गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
86 - गयाके तीर्थोंकी महिमा तथा आदिगदाधरका माहात्म्य
ब्रह्माजीने कहा - इस गयाक्षेत्रमें जो विख्यात प्रेतशिला है, वह प्रभास, प्रेतकुण्ड एवं गयासुरशीर्ष नामक तीर्थोंमें तीन प्रकारसे अवस्थित है। सर्वदेवमयी इस शिलाको धर्मदेवताके द्वारा ऐश्वर्यक लिये धारण किया गया है। अपने मित्रादिक बन्धु - बान्धवोंमें जिन लोगोंको प्रेतयोनि प्राप्त हो गयी है, उनका उद्धार करनेके लिये यह प्रेतशिला शुभ है। अतएव मुनिजन, नृपगण तथा राजपत्न्यादि इस प्रेतशिलापर आ करके अपने पितृजनोंके लिये श्राद्धादिकर ब्रह्मलोक प्राप्त करते हैं।
गयासुरके मुण्डके पृष्ठभागमें जो शिला स्थित है, उसका नाम 'मुण्डपृष्ठगिरि' है, इसी कारण यह पर्वत सर्वदेवमय है। इसके पाददेशमें ब्रह्मसरोवरादि अनेक तीर्थ हैं। उन तीर्थोंमें एक अरविन्दवन नामक तीर्थ है। उस वनसे सुशोभित होनेके कारण उसके पर्वतीय प्रान्त - भागको 'अरविन्दगिरि' कहते हैं। वहाँपर क्रौञ्च पक्षियोंक चरण - चिह्न विद्यमान रहते हैं। इसलिये वह पर्वतीय भाग 'क्रौञ्चपाद' के नामसे प्रसिद्ध है। श्राद्धांदि करनेसे वह तीर्थ पितरोंको ब्रह्मलोक प्रदान करता है।
आदिकालसे ही यहाँपर आदिदेव भगवान् गदाधर विष्णु अव्यक्तरूपमें शिलारूपसे स्थित हैं। इसलिये यह शिला देवमयी कही गयी है। यह शिला गयासुरके सिरको आच्छादित करके वर्तमान समयमें भी अपने गुरुत्व भावके कारण चारों ओरसे अवस्थित है। कालान्तरमें महारुद्रादि देवोंके साथ आदि - अन्तसे रहित हरि आदि गदाधरके रूपमें व्यक्त होकर यहाँ स्थित हो गये हैं।
जिस प्रकार पूर्वकालमें धर्म - संरक्षण एवं अधर्म - विनाशके निमित्त दैत्यों और राक्षसोंका संहार करनेके लिये मत्स्यावतार हुआ। जैसे कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, दाशरथी राम, कृष्ण और बुद्ध हुए। तदनन्तर कल्कि अवतार भी हुआ। उसी प्रकार यहाँपर व्यक्ताव्यक्त भगवान् आदि गदाधर प्रकट हुए।
आदिकालमें इसी पवित्र तीर्थपर ब्रह्मादि देवोंने आदिदेव भगवान् गदाधर विष्णुकी पूजा की थी। इसलिये यहाँपर अर्घ्य, पाद्य, पुष्पादिक उपहारोंसे उन भगवान् गदाधरकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य इस तीर्थमें जाकर अन्य देवताओंके साथ इन आदिदेव भगवान् गदाधरको अर्घ्य - पात्र, पाद्य, गन्ध, पुष्प, धूप, सुन्दर नैवेद्य, विविध प्रकारके पुष्पोंसे बनी हुई मालाएँ, वस्त्र, मुकुट, घण्टा, चामर, दर्पण, अलंकार, पिण्ड, अन्न तथा अन्यान्य वस्तुओंको प्रदान करता है, वह जबतक इस पृथिवीपर जीवित रहता है, तबतक धन, धान्य, आयु, आरोग्य, सम्पदाओं, पुत्र - पौत्रादिक संतति, श्रेय, विद्या, अर्थ एवं अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त करता है। भार्याको प्राप्तकर (अन्तमें) स्वर्गका निवासी बन जाता है। तदनन्तर वह पुन: पृथिवीपर जन्म लेकर राज्यसुख प्राप्त करता है। वह श्रेष्ठ कुलीन मनुष्य सत्त्वसम्पन्न होकर युद्धभूमिमें शत्रुओंको पराजित करनेमें समर्थ रहते हुए वध और बन्धनसे विमुक्त होकर मृत्युके पश्चात् मोक्ष प्राप्त करता है।
जो इस गयातीर्थमें अपने पितृजनोंके लिये श्राद्ध तथा पिण्डदानादिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेवाले हैं, वे उन पितृगणोंके साथ स्वयं भी ब्रह्मलोकगामी होते हैं।
(वधबन्धविनिर्मुक्तश्चान्ते मोक्षमवाप्नुयात्।
श्राद्धपिण्डादिकर्तार: पितृभिर्ब्रह्यलोकगा:।)
जो व्यक्ति पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाकर भगवान् जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्रकी पूजा करते हैं, वे लोग ज्ञान, लक्ष्मी तथा पुत्रादिकोंको प्राप्तकर अन्त समयमें भगवान् पुरुषोत्तम विष्णुके सांनिध्यमें चले जाते हैं। जो मनुष्य वहाँ स्थित भगवान् पुरुषोत्तम जगन्नाथ, सूर्यदेव और गणनायक विघ्नेश्वरके समक्ष पितरोंके लिये पिण्डदानादिक कार्य करते हैं, उन लोगोंको वह सम्पूर्ण कृत्य ब्रह्मलोक प्रदान करता है।
इस क्षेत्रमें विद्यमान कपर्दी भगवान् शिव और गणेशको नमस्कार करके मनुष्य समस्त विघ्नोंसे मुक्त हो जाता है। यहाँपर विराजमान भगवान् कार्तिकेयका पूजनकर ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। द्वादशादित्य सूर्यदेवकी सम्यक् अर्चनासे पुरुष सर्वरोग - विमुक्त हो जाता है। भगवान् वैश्वानर अग्निदेवकी विधिवत् पूजा करके पुरुष उत्तम कान्ति प्राप्त करता है। रेवन्त देवकी पूजा करके मनुष्य उत्तम जातिके अश्रोंको प्राप्त करता है। देवराज इन्द्रकी भलीभाँति पूजा करके महान् ऐश्वर्य एवं गौरीदेवीकी पूजा करके सौभाग्यकी प्राप्ति करनी चाहिये। मनुष्य सरस्वतीदेवीकी पूजा करके विद्या, लक्ष्मीकी पूजा करके सम्पत्ति तथा गरुडकी पूजा करके विघ्नोंके समूहोंसे विमुक्त हो जाता है।
क्षेत्रपगालदेवकी पूजा करके व्यक्ति ग्रहोंके समूहसे निर्मुक्त हो जाता है। मुण्डपृष्ठकी पूजा करके अपनी सम्पूर्ण अभिलाषाओंकी पूर्ति करनी चाहिये। अष्टनागदेवकी पूजा करके प्राणी सर्पदंशसे मुक्त हो जाता है । ब्रह्याकी पूजा करके ब्रह्यलोकका पुणय अर्जित करना चाहिये। भगवान् बलभद्रकी सम्यक् पूजा करके शक्ति और आरोग्य तथा सुभद्रादेविकी विधिवत् पूजा करके परम सौभगयकी प्राप्ति होती है। भगवान् पुरुषोत्तम जगन्नाथकी पूजा करनेसे सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति होती है। भगवान् नारायणकी पूजा करके वह मनुष्योंका अधिपति होता है।
नृसिंहदेवके चरणोंका स्पर्श एवं नमन करके मनुष्य संग्राममें विजयी होता है। वराहदेवकी पूजा करके वह पृथिवीका राज्य प्राप्त करता है तथा मालाधर एवं विद्याधरका स्पर्श करके विद्याधरोंके पदको प्राप्त कर लेता है।
भगवान् आदिगदाधरकी सम्यक् पूजा करके प्राणी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण कर लेता है। भगवान् सोमनाथकी पुजासे
शिवलोकको प्राप्त करता है। रुद्रदेवको नमस्कार करके रुद्रलोकमें प्रतिष्टापित होता है।
रामेश्वर - शिवको प्रणाम करके मनुष्यको रामके समान अतिशय प्रिय बनाना चाहिये। भगवान् ब्रह्ये श्वरकी पूजा करके ब्रह्यलोक - प्राप्तिकी योग्यता प्रास करनी चाहिये। कालेश्वरकी भलीभाँती पूजा करके कालजयी बनाना चाहिये। केदारनाथकी पूजा करके शिवलोकमें प्रतिष्टा प्रास करनी चाहिये और भगवान् सिद्धेश्वरकी पूजा करके मनुष्यको ब्रह्यलोक प्राप्त करना चाहिये।
आद्यदेव रुद्र आदिके साथ भगवान् आदिगदधार विष्णुका दर्शन करके आपने सौ कुलोंका उद्धार कर उन्हें ब्रह्यलोक प्राप्त कराये। आदिगदाधरकी पुजासे धर्मार्थो धर्मको, धनार्थो धनको ,कामार्थो कामको तथा मोक्षार्थो मोक्षको प्राप्त करता है।
इनकी पुजासे राज्य चाहनेवाला पुरुष राज्य और शान्तिका इच्छुक शान्ति प्राप्त कर लेता है। सब प्रकारकी कामना करनेवाला सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इन भगवान् आदिगदाधरकी अर्चनासे पुत्रकी कामना करनेवाली स्त्रीको पुत्र , सौभाग्य चाहनेवालीको सौभाग्य तथा वंशाभिवृद्धिकी इच्छुक स्त्रीको वंशाभिवृद्धिका पुणय प्राप्त करना चाहिये।
मनुष्य श्राद्ध, पिण्डदान, अन्नदान और जलदानके द्वारा भगवान् गदाधरदेवकी विधिवत् पूजा करके ब्रह्यलोक प्राप्त करता है। पृथिवीपर अवस्थित सभी तीर्थोंकी अपेक्षा जिस प्रकार गयापुरी श्रेष्ट है , उसी प्रकार शिलाके रूपमें विराजमान गदाधर श्रेष्ट हैं । उनकी मूर्तिका दर्शन करनेसे सम्पूर्ण शिलाक दर्शन हो जाता है ; क्योंकि सब कुछ तो भगवान् गदाधर विष्णु ही हैं -
श्राद्धेन पिण्डदानेन अन्नदानेन वारिदः॥
ब्रह्यलोकमवाप्नोति सम्पूज्यादिगदाधरम्।
पृथिव्यां सर्वतीर्थोभ्यो यथा श्रेष्टा गयापुरी॥
तथा शीलादीरूपश्च श्रेष्टशचैव गदाधरः।
तस्मिन् दृष्टे शिला दृष्टा यतः सर्वं गदाधरः॥