गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
216 - बलिवैश्वदेव निरूपण
ब्रह्मजीने कहा - अब मैं वैश्वदेव - बलिविधिका विधान बतलाता हूँ। यह होमका एक प्रारम्भिक उत्तम स्वरूप है। पहले अग्निको जलाकर अग्निका पर्युक्षण करे, तदनन्तर ‘ॐ कव्यादमग्नि०’ इत्यादि मन्त्रसे अग्निके लिये कुछ हव्यांशका परित्याग करे। इसके बाद ‘ॐ पावक वैश्वानर०’ मन्त्रको पढ़कर अग्निका आवाहन करे और ॐ प्रजापतये स्वाहा। ॐ सोमाय स्वाहा। ॐ बृहस्पतये स्वाहा। ॐ अग्निषोमाभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहा। ॐ द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्य: स्वाहा। ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ अद्भ्यः स्वाहा। ॐ ओषधिवनस्पतिभ्य: स्वाहा। ॐ गृह्याय स्वाहा। ॐ देवदेवताभ्य: स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ इन्द्रपुरुषेभ्य: स्वाहा। ॐ यमाय स्वाहा। ॐ यमपुरुषाय स्वाहा। ॐ सर्वेभ्यो भूतेभ्यो दिवाचारिभ्य: स्वाहा। ॐ बसुधापितृभ्य: स्वाहा - इन मन्त्रोंसे अग्निमें आहुति दे। तदनन्तर ‘ॐ ये भूता
(ये भूता: प्रचरन्ति दीनाश्च निमिहन्तो भुवनस्य मध्ये।
तेभ्यो बलिं पुष्टिकामो ददामि मयि पुष्टिं पुष्टिपतिर्दधातु॥)
प्रचरन्ति०’ का पाठ करते हुए बलि और पुष्टि प्रदान करनेकी प्रार्थना करे। अन्तमें ‘ॐ आचाण्डालपतितवायसेभ्यो नमः’ इस मन्त्रसे भी काक आदिको बलि प्रदान करे।
(इस अध्यायमें बलिवैश्वदेवकी विधि अन्य शाखाके अनुसार है। माध्यन्दिन शाखाके लोगोंके लिये ‘पारस्करगृह्यसूत्र’के अनुसार संक्षिप्त एवं प्रामाणिक ‘बलिवैश्वदेवविधि’ गीताप्रेससे प्रकाशित ‘नित्यकर्म - पूजाप्रकाश’में द्रष्टव्य है।)