गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
146 - निदानका अर्थ तथा रोगोंका सामान्य निदान - निरूपण
धन्वन्तरिजीने कहा - हे सुश्रुत! प्राचीन कालमें आत्रेय आदि श्रेष्ठ मुनियोंने जिस प्रकार सभी रोगोंका निदान बताया है, वैसे ही मैं तुम्हें सुनाऊँगा। पाप्मा, ज्वर, व्याधि, विकार, दु:ख, आमय, यक्ष्मा, आतङ्क, गद और आबाध - ये पर्यायवाची शब्द हैं।
रोगके ज्ञानके पाँच उपाय हैं - निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति। निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान तथा कारण - इन पर्यायोंसे निदान कहा जाता है अर्थात् निमित्त आदि शब्दोंसे जिस वस्तुका निश्चय होता है वही निदान है। दोष - विशेषके ज्ञानके बिना ही उत्पन्न होनेवाला रोग जिन लक्षणोंसे जाना जाता है, उसे पूर्वरूप कहते हैं। यह पूर्वरूप सामान्य और विशिष्ट - भेदसे दो प्रकारका होता है। यह उत्पद्यमान रोग जिन लक्षणोंसे जाना जाता है, उन लक्षणोंको अल्पताके कारण थोड़ा व्यक्त होनेसे पूर्वरूप कहा जाता है। वही पूर्वरूप व्यक्त हो जानेपर रूप कहलाता है। संस्थान, व्यञ्जन, लिङ्ग, लक्षण, चिह्न और आकृति - ये रूपके पर्यायवाची शब्द हैं। हेतु - विपरीत, व्याधि - विपरीत, हेतु - व्याधि - उभय - विपरीत तथा हेतु - विपरीत अर्थकारी (हेतुके समान प्रतीत होनेपर भी विपरीत क्रिया करनेवाला),व्याधि - विपरीत अर्थकारी और हेतु - व्याधि - उभय - विपरीत अर्थकारी औषध, अन्न तथा विहारके परिणाममें सुखदायक उपयोगको उपशय कहते हैं, इसीका नाम सात्म्य भी है। उपशयके विपरीत अनुपशय होता है। इसका दूसरा नाम व्याध्यसात्म्य भी है। दोष जिस प्रकार (प्राकृत आदि विविध) निदानोंसे दूषित होकर (ऊर्ध्व आदि भिन्न गतियोंके द्वारा शरीरमें) विसर्पण करते हुए (धातु आदिको दूषित कर) रोगको उत्पन्न करता है, उसे सम्प्राप्ति कहा जाता है। उसके पर्यायवाची शब्द हैं - जाति तथा आगति।
संख्या, विकल्प, प्राधान्य, बल और व्याधि कालकी विशेषताओंके आधारपर उस सम्प्राप्तिके भेद किये जाते हैं। जैसे इसी शास्त्रमें बताया जायगा कि ज्वरके आठ भेद होते हैं (यह संख्या सम्प्राप्ति हुई)। रोगोत्पत्तिमें कारणभूत दोषोंकी अंशांशकल्पना (न्यूनाधिक्य आदि) - का विवेचन विकल्प सम्प्राप्ति स्वतन्त्रता और परतन्त्रता द्वारा दोषोंका प्राधान्य या अप्राधान्य - विवेचन प्राधान्य सम्प्राप्ति, हेतु - पूर्वरूप और रूपकी सम्पूर्ण अथवा अल्पताके द्वारा बल या अबलका विवेचन बल सम्प्राप्ति और दोषानुसार रात्रि, दिन, ऋतु एवं भोजन ( - के परिपाक) - के अंश (आदि, मध्य और अन्त) - द्वारा रोगकालके ज्ञानको कालसम्प्राप्ति समझना चाहिये।
इस प्रकार निदानके सामान्य अभिधेयों (निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति) - का निरूपण किया गया। सम्प्रति उनका विस्तारसे वर्णन किया जायगा। सभी रोगोंके मूल कारण [शरीरमें स्थित] कुपित दोष ही हैं। किंतु दोष - प्रकोपका भी कारण अनेक प्रकारके अहितकर पदार्थोका सेवन है। यह अहितसेवन तीन प्रकार (असात्प्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध तथा परिणाम) - का होता है, इन तीनों योगोंकों पहले बताया जा चुका है।
वात - प्रकोपका निदान
तिक्त, उष्ण, कटु, कषाय, अम्ल और रुक्ष खाद्यान्नका असंयमित आहार, दौड़ना, जोरसे बोलना, रात्रि - जागरण तथा उच्च भाषण, कार्योमें विशेष अनुरक्ति, भय, शोक, चिन्ता, व्यायाम एवं मैथुन करनेसे शरीरके अन्तर्गत विद्यमान वायु प्रकुपित हो जाती है। विशेषत: यह वायु - विकार ग्रीष्म - ऋतुके दिन तथा रात्रिमें भोजन करनेके पश्चात् पाकके अन्तमें होता है।
पित्त - प्रकोपका निदान
कटु, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण, लवण तथा क्रोधोत्पादक एवं दाहोत्पादक आहार करनेसे पित्त प्रकुपित होता है। पित्तका यह प्रकोप शरद् - ऋतुके मध्याह्न, अर्धरात्रि तथा अन्य दाह उत्पन्न करनेवाले क्षणोंमें विशेषरूपसे होता है।
कफ - प्रकोपका निदान
मधुर अम्ल,( अ०हृ०अ0 2।17-18) लवण, स्निग्ध, गुरु, अभिष्यन्दी तथा शीतल भोजनोंके प्रयोगसे, बैठे रहनेसे, निद्रासे, सुख - भोगसे, अजीर्णसे, दिवा - शयनसे, अत्यन्त बलकारक पदार्थोके प्रयोगसे, वमन आदि न करनेसे, भोजनके परिपाकके प्रारम्भकालमें, दिनके प्रथम भागमें तथा रात्रिके प्रथम भागमें कफ कुपित होता है और दो - दो दोषोंके प्रकोपक आहार - विहारका सेवन करनेसे दो - दो दोष प्रकुषित होते हैं।
त्रिदोष - प्रकोपका निदान एवं सब रोगोंकी सामान्य सम्प्राप्ति
त्रिदोषके (वात - पित्त(अ०हृ०नि०अ0 2।19-23 (चिकित्सादर्श परि0 पृ0 9 वैद्य राजेश्वरशास्त्रीकृत)तथा श्लेष्मा - इन सभीके) प्रकुपित तथा मिश्रित स्वभावसे सन्निपातकी उत्पत्ति होती है। संकीर्ण भोजन, अजीर्णतामें भोजन, विषम तथा विरुद्ध भोजन, मद्यपान, सूखे शाक, कच्ची मूली, पिण्याक (खली), मृत्युवत्सर पूति (सत्तू) शुष्क, कृशा, मांस तथा मत्स्यादिका भक्षण करनेसे, वात - पित्त एवं श्लेष्मोत्पादक विभिन्न पदार्थोके उपभोगसे, आहार्य अन्नका परिवर्तन, धातुजन्य - दोष, वात - पित्त, श्लेष्माका परस्पर मिलकर उपद्रव करनेसे शरीरमें यह विकार (सन्निपात)उत्पन्न होता है। दूषित कच्चे अन्नका प्रयोग करनेसे, श्लेष्माजनित विकारसे तथा ग्रहोंके प्रभावसे, मिथ्या आहार - व्यवहारके योगसे, पूर्वजन्ममें संचित विभिन्न पापोंके प्रभाववश किये गये दुराचरणसे, स्त्रियोंमें प्रसव- कालकी विषमता तथा मिथ्योपचारसे शरीरमें सन्निपातकी विकृति उत्पन्न होती है। इस प्रकार प्रकृपित वात आदि दोष रोगोंके अधिष्ठानोंमें जानेवाली रसवाहिनियोंके द्वारा शरीरमें पहुँचकर अनेक प्रकारके विकारोंको उत्पन्न करते हैं।