गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
69 - मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण - विधि
सूतजीने कहा - श्रेष्ठ हाथी, जीमूत (मेघ), वराह, शङ्ख , मत्स्य, सर्प, शुक्ति तथा बाँसमें उत्पन्न मुक्ताफलोंकी संसारमें प्रसिद्धि है; किंतु इनमें शुक्ति (सीप) - में प्रादुर्भूत मुक्ताएँ ही अधिक उपलब्ध हैं।
मुक्ताशास्त्री कहते हैं कि इन मुक्ताओंमें मात्र एक ही ऐसी मुक्ता होती है, जिसको रत्नपदपर अधिष्ठित किया जा सकता है। वह शुक्तिसे उत्पन्न होनेवाली मुक्ता है। यह सूचिकादि यन्त्रोंसे वेध्यहोती है, शेष मुक्ताएँ अवेध्य हैं।
प्राय: बाँस, हाथी, मत्स्य, शङ्ख एवं वराहसे उत्पन्न मुक्ताएँ प्रभाविहीन होती हैं; फिर भी माङ्गलिक होनेसे वे प्रशस्त मानी जाती हैं।
रत्ननिर्णायक विद्वानोंने मुक्ताओंके जिन आठ प्रकारोंका वर्णन किया है, उनमें शङ्ख से उत्पन्न और हाथीसे प्राप्त होनेवाली मुक्ताको अधम कहा है।
शङ्खसे उत्पन्न मुक्ता, अपने मूल कारणके मध्यभागमें अवस्थित वर्णके समान वर्णवाली तथा परिमाणमें बृहल्लोल फलके सदृश होती है। जो मुक्ता हाथीके कुम्भस्थलसे निकलती है, वह पीतवर्णवाली एवं प्रभाविहीन होती है। जो शङ्खोद्भव मुक्ताएँ हैं, वे शार्ङ्गधनुषके तुल्य वर्णको प्राप्त पीतशङ्खोंके श्रेष्ठ गोत्रमें ही उत्पन्न होती हैं। जो गजमुक्ताएँ हैं, उनका भी जन्म विशुद्ध वंशवाले मदमत्त गजराजोंमें होता है, उन्हें मौक्तिकप्रभव अर्थात् गजमुक्ता नामसे अभिहित किया गया है। इनसे प्राप्त मुक्ता पूर्णतया पीतवर्णसे युक्त एवं प्रभाविहीन होती है।
मत्स्यसे उत्पन्न मुक्ता पाठीन मत्स्यके पीठके समान वर्णवाली, अत्यन्त सुन्दर, वृत्ताकार, लघु एवं अत्यधिक सूक्ष्म होती है। यह जलचर प्राणियोंके मुखोंमें प्राप्त होती है, उनमें भी जो मत्स्य अथाह समुद्रकी जलराशिमें विचरण करते हैं, वे इसके जनक होते हैं।
वराहके दाँतसे उत्पन्न मुक्ता उसके ही दन्ताङ्कुरोंके सदृश वर्णवाली होती है, किंतु ऐसी मुक्ता प्रदान करनेवाले विशिष्ट वराहराज कहीं किसी विशेष भूप्रदेशमें ही पाये जाते हैं।
बाँसके पर्वोंसे उत्पन्न मुक्ताएँ वर्षोपल (ओले) - के समान समुज्ज्वल वर्णकी सुन्दर शोभासे सुशोभित रहती हैं। ऐसी मुक्ताओंके जनक बाँसोंके वंश दिव्यजनोंके लिये उपभोग्य विशेष स्थानमें अङ्कुरित होते हैं। वे सार्वजनिक स्थानोंमें नहीं पाये जाते।
सर्पमुक्ता मत्स्यमुक्ताके सदृश विशुद्ध तथा वृत्ताकार होती है। स्थान - विशेषके कारण उसकी अत्यन्त उज्ज्वल शोभा होती है। इसकी कान्ति शाणपर चढ़ायी गयी तलवारकी धारके समान अत्यन्त स्वच्छ होती है। सर्पोंके सिरसे प्राप्त होनेवाली इस मुक्ताको अर्जित करनेवाले मनुष्य अतिशय प्रभासम्पन्न, राज्यलक्ष्मीसे युक्त तथा दुःसाध्य महान् ऐश्वर्यसम्पन्न, तेजस्वी एवं पुण्यवान् होते हैं।
रत्नोंके गुण एवं अवगुणोंको जाननेकी इच्छासे यदि रत्न - विधियोंमें पूर्ण अधिकार रखनेवाले विद्वानोंके द्वारा शुभ मुहूर्त्तमें प्रयत्नपूर्वक समस्त रक्षाविधिसे सम्पन्न भवनके ऊपर उस मुक्ताको स्थापित करा दिया जाय तो उस समय आकाशमें देव - दुन्दुभियोंकी ध्वनि परिव्याप्त हो उठती है। इन्द्रधनुषकी टंकार, विद्युल्लताओंके संघर्षण एवं सघन पयोधरोंकी पारस्परिक टकराहटसे अन्तरिक्ष आच्छादित हो उठता है।
जिसके कोशागारमें यह सर्पमुक्ता रहती है, उसकी मृत्यु सर्प, राक्षस, व्याधि या अन्य आभिचारिक दोषके कारण नहीं होती।
मेघसे उत्पन्न होनेवाली मुक्ता पृथ्वीतक आ ही नहीं पाती। देवगण आकाशमें ही उसका हरण कर लेते हैं। उस मेघमुक्ताके तेजकी दिव्य कान्तिसे अनावृत समस्त दिशाएँ आलोकित हो उठती हैं। सूर्यके समान देदीप्यमान उसका परिमण्डल देखनेमें कष्टसाध्य होता है। अग्नि, चन्द्र, नक्षत्र तथा ताराओंके तेजको तिरस्कृत करके जैसे सूर्यके कारण दिन प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार गहन अन्धकारसे भरी हुई रात्रियोंमें भी उस मेघमुक्ताका तेज दिनकी प्रभाके समान ही प्रभाको विकीर्ण करता है। विचित्र रत्नकान्तिको प्राप्त सुन्दर आभूषणको प्रशस्त बनानेके लिये जलराशिवाले चारों समुद्रोंसे इस मुक्ताका जन्म हुआ है। मेरा पूर्ण विश्वास है कि इसका कोई मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता। यह जिसके पास रहती है, वह राजा होता है। उसके राज्यकी सम्पूर्ण भूमि सोनेसे परिपूर्ण होती है। कदाचित् शुभ तथा महान् कर्मविपाकसे यदि कोई दरिद्र भी इस मेघमुक्ताको प्राप्त कर लेता है तो उस व्यक्तिके पास जबतक यह रहती है, तबतक वह शत्रुओंसे रहित सम्पूर्ण पृथिवीका उपभोग करता है।
यह मेघमणि मात्र राजाके लिये ही शुभप्रद है, ऐसा नहीं है, अपितु प्रजाओंके भाग्यसे भी इसका जन्म होता है। यह अपने चारों ओर सहस्त्र योजनपर्यन्त क्षेत्रमें अनर्थोंको आने नहीं देती।
दैत्यराज बलासुरके मुखसे विशीर्ण हुई दन्तपंक्ति आकाशमें फैली हुई नक्षत्रमालाके समान प्रतीतहोती थी। विचित्र वर्णोंमें भी अपना विशुद्ध स्थान रखनेवाली वह दन्तावलि आकाशसे उस समुद्रकी जलराशिमें गिरी, जो पूर्णिमाके चन्द्रकी समस्त घोडशकलाओंको तिरस्कृत करनेमें समर्थ महागुणसम्पन्न मणिरत्नका निधान है। समुद्रके जलमें उसे शुक्तिमें स्थान प्राप्त हुआ। अत: वह सामुद्रिक मुक्ताका प्राचीन बीज बन गया, जिससे अन्य मुक्ताओंका उद्धव हुआ। समुद्रके जिस जल - प्रदेशमें सुन्दर रत्न मुक्तामणिके बीज गिरे, उसीप्रदेशमें वे बीज फैलकर शुक्तियोंमें स्थित होनेके कारण मुक्तामणि (मोती) हो गये। अतएव सिंहल, परलोक, सौराष्ट्र, ताम्रपर्ण, पारशव, कुबेर, पाण्ड्य, हाटक और हेमक - ये मुक्ताओंके खजाने हैं।
वर्धन, पारसीक, पाताल, लोकान्तर तथा सिंहलादिकी शुक्ति - मुक्ताएँ प्रमाण, स्थान, गुण और कान्तिकी दृष्टिसे अन्य क्षेत्रोंमें प्राप्त होनेवाली मुक्ताओंकी तुलनामें अत्यधिक हीन वर्णकी नहीं होती हैं। अतः विद्वान् व्यक्तिको उनके मूल उत्पत्ति - स्थानको लेकर चिन्तन नहीं करना चाहिये, बल्कि उनके रूप एवं प्रमाणपर ही विशेष ध्यान देनेकी आवश्यकता होती है। इस प्रकारकी मुक्तासे सम्बन्धित गुण - अवगुणकी कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। ये सर्वत्र सब प्रकारकी आकृतियोंमें पायी जाती हैं।
शुक्तिसे उत्पन्न एक मुक्ताफलका मूल्य एक हजार तीन सौ पाँच मुद्रा होता है। आधे तोले भारवाली मुक्ताका मूल्य उक्त मूल्यकी अपेक्षा 2 /5 भाग कम होता है। जिस मुक्ताका भार तीन माशा अधिक हो, उसका मूल्य दो हजार मुद्रा कहा गया है।
ढाई माशा परिमाणवाली मुक्ताका मूल्य तेरह सौ मुद्रा होता है। जो मुक्ता दो माशा परिमाणकी होती है, उसका मूल्य आठ सौ मुद्रा है। जिसका परिमाण आधा माशा है, उसका मूल्य तीन सौ बीस मुद्रा है। जो मुक्ता भारमें छ: गुंजाके बराबर है, पण्डितोंने उसका मूल्य दो सौ मुद्रा स्वीकार किया है। जिसका परिमाण तीन गुंजा है, वह एक सौ मुद्राकी होती है। जो मुक्ता उक्त परिमाणमें सोलहवाँ भाग है, विद्वानोंने उसको दार्विका कहा है। उसका मूल्य एक सौ दस मुद्रा होता है।
जिस मुक्ताका कथित परिमाणकी तुलनामें भार 1/20 भाग होता है, उसको विद्वानोंने भवककी संज्ञा प्रदान की है। यदि वह मुक्ता गुणहीन न हो तो उसका मूल्य सत्तानबे मुद्रा होता है। जो मुक्ता उक्त स्वाभाविक परिमाणमें 1/30 भागकी होती है, उसको शिक्य कहा जाता है। उसका मूल्य चालीस मुद्रा होता है। जिसका परिमाण कहे गये परिमाणकी अपेक्षा 1 /40 वाँ अंश हो तो उसका मूल्य तीस मुद्रा है। जो मुक्ता 1/40 वाँ अंश परिमित होती है, उसे सोम कहा जाता है। उसका मूल्य बीस मुद्रा है। जो मुद्रा 1/30 अंशके बराबर होती है, उसको निकरशीर्ष कहा जाता है। वह चौदह मुद्रा मूल्यकी होती है। 1/80 तथा 1/90 अंश परिमित मुक्ताको कृप्य नामसे अभिहित किया गया है। उनका मूल्य क्रमश: ग्यारह और नौ मुद्रा है।
विशुद्धताके लिये मुक्ताओंको अन्नपात्र (अर्थात् अन्न रखनेवाले मटके) - में भरे हुए जम्बीर - रसमें डालकर पकाना चाहिये। तत्पश्चात् उनकी मूल आकृतियोंको घिसकर चिक्कण एवं समुज्जवल आकार प्रदान करके उनमें यथाशीघ्र छेद भी कर देना चाहिये।
सर्वप्रथम पूर्णतया आर्द्र मिट्टीसे लिप्त मत्स्य पुटपाक और फिर बिडाल पुटपाकमें मुक्ताओंका पाचन करे। उसके बाद उन्हें चिकना और उज्ज्वल बनानेके लिये उसमेंसे निकालकर दूध अथवा जल या सुधारसमें पकाया जाता है। तदनन्तर स्वच्छ वस्त्रसे घिस - घिसकर उन्हें उज्ज्वल और चमकदार रूप प्रदान किया जाता है। ऐसा करनेसे वह मौक्तिक अत्यधिक गुणवान् तथा कान्तिसे युक्त हो जाता है। महाप्रभावशाली, सिद्ध एवं संतप्तजनोंके हितमें लगे रहनेवाले, दयावान् आचार्य व्याडिने ऐसा ही कहा है।
रसविशेषमें शोधित वही मुक्ता शरीरका अलङ्कार होती है - जो श्रेत काँचके समान हो, स्वर्णजटित हो तथा रत्नशास्त्रके अनुसार सुपरीक्षित होनेके कारण (तार) कष्टका निवारण करनेवाली हो। सिंहल - देशके कुशलजन ऐसा ही (शोधनादिकार्य) करते हैं।
यदि किसी मुक्ताके कृत्रिम होनेका संदेह हो तो उसको लवणमिश्रित उष्ण, स्नेह द्रव्यमें एक रात रखकर सूखे वस्त्रमें वेष्टित करके यथायोग्य धान्यके साथ उसका मर्दन करे। ऐसा करनेसे यदि उसमें विवर्ण भाव नहीं आता है तो उसको स्वाभाविक मुक्ता ही मानना चाहिये।
यथोक्त प्रमाणवाली गुरु, श्वेत, स्निग्ध, स्वच्छ, निर्मल एवं तेजसम्पन्न, सुन्दर एवं वृत्ताकार मुक्ता गुणसम्पन्न मानी गयी है। प्रमाणमें बड़ी - बड़ी, सुन्दर, रश्मि - कान्तिसे परिपूर्ण, श्वेत, सुवृत्ताकार, समान एवं सूक्ष्म छिद्रसे युक्त जो मुक्ता होती है, वह क्रय न करनेवाले व्यक्तिको भी आनन्दित करती है। (उत्तम मुक्ताका क्रय - (मुक्ता विक्रय) करनेसे रुपये मिलते हैं, उससे आनन्दानुभूति होती है। क्रय किये बिना भी अपनी उत्तमताके कारण यथाविधि यदि मुक्ता धारण की जाय तो वह स्वयं विविध ऐश्वर्य देती ही है। इसलिये आनन्दानुभूति दोनों दशा (क्रय करने, न करने) - में समान है।) अत: ऐसी मुक्ताको प्रशस्त मानना चाहिये।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि रत्नशास्त्रीय परीक्षा - विधिके अनुसार जिस मुक्तामें सभी गुणोंका उदय हो गया है, यदि वह मुक्ता किसी पुरुषका योग (संयोग) प्राप्त कर लेती है तो वह अपने स्वामीको किसी भी प्रकारके एक भी अनर्थोत्पादक दोषके सम्पर्कमें नहीं आने देती।