220 - सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि

श्री ब्रह्माजीने कहा - हे व्यासजी! अब मैं सपिण्डीकरण श्राद्धका वर्णन करता हूँ। मृत्युके सालभर बाद मृत्यु - तिथिपर यह श्राद्ध करना चाहिये। इस श्राद्धको यथासमय विधिवत्‌ करनेसे प्रेतको पितृलोककी प्राप्ति होती है। सपिण्डीकरणश्राद्ध अपराह्णमें करना चाहिये, सभी अनुष्ठान प्राय: अन्य श्राद्धोंक समान करे। (इसमें जो विशेष है वही कहा जा रहा है।) पितामहादिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंको निमन्त्रित कर ‘ॐ पुरूरवोमाद्रवसंज्ञकेभ्यो०’ से वामपार्श्वमें आसन रखकर पुरूरवा और माद्रव नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहिये। ‘पितामहप्रपितामहानां०’ इत्यादि वाक्यसे श्राद्धकी पितामह आदिके प्रतिनिधि ब्राह्मणोंसे अनुज्ञा ग्रहणकर तीन पात्र स्थापित करे। उन पात्रोंके ऊपर कुश रखकर दूसरे पात्रसे उन्हें ढक दे और आवाहन करे। इसके बाद अन्य श्राद्धोंके समान अच्छिद्रावधारणतककी क्रिया(पितरोंके उद्देश्यसे की गयी विधिकी पूर्णताकी प्रार्थना ही ‘अच्छिद्रावधारण’ है।) करके सपत्नीक पिताको प्रेतपद अन्तमें प्रयुक्तकर उनका नाम उच्चारण करे। श्राद्धकी अनुज्ञा ले ले। तदनन्तर देव पात्राच्छिद्रावधारण(अर्घ्यपात्रके छिद्ररहित होनेका निश्चय करना ही ‘देवपात्राच्छिद्रावधारण’ है।) करे। यथाविधान कार्योंको सम्पन्नकर पितामह, प्रपितामह, वृद्धप्रपितामहके पात्रोंका क्रमसे संचालन और उद्घाटनकर ‘ॐ ये समाना: समनसो०’ इत्यादि मन्त्रोंसे पितृपात्रका जल पितामह और प्रपितामहके पात्रमें छोड़े। वृद्धप्रपितामहके पात्रको छोड़कर पितामह, प्रपितामहके पात्रका जल और पवित्रक पितृ - पात्रमें निक्षिप्त करे। तदनन्तर पितृ - ब्राह्मणके हाथमें अर्घ्यपात्रस्थ पवित्रक देकर उसमें स्थित पुष्प ब्राह्मणोंके सिर, हाथ और चरणोंमें समर्पित करना चाहिये। इसके बाद ब्राह्मणोंके हाथमें जल देकर दोनों हाथोंसे अर्घ्यपात्र उठाकर ‘ॐ या दिव्या०’ इत्यादि मन्त्रका पाठकर ‘अमुक गोत्र मत्पितामह०’ इस वाक्यसे पितृ - पात्रसे कुछ अध्योदक पितामहके प्रतिनिधि ब्राह्मणके हाथमें प्रदान करे तथा पवित्रकके सहित अवशिष्ट कुछ जल पिण्डसेचनके लिये रखकर अन्य पात्रसे आच्छादितकर पितृ - ब्राह्मणके वामपार्श्वमें दक्षिणाग्रकुशके ऊपर ‘पितृभ्यः स्थानमसि’ यह पढ़कर अधोमुख स्थापित करे।

इसके बाद पितामह - प्रपितामह आदिको गन्धादि देकर ‘अग्नौकरण ‘(अग्नौकरण - एक विशेष विधि है। इसमें अपसव्य होकर जलमें दो आहुति दी जाती है।) करे तथा अवशिष्ट अन्नको प्रपितामह आदिके पात्रमें डाल दे। इसी प्रकार पितामहादिका पात्राभिमन्त्रणपर्यन्त कर्म सम्पन्नकर ब्राह्मण पात्राभिमन्त्रण, अंगुष्ठनिवेशन, तिल - विकरणपूर्वक ‘ अमुक गोत्र० ‘ इत्यादि वाक्य कहकर घृताक्त अन्न आदिका निवेदन करे।

तत्पश्चात्‌ देवादिक्रमसे ब्राह्मणके हाथमें जल प्रदान करे, यही ‘अपोशन’ विधि है। अतिथिके आनेपर अतिथिश्राद्ध करते हुए इस समय भी विकरणके लिये अन्न प्रदान करना चाहिये। पितामहादि ब्राह्मणसे ‘ॐ स्वदितं भवद्धिः’ से सुतृप्तिकी जिज्ञासा कर संतुष्टिका आश्वासन प्राप्त करे। ‘अमुक गोत्र०’ इत्यादि वाक्यसे पिण्डदान और ‘पिण्डपात्रमच्छिद्रमस्तु’ कहकर सभी कार्योंकी समाप्तिके बाद पिण्डके दो हिस्से कर ‘ये समानाः समनसः ०’आदि मन्त्रोंका पाठ करे और पितामह, वृद्धप्रपितामह - पिण्डके साथ पिताका पिण्ड मिला दे। पिण्डके ऊपर गन्धादि रखकर पिण्डचालन करना चाहिये। अतिथि और ब्राह्मणसे स्वदितादि (सुतृप्ति) - का प्रशन करके ब्राह्मणोंको आचमन एवं ताम्बूल प्रदान करे।

तदनन्तर यजमान ‘सुप्रोक्षितमस्तु ‘, ‘शिवा आप: सन्‍तु’ - इन दो मन्त्रोंका उच्चारण करके वृद्धप्रपितामहादि - क्रमसे ब्राह्मणके हाथमें जल प्रदान करे और ‘गोत्रस्याक्षय्यमस्तु’ से पितृ - ब्राह्मणके हाथमें अक्षय्यदान करके ‘उपतिष्ठताम्‌’ आदि वाक्यसे सतिल जल देना चाहिये।

तत्पश्चात्‌ ‘अघोरा: पितरः सन्तु’ इस वाक्यका उच्चारण करनेपर ब्राह्मण ‘अस्तु’ इस वाक्यसे प्रतिवचन प्रदान करें एवं ‘स्वधां वाचयिष्ये’ इस पदका उच्चारण करनेपर ब्राह्मण ‘ॐ वाच्यताम्‌’ इस अनुज्ञा - वाक्यसे प्रत्युत्तर दें। ‘पितामहादिभ्यः स्वधा उच्यताम्‌’ इस प्रकार यजमानके कहनेपर ‘अस्तु स्वधा’ ऐसा ब्राह्मण बोलें। फिर ‘पितृभ्यःस्वधा उच्यताम्‌’ ऐसा कहकर आज्ञा प्राप्त करे।

तदनन्तर ‘ॐ ऊर्जं वहन्ती०’ इत्यादि मन्त्रसे दक्षिणाभिमुख होकर जलधारा दे, पुनः ‘ॐ विश्वेदेवा अस्मिन्‌ यज्ञे प्रीयन्ताम्‌’ यह मन्त्र पढ़कर देवब्राह्मणके हाथमें यव और जल देकर ‘ॐ देवताभ्य:० ‘ इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करे। पिण्ड पात्रोंकी परिचालितकर आचमन पूर्वक पितामहादि - क्रमसे दक्षिणा दे। पितृ - ब्राह्मणसे ‘आशिषो मे प्रदीयन्ताम्‌’ इस वचनसे आशीर्वादकी प्रार्थना करे। ब्राह्मण ‘प्रतिगृह्मताम्‌’ इस वाक्यसे प्रत्युत्तर प्रदान करें। पुनः ‘दातारो नोऽभिवर्धन्ताम्‌०’ आदि मन्त्रका पाठकर अर्घ्यपात्रको ऊर्ध्वमुख कर ‘वाजे वाजे०’ इत्यादि मन्त्रसे देव ब्राह्मण एवं ‘अभिरम्यताम्‌’ इस मन्त्रसे पितृ ब्राह्मणका विसर्जन करना चाहिये।

हे व्यास! मैंने आपको सपिण्डीकरणग श्राद्धका विधान बताया। श्राद्ध, श्राद्धकर्ता और श्राद्धफल - इन तीनोंको विष्णुरूप जानना चाहिये।

( सपिण्डीकरण श्राद्धकी विस्तृत विधि श्राद्ध पद्धतियोंसे जानना चाहिये। यहाँ संक्षिप्त रूपमें वर्णन है।)