गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
120 - रम्भातृतीया व्रत
ब्रह्मजीने कहा - अब मैं सौभाग्य, लक्ष्मी तथा पुत्रादिसे सम्पन्न करनेवाले 'रम्भातृतीयाव्रत' को कहूँगा। यह व्रत मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको किया जाता है। इस तिथिको उपवास रखकर व्रती कुशोदक हाथमें लेकर बिल्वपत्रसे महागौरीकी पूजा करे। इस पूजनमें कदम्ब (वृक्ष) - की दतुअनका प्रयोग करना चाहिये, किंतु पौष मासमें मरुबकके पुष्पोंसे पार्वतीके पूजनका विधान है। व्रती इस मासके व्रतमें मात्र कर्पू्रका सेवनकर उपवास करता हुआ उन गौरीकों कूसर (तिल - चावलका सिद्धान्न)-का नैवेद्य एवं मल्लिकाओंकी दतुअन अर्पित करे।
माघमासमें व्रतके दिन घृत पानकर उपवास करते हुए व्रतीको कल्हार पुष्प (श्वेतकमल) - से सुभद्रादेवीकी पूजा करके उन्हें मण्डका (मण्ड - अन्न, दधि आदिका सार।) नैवेद्य समर्पित करना चाहिये।
फाल्गुन मासमें गोमतीकी पूजाका विधान है। कुन्द पुष्पसे उनकी पूजा करके उसीकी नालको दतुअनरूपमें उन्हें निवेदित करे और स्वयं जीवा (जीवा - शाकविशेष, शर्कराके समान मधुर पुष्पवाली लता।) (जीवन्ती)-का भक्षणकर शष्कुली (तिल, तण्डुल, उड़दके चूर्णसे बना यवागू भी शष्कुलीका अर्थ है।) (पूड़ी) - का नैवेद्य लगाये।
चैत्रमासमें भगवती विशालाक्षीको दमनक - पुष्प, तगर( तगर - पुष्पवृक्ष, सितपुष्प, मदनवृक्ष (टगर)।) काष्ठकी दतुअन और कृसरान्नका नैवेद्य अर्पित करके स्वयं दहीका प्राशन करे। वैशाख मासमें श्रीमुखी देवीकी पूजा कर्णिकार (कनैल) - के पुष्प, वटवृक्षकी दतुअनसे करनी चाहिये और व्रतीको अशोक कलिकाका प्राशन करना चाहिये।
ज्येष्ठ मासमें नारायणी देवीका पूजन शतपर्णी (छितवन) - के पुष्प एवं दतुअनसे होता है। इस पूजामें देवीको खाँड़का नैवेद्य प्रदानकर स्वयं उपासक लौंगका भक्षण करे। आषाढ़ मासमें माधवीकी पूजा करनी चाहिये। इस मासमें व्रती तिलका प्राशन करे और भगवती माधवीकी बिल्व पत्रसे पूजाकर खीर और वटक (घृतपक्व मधुर पिष्टक) - का नैवेद्य अर्पित करे। इस पूजनमें देवीके लिये गूलरकी दतुअन प्रदान करनी चाहिये।
श्रावण मासमें क्षीरान्न तथा मल्लिकाकी दतुअन देकर तगरके फूलसे श्रीदेवीकी पूजा करनी चाहिये।
भाद्रपद मासमें सिंघाड़ेका आहारकर व्रतीको उत्तमादेवीके लिये गुड़का नैवेद्य अर्पित करके पद्मपुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये।
आश्विन मासमें राजपुत्रीका पूजन जपापुष्पसे करके उन्हें जीरेसे सुवासित अन्नका नैवेद्य अर्पितकर रात्रिमें प्राशन करना चाहिये। कार्तिकमासमें पद्मजा देवीका जाति नामक पुष्प एवं कृसरान्नके नैवेद्यसे पूजन होता है और उपासकको पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये।
इस प्रकार मार्गशीर्षसे कार्तिक मासतक वर्षकी समाप्तिपर सपत्नीक ब्राह्मणोंको घृतोदन (घृतमें पका तण्डुल) देकर उनका पूजन करना चाहिये।
उसके बाद पार्वती और शिवकी गुड़ आदिसे बने नैवेद्य, वस्त्र, छत्र और सुवर्ण आदिसे पूजा करके गीत - वाद्यादिसे रात्रि - जागरण करते हुए प्रातः गौ आदिका दान देना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रतीको सब कुछ प्राप्त हो जाता है।