21 -23 - पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि

सूतजीने कहा-हे ऋषियो! अब मैं पञ्चमुख शिवकी पूजाका वर्णन करूँगा, जो साधकको भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती है। साधकको सबसे पहले निम्न मन्त्रसे उन देवका आवाहन करना चाहिये-

'ॐ भूर्विष्णवे आदिभूताय सर्वाधाराय मूर्तये स्वाहा।'

पुन: 'ॐ हां सद्योजाताय नम:।' कहकर साधक सद्योजातका आवाहन करे। इन सद्योजातकी आठ कलाएँ कही गयी हैं। उनका नाम सिद्धि, ऋद्धि, धृति, लक्ष्मी, मेधा, कान्ति, स्वधा और स्थिति है। सद्योजातकी पूजा करनेके पश्चात्‌ 'ॐ सिद्धयै नमः' इत्यादि मन्त्रोंसे उन सभी आठ कलाओंकी पूजा करनेका विधान है। तदनन्तर 'ॐ हीं वामदेवाय नमः' इस मन्त्रसे साधक वामदेवकी पूजा करे। वामदेवकी तेरह कलाएँ हैं, जिन्हें रजा, रक्षा, रति, पाल्या, कान्ति, तृष्णा, मति, क्रिया, कामा, बुद्धि, रात्रि, त्रासनी तथा मोहिनी कला कहा गया है। इन कलाओंके अतिरिक्त मनोन्मनी, अघोरा, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया तथा भयंकरा नामकी आठ कलाएँ (अघोरकी) हैं।

उक्त समस्त कलाओंका पूजन करनेके बाद साधकको 'ॐ हैं तत्पुरुषाय नमः' इस मन्त्रसे तत्पुरुषदेवकी पूजा करनी चाहिये। उनकी निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति और सम्पूर्णा - ये पाँच कलाएँ हैं। साधक कलाओंकी पूजा करके 'ॐ हों ईशानाय नमः' इस मन्त्रसे ईशान देवकी पूजा करे। तत्पश्चात्‌ ईशानदेवकी निश्चला, निरन्जना, शशिनी, अंगना, मरीचि और ज्वालिनी नामकी जो छ: कलाएँ हैं, उनकी पूजा करके पूजन पूर्ण करे।

सूतजीने पुनः कहा - हे ऋषियो! अब मैं शिवकी अर्चनाका वर्णन करूँगा, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करनेवाली है। बारह अंगुलके मापमें बिन्दुद्वारा (किसी पात्रमें) भगवान्‌ शिवकी मूर्ति बनानी चाहिये। उसमें शान्त, सर्वगत और निराकारका चिन्तन करना चाहिये। बिन्दुद्वारा बनायी गयी मूर्तिमें ऊपरकी ओर पाँच बिन्दु लगाने चाहिये, जो शिवका मुख है। वह छोटे आकारमें होना चाहिये और नीचेकी ओर मूर्तिके अनुसार बिन्दु लगाकर बड़े - बड़े अङ्ग बनाने चाहिये। मूर्तिके अधोभागमें छठा बिन्दु विसर्गके साथ होना चाहिये, जो अस्त्र है। इसके साथ 'हौं' लिख देना चाहिये - यह महामन्त्र है और सम्पूर्ण अर्थोको देनेवाला है। साधक मूर्तिके ऊर्ध्वभागसे लेकर मूर्तिके चरणपर्यन्त अपने दोनों हाथोंसे स्पर्श करे और महामुद्रा दिखाये; इसके बाद सम्पूर्ण अंङ्गोंमें न्‍यास - करन्यास आदि करे।

तदनन्तर वह अस्त्रमन्त्र 'ॐ फट्‌' का उच्चारण करता हुआ दाहिनी हथेलीसे स्पर्श करके शोधन करे। उसके बाद कनिष्ठा अँगुलीसे लेकर महामन्त्रसे ही तर्जनी अँगुलीतक न्यास करना चाहिये।

अब मैं हृदय-कमलकी कर्णिकामें (यहाँ बाह्यपूजन तथा मानसपूजन दोनोंका एक साथ वर्णन है।) पूजनकी विधि बतलाऊँगा। उसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यादिकी अर्चना करे। सर्वप्रथम आवाहन, स्थापन, पाद्य, अर्घ, आचमन, स्नान अर्पित करे तथा अन्य विविध मानस उपचारोंको करके तदाकार हो जाय। उसके बाद अग्निमें आहुति देनेकी विधि कह रहा हूँ। साधकको पूजा - स्थलपर अग्नि प्रज्वलित करनेके लिये 'ॐ फट्' अस्त्रमन्त्रसे एक कुण्डका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ 'ॐ हूं' इस कवच मन्त्रसे उस कुण्डका अभ्युक्षण करके मानसिक रूपसे उसमें शक्तिका विन्यास करे। उसके बाद साधकको हृदय अथवा शक्ति कुण्डमें क्रमशः ज्ञानरूपी तेज तथा अग्निका विन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ अग्निके निष्कृति - संस्कारको छोड़कर गर्भाधानादि समस्त संस्कार करनेका विधान है। निष्कृति या मोक्ष - संस्कार आहुतिके पश्चात्‌ किया जाता है। [इसलिये आहुतिके पूर्व उस संस्कारका निषेध है।] समस्त संस्कारोंके बाद साधकको उस प्रज्वलीत अग्निमें समस्त आङि्गकदेवोंके साथ मानसिक रूपसे शिवको आहुति देनी चाहिये।

तदनन्तर कमलाङ्कित गर्भवाले उस मण्डलमें नीलकण्ठ शिवका पूजन करना चाहिये। इस मण्डलके अग्निकोणमें अर्धचन्द्राकार कल्याणकारी एक अग्निकुण्ड बनाना चाहिये।

तदनन्तर अग्निदेवताके अस्त्रोंसे युक्त हृदयादिमे न्यास करनेका विधान है। उसके बाद मण्डलके अन्तर्गत बने हुए कमलकी कर्णिकापर सदाशिवकी तथा दिशाओंमें अस्त्रकी पूजा करे।

अब श्रेष्ठ पञ्चतत्त्वोंमें स्थित पृथ्वी, जल आदि तत्त्वोंकी दीक्षा बतलायी जाती है। इन दोनों शान्तियोंके लिये पृथकू-पृथक्‌ रूपसे सौ - सौ आहुतियाँ पाँच बार देनी चाहिये। तत्पश्चात्‌ साधक पूर्णाहुति देकर प्रसन्नतापूर्वक त्रिशूली भगवान्‌ शिवका ध्यान करे।

उसके बाद प्रायश्चित्त - शुद्धिके लिये आठ बार आहुति देनी चाहिये। यह आहुति अस्त्र - बीज 'हुं फट्' मन्त्रसे प्रदान करनेका विधान है। इस प्रकार संस्कारसे शुद्ध हुआ वह साधक नि: संदेह शिव - स्वरूप हो जाता है ।

शिवकी विशेष पूजामें साधकको चाहिये कि वह प्रथम -'ॐ हां आत्मतत्त्वाय स्वाहा', 'ॐ हूं विद्यातत्त्वाय स्वाहा, तथा 'ॐ हूं शिवतत्त्वाय स्वाहा'-ऐसा उच्चारण करके आचमन करे। तत्पश्चात्‌ उसे मानसिक रूपसे कर्णेन्द्रियोंका स्पर्श करना चाहिये। उसके बाद भस्म - धारण और तर्पण आदि क्रियाओंको सम्पन्न करना चाहिये। 'ॐ हां प्रपितामहेभ्य: स्वधा', 'ॐ हां मातामहेभ्य: स्वधा' और 'ॐ हां नमः सर्वमातृभ्य: स्वधा' इन मन्त्रोंसे तर्पण करे। इसी रीतिसे पिता, पितामह,

प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह आदिका भी तर्पण करे और फिर प्राणायाम करना चाहिये।

इसके बाद आचमन तथा मार्जन करके साधकको शिवके गायत्रीमन्त्रका जप करना चाहिये। वह मन्त्र इस प्रकार है -

'ॐ हां तन्महेशाय विद्महे, वाग्विशुद्धाय धीमहि, तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्‌।'

अर्थात्‌ प्रणवसे युक्त 'हां' बीजशक्तिसे सम्पन्न उन महेश्वरका हम सभी चिन्तन करते हैं। वाणीकी पवित्रताके लिये उनका हम ध्यान करते हैं। वे रुद्र हम सभीको सन्मार्गपर चलनेके लिये प्रेरणा प्रदान करें।

शिव - गायत्री मन्त्र - जपके पश्चात्‌ सूर्योपस्थान करके सूर्य - मन्त्रोंसे सूर्यरूप शिवकी पूजा करनी चाहिये। उन मन्त्रोंका स्वरूप इस प्रकार है-

'ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः शिवसूर्याय नमः।'

'ॐ हं खखोल्काय सूर्यमूर्तये नम:।'

'ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः।'

-इस पूजाके बाद क्रमश: नामके आदि और अन्तमें 'ॐ नमः' शब्दका प्रयोग करके दण्डी तथा पिङ्गल आदि भूतनायकोंका स्मरण करे। तदनन्तर अग्नि आदि कोणोंमें 'ॐ विमलायै नमः, ॐ ईशानायै नमः'-आदि मन्त्रोंसे क्रमश: विमला और ईशानादि शक्तियोंकी स्थापना करके पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उपासकको परम सुखकी प्राप्ति होती है। [इन शक्तियोंकी पूजाके लिये पृथक् -पृथक्‌ बीजमन्त्र निर्दिष्ट हैं।] यथा- 'ॐ रां पद्मायै नमः' (अग्निकोणमें), 'रीं दीप्तायै नमः' (नैऋत्यकोणमें), 'रूं सूक्ष्मायै नमः'(वायव्यकोणमें), 'रें जयायै नमः' (ईशानकोणमें ), 'रैं भद्रायै नमः'(पूर्व दिशामें), 'रों विभूत्यै नम:' (दक्षिण दिशामें), 'रौं विमलाये नमः' (पश्चिम दिशामें), 'रं अमोधिकायै नमः', 'रं विद्युतायै नमः' (उत्तर दिशामें) और 'रं सर्वतोमुख्यै नमः' (मण्डलके मध्यमें)। इसके बाद शिव स्वरूप सूर्य प्रतिमाको सूर्यासन प्रदान करके 'ह्रां ह्रू (ह्रीं)सः' इस मन्त्रसे भगवान्‌ सूर्यकी अर्चना करे और फिर निम्न मन्त्रोंसे न्यास करे-

'ॐ आं हृदर्काय नमः', 'ॐ भूर्भुव: स्व: शिरसे स्वाहा', 'ॐ भूर्भुवः स्व: शिखायै वौषट्‌', 'ॐ ह्र ज्वालिन्यै नमः', 'ॐ ह्रुं कवचाय हुम्‌', 'ॐ ह्रूं अस्त्राय फट्‌', 'ॐ ह्रं फट्‌ रान्यै?? नमः', 'ॐ ह्रां फट्‌ दीक्षितायै नमः।'

साधकको अङ्गन्यासके पश्चात्‌ निम्न मन्त्रोंसे सूर्यादि सभी नवग्रहोंकी मानसी पूजा करनी चाहिये-

'ॐ सः सूर्याय नमः, ॐ सों सोमाय नमः, ॐ मं मंगलाय नमः, ॐ बुं बुधाय नमः, ॐ बूं बृहस्पतये नमः, ॐ भं भार्गवाय नमः, ॐ शं शनैश्चराय नमः, ॐ रं राहवे नमः, ॐ कं केतवे नमः, ॐ तेजश्चण्डाय नमः ।'

इस प्रकार सूर्यदेव आदिकी पूजा करके साधकको आचमन करना चाहिये। उसके बाद वह कनिष्ठिका आदि अंगुलियोंमें करन्यास तथा पुनः निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे -

'ॐ हां हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे स्वाहा, ॐ हूं शिखायै वौषट्‌, ॐ हैं कवचाय हुम्‌, ॐ हों नेत्रत्रयाय वौषटू, ॐ हः अस्त्राय फट्।'

तदनन्तर भूतशुद्धि करे तथा पुन: न्यास करे। अर्घ्यस्थापन करके उसी जलसे अपने शरीरका प्रोक्षण करना चाहिये। उसके बाद वह साधक शिवसहित नन्दी आदिकी पूजा करे। 'ॐ हौ शिवाय नमः' मन्त्रसे पद्ममें स्थित शिवकी पूजा करके नन्‍दी, महाकाल, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, श्रीवत्स, वास्तुदेवता, ब्रह्मा, गणपति तथा गुरुकी पूजा करे।

तत्पश्चात्‌ साधकको पद्मके मध्यमें शक्ति एवं अनन्त देवकी पूजा करके पूर्व दिशामें धर्म, दक्षिणमें ज्ञान, पश्चिममें वैराग्य, उत्तरमें ऐश्वर्य, अग्निकोणमें अधर्म, नैर्ऋत्यमें अज्ञान, वायव्यमें अवैराग्य, ईशानमें अनैश्वर्य, पद्मकी कर्णिकामें वामा और ज्येष्ठा उसके बाद पूर्व आदि दिशाओंमें रौद्री, काली, शिवा तथा असिता आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये।

तदनन्तर साधकको शिवके आगे स्थित पीठके मध्यमें

'ॐ हौं कलविकरिण्यै नमः, ॐ हौं बलविकरिण्यै नमः, ॐ हौं बलप्रमथिन्यै नमः, ॐ सर्वभूतदमन्यै नमः, ॐ मनोन्मन्यै नम:'-

इन मन्त्रोंसे कलविकरिणी एवं बलविकरिणी आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। साधक भगवान्‌ शिवके लिये आसन प्रदानकर महामूर्तिकी स्थापना करे। तदनन्तर मूर्तिके मध्यमें शिवको उद्दिष्ट करके आवाहन - स्थापन - सन्निधान - सन्निरोध - सकलीकरण आदि मुद्रा दिखाये और अर्घ्य, पाद्य, आचमन, अभ्यङ्ग, उव्दर्तन तथा स्नानीय जल समर्पित करे एवं अरणि - मन्थन करके पूज्य देवको वस्त्र, गन्ध, पुष्प, दीप और नैवेद्यमें चरु समर्पित करे। नैवेद्यके अनन्तर आचमन दे करके मुखशुद्धिके लिये ताम्बूल, करोद्वर्तन, छत्र, चामर, पवित्रक (यज्ञोपवीत) प्रदानकर परमीकरण (अर्चनीय देवमें सर्वोत्कृष्टताका भाव) करें। तदनन्तर साधक आराध्यके साथ तदाकार होकर उनका जप करे तथा विनम्रभावसे

स्तुतिकर उन्हें प्रणाम करे। इसी हृदयादिन्यास आदिके साथ पूर्ण की गयी पूजाको 'षडङ्गपूजा' यह नाम दिया गया है।

इस प्रकार शिवपूजन पूर्ण करनेके पश्चात्‌ साधकको अग्नि आदि चतुर्दिक्‌ कोणों, मध्यभाग तथा पूर्वादि दिशाओंमें अग्नि आदि दिग्देवताओं तथा इन्द्रादि दिक्पालोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर उसको उन देवोंके मध्य स्थित चण्डेश्वरकी पूजाकर उनके लिये निर्माल्य समर्पित करना चाहिये। उसके बाद वह निम्नांङ्कित स्तुतिसे क्षमापन (क्षमा - याचना) करके उनका विसर्जन करे -

गुह्मातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्‌।

सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात्‌ त्वयि स्थिति:॥

यत्किच्चित्‌ क्रियते कर्म सदा सुकृतदुष्कृतम्‌।

तन्मे शिवपदस्थस्य रुद्र क्षपय शङ्कर॥

शिवो दाता शिवो भोक्ता शिव: सर्वमिदं जगत्‌।

शिवो जयति सर्वत्र य: शिव: सोऽहमेव च॥

यत्कृतं यत्‌ करिष्यामि तत्‌ सर्वं सुकृतं तव।

त्वं त्राता विश्वनेता च नान्यो नाथोऽस्ति मे शिव॥

हे प्रभो! आप गुह्य - से - गुह्य तत्त्वोंके संरक्षक हैं। आप मेरे किये हुए जपको स्वीकार करें। हे देव! मुझे सिद्धि प्राप्त हो। आपकी कृपासे आपमें मेरी निष्ठा बनी रहे। हे रुद्र! हे भगवान्‌ शङ्कर! मेरे द्वारा सर्वदा पाप - पुण्य रूप जो कर्म किया जाता है, उसे आप नष्ट करें। मैं आपके इन कल्याणकारी चरणोंमें पड़ा हूँ। हे शिव! आप अपने भक्तोंको सर्वस्व देनेवाले हैं। आप ही भोक्ता हैं, हे शिव! यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत्‌ भी तो आप ही हैं। हे शङ्कर! आपकी विजय हो। सर्वत्र जब शिव ही हैं तो मैं भी वही हूँ। जो कुछ मैंने किया है और जो कुछ भविष्यमें करूँगा, वह सब आपके द्वारा ही किया हुआ है। आप रक्षक हैं। आप विश्वनायक हैं। हे शिव! आपके अतिरिक्त मेरा कोई स्वामी नहीं है।

(हरिने पुन: कहा- हे रुद् !) इसके बाद मैं शिव पूजाकी दूसरी विधि कह रहा हूँ-

इस विधिके अनुसार गणेश - सरस्वती - नन्दी - महाकाल - गङ्गा - यमुना, अस्त्र तथा वास्तुपतिदेवकी पूजा मण्डलके द्वारपर करनी चाहिये और साधक पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि सभी दिक्‍पालोंकी पूजा करे। उसके बाद कारणभूत समस्त तत्त्वोंकी पूजा करे।

उन तत्त्वोंमें 'पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश'- ये पञ्चमहा भूत हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द - ये उनकी पाँच तन्मात्राएँ हैं। वाक्‌, पाणि, पाद, पायु एवं उपस्थ - ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा तथा प्राण - ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इनके अतिरिक्त मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - ये अन्त:करण चतुष्टय हैं। इनसे ऊपर 'पुरुष' की स्थिति है। इन्हीं (पुरुष)- को शिव कहा जाता है।

इन तत्त्वोंके साथ राग (गानशास्त्रीय रागविशेष), बुद्धि, विद्या, कला, काल, नियति, माया, शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव जो सबके मूल हैं, उनकी भी पूजा होनी चाहिये। इन समस्त तत्त्वोंमें जो शिव और शक्ति अर्थात्‌ पुरुष एवं प्रकृतिका तत्त्व अनुस्यूत है, उसको जानकर ज्ञानी साधक जीवन्मुक्त होकर शिवरूप हो जाता है। इन तत्त्वोंमें जो शिवतत्त्व है, वही विष्णु है, वही ब्रह्मा है और वही ब्रह्मतत्त्व है।

भगवान्‌ सदाशिवका मङ्गलमय ध्यान स्वरूप इस प्रकार है - वे देव पद्मासन पर विराजमान रहते हैं। उनका वर्ण शुक्ल है। सदैव सोलह वर्षकी आयुमें स्थित रहते हैं। वे पाँच मुखोंवाले हैं। उनके दसों हाथोंमें क्रमश: दक्षिण भागकी ओर अभयमुद्रा, प्रसाद मुद्रा, शक्ति, शूल तथा खट्वाङ्ग और वाम भागकी ओर सर्प, अक्षमाला, डमरू, नीलकमल तथा श्रेष्ठ बीजपूरक (बिजौरा नीबू) स्थित रहता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया नामक तीन शक्तियाँ उनके तीन नेत्र हैं। ऐसे वे देव सर्वदा कल्याणकी भावनामें अवस्थित रहते हैं, इसीलिये इन्हें सदाशिव कहा गया है।

(बद्धपद्मासनासीन: सित: षोडशवार्षिक:॥

पञ्चवक्त्र: कराग्रै: स्वैर्दशभिश्चैव धारयन्‌।

अभयं प्रसादं शक्ति शूलं खट्वाङ्गमीश्वर:॥

दक्षै: करैर्वामकैश्च भुजंगं चाक्षसूत्रकम्‌। डमरुकं नीलोत्पलं बीजपूरकमुत्तमम्‌॥)

ऐसे मूर्तिमान्‌ देवका चिन्तन करनेवाला साधक सदैव कालभयसे रहित रहता है। इस प्रकार शिवोपासना करनेवाले साधककी न तो अकाल मृत्यु होती है और न शीत तथा ऊष्णादि कारणोंसे ही उसकी मृत्यु होती है।