163 - विसर्परोगका निदान

धन्वन्तरिने कहा - हे सुश्रुत! अब मैं विसर्पादि रोगोंके मूल कारणोंका वर्णन कर रहा हूँ, उसे आप सुनें।

वात, पित्त, कफ एवं अभिघात नामक दोषोंसे तथा पित्त, रक्त एवं कफके दूषित होनेसे शोथ - सदृश विसर्परोग होता है। बाह्य, अन्तः, उभय - ये उसके तीन अधिष्ठान हैं। इनमें अपने - अपने प्रकोपक तथा विदाहकारी कारणोंसे शरीरमें शीघ्र विसर्पण कर बाहर एवं अंदर विकृत करके विसर्परोग शरीरके बाहर तथा अंदर उत्पन्न करते हैं।

आन्तरिक विसर्पसे हृदय आदिमें उपताप होनेके कारण अत्यन्त मोह तथा कर्ण - नासा आदियें विघटन होता है। प्यासकी अधिकता और मलमूत्रादिमें विषमता होती है। कफजन्य(च०चि०29, सु०नि०अ० 10, अ०हृ०नि०अ० 23)विसर्परोगमें अत्यधिक खुजलाहट होती है। उसमें स्निग्धता बनी रहती है और कफजन्य ज्वरके समान इस रोगमें भी रोगीको कष्ट भोगना पड़ता है।

संनिपातज विसर्प होनेपर रक्त - वातादि सभी दोषोंके लक्षण प्रकट हो जाते हैं। इन सभी प्रकारके विसर्प - भेदोंकी उपेक्षा कर देनेपर वे यथाक्रम अपने - अपने दोषोंके लक्षणोंसे समन्वित होकर फुंसियोंके रूपमें उभर आते हैं। ये जब पककर फूट जाते हैं, तब अपने - अपने लक्षणोंमें उक्त व्रणका रूप धारण कर लेते हैं।

वात - पित्तज विसर्परोगमें रोगीको ज्वर, वमन, मूर्च्छा, अतिसार, प्यास, भ्रम, हड्डी टूटना, अग्निमान्द्य, तमक, श्वास और अरुचिका उपद्रव ग्रस्त कर लेता है। यह रोग प्रज्वलित अग्निके अंगारेके समान रोगीके सम्पूर्ण अङ्गको संतप्त कर देता है। यह विसर्प शरीरके जिन - जिन स्थानोंपर फैलता है, वे स्थान बुझे हुए अंगारेके समान काले, नीले तथा रक्तवर्णके हो जाते हैं। अपने स्फुटित व्रणोंके द्वारा यथाशीघ्र ही अग्निसे दग्ध हुए स्थानके सदृश विस्तृत क्षेत्रमें यह फैल जाता है। शीघ्रगामी होनेके कारण विसर्प मर्मस्थलतक पहुँच जाता है। इस रोगमें वायु प्रबल हो जाता है और वह प्रकुपित होकर सम्पूर्ण अज्ञोंको पीड़ित करता है तथा रोगीको चेतनाशून्य कर देता है। उसके प्रभावसे रोगीकी निद्रा भी समाप्त हो जाती है। उसकी श्वसन - क्रियामें विकार आ जाता है। ऐसे रोगीको हिचकी भी आने लगती है। इस प्रकारके रोगमें रोगीकी ऐसी अवस्था हो जाती है कि वह पीड़ासे ग्रस्त हो उठता है तो उसको अत्यन्त व्याकुलताकी अनुभूति होती है। भूमि, शय्या तथा आसन आदिपर उठने - बैठने और लेटनेसे उसको तनिक भी शान्ति प्राप्त नहीं होती। इस रोगसे ग्रस्त रोगी उससे विमुक्त होनेके लिये विभिन्न प्रकारकी चेष्ट करता है, किंतु उस कष्टसे विमुक्त नहीं हो पाता। ऐसा रोगी मन और शरीर दोनोंसे शिथिल होकर ऐसी गम्भीर मूर्च्छाको प्राप्त कर लेता है, जिससे पुनः चेतनामें उसको लौटना बड़ा ही दुस्साध्य होता है। इन लक्षणोंसे युक्त विसर्पको अग्निविसर्प कहा जाता है।

कफसे अवरुद्ध वायु उस अवरोधक कफका बहुत प्रकारसे भेदन कर देती है, तब ग्रन्थिमाला तैयार हो जाती है अथवा जिस रोगीका रक्त बढ़ जाता है, उसके त्वचा, शिरा, स्नायु तथा मांसगत रक्तको दूषित करके वह वायु लम्बी, छल्लेदार, स्थूल और खरदरी ग्रन्थियोंकी रक्तभरी मालाकी सृष्टि करती है। इसके कारण रोगीको तीव्र पीड़ादायक ज्वर होता है। यह रोग होनेपर रोगी श्वास, खाँसी, अतिसार, मुखशोष, हिचकी, वमन, भ्रम, मोह, वर्णभेद, मूर्च्छा, अङ्गभेद और अग्निमान्द्यके दोषसे भी घिर जाता है। इस प्रकार कफ और वायुके संक्षोभसे उत्पन्न इस रोगको ग्रन्थिविसर्प कहते हैं।

कफ और पिक्तके प्रकुपित होनेसे रोगीमें ज्वर, स्तम्भन, निद्रा, तन्द्रा, शिरोवेदना, विक्षेप, प्रलाप, अरुचि, भ्रम, मूर्च्छा, अग्निमान्द्, अस्थिभेद, प्यास, इन्द्रियजनित जड़ता, आँवनिर्गमन तथा रसादिक स्रोतोंका लेप - ये लक्षण दिखायी देते हैं। प्राय:यह दोष आमाशयके एक देशमें होता है और धीरे - धीरे अन्य भागोंमें फैलता जाता है, परंतु इसमें दर्द नहीं होता। यह अत्यन्त पीला, लोहित और पाण्डु रंगकी पिडिकाओंसे भर जाता है। इसके स्वरूपकी कान्ति कृष्ण और मलिन मानी गयी है। यह रोग शोथसे युक्त और भारी होता है। यह स्पर्श करनेमें अधिक ऊष्मासे समन्वित अनुभूत होता है। इसमें पसीने - जैसी चिपचिपाहट होती है। जब यह पककर फूटता है तो इसमें मांस गल - गलकर नये रूपमें निकलने लगता है। शरीरकी स्नायु तथा शिराएँ स्पष्ट रूपसे दिखायी देने लगती हैं। इस प्रकार सभी लक्षणोंसे युक्त हुआ यह विसर्परोग अन्ततोगत्वा शरीरकी त्वचासे सम्पृक्त हो जाता है, जिसके कारण यह बाह्य भागमें दिखायी देने लगता है। इस रोग - स्थानसे शवके समान दुर्गन्‍ध निकलती है। विद्वानोंने इसको कर्दम विसर्परोगके नामसे अभिहित किया है।

बाह्य आघात आदिके कारण क्षत हुए शरीरसे क्रुद्धवायु (सु०नि०अ० 10; च०चि०अ० 29) पित्तको रक्तसमन्वित करता हुआ कुल्थीके दानोंके समान स्फोटजनित विसर्पको जन्म देता है। इसमें शोथ, ज्वर, पीड़ा, दाहाधिक्य, श्याम और रक्तवर्णताका लक्षण भी दिखायी पड़ता है। पृथक्‌ - पृथक्‌ वात, पित्त तथा कफजनित दोषसे उत्पन्न उक्त तीनों प्रकारका विसर्परोग साध्य है। इतना ही नहीं, वात - पित्त आदि द्वन्द्वजनित दोषसे समन्वित विसर्प यदि उपद्रवसे रहित हैं तो वे भी यथापेक्षित चिकित्सासे दूर किये जा सकते हैं, किंतु जो विसर्प समस्त दोषोंसे युक्त हो जाते हैं और जिनका आक्रमण रोगीके मर्मस्थलको (च०चि० 29; अ०हृ०नि०अ० 14) आहत करनेमें सफल हो जाता है, जिसके दुष्प्रभावसे रोगीके शरीरका स्नायु, शिरा और मांस गल जाता है और जिनसे शवके समान दुर्गन्ध आने लगती है - वे विसर्परोग असाध्य हो जाते हैं, उनकी चिकित्सा सम्भव नहीं है।