गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
33 - सुदर्शनचक्र पूजा -विधि
रुद्रने कहा - हे शङ्ख - गदाधर! उस सुदर्शनकी पूजाके विषयमें मुझे बतायें, जिसे करनेसे ग्रहदोष और रोगादि - सभी कष्ट विनष्ट हो जाते हैं।
श्रीहरिने कहा - हे वृषभध्वज! सुदर्शन चक्रकी पूजा - विधिको मैं कह रहा हूँ, आप सुनें। सर्वप्रथम स्नान करके हरिका पूजन करे। साधकको चाहिये कि अपने निर्मल एवं शुभ हृदय - कमलमें भगवान् सुदर्शन देव विष्णुका ध्यान करे। हे महादेव! उसके
बाद मण्डलमें शङ्ख , चक्र, गदा तथा पद्म धारण करनेवाले, सौम्य आकृतिवाले, किरीटी भगवान् विष्णु देवका आवाहन करके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि विविध उपचारोंसे पूजा करे।
पूजाके अन्तमें मूल मन्त्रका 108 बार जप करे। हे रुद्र! जो इस प्रकार सुदर्शन चक्रका उत्तम पूजन करता है, वह इस लोकमें समस्त रोगोंसे विमुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। मन्त्र - जपके पश्चात् सभी व्याधियोंको विनष्ट करनेवाले इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये-
नमः सुदर्शनायैव सहस्त्रादित्यवर्चसे॥
ज्वालामालाप्रदीप्ताय सहस्त्राराय चक्षुषे।
सर्वदुष्ठविनाशाय सर्वपातकमर्दिने॥
सुचक्राय विचक्राय सर्वमन्त्रविभेदिने।
प्रसवित्रे जगद्धात्रे जगद्विध्वंसिने नमः॥
पालनार्थाय लोकानां दुष्टासुरविनाशिने।
उग्राय चैव सौम्याय चण्डाय च नमो नमः॥
नमश्चक्षु:स्वरूपाय संसारभयभेदिने।
मायापञ्चरभेत्रे च शिवाय च नमो नमः॥
ग्रहातिग्रहरूपाय ग्रहाणां पतये नमः।
कालाय मृत्यवे चैव भीमाय च नमो नमः॥
भक्तानुग्रहदात्रे च भक्तगोप्त्रे नमो नमः।
विष्णुरूपाय शान्ताय चायुधानां धराय चा॥
विष्णुशस्त्राय चक्राय नमो भूयो नमो नम:।
इति स्तोत्रं महत्पुण्यं चक्रस्य तव कीर्तितम्॥
यः पठेत् परया भक्त्या विष्णुलोकं स गच्छति।
चक्रपूजाविधिं यश्च पठेद्रुद्र जितेन्द्रिय:।
स पापं भस्मसात्कृत्वा विष्णुलोकाय कल्पते॥
सहस्त्रों सूर्यके समान तेज:सम्पन्न सुदर्शन चक्रके लिये नमस्कार है। तेजस्वी किरणोंकी मालाओंसे प्रदीप्त हजारों अरे (चक्रके अवयव) - वाले, नेत्र स्वरूप, सर्वदुष्टवनाशक तथा सभी प्रकारके पापोंको नष्ट करनेवाले आपको नमन है। सुचक्र तथा विचक्र नामधारी, सम्पूर्ण मन्त्रका भेदन करनेवाले, जगत्की सृष्टि करनेवाले, पालन - पोषण करनेवाले एवं जगत्का संहार करनेवाले हे सुदर्शनचक्र! आपको नमस्कार है। (संसारकी रक्षा करनेके लिये) देवताओंका कल्याण करनेवाले, दुष्ट राक्षसोंका विनाश करनेवाले, दुष्टोंका संहार करनेके लिये उग्र - स्वरूप एवं प्रचण्ड - स्वरूप और सज्जनोंके लिये सौम्य - स्वरूप धारण करनेवाले आपको बारम्बार नमस्कार है। जगत्के लिये नेत्रस्वरूप संसारभयको काटनेवाले मायारूपी पिंजड़ेका भेदन करनेवाले, कल्याणकारी सुदर्शन चक्रको नमस्कार है। ग्रह एवं अतिग्रह स्वरूप, ग्रहपति, काल स्वरूप, मृत्यु स्वरूप, पापात्माओंके लिये महा भयंकर आपके लिये बार - बार नमन है। भक्तों पर कृपा करनेवाले, उनके अभिरक्षक, विष्णु स्वरूप, शान्त स्वभाव, समस्त आयुधोंकी शक्तिको अपनेमें धारणकर स्थित रहनेवाले विष्णुके शस्त्रभूत हे सुदर्शन चक्र! आपके लिये बारम्बार नमस्कार है।
हे शङ्कर! सुदर्शन चक्रके इस महत्पुण्यशाली स्तोत्रका जो मनुष्य परम भक्तिसे पाठ करता है, वह विष्णु लोकको प्राप्त करता है।