100 - विनायकशान्ति - स्नान

याज्ञवल्क्यजीने कहा - हे ऋषियों! अब आप सभी विनायककी अप्रसन्नतासे ग्रस्त (आविष्ट) पुरुषके लक्षणोंका श्रवण करें।

विनायकसे ग्रस्त व्यक्ति स्वप्नावस्थामें बहुत अधिक स्नान करता है। उसे स्वप्नमें मरे हुए प्राणियोंके सिरोंका दर्शन होता है। वह उद्विग्नमन रहता है। उसके सारे प्रयत्न निष्फल रहते हैं। बिना कारण उसे पीड़ा होती है। विनायककी अप्रसन्नतासे युक्त होनेपर राजा राज्यसे वंचित रहता है, कुमारी पतिसे वंचित रहती है तथा गर्भिणी स्त्री पुत्र - लाभसे वंचित रहती है। अतएव विनायककी शान्तिके लिये किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें उसे विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। स्नानकी विधि संक्षेपमें इस प्रकार है - भद्रासनपर बिठाकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन पूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली सरसों पीसकर उसे घृत - मिश्रित करके उबटन बनाये और उस व्यक्तिके सम्पूर्ण शरीरमें मले। फिर उसके मस्तकपर सर्वौषधिसहित सब प्रकारके सुगन्धित द्रव्यका लेप करे। सर्वौषधियुक्त चार कलशोंके जलसे स्नान कराना चाहिये। सरोवर आदि पाँच स्थानोंकी मिट्टी, गोरोचन, गन्ध और गुग्गुल - ये वस्तुएँ भी उन कलशोंके जलमें छोड़े।

प्रथम कलशको लेकर आचार्य निम्नलिखित मन्त्रसे उसे स्नान कराये -

सहस्त्राक्षं शतधारमृषिभि: पावनं स्मृतम्‌॥

तेन त्वामभिषिञ्चमि पावमान्यः पुनन्तु ते।

जो सहस्त्रों नेत्र (अनेक प्रकारकी शक्तियों ) - से युक्त हैं, जिनकी सैकड़ों धाराएँ (प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियोंने पवित्र करनेवाला बताया है, उस पवित्र जलसे मैं (विनायकग्रस्त) तुम्हारा (उपद्रवकी शान्तिके लिये) अभिषेक करता हूँ। यह पावन जल तुम्हें पवित्र करे।

द्वितीय कलशके जलसे निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए अभिषेक करे -

भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पति:॥

भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयों ददुः।

राजा वरुण तथा भगवान्‌ सूर्य एवं देवगुरु बृहस्पति आपके सौभाग्यकी अभिवृद्धि करें; इसी प्रकार देवराज इन्द्र, वायुदेव तथा सप्तर्षिगण भी आपके सौभाग्यकी अभिवृद्धि करते रहें।

तृतीय कलशके जलसे निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए अभिषेक करें -

यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्द्धनि॥

ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्घ्नन्तु ते सदा।

तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रोंमें भी जो दुर्भाग्य है, उसे जलदेवता सदाके लिये शान्त करें।

तदनन्तर पहले कहे गये तीनों मन्त्रोंसे चतुर्थ कलशके जलसे स्नान कराये। इसके बाद बाँयें हाथमें कुशा लेकर स्नान किये हुए प्राणीके सिरको कुशसे स्पर्श करते हुए ब्राह्मणको संयमित होकर गूलरकी लकड़ीसे निर्मित सृवाके द्वारा सार्षपतैल (सरसोंका तेल) - से अग्निमें आहुति प्रदान करनी चाहिये। आहुति देनेके लिये ये मन्त्र विहित हैं - ‘मिताय स्वाहा’, ‘सम्मिताय स्वाहा’, ‘शालाय स्वाहा’,’कटङ्कटाय स्वाहा’, 'कूष्माण्डाय स्वाहा', ‘राजपुत्राय स्वाहा’ (’स्वाहा’ के पूर्व प्रयुक्तसभी नाम विनायकके हैं। या0 मि0 ग0 प्र0 अ0 श्लोक 285)।

इसके अनन्तर लौकिक अग्निमें स्थालीपाक - विधिसे चरु पकाकर उससे सभी निर्दिष्ट विनायक नामवाले ‘स्वाहा’ युक्त छः मन्त्रोंसे उसी लौकिक अग्निमें ही हवनकर अवशिष्ट हविशेषके द्वारा इन्द्र, अग्नि, यम आदिको बलि देनी चाहिये। तत्पश्चात्‌ किसी चतुष्पथ (चौराहे) -पर कुशोंका आसन बिछाकर उसमें पुष्प, गन्ध, उण्डेरककी माला, कच्चे - पक्के चावल, घृतमिश्रित पुलाव, मूली, पूड़ी, पुआ, दही, पायस, घृत, गुड़पिष्ट, लड्डू तथा इक्षु - इन सभी सामग्रियोंको एकत्र करके रख दे। तदनन्तर विनायकजननी भगवती अम्बिकाका उपस्थान करे और हाथ जोड़कर अर्घ्य प्रदान करे।

पुत्रजन्‍मकी कामना करनेवाली स्त्रीको दूर्वा और सससोंके पुष्पोंसे भगवती दुर्गाकी अर्चना करके स्वस्ति - वाचनके साथ इस

प्रकार उनकी प्रार्थना करनी चाहिये -

रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे।

पुत्रान्देहि श्रियं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे॥

हे भगवति! आप मुझे रूप, यश और ऐश्वर्य प्रदान करें। हे देवि! आप मेरे लिये पुत्र दें, लक्ष्मी दें और मेरी सभी कामनाओंको परिपूर्ण करें।

तत्पश्चातू ब्राह्मणोंको भोजन प्रदानकर संतुष्ट करे। अपने गुरुको दो वस्त्र प्रदानकर अन्य ग्रहोंकी पूजा करके सूर्यार्चनमें निरत रहे। इस प्रकार विनायक और ग्रहोंका पूजन करके मनुष्य अपने सभी कार्योमें सफलता प्राप्त करता है।