48 - देव - प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि

सूतजीने कहा -अब मैं सभी देवताओंकी प्रतिष्ठा - विधिको संक्षेपमें कह रहा हूँ। प्रशस्त तिथि - नक्षत्रादिमें प्रतिष्ठा करवानी चाहिये।

सर्वप्रथभ अपनी वैदिक शाखामें कहे गये विधानके अनुसार या प्रणव - मन्त्र (ॐकार) - का उच्चारण करके पाँच या उससे अधिक ऋत्विजोंके साथ मध्य स्थानमें स्थित आचार्यका वरण करे। तदनन्तर पाद्य, अर्घ्य और मुद्रिका, वस्त्र - गन्ध - माल्य एवं अनुलेपनीय द्रव्योंसे उनका पूजन करे। गुरुको चाहिये कि वे मन्त्रन्यासपूर्वक प्रतिष्ठाकर्मका समारम्भ करें।

प्रासादके अग्रभागमें दस अथवा बारह हाथका एक वर्गाकार सोलह खम्भोंवाला मण्डप तैयार करके उसमें (पूर्वादिक चारों दिशाओं और ईशानादिक चार विदिशाओंमें एक - एक ध्वजा - इस तरह) कुल आठ ध्वजोंको प्रतिष्ठित करना चाहिये। तदनन्तर मण्डपके मध्यभागमें चार हाथ परिमाणकी एक वेदीका निर्माण कराये। उस वेदीके ऊपरी भागमें नदियोंके संगम - स्थलके किनारेसे लायी गयी बालुका बिछाये। प्रधान कुण्डका निर्माण करवाकर उसके पूर्व दिशामें वर्गाकार, दक्षिणमें धनुषाकार, पश्चिममें वर्तुलाकार और उत्तरमें पद्माकार- इस प्रकार पाँच कुण्डोंका निर्माण करवाना चाहिये अथवा सभी कुण्ड चौकोर रखे जा सकते हैं।

कुण्ड - निर्माणके पश्चात्‌ समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये आचार्य, शान्तिकर्मके लिये विहित विधिसे हवन करे। कुछ लोग मण्डपके ईशान कोणकी भूमिको गायके गोबर या स्वच्छ मिट्टीसे लीपकर उसमें होम करते हैं।

मण्डपमें लगे तोरणोंके समीप ही पूर्वादिक दिशाओंमें चार द्वारोंका निर्माण करवाना चाहिये। मण्डपके तोरणस्तम्भ न्यग्रोध (वट), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), बिल्व, पलाश, खदिर (खैर) काष्ठसे निर्मित होने चाहिये। प्रत्येक तोरण स्तम्भका परिमाप पाँच हाथ होना चाहिये और प्रत्येक स्तम्भको वस्त्र - पुष्पादिसि अलंकृत करना चाहिये तथा उसके निचले भागको एक हाथ नापकर पृथ्वीमें गाड़ देना चाहिये। शेष चार हाथ परिमाणका भाग ऊपर रखे। इसी प्रकार उन्हें मण्डपके चारों ओरकी दिशाओंमें स्थापित करवाना चाहिये।

मण्डपके पूर्वी द्वारपर मृगेन्द्र, दक्षिणी द्वारपर हयराज, पश्चिमी द्वारपर गोपति तथा उत्तरी द्वारपर देवशार्दूलका न्यास करे। पहले ' अग्निमीळे0 ' इस मन्त्रसे पूर्व द्वारकी दिशामें मृगेन्द्रका न्यास करे। तदनन्तर 'ईषेत्वेति च०' इस मन्त्रसे दक्षिण द्वारकी दिशामें हयराजका, 'अग्न आयाहि०' इस मन्त्रसे पश्चिम द्वारकी दिशामें गोपतिका और 'शं नो देवी०' मन्त्रसे उत्तर द्वारकी दिशामें देवशार्दूलका न्यास करना चाहिये।

मण्डपकी पूर्व दिशामें मेघवर्णके समान श्याम, अग्नि कोणमें धूम्रवर्ण, दक्षिण दिशामें कृष्णवर्ण, नैर्ऋत्य कोणमें धूसरवर्ण, (पीलापनके साथ शुक्‍लवर्ण पाण्डुर वर्ण है और थोड़ा कम पाण्डुरवर्ण धूसरवर्ण है।) पश्चिम दिशामें पाण्डुरवर्ण, वायु कोणमें पीतवर्ण, उत्तर दिशामें रक्तवर्ण, ईशान कोणमें शुक्लवर्ण तथा मण्डपके मध्यभागमें अनेक वर्णवाली पताकाको स्थापित करे।

'इन्द्रविद्येति०' इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें इन्द्र, 'संसुप्ति०' इस मन्त्रसे अग्निकोणमें अग्नि, 'यमोनाग०' इस मन्त्रसे दक्षिणमें यम, 'रक्षोहणावेति०' मन्त्रसे (नैर्ऋत्यमें निर्ऋति) पश्चिममें वरुण तथा 'ॐ वातेति०' मन्त्रसे वायव्यमें वायुदेवका अभिषेक करके उत्तरमें 'ॐ आप्यायस्वेति०' मन्त्रसे कुबेरकी पूजा करे। 'ॐ तमीशान०' इस मन्त्रसे ईशान दिशामें ईशान और मण्डपके मध्यभागमें 'ॐ विष्णोलर्लोकेति०' मन्त्रसे विष्णुका पूजन करना चाहिये।

प्रत्येक तोरणके समीप दो - दो कलश स्थापित करनेके पश्चात्‌ वस्त्र तथा उपवबस्त्रसे आच्छादित, चन्दनादि सुगन्धित पदार्थोंसे अलंकृत, पुष्प, वितान एवं अन्यान्य पूजा - उपचारोंसे सुशोभित दिक्पालोंकी पूजा करनी चाहिये।

'ॐ त्रातारमिन्द्र०' मन्त्रसे इन्द्र, 'ॐ अग्निर्मुर्धा०' मन्त्रसे अग्नि, 'ॐ अस्मिन्वृक्ष०' मन्त्रसे निर्ऋति, 'ॐ किं चे दधातु०' मन्त्रसे वरुण, 'ॐ आचत्वा०' मन्त्रसे कुबेर, 'ॐ इमा रुद्रेति०' मन्त्रसे रुद्र आदि दिक्पालोंकी पूजा करके विद्वान् आचार्यको चाहिये कि वह वायव्य कोणमें होमद्रव्य एवं अन्य पूजामें प्रयुक्त वस्तुओंको स्थापित करे।

तदनन्तर वह गुरु वहाँ रखी गयी श्वेत शंखादिक शास्त्र - विहित समस्त वस्तुओंपर एक बार दृष्टिपात कर ले, ऐसा करनेसे निश्चित द्रव्योंकी शुद्धि हो जाती है।

तत्पश्चातू हृदयादि षडङ्गोंका न्यास व्याहृति और प्रणव मन्त्रसे संयुक्त करके क्रमश:-(ॐ हृदयाय नमः, ॐ भू: शिरसे स्वाहा, ॐ भुवः शिखायै वषट्‌, ॐ स्व: कवचाय हुम्‌, ॐ भूर्भुव: स्व: नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ भूर्भुव: स्वः करतलकररपृष्ठाभ्यां फट्‌ मन्त्रका उच्चारण करते हुए) हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र, करतल और करपृष्ठका स्पर्श करे। तदनन्तर 'ॐ अस्त्राय फट्‌' मन्त्रसे अस्त्रका न्यास भी करना चाहिये, क्योंकि यह न्‍यास - कर्म समस्त इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला होता है।

अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अक्षत और विष्टरको अभिमन्त्रित करके उसी विष्टरके द्वारा यज्ञ मण्डपमें एकत्रित समस्त द्रव्योंका स्पर्श करे। तत्पश्चात्‌ अस्त्र - मन्त्रसे पवित्र किये गये उन अक्षतोंको अपने चारों ओर बिखेर दे। उसके बाद पूर्व दिशासे लेकर अग्निकोण, दक्षिण, नैर्ऋत्य कोण, पश्चिम, वायुकोण, उत्तर और ईशान कोणपर्यन्त मण्डपमें अभिमन्त्रित अक्षतोंका निक्षेप करके सम्पूर्ण यज्ञ - मण्डपका लेपन करवाना चाहिये।

तदनन्तर याज्ञिक गुरुको चाहिये कि वह अर्घ्यपात्रमें गन्धादिसे युक्त जलको पूर्णकर मन्त्रसमूहोंसे उसे अभिमन्त्रित करे। उसी अभिमन्त्रित जलसे यज्ञ मण्डपका प्रोक्षण करना चाहिये। उसके बाद जिस देवकी प्रतिष्ठा करनी है, उसी देवके नामसे मण्डपके ईशान कोणमें कलश स्थापितकर उसके दक्षिण भागमें अस्त्र - मन्त्रसे अभिमन्त्रित वर्द्धिनीकी ( कमण्डलु (गडुआ) कलशविशेष - देवताकी प्रतिष्ठा आदिमें विहित पात्र।) स्थापना करे। उसके बाद कलश, वर्द्धिनी, ग्रह और वास्तोष्पति देवकी यथाविहित आसनपर प्रतिष्ठाके साथ पूजा करके आचार्य प्रणव - मन्त्रका जप करे। तदनन्तर सूत्रसे वेष्टित, पञ्चरत्रोंसे युक्त दो वस्त्रोंसे आच्छादित सब प्रकारकी औषधियों तथा चन्दनादि सुगन्धित पदार्थोंसे अनुलिप्त उस कलशकी पुनः पूजा करे, साथ ही उस कलशमें प्रतिष्ठित देवताकी भी पूजा करनी चाहिये।

तदनन्तर उत्तम वस्त्रसे वर्द्धिनीको आच्छादित करके उसके साथ कलशको घुमाये। वर्द्धिनीकी जलधारासे उस कुम्भको सिञ्चत करके उसके आगे ही वर्द्धिनीको स्थापित करे । वर्द्धिनिके साथ उस कुम्भका पूजन करके स्थण्डिलमें मूल देवताकी पूजा करे।

उसके बाद वायव्य कोणमें एक घटकी स्थापना करनी चाहिये। उसमें गणपतिका आवाहनकर 'ॐ गणानां त्वेति०' मन्त्रसे उनकी पूजा करके ईशान कोणमें दूसरा घट स्थापित करे। उसमें वास्तुदोष - परिहारके लिये 'ॐ वास्तोष्पते०' इस मन्त्रसे वास्तुदेवकी पूजा करनी चाहिये। कुम्भके पूर्वभागमें भूत और गणदेवको बलि प्रदानकर वेदीका आलम्भन करे। तदनन्तर 'ॐ योगेयोगेति०' मन्त्रसे हरे कुशोंका आस्तरण करे और ऋत्विजोंके साथ आचार्य तथा यज्ञदीक्षित वह श्रेष्ठ यजमान स्नान- पीठपर उस देवमूर्तिको प्रतिष्ठित करे। उस समय विविध वैदिक मन्त्रोच्चारके साथ जय - जयकारकी मङ्गल ध्वनि करनी चाहिये।

स्नान करवानेके लिये पीठसहित उस देव मूर्तिको ब्रह्मथपर बैठाकर ईशान कोणमें अवस्थित मण्डप पीठमें स्थापित करे। तदनन्तर 'ॐ भद्रंकर्णेति०' मन्त्रसे स्नान कराकर यज्ञीय सूत्र या वल्कल वस्त्रसे पोंछकर मूर्तिको स्वच्छ करके तूर्यादिक वाद्य - यन्त्रोंका वादन करते हुए लक्षणोद्धार (मूर्तिका नामकरण) करे।

उसके बाद कांस्य या ताम्र - पात्रमें स्थित घृत और मधुसे मिश्रित अञ्जनको सोनेकी शलाकासे लेकर उस प्रतिमाकी आँखोंमें अञ्जन करे। अञ्जन लगानेके लिये 'ॐ अग्निर्ज्योतीति०' मन्त्रसे देवके नेत्रोंको उद्धाटित करना चाहिये।

अञ्जनादिसे सुशोभित उस देवप्रतिमाका नामकरण स्थापना करनेवाला व्यक्ति करे। तदनन्तर 'ॐ इमं मे गाङ्गेति०' मन्त्रसे प्रतिमाके नेत्रोंमें शीतल - क्रिया (शीतलीकरण) - का सम्पादनकर 'ॐ अग्निर्मूर्द्धेति०' मन्त्रसे बाँबी अर्थात्‌ दीमकादिके द्वारा एकत्रित की गयी मिट्टी उस देवमूर्तिको समर्पित करे और बिल्व, गूलर, पीपल, वट, पलाशद्वारा निर्मित पञ्चकषायको लेकर 'ॐ यज्ञायज्ञेति0' मन्त्रसे प्रतिमाको स्नान कराये। तत्पश्चात्‌ पञ्चगव्यसे स्नान कराकर सहदेवी, बला, शतमूली, शतावरी, घृतकुमारी, गुडूची, सिंही तथा व्याघ्री - इन औषधियोंसे युक्त जलसे 'ॐ या ओषधीति०' मन्त्रद्वारा स्नान कराये। तदनन्तर 'ॐ या: फलिनीति०' मन्त्रके द्वारा फल - स्नान करानेका विधान है।

तत्पश्चात्‌ 'ॐ द्रुपदादिवेति०' मन्त्रसे विद्वानोंको उदूर्तन - कृत्य करना चाहिये। अनन्तर उत्तर आदि दिशाओंमें क्रमश: चार कलशोंका स्थापन करना चाहिये और उन कलशोंमें विविध रत्न , सप्तधान्य ( जौ, धान, तिल, कँगनी, मूँग, चना, साँवा - इन धान्योंका समूह सप्तधान्य कहलाता है।) और शतपुष्पिका (शतपुष्पिका सौंफ या वनसौंफकों कहते हैं।)  नामक औषधिका निक्षेप करना चाहिये। इसके अतिरिक्त उन चारों कलशोंमें चारों समुद्र एवं चारों दिशाओंके अधिष्ठाता देवोंका आवाहन करना चाहिये। साथ ही दूध, दही, क्षीरोदक एवं घृतोदकसे चारों कलशोंको पृथक्‌ - पृथक्‌ परिपूर्ण करके 'आप्यायस्व०' इस मन्त्रसे दुग्धकुम्भ, 'दधिक्राव्णो0 'मन्त्रसे दधिकुम्भ, 'याओषधी०' इस मन्त्रसे क्षीरोदककुम्भ तथा 'तेजोसि०' मन्त्रसे घृतकुम्भकों अभिमन्त्रित करना चाहिये। अभिमन्त्रित इन चारों कलशोंको चार समुद्रोंका प्रतिनिधि समझते हुए इनके द्वारा देवप्रतिमाको स्नान कराना चाहिये।

इस प्रकार स्नान - सम्पन्न उस देवप्रतिमाको सुन्दर वेश - भूषासे अलंकृत करके गुग्गुलका धूप प्रदान करे। तत्पश्चात्‌ पुनः कुम्भोंमें पृथ्वीपर विद्यमान सभी तीर्थों, नदियों तथा सागरोंका विन्यास करना चाहिये। उन कुम्भोंको 'ॐ या ओषधीति०' मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उनसे पुनः उस देवप्रतिमाका अभिषेक करे। जो व्यक्ति अभिषेकके अवशिष्ट जलसे स्नान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

समुद्रके प्रतिनिधिरूप उन कुम्भोंसे उस देवमूर्तिका अभिषेक - कृत्य सम्पन्न होनेके पश्चात्‌ अर्घ्य प्रदान करके 'ॐ गन्धद्वारेति०' मन्त्रसे सुगन्धित चन्दनादि पदार्थोंद्वारा अनुलेप करे। साथ ही शास्त्रोंमें विविध वेदमन्त्रोंसे देवमूर्ति - न्यासकी प्रक्रिया भी सम्पन्न करे। तत्पश्चात्‌ 'ॐ इमं वस्त्रेति०' मन्त्रके द्वारा वस्त्रोंसे मूर्तिको आच्छादित करे। उसके बाद 'ॐ कविहाविति०' मन्त्रका उच्चारण करते हुए उस प्रतिमाको सुन्दर मण्डपमें ला करके 'ॐ शम्भवायेति०' मन्त्रसे शय्यापर स्थापित करे। तदनन्तर 'ॐ विश्वतश्चक्षु०' मन्त्रका उच्चारणकर समस्त पूजाविधिको सब प्रकारसे परिपूर्ण करे। तत्पश्चात्‌ वहींपर बैठकर परमतत्त्वका ध्यान करते हुए आचार्यको शास्त्रीय विधानके अनुसार मन्त्रन्यास करना चाहिये। मन्त्रन्यासकी प्रक्रिया मन्त्रशास्त्रोंमें बतायी गयी है। इस न्यासके बाद मण्डपमें प्रतिष्ठापित देवप्रतिमाको वस्त्रसे आच्छादित करना चाहिये और उसकी यथाविधि पुन: पूजा भी करनी चाहिये। शास्त्रीय विधिके अनुसार जो देवताको समर्पित करना है, वह उनके पादमूलमें समर्पित कर देना चाहिये। इसके अतिरिक्त देवताके शिरोभागमें दो वस्त्रोंसे वेष्टित, स्वर्णसे युक्त एवं प्रणवसे अंकित कलश स्थापित करना चाहिये।

तदनन्तर कुम्भके सन्निकट बैठकर आचार्य वेद मन्त्रोच्चारके साथ अग्निकी स्थापना करे। तदनन्तर पूर्वदिशामें ऋगेदवेत्ता ऋत्विक्‌ कुण्डके समीप बैठकर श्रीसूक्त तथा पवमान आदि सूक्तोंका पाठ करे।

कुण्डके दक्षिण दिशामें स्थित अध्वर्यु अर्थात्‌ यजुर्वेदवेत्ता आचार्य रूद्रसूक्त तथा पुरुषसूक्तका पारायण करे। कुण्डके पश्चिममें बैठा हुआ उद्राता सामवेदीय आचार्य वेदव्रत, वामदेव्य, ज्येष्ठसाम, रथन्तर एवं भेरुण्डसामका पाठ करे। ऐसे ही कुण्डके उत्तरमें स्थित अथर्ववेदवेत्ता अथर्वशिरस्, कुम्भसूक्त, नीलरुद्रसूक्त एवं मैत्रसूक्तका पारायण करे।

तदनन्तर आचार्य अस्त्र - मन्त्रके द्वारा भलीभाँति कुण्डका प्रोक्षण करके स्वसामर्थ्यके अनुसार प्राप्त ताम्र या अन्य किसी धातुसे निर्मित पात्रमें अग्नि ग्रहणकर उस मूर्तिके आगे स्थापित करे। तत्पश्चात्‌ उस अग्निको अस्त्र - मन्त्रसे प्रज्वलित करके कवच - मन्त्रके द्वारा वेष्टित कर देना चाहिये (इसे अग्निका अमृतीकरण - कृत्य कहते हैं)।

इस प्रकार अमृतीकृत अग्निको गुरु वेदमन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके पात्रसहित कुण्डके चारों ओर घुमाये और वैष्णवयोगसे उसे प्रज्वलितकर वहीं कुण्डके मध्य स्थापित करे। अग्निके दक्षिणमें ब्रह्मा और उत्तरमें प्रणीताको स्थापितकर कुण्डकी प्रत्येक दिशाओं एवं विदिशाओंमें कुशाके विष्टरोंसे परिधिका निर्माण करे।

तदनन्तर गुरु ब्रह्मा, विष्णु, हर और ईशानकी पूजा करके दर्भोंके ऊपर अग्निको रखकर दर्भसे ही वेष्टित करके दर्भजलसे ही प्रोक्षण करे, क्योंकि कुशाद्वारा प्रदत्त जलका प्रोक्षण करनेसे बिना मन्त्रके भी शुद्धि हो जाती है और पूर्वाग्र, उत्तराग्र एवं पश्चिमाग्र अखण्डित तथा विस्तृत कुशाओंसे वेष्टित वह्निमें देवताका सांनिध्य स्वयं ही हो जाता है।

अग्निकी रक्षाके लिये मन्त्रज्ञोंने जो उपर्युक्त नियम कहे हैं, उनके विषयमें कुछ आचार्योका विचार है कि उन सभी कृत्योंको जातकर्म - संस्कारके पश्चात्‌ करना चाहिये।

अग्निका पवित्रीकरण करके आचार्यको आज्य - संस्कार करना चाहिये। अनन्तर आज्य (घृत) - को आहुतियोग्य बनानेके लिये उसका अवेक्षण, निरीक्षण, नीराजन एवं अभिमन्त्रण करके उसके द्वारा मुख्य हवनके पूर्व करणीय आज्यभाग एवं अभिघार(अभिघार (आघार) एवं आज्यभाग आहुतिविशेषका नाम है। यह कुशकण्डिका नामके विशेष कृत्यके सम्पादन - कालमें मुख्य आहुतियोंके पूर्व अवश्य करणीय है।) नामका कृत्यविशेष सम्पन्न करना चाहिये। तदनन्तर उस आज्यसे पाँच - पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। उसके बाद गर्भाधान - संस्कारसे लेकर गोदान - संस्कार पर्यन्त अग्निका संस्कार करके आचार्यको अपनी शाखाके अनुसार विहित मन्त्रोंसे अथवा प्रणवसे आहुति प्रदान करनी चाहिये।

आचार्य अन्तमें पूर्णाहुति प्रदान करे, क्योंकि पूर्णाहुति देनेसे यजमानकी अभिलाषा पूर्ण हो जाती है।

इन वेद - विहित नियमोंसे उत्पन्न हुई अग्नि सभी कार्योंमें सिद्धि प्रदान करनेवाली होती है। अतएव पुन: उसकी पूजा करके अन्य सभी कुण्डोंमें उसे प्रतिष्ठित करना चाहिये। वहाँ प्रत्येक आचार्य अपने शाखा मन्त्रोंसे इन्द्रादि सभी देवोंको सौ - सौ आहुतियाँ प्रदान करें। सौ आहुतियोंके पश्चात्‌ पूर्णाहुति समर्पित करके सभी देवोंको एक - एक आहुति पुनः प्रदान करनी चाहिये।

होता अपने द्वारा अनुष्ठित आज्याहुतियोंके शेष भागको यथाविधान कलशमें समर्पित करे। इसके बाद आचार्य देवता, मन्त्र एवं अग्निकि साथ अपने तादात्म्यकी भावना करते हुए पूर्णाहुति सम्पन्न कराये।

यज्ञ मण्डपसे बाहर आकर आचार्य दिक्पालोंको बलि प्रदान करे। इस बलि कृत्यके साथ भूतों, देवताओं और नागोंको बलि देनी चाहिये। तिल और समिधा - यही दो होम - पदार्थ विहित हैं। आज्य तो उन दोनोंका सहयोगी है, क्योंकि घृतके बिना हवनीय द्रव्य अक्षय (परिपूर्ण) नहीं होता।

इस हवनकृत्यमें पुरुषसूक्त, रुद्रसूक्त, ज्येष्ठसाम तथा 'तन्नयामि' इस मन्त्रसे युक्त भारुण्डसूक्त, महामन्त्रके रूपमें प्रसिद्ध नीलरुद्रसूक्त एवं अथर्वके कुम्भसूक्तका पारायण यथाक्रम पूर्व, दक्षिण तथा पश्चिम आदि दिशाओंमें आसीन ऋत्विजोंसे करवाना चाहिये। इस हवन - कर्ममें एक - एक सहस्र आहुतिका विधान है और इन आहुतियोंमें वेदोंके आदि मन्त्रों, देवताके नाम - मन्त्रों, अपनी शाखाके विहित मन्त्रों, गायत्री - मन्त्रके साथ यथाविधान व्याहति एवं प्रणवका प्रयोग करना चाहिये। साथ ही यह भावना करनी चाहिये कि हम इन आहुतियोंको देवताके शिरोभाग, मध्यभाग तथा पादभाग आदिमें समर्पित कर रहे हैं और स्वयंको देवमय समझना चाहिये।

इस प्रकार होम - विधिको सम्पन्न करके देशिक (आचार्य) - को चाहिये कि वह देव - विग्रहमें मन्त्रोंका न्यास करें। यथा - 'ॐ अग्निमीळे०' मन्त्रका देवके दोनों चरणोंमें, 'ॐ इषेत्वेति०' मन्त्रका दोनों गुल्फोंमें, 'ॐ अग्न आयाहि०' मन्त्रसे देवकी दोनों जंघाओंमें, 'ॐ शं नो देवी०' मन्त्रका दोनों जानुओंमें, 'ॐ बृहद्रथन्तर0 ' मन्त्रका दोनों ऊरुओंमें न्यास विहित है। देवके उदर भागमें भी इसी प्रकार न्यास करना चाहिये। तदनन्तर 'ॐ दीर्घायुष्द्वाय०' मन्त्रका देवके हृदयमें, 'ॐ श्रीश्चते०' मन्त्रका गलेमें, 'ॐ त्रातारमिन्द्र०' मन्त्रका वक्ष:स्थलमें, 'ॐ त्र्यम्बक०' मन्त्रका दोनों नेत्रोंमें तथा 'ॐ मूर्द्धा भव०' मन्त्रका मस्तकमें न्यास करके विहित लग्नमुहूर्तमें हवन करे।

इसके पश्चात्‌ 'ॐ उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते०' मन्त्रसे देवमूर्तिका उत्थापन करके मन्त्रवेत्ता आचार्य 'देवस्यत्वा०' मन्त्रसे मूर्तिका स्पर्श करते हुए वेदोक्त पुण्याहवाचनके साथ देवप्रासादकी प्रदक्षिणा करे। इसके अनन्तर विविध रत्न, विविध धातु, लौहद्रव्य एवं विधानके अनुसार अनेक प्रकारके सिद्धबीजोंके साथ दिक्‍पाल आदि देवताओंकी प्रदक्षिणा विहित है। इसके अनन्तर यथास्थान प्रधान देवप्रतिमाकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये।

देवमूर्तिको मन्दिरके मुख्य गर्भभागमें स्थापित नहीं करना चाहिये और न उस गर्भका परित्याग करके अन्यत्र ही उसकी स्थापना होनी चाहिये, अपितु गर्भभागका कुछ मध्यभाग छोड़कर उसे स्थापित करनेसे दोषका परिहार हो जाता है। अत: तिलके कणमात्र परिमाणमें मूर्तिको उत्तरकी ओर कुछ बढ़ा लेना चाहिये।

'ॐ स्थिरो भव', 'शिवो भव', 'प्रजाभ्यश्च नमो नमः ', 'देवस्य त्वा सवितु:०' आदि मन्त्रोंसे गुरु देवमूर्तिका यथाविधि विन्यास एवं अभिमन्त्रण करे। साथ ही सुप्रतिष्ठित देवप्रतिमाको यथाविधान सम्पातकलशके जलसे ही स्नान कराना चाहिये।

तदनन्तर धूप - दीप, अन्य सुगन्धित पदार्थ तथा नैवेद्यसे उस देवप्रतिमाकी विधिवत्‌ पूजा करके अर्घ्य प्रदान करे और प्रणाम निवेदन करके क्षमा - प्रार्थना करे।

उसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार यजमान ऋत्विजोंको पात्र, वस्त्र एवं उपवस्त्र, छत्र, सुन्दर बहुमूल्य अँगूठी तथा दक्षिणा देकर संतुष्ट करे। तदनन्तर सावधान होकर यजमान चतुर्थी होम करे। सौ आहुतियोंको देकर अन्तमें वह पूर्णाहुति प्रदान करे।

इसके बाद आचार्य मण्डपसे बाहर आकर दिक्‍पालोंको बलि प्रदान करके पुष्प लेकर 'क्षमस्व' इस वाक्यसे उन देवोंका विसर्जन कर दे।

इस प्रकार यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात्‌ आचार्यको कपिला धेनु, चामर, मुकुट, कुण्डल, छत्र, केयूर, कटिसूत्र, व्यजन (पंखा), वस्त्रादि वस्तुएँ, ग्राम तथा साज - सज्जापूर्ण सुन्दर भवन प्रदान करना चाहिये। तदनन्तर आचार्य तथा अन्य सहयोगीजनोंके लिये सुन्दर विशाल भोजका आयोजन कराकर सबको संतुष्ट करना चाहिये। ऐसा करनेसे यजमान कृतार्थ हो जाता है और वास्तु देवकी प्रसन्नतासे उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है।