गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
53 - नवनिधियोंके लक्षणोंसे युक्त पुरुषके ऐश्वर्य एवं स्वभावका वर्णन
सूतजीने कहा - भगवान् विष्णुसे अष्टनिधियोंके विषयमें सुनकर ब्रह्माजीने उनका वर्णन इस प्रकार किया था कि ‘पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द (नन्द), नील और शंङ्ख नामकी अष्टनिधियाँ' हैं। नवीं निधि मिश्र कहलाती है। अब मैं उनके स्वरूपका वर्णन करता हूँ।
पद्मनिधिके लक्षणोंसे सम्पन्न मनुष्य सात्विक और दाक्षिण्य गुणसे सम्पन्न होता है। वह सुवर्ण - चाँदी आदि मूल्यवान् धातुओंका संग्रह करके यतियों, देवताओं और याज्ञिकोंको दान करता है। महापद्म - चिह्नसे लक्षित व्यक्ति भी अपने संग्रहीत धन आदिका दान धार्मिक जनोंको करता रहता है। पद्म तथा महापद्मनिधि सम्पन्न पुरुष सात्त्विक स्वभाव वाले कहे गये हैं।
मकरनिधिके चिह्नसे चिह्नित मनुष्य खड्ग, बाण एवं कुन्त(भाला) आदि अस्त्रोंका संग्रह करनेवाला होता है। वह नित्य श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान देता है और राजाओंके साथ उसकी सदैव मित्रता बनी रहती है। द्रव्यादिका आहरण करनेके लिये वह शत्रुओंका विनाश करता है और युद्धके लिये सदा तत्पर रहता है। कच्छपनिधि - लक्षित व्यक्ति तामस गुणवाले होते हैं। कच्छप - चिहनसे युक्त व्यक्ति किसीपर विश्वास नहीं करता है। वह न अपनी सम्पत्तिका स्वयं उपभोग करता है और न तो उसमेंसे वह किसीको कुछ देता ही है। वह एकान्तमें जाकर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्तिको पृथिवीमें गाड़कर छिपा देता है। उसकी सम्पत्ति एक पीढ़ीतक रहती है।
मुकुन्द निधिके चिह्नसे अंकित पुरुष रजोगुण - सम्पन्न होता है। वह राज्य - संग्रहमें लगा रहता है, वह भोगोंका उपभोग करते हुए गायक और वेश्या आदिको धन देता है।
नन्दनिधिसे युक्त व्यक्ति राजस और तामस गुणोंवाला होता है। वही कुलका आधार बनता है। वह स्तुति करनेपर प्रसन्न होता है तथा बहुत - सी स्त्रियोंका पति होता है। पूर्वकालके मित्रोंमें उसकी प्रीति शिधिल होती है और वह अन्य नये मित्रोंके साथ प्रेम करने लगता है।
नीलनिधिके चिह्नसे सुशोभित मानव सात्त्विक तेजसे संयुक्त होता है। वह वस्त्र - धान्यादिका संग्रह तथा तडागादिका निर्माण करता है। उसके द्वारा (जनहितमें) आम्रादिके उद्यान भी लगवाये जाते हैं।उसकी सम्पत्ति तीन पीढ़ीतक रहती है।
शङ्खनिधि एक ही पुरुष (पीढ़ी) - के लिये होती है। इससे समन्वित मनुष्य धनादिका स्वयं तो उपभोग करता है, किंतु उसके परिजन कुत्सित अन्नका भोजन तथा अच्छे न लगनेवाले मैले - कुचैले वस्त्रोंसे जीवनयापन करते हैं। वह स्वयंके भरण - पोषणमें सदैव तत्पर रहता है। यदि वह किसीको कुछ वस्तु देता भी है तो वह व्यर्थकी वस्तु होती है (जिसका कोई उपयोग नहीं होता)।
मिश्र (मिली-जुली ) - निधिके चिह्नसे युक्त होनेपर मनुष्यके स्वभावमें मिश्रित फल दिखलायी देते हैं।
भगवान् विष्णुने भी निधियोंके ऐसे ही स्वरूपका वर्णन शिव आदि देवोंसे किया था (उसको मैंने आप सभीको सुना दिया)। अब हरिने भुवन कोशादिका जैसा वर्णन किया था, वैसा ही मैं कह रहा हूँ।