गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
217 - संध्याविधि
(इस अध्यायमें संध्याकी विधि अत्यन्त संक्षिप्त दी गयी है। अतः सविधि विस्तारपूर्वक ‘संध्योपासनविधि’ जाननेके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित ‘नित्यकर्म - पूजाप्रकाश’ पुस्तक देखना चाहिये।)
श्रीब्रह्माजीने कहा - अब द्विजातियोंके लिये संध्या - विधिका वर्णन करता हूँ। सर्वप्रथम इस मन्त्रसे बाह्य तथा आभ्यन्तर शुद्धि करे-
ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥
अर्थात् पवित्र हो या अपवित्र किसी भी अवस्थामें क्यों न हो, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारकी शुद्धि हो जाती है।
उपनयन - संस्कारके समय जिस गायत्री मन्त्रका उपदेश प्राप्त होता है, उसीका जप संध्योपासनमें होता है। उपनयन कालमें गायत्री मन्त्रका विनियोग इस प्रकार होता है -
‘ॐ गायत्री छन्दः, विश्वामित्र ऋषिस्त्रिपात्, समुद्रा: कुक्षि:,
चन्द्रादित्यौ लोचनौ, अग्निर्मुखम्, विष्णुर्हृदयम, ब्रह्मरुद्रौ शिर:,
रुद्रः शिखा उपनयने विनियोग:।
संध्योपासनके समय गायत्री मन्त्रके जपसे पहले
‘ॐ भू: से पैरमें, ‘ॐ भुवः’ से जानुओंमें, ‘ॐ स्व:’ से हृदयमें,
‘ॐ महः’ से सिरमें, ‘ॐ जन:’ से शिखामें, ‘ॐ तपः’ से कण्ठमें और
‘ॐ सत्यम्, से ललाटमें न्यास करना चाहिये।
आगेके मन्त्रोंसे हृदय, सिर, शिखा, कवच, अस्त्र आदियमें न्यास करे -
ॐ हृदयाय नमः, ॐ भू: शिरसे स्वाहा, ॐ भुवः शिखायै वौषट्,
ॐ स्व: कवचाय हुम, ॐ भूर्भुवः स्व: अस्त्राय फट्। इसके बाद ॐ भू:,
ॐ भुव: इत्यादि सप्तव्याहतियोंके साथ गायत्रीके तृतीय पाद
‘ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतम् भूर्भुव: स्वरोम्’ का जप करते हुए प्राणायाम करे।
प्राणायामके बाद ‘ॐ सूर्यश्र्च०’ इस मन्त्रसे प्रातः कालकी,
‘ॐ आप: पुनन्तु०’ इस मन्त्रसे मध्याहकालकी तथा
‘ॐ अग्निश्च०’ इस मन्त्रसे सायंकालीन संध्यामें आचमन करे।
तत्पश्चात् आवाहन पूर्वक भगवती गायत्रीके प्रातः,
मध्याह्न तथा सायं - स्वरूपोंका ध्यान करे।
फिर ‘ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः०’ और ‘ॐ सुमित्रिया न आपः०’ एवं
‘ॐ द्रुपदादिव०’ इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा जलसे मार्जन करे और
‘ॐ ऋतं चर सत्यं०’ इस मन्त्रसे अघमर्षण करे।
तदनन्तर गायत्रीजपसे पूर्व गायत्रीमन्त्रका विनियोग इस प्रकार करे -
‘ॐ गायत्र्या विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोग:’।
‘ॐ उदु त्यं जातवेदसं०’, ‘ॐ चित्र देवानां०’, ‘ॐ तच्चक्षु०’ -
ये सूर्योपस्थानके मन्त्र हैं।
गायत्रीका जप करनेके अनन्तर ‘ॐ विश्वतश्चक्षु०’,
‘ॐ देवागातु०’ तथा ‘ॐ उत्तरे शिखरे०’
इन मन्त्रोंसे जपसमर्पणपूर्वक गायत्रीदेवीका विसर्जन करे।