206 - व्याकरणसार

सूतजीने कहा - हे विप्रो! अब मैं संहिता आदिसे युक्त सिद्ध शब्दोंको बतलाने जा रहा हूँ। आप उसे सुनें - सागता, वीदं, सूत्तमम्‌, पितॄर्षभ, लॄकार - इन पदोंमें दीर्घ सन्धि है। लांगलीषा, मनीषा - यहाँ पररूप सन्धि है। इसी प्रकार गंगोदकम्‌ (यहाँ गुण हुआ है।) तवल्कार: (यहाँ गुण), ऋणार्णम्‌, प्रार्णम्‌में (वृद्धि), शीतार्त्त: में (दीर्घ), सैन्द्री - सौकरमें (वृद्धि), बध्वासन, पित्रर्थ, लनुबन्धमें (यण्‌), नायकः, लवणम्‌, गाव: में (अयादि),एते (गुण्) त ईश्वरा:में (अय्‌ और यलोप्‌) (ये शब्द स्वरसन्धिके उदाहरण हैं ।) देवी गृहमथो अत्र अ अवेहि पटू इमौ (इनमें प्रकृति भाव है।),अश्वा: षडस्य (जश्त्वा), तन्न (अनुनासिक), वाक्‌ (चर्त्व), षड्दलानि(जश्त्वा),तच्चरेत्‌ (श्च्युत्व - चर्त्व), तल्लुनाति (परसवर्ण), तज्जलम्‌ (श्च्युत्व), तच्छमशानकम्‌ (छत्व - श्चुत्व), सुगन्नण्णत्र, पचन्नत्र(नुट्‌ आगम), भवांश्छादयति (अनुस्वार सुट्‌ - श्रुत्व), भवाञझनकर: (परसवर्ण), भवांस्तरति,

(अनुस्वार - सुट्‌), भवाँल्लिखति (परसवर्ण), ताञ्चक्रे(श्रुत्व), भवाञ्शेते (श्रुत्व) भवाण्डीनं त्वन्तरसि त्वङ्करोषि (परसवर्ण) (ये व्यञ्जनसंधिके उदाहरण हैं), सदार्चनम्‌ (दीर्घ), कश्चरेत्‌(श्चुत्व) कृष्टकारेण(ष्टुत्व), कॅँ्कुर्यात्‌ कॅँ्फले (जिह्वामूलीण विसर्ग)कश्शेते(श्चुत्व),कष्षण्ड:(ष्टुत्व), कस्क:(सत्त्व),क इहात्र क एवाहु - र्देवा आहु:,भो व्रज(रुत्व,यत्व,यलोप्‌), स्वयम्भूविष्णुर्व्रजति(रुत्व) गीष्पति:(षत्व), धूर्पति:(रुत्व), कुटीच्छाया (तुक् - श्चुत्व), तथाच्छाया (तुक् - विकल्प) - ये विसर्ग - सन्धिके उदाहरण हैं।

समास छ: प्रकारके होते हैं (द्वन्द्व , द्विगु, तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव)। स द्विज: = सद्विज (कर्मधारय), त्रिवेद (त्रयाणां वेदानां समाहारः द्विगु) तत्कृतः तदर्थ: वृकभीति:, यद्धनम्‌ ज्ञानदक्षः (इनमें क्रमश: तेन कृतः, तस्मै अर्थ:, वृकाद् भीतिः, यस्य धनम्‌, ज्ञानेदक्षः इस व्युत्पत्तिसे तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी तथा सप्तमी तत्पुरुष समास है।) तत्त्वज्ञमें बहुव्रीहि तथा अधिमानमें अव्ययीभाव समास है। देवर्षिमानवाःमें देवश्च ऋषिश्च मानवश्च इस व्युत्पत्तिसे द्वन्द्व समास है।

‘पाण्डव (पाण्डो:अपत्यमिति पाण्डव: इत्यर्थ अण्‌)’, शैव (शिवो देवताऽस्य इत्यर्थे अण्‌),(शिवादिभ्योऽण् (पा०सू० 41112)) ब्राह्मयम्‌ (ब्रह्मण: भावः कर्म इत्यर्थे ष्यञ्),( गुणवचनब्राह्मणादिभ्य: कर्मण च (पा०सू० 51124)) तथा ब्रह्मता (ब्रह्मण:भाव: इत्यर्थे तल्‌),(तस्य भावस्त्वतलौ(पा०सू० 51119))आदि तद्धित प्रत्ययान्त शब्द हैं।

देव, अग्नि, सखि, पति, अंश, क्रोष्टा(सियार), स्वायम्भुव, पितृ, नृ, प्रशस्ता (प्रशंसक), रै (धन), गौ और ग्लौ (चन्द्रमा) - ये अत्यन्त पुल्लिङ्गके सिद्ध शब्द हैं। अश्वयुक्‌ (घोड़ेसे युक्त), क्ष्माभुक्‌(पृथ्वीका उपभोग करनेवाला राजा), मरुत्‌(पवन), क्रव्याद, मृगव्यध (मृगका पीछा करनेवाला शिकारी), आत्मन्‌, राजन्‌ (राजा), यव, पन्था (मार्ग), पूषन्‌(सूर्य), ब्रह्महन्‌ (ब्राह्मणको मारनेवाला ब्रह्मघाती), हलिन्‌ (हल धारण करनेवाला मनुष्य), विट्‌(जार पुरुष), वेधस्‌ (विधाता), उशनस्‌ (उशना-शुक्राचार्य), अनड्वान्‌ (गाड़ी खींचनेवाला बैल), मधुलिट्‌ (शहद चाटनेवाला भौंरा) तथा काष्ठतट्‌(कठफोर पक्षी या बढ़ई) - ये हलन्त्‌ पुल्लिङ्गके अन्तर्गत आनेवाले सिद्ध शब्द हैं।

वन(जंगल), वारि(जल), अस्थि (हड्डी),वस्तु(सामग्री), जगत्‌ (संसार), साम्‌, अहः, कर्म, सर्पिष्‌(घी), वपुष्‌ शरीर), तेजस्‌ (ऊर्जा) - ये आदिके चार शब्द अजन्त और शेष हल् प्रत्ययान्त नपुंसकलिङ्गके सिद्ध रूप हैं।

जाया (पत्नी), जरा(वृद्धावस्था), नदी, लक्ष्मी, श्री, स्त्री, भूमि, वधू, भ्रू (भौंह), पुनर्भू (पुनर्जन्म), धेनु (गौ), स्वसा (बहन), मातृ (माता) तथा नौ(नौका) - ये अजन्त स्त्रीलिङ्गमें सिद्ध रूप हैं।

वाक्‌ (वाणी), सत्रक्‌ (माला), दिक्‌ (दिशा), मुद्‌ (मुदा - प्रसन्नता), क्रुध्‌ (क्रोध), युवति, ककुभू, घौ आकाश), दिव्‌ (स्वर्ग), प्रावृट्‌ (वर्षा), सुमना और उष्णिक् - ये हलन्त स्त्रीलिङ्गके सिद्ध रूप हैं।

अब मैं आपको गुण, द्रव्य और क्रियाके योगसे बननेवाले स्त्रीलिङ्गके शब्दोंको भी बता रहा हूँ।

शुक्ल (श्वेत), कीलालक (अमृतके समान पेय पदार्थ), शुचि (पवित्रता), ग्रामणी (गाँवका अधिकारी), सुधी (विद्वान), पटु (चतुर), कमलभू (कमलसे उत्पन्न ब्रह्मा या पराग), कर्तृ (कर्ता), सुमत (सुन्दर विचारोंवाला पुरुष), सूनु (पुत्र), सत्या, अभक्ष (न खाने योग्य), दीर्घपा, सर्वविश्वा, उभय (दो), उभौ, एक, अन्या (दूसरी) और अन्यतरा (दूसरेमें प्रमुख) - ये सब गुणप्रधान शब्द हैं, जो स्त्रीलिङ्गमें बनते हैं।

इसके बाद डतर (उच्चतर), डतम (उच्चतम), नेम, तु (तो), सम (समान), अथ (तदनन्तर), सिम (प्रत्येक), इतर (अतिरिक्त), पूर्व (प्राचीन), अध:(नीचे), च (और), दक्षिण (दक्षिण दिशा), उत्तर (उत्तर दिशा), अवर (अधम), पर (दूसरे), अन्तर, एतद्‌ (यह),यद्यत्‌ (जो - जो), किं (क्या), अदसू (यह ), इदम्‌ (यह), युष्मत्‌ (तुम), अस्मत्‌(मैं - हम), तत्‌ (वह), प्रथम (पहला), चरम(अन्तिम), अल्पतया (संक्षेप), अर्ध(आधा), तथा (और), कतिपय (कुछ), द्वौ (दो), चेति (और ऐसा), एवं (इस प्रकार) - ये सभी शब्द सर्वनाम हैं। इनको सर्वादिगणमें परिगृहीत किया गया है।

शृणोति(सुनता है), जुहोति (हवन करता है), जहाति (परित्याग करता है), दधाति (धारण करता है), दीप्यति (तेजस्वी बन रहा है), स्तूयति (स्तुति करता है), पुत्रीयति (पुत्रके समान व्यवहार करता है), धनीयति (धनवान्‌ बन रहा है), त्र्युट्यति, म्रियते (मर रहा है), चिचीषति (संग्रहकी इच्छा कर रहा है) तथा निनीषति (ले जानेकी इच्छा कर रहा है) - ये कतिपय तिडन्तके सिद्ध रूप शब्द हैं।

‘सर्व’शब्दके प्रथमा विभक्तिके बहुवचनमें ‘सर्वे’, चतुर्थी विभक्तिके एकवचनमें ‘सर्वस्मै’, पञ्चमी विभक्तिके एकवचनमें ‘सर्वस्मात्‌’, षष्ठी विभक्तिके बहुवचनमें ‘सर्वेषाम्‌’ रूप बनता है। इसी प्रकार विश्व आदि शब्दोंके रूपोंको भी आप जानें। पहले कहे गये ‘पूर्व’शब्दके प्रथमा विभक्तिके बहुवचनमें ‘पूर्वे, पूर्वा:’पञ्चमी विभक्तिके एकवचनमें ‘पूर्वस्मात्‌’और सप्तमी विभक्तिके एकवचनमें ‘पूर्वस्मिन्‌’ रूप बनता है।

सूतजीने कहा - हे ऋषियो! सुबन्त और तिडन्त पदोंके सिद्धरूपका वर्णन नाममात्र ही किया गया है। कुमारसे इस व्याकरणको सुनकर कात्यायनने इसको विस्तारपूर्वक कहा था।