24 - 26 - भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवोंकी पूजा - विधि

सूतजीने कहा - अब मैं गणेश आदि देवोंकी तथा त्रिपुरा देवीकी पूजाको कहूँगा, जो अपने भक्तोंको सर्वदा अभीष्ट प्रदान करनेवाली तथा श्रेष्ठ है। साधकको सबसे पहले गणपति देवके आसन एवं उनके मूर्त स्वरूपका पूजन करके न्यास पूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। साधक 'गां' आदि बीजमन्त्रोंसे निम्न रीतिसे हृदयादि न्यास करे-

ॐ गां हृदयाय नमः, ॐ गीं शिरसे स्वाहा, ॐ गूं शिखायै वषट् , ॐ गैं कवचाय हुम्‌, ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट्‌, ॐ गः अस्त्राय फट्‌।

इस न्यासके पश्चात्‌ साधकको-

'ॐ दुर्गायाः पादुकाभ्यां नमः', 'ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः'

मन्त्रसे माता दुर्गा और गुरुकी पादुकाओं को नमस्कार करके देवी त्रिपुराके आसन और मूर्तिको प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ वह (साधक) 'ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षिणि' -इस मन्त्रसे हृदयादि न्‍यास करे और फिर इसी मन्त्रसे 'रुद्रचण्डा, प्रचण्ड दुर्गा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा, चण्डिका तथा दुर्गा - इन नौ शक्तियोंका पूजन करे। तदनन्तर वज्र, खड्ग आदि मुद्राओंका प्रदर्शनकर उसके अग्नि कोणमें सदाशिव आदि देवोंकी पूजा करे। अत: साधक पहले 'ॐ सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनाय नमः' कहकर प्रणाम करे। तत्पश्चात्‌ 'ॐ ऐं क्लीं (ह्रीं) सौं त्रिपुरायै नमः' यह मन्त्रोच्चार करते हुए उस त्रिपुरा शक्तिको नमस्कार करे।

साधक उसके बाद भगवती त्रिपुराके पद्मासन, मूर्ति और हृदयादि अंङ्गोंको प्रणाम करे। तत्पश्चात्‌ उस पद्मपीठ पर ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और चण्डिका - इन आठ देवियोंकी पूजा करे। इन देवियोंकी पूजाके बाद 'भैरव' नामक देवोंकी पूजाका विधान है। असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण तथा संहार नामवाले - ये आठ भैरव हैं।

भैरव - पूजाके पश्चात्‌ रति, प्रीति, कामदेव, पञ्चबाण, योगिनी, बटुक, दुर्गा, विघ्नराज, गुरु और क्षेत्रपाल - देवोंका भी पूजन करे।

साधकको पद्मगर्भ - मण्डल या त्रिकोण पीठ बनाकर उसपर और हृदयमें शुक्ल वर्णवाली, वरदायिनी, अक्षमाला, पुस्तक एवं अभय मुद्रासे सुशोभित भगवती सरस्वतीका भी ध्यान करना चाहिये। एक लाख मन्त्रका जप और हवन करनेसे भगवती त्रिपुरेश्वरी साधकके लिये सिद्धिदात्री हो जाती हैं। पूजामें देवोंके आसन तथा पादुकाकी पूजाका भी विधान है। विशेष पूजनमें मन्त्रन्यास तथा मण्डलादि-पूजन भी करना चाहिये।