गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
145 - महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन
ब्रह्मजीने कहा - अब मैं महाभारतके युद्धकी कथाका वर्णन करूँगा, जो पृथिवीपर बढ़े अत्याचारके भारको उतारनेके लिये हुआ था, जिसकी योजना युधिष्ठिरादि पाण्डवोंकी रक्षाके लिये तत्पर कृष्णने स्वयं की थी।
भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। ब्रह्मासे अत्रि, अत्रिसे सोम, सोमसे बुध हुए। बुधने इला नामक अपनी पत्नीसे पुरूरवाको उत्पन्न किया। पुरूरवासे आयु, आयुसे ययाति और ययातिके वंशमें भरत, कुरु तथा शन्तनु हुए। राजा शन्तनुकी पत्नी गङ्गासे भीष्म हुए। भीष्म सर्वगुण सम्पन्न तथा ब्रह्मविद्याके पारंगत विद्वान थे।
शन्तनुकी सत्यवती नामक एक दूसरी पत्नी थी। उस पत्नीके दो पुत्र हुए, जिनका नाम चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य था। चित्रांगद नामवाले गन्धर्वके द्वारा युद्धमें चित्रांग मार डाला गया। विचित्रवीर्यका विवाह काशिराजकी पुत्री अम्बिका और अम्बालिकाके साथ हुआ। विचित्रवीर्य भी नि:संतान ही मर गये थे। अत: व्याससे उनके दो क्षेत्रज पुत्रों - अम्बिकाके गर्भसे धृतराष्ट्र तथा अम्बालिकाके गर्भसे पाण्डुका जन्म हुआ। उन्हीं व्यासके द्वारा दासीके गर्भसे विदुरका जन्म हुआ। धृतराष्ट्रके गान्धारीसे सौ पराक्रमी पुत्र हुए, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था। पांडुपत्नी कुन्ती और माद्रीसे पाँच पुत्रोंका जन्म हुआ। युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव - ये पाँचों पुत्र बड़े ही बलवान् और पराक्रमशाली थे।
दैववशात् कौरव और पाण्डवोंमें वैरभाव उत्पन्न हो गया। उद्धत स्वभाववाले दुर्योधन द्वारा पाण्डवजन बहुत ही सताये गये। लाक्षागृहमें उन्हें विश्वासघातसे जलाया गया, किंतु वे अपनी बुद्धिमत्तासे बच गये। उसके बाद उन लोगोंने एकचक्रा नामक पुरीमें जाकर एक ब्राह्मणके घरमें शरण ली। वहाँ रहते हुए उन सभीने बक नामक राक्षसका संहार किया। तदनन्तर पाञ्चआल नगरमें हो रहे द्रौपदीके स्वयंवरको जानकर वे सभी वहाँ पहुँचे। वहाँ अपने पराक्रमका परिचय देकर उन पाण्डवोंने द्रौपदीको पत्नीके रूपमें प्राप्त किया।
इसके बाद द्रोणाचार्य और भीष्मकी अनुमतिसे धृतराष्ट्रने पाण्डवोंको अपने पास बुला लिया और आधा राज्य उन्हें दे दिया। आधा राज्य प्राप्त करनेके पश्चात् इब्द्रप्रस्थ नामक एक सुन्दर नगरीमें रहकर वे राज्य करने लगे। उन तपस्वी पाण्डवोंने वहाँपर एक सभामण्डपका निर्माण करके राजसूय - यज्ञका अनुष्ठान किया।
तत्पश्चात् मुरारि भगवान् वासुदेवकी अनुमतिसे ही द्वारकापुरीमें जाकर अर्जुनने उनकी बहन सुभद्राका पाणिग्रहण किया। उन्हें अग्निदेवसे नन्दिघोष नामक दिव्य रथ, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध गाण्डीव नामका श्रेष्ठतम दिव्य धनुष, अविनाशी बाण तथा अभेद्य कवच प्राप्त हुआ। उसी धनुषसे कृष्णके सहचर वीर अर्जुनने अग्निको खाण्डव - वनमें संतुष्ट किया था। दिग्विजयमें देश - देशान्तरके राजाओंको जीतकर उनसे प्राप्त रत्नराशि लाकर उन्होंने अपने नीति - परायण ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरको सौंप दी।
भाइयोंके साथ धर्मराज युधिष्ठिर कर्ण, दुःशासन और शकुनिके मतमें स्थित पापी दुर्योधनके द्वारा द्यूतक्रीडाके मायाजालमें जीत लिये गये। उसके बाद बारह वर्षोतक उन्हें वनमें महान् कष्ट उठाना पड़ा। तदनन्तर धौम्य ऋषि तथा अन्य मुनियोंके साथ द्रौपदी सहित वे पाँचों पाण्डव विराट - नगर गये और गुप्तरूपसे वहाँ रहने लगे। एक वर्षतक वहाँ रहकर दुर्योधन द्वारा हरण की जाती हुई गायोंका प्रत्याहरण करके अर्थात् वापस लौटाकर वे अपने राज्यमें जा पहुँचे। सम्मान पूर्वक दुर्योधनसे उन्होंने अपने आधे राज्यके हिस्सेके रूपमें पाँच गाँव माँगे, किंतु दुर्योधनसे वे भी प्राप्त न हो सके। अत: कुरुक्षेत्रके मैदानमें उन वीरोंको युद्ध करना पड़ा। उसमें पाण्डवोंकी ओर सात दिव्य अक्षौहिणी सेना थी और दुर्योधनादि ग्यारह अक्षौहिणी सेनासे युक्त थे। यह युद्ध देवासुर - संग्रामके समान महाभयंकर हुआ था।
सबसे पहले दुर्योधनकी सेनाके सेनापति भीष्म हुए और पाण्डवोंका सेनापति शिखण्डी बना। उन दोनोंके बीचमें शस्त्र - से - शस्त्र तथा बाण - से - बाण भिड़ गये। दस दिनोंतक महाभयंकर युद्ध होता रहा। शिखण्डी और अर्जुनके सैकड़ों बाणोंसे बिंधकर भीष्म धराशायी हो गये, किंतु इच्छामृत्युका वरदान होनेसे भीष्मकी उस समय मृत्यु नहीं हुई। जब सूर्य उत्तरायणमें आ गये तब धर्म - सम्बन्धित विभिन्न उपदेश देकर उन्होंने अपने पितरोंका तर्पण किया और भगवान् गदाधरका ध्यान करते हुए अन्तमें वे उस परमपदको प्राप्त हुए, जहाँपर आनन्द - ही - आनन्द है और जो निर्मल आत्माओंके लिये मुक्तिका स्थान है।
तदनन्तर सेनापतिके पदपर द्रोणाचार्य आसीन हुए। उनका युद्ध पाण्डव - सेनापति धृष्टद्यम्मके साथ हुआ। यह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा। जितने भी राजा इस युद्धमें सम्मिलित हुए, वे सभी अर्जुनके द्वारा मारे गये। पुत्रशोकका समाचार सुनकर द्रोणाचार्य उस शोकके सागरमें डूबकर मर गये।
इसके बाद वीर अर्जुनसे लड़नेके लिये कर्ण युद्धभूमिमें आया। दो दिनोंतक महाभयानक युद्ध करके वह भी उनके द्वारा प्रयुक्त अस्त्रोंसे न बच सका। तत्पश्चात् शल्य धर्मराजसे युद्ध करनेके लिये गया। अपराह्णकाल होनेके पूर्व ही धर्मराजके तीक्ष्ण बाणोंसे वह भी चल बसा।
तदनन्तर कालान्तक यमराजके समान क्रुद्ध दुर्योधन गदा लेकर भीमसेनको मारनेके लिये दौड़ा, किंतु वीर भीमसेनने अपनी गदासे उसे गिरा दिया। उसके बाद द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने रात्रिमें सोयी हुई पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण कर दिया। अपने पिताके वधका स्मरण करके उसने बड़ी ही बहादुरीसे बहुतोंको मौतके घाट उतार दिया। धृष्टद्युम्मका वध करके उसने द्रौपदीके पुत्रोंकी भी मार डाला। इस प्रकार पुत्रोंका वध होनेसे दु:खित एवं रोती हुई द्रौपदीको देखकर अर्जुनने अश्वत्थामाको परास्तकर ऐषिक नामक अस्त्रसे उसकी शिरोमणिको निकाल लिया।
उसके बाद अत्यन्त शोकसन्तप्त स्त्रीजनोंको आश्वस्त करके धर्मराज युधिष्टिरने स्नान करके देवता और पितृजनोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् भीष्मके द्वारा दिये गये सदुपदेशोंसे आश्वस्त महात्मा युधिष्ठिर पुनः राज्यकार्यमें लग गये। अश्वमेध - यज्ञका अनुष्ठान करके उन्होंने भगवान् विष्णुका पूजन किया तथा विधिवत् ब्राह्मणोंको दक्षिणादि देकर संतुष्ट किया। साम्बके पेटसे निकले हुए मूसलके द्वारा यदुवंशियोंके विनाशका समाचार सुनकर उन्होंने राज्य सिंहासनपर अभिमन्युके पुत्र परीक्षित्कों बैठाकर भीमादि अपने सभी भाइयों सहित विष्णु सहस्रनामका जप करते हुए स्वयं भी स्वर्गके मार्गका अनुगमन किया।
वासुदेव कृष्ण असुरोंको व्यामोहित करनेके लिये बुद्धरूपमें अवतरित हुए । अब वे कल्कि होकर फिर सम्भल ग्राममें अवतार लेंगे और घोड़ेपर सवार होकर वे संसारके सभी विधर्मियोंका विनाश करेंगे।
अधर्मको दूर करनेके लिये, सत्त्वगुण - प्रधान देवता आदिकी रक्षा और दुष्टोंका संहार करनेके निमित्त भगवान् विष्णुका समय - समयपर वैसे ही अवतार होता है, जैसे समुद्रमन्थनके समय धन्वन्तरि होकर उन्होंने देवता आदिकी रक्षाके लिये विश्वामित्रके पुत्र महात्मा सुश्रुतको आयुर्वेदका उपदेश किया।
इस तरह महाभारतकी कथा एवं भगवान्के अवतारोंकी कथाका मैंने वर्णन किया, इसे सुनकर मनुष्य स्वर्गको प्राप्त करता है।
आयुर्वेद - प्रकरण
(गरुडपुराणका आयुर्वेद - प्रकरण अत्यन्त महत्त्वका है। इस प्रकरणके प्रथम बीस अध्यायोंमें निदान - स्थानके विषय वर्णित हैं। किस कारणसे रोग उत्पन्न हुआ है और रोगके लक्षण क्या हैं जिससे रोगका निर्णय हो सके इत्यादि विषय ‘निदान’ शब्दसे अभिप्रेत हैं। इसके बाद लगभग चालीस अध्यायोंमें रोगोंकी चिकित्सा - हेतु औषधियोंका निरूपण हुआ है तथा उन औषधियोंके निर्माणकी विधि बतायी गयी है। इस औषधिका यह आनुपान है, किस प्रकार इसका सेवन करना चाहिये आदि
बताया गया है। एक ही रोगके लिये अनेक औषधिक योगोंको भी बताया गया है, पर यह सब किसी सुयोग्य वैद्यके परामर्शमे ही करना उचित है।
उपलब्ध गरुड पुराणका पाठ कहीं - कहीं अस्पष्ट तथा खण्डित भी प्रतीत होता है। आयुर्वेदके आर्षग्रन्थोंका आश्रय करके यथासम्भव अर्थ ठीक करनेकी चेष्टा की गयी है, पाठकोंको इससे लाभ उठाना चाहिये - सम्पादक)