गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
194 - व्याधिहर वैष्णव कवच
श्रीहरिने कहा - हे रुद्र! अब मैं समस्त व्याधियोंके विनाशक, कल्याणकारी उस वैष्णव कवचको बताऊँगा, जिसके द्वारा प्राचीन कालमें दैत्योंको विनष्ट करते हुए भगवान् शिवकी रक्षा हुई थी।
अजन्मा, नित्य, अनामय, ईशान, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, जनार्दन, देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुको प्रणाम करके मैं रक्षाके निमित्त अमोघ अप्रतिम वैष्णन कवचको धारण करता हूँ। जो सभी दुःखोंका निवारण करनेवाला और सर्वस्व है, वह कवच इस प्रकार है
(विष्णुर्मामग्रतः पातु कृष्णो रक्षतु पृष्ठत:।
हरिर्मे रक्षतु शिरों हृदयं च जनार्दन:॥
मनो मम हृषीकेशो जिह्वां रक्षतु केशव:।
पातु नेत्रे वासुदेव: श्रोत्रे सङ्कर्षणो विभु:॥
प्रद्युम्नः पातु में घ्राणमनिरुद्धस्तु चर्म च।
वनमाला गलस्यान्तं श्रीवत्सो रक्षतादध:॥
पार्श्व रक्षतु मे चक्रं वामं दैत्यनिवारणम्।
दक्षिणं तु गदा देवी सर्वासुरनिवारिणी॥
उदरं मुसलं पातु पृष्ठं मे पातु लाङ्गलम्।
ऊर्ध्वं रक्षतु मे शार्ङ्ग जङ्घे रक्षतु नन्दकः॥
पार्ष्णी रक्षतु शड्खश्च पद्मं मे चरणावुभौ।
सर्वकार्यार्थसिद्ध्यर्थ पातु मां गरुड: सदा॥
वराहो रक्षतु जले विषमेषु च वामन:।
अटव्या नरसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः॥
हिरण्यगर्भो भगवान् हिरण्यं मे प्रयच्छतु।
सांख्याचार्यस्तु कपिलो धातुसाम्यां करोतु मे॥
श्वेतद्वीपनिवासी च श्वेतद्वीपं नयत्वज:।
सर्वान् सूदयतां शत्रून् मधुकैटभमर्दन:॥
सदाकर्षतु विष्णुश्च किल्बिषं मम विग्रहात्।
हंसो मत्स्यस्तथा कूर्म: पातु मां सर्वतो दिशम्॥
त्रिविक्रमस्तु मे देव: सर्वपापानि कृन्ततु।
तथा नारायणो देवों बुद्धिं पालयतां मम॥
शेषो मे निर्मलं ज्ञानं करोत्वज्ञाननाशनम्।
वडवामुखो नाशयतां कल्मषं यत्कृतं मया॥
पद् भ्यां ददातु परमं सुख मूर्ध्नि मम प्रभु:।
दत्तात्रेय: प्रकुरुतां सपुत्रपशुबान्धवम्॥
सर्वानरीन् नाशयतु राम: परशुना मम।
रक्षोघ्नस्तु दाशरथि: पातु नित्यं महाभुज:॥
शत्रून् हलेन मे हन्याद्रामों यादवनन्दन:।
प्रलम्बकेशिचाणूरपूतनाकंसनाशन:॥
कृष्णस्य यो बालभाव: स मे कामान् प्रयच्छतु॥
अन्धकारतमोघोरं पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्।
पश्यामि भयसंत्रस्त: पाशहस्तमिवान्तकम्॥
ततोऽहं पुण्डरीकाक्षमच्युतं शरणं गत:।
धन्योऽहं निर्भयो नित्यं यस्य मे भगवान् हरि:॥
ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वोपद्रवनाशनम्।
वैष्णवं कवचं बद्ध्वा विचरामि महीतले॥
अप्रधृष्योऽस्मि भूतानां सर्वदेवमयो ह्याहम्।
स्मरणाद्देवदेवस्य विष्णोरमिततेजस:॥)
भगवान् विष्णु मेरी आगेसे रक्षा करें। कृष्ण मेरी पीछेसे रक्षा करें। हरि मेरे सिरकी रक्षा करें। जनार्दन हृदयकी रक्षा करें। मेरे मनकौ रक्षा हृषीकेश और जिह्वाकी रक्षा केशव करें। वासुदेव दोनों नेत्रोंकी तथा संकर्षण (बलराम) दोनों कानोंकी रक्षा करें। प्रद्युम्न मेरे नाककी, अनिरुद्ध शरीरके चर्मभागकी रक्षा करें। भगवान्की वनमाला मेरे कण्ठप्रदेशके नीचे अन्तःकरणतक और उनका श्रीवत्स मेरे अधोभागकी रक्षा करे। दैत्योंका निवारण करनेवाला चक्र मेरे वामपार्श्वकी रक्षा करे। समस्त असुरोंका निवारण करनेवाली गदा मेरे दक्षिण पार्थकी रक्षा करे। मेरे उदरभागकी रक्षा मुसल और पृष्ठभागकी रक्षा लाङ्गल(हल)करे। मेरे ऊर्ध्वभागकी रक्षा शार्ङ्ग नामक धनुष तथा मेरे दोनों जंघा - प्रदेशोंकी रक्षा नन्दक नामक तलवार करे। मेरे पार्ण ष्णिभागकी रक्षा शंख और दोनों पैरोंकी रक्षा पद्म करे। गरुड सदैव मेरे सभी कार्योके अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये रक्षा करते रहें। भगवान् वराह जलमें, भगवान् वामन विषम परिस्थितिमें, भगवान् नरसिंह वनमें और भगवान् केशव सब ओरसे मेरी रक्षा करते रहें।
हिरण्यगर्भ भगवान् मुझे हिरण्य अर्थात् स्वर्णकी राशि प्रदान करें। सांख्यदर्शनके आचार्य भगवान् कपिल मुनि मेरे शरीरमें स्थित सभी प्रकारके धातुओंमें समानता बनाये रखें। श्वेतद्वीपमें निवास करनेवाले भगवान् अजन्मा विष्णु मुझको भी श्वेतद्वीपमें ले चलें। मधु कैटभका मर्दन करनेवाले विष्णु मेरे सभी शत्रुओंका विनाश करें। मेरे शरीरमें विद्यमान समस्त पापोंको खींच - खींचकर सदैव भगवान् विष्णु विनष्ट करते रहें। हंसावतार, मत्स्यावतार तथा कूर्मावतार धारण करनेवाले विष्णु सभी दिशाओंमें मेरी रक्षा करें। भगवान् त्रिविक्रमदेव मेरे समस्त पापोंको काट डालें। भगवान् नारायणदेव मेरी बुद्धिका विकास करें। शेषनारायण मेरे ज्ञानको निर्मल बनायें तथा अज्ञानका विनाश करें। मैंने जो कुछ भी पाप किया है, उस समस्त पापको भगवान् वडवामुख हयग्रीव विनष्ट करें।
भगवान् विष्णु मेरे दोनों पैरोंको और सिरको सुख प्रदान करें। भगवान् दत्तात्रेय मुझे पुत्र और बन्धु - बान्धव तथा पशुओंसे सम्पन्न रखें। भगवान् जामदग्न्य - परशुराम अपने परशुसे मेरे सभी शत्रुओंका विनाश करें। राक्षसोंके निहन्ता दशरथसुत आजानुभुज भगवान् श्रीराम मेरी नित्य रक्षा करें। यादव नन्दन बलराम अपने हलसे मेरे शत्रुओंका विनाश करें। प्रलम्ब, केशी, चाणूर, पूतना तथा कंसका संहार करनेवाला जो बालभाव भगवान् कृष्णका है, वही मेरे समस्त मनोरथोंको पूर्ण करे।
हे देव! मैं अन्धकारके समान तमोगुणसे सम्पन्न, हाथमें पाश धारण करनेवाले यमराजके सदृश काले - पीले वर्णवाले भयंकर पुरुषको देख रहा हूँ, उसके भयसे मैं संत्रस्त हो गया हूँ। हे पुण्डरीकाक्ष भगवान् अच्युत! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आपके इस आश्रयसे मैं धन्य हो उठा हूँ। आपकी शरण ग्रहण करनेसे अब मुझे कोई भय नहीं रह गया है, अतः मैं नित्य निर्भय हो गया हूँ।
समस्त सांसारिक उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाले भगवान् नारायण देवका ध्यान करके वैष्णव कवचसे आबद्ध मैं पृथ्वी तलपर विचरण करता हूँ। इसीके प्रभावसे मैं सभी प्राणियोंके लिये अजेय हो गया हूँ। इतना ही नहीं, सर्वदेवमय भी हो गया हूँ। अपरिमित तेजसे सम्पन्न देवाधिदेव भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे मेरा समस्त मनोरथ नित्य सिद्ध होता रहे।
भगवान् वासुदेवके चक्रमें जो अरे लगे हैं, वे यथाशीघ्र मेरे समस्त पापोंका विनाश करें और मेरी हिंसा करनेवाले शत्रुओंका संहार करें।
राक्षस एवं पिशाचोंसे तथा गहन वन, प्रान्त, विवाद, राजमार्ग, द्यूतक्रोड़ा, लड़ाई, झगड़ा, नदी पार करनेकी स्थिति, आपत्काल, प्राणोंका संकट - काल, अग्निभय, चौरभय, ग्रहबाधा, विद्युत् - उत्पीडन, सर्पविषका उद्वेग, रोग, विघ्न, संकट आनेपर तथा भयविह्वल होनेपर इसका जप तो करना ही चाहिये, किंतु नित्य इसका जप करना विशेष लाभप्रद है। यह भगवान् विष्णुका मन्त्ररूपी कवच परम श्रेष्ठ तथा सभी पापोंका विनाशक है।