51 - दानधर्मका निरूपण एवं विभिन्न देवताओंकी उपासना

ब्रह्माजीने कहा - अब मैं सर्वोत्तम दानधर्मके विषयमें कह रहा हूँ - सत्पात्रमें श्रद्धापूर्वक किये गये अर्थ (भोग्यवस्तु) - का प्रतिपादन (विनियोग) दान कहलाता है - ऐसा दानधर्मवित्‌ - जनोंका कहना है। यह दान इस लोकमें भोग और परलोकमें मोक्ष प्रदान करनेवाला है। मनुष्यको चाहिये कि वह न्यायपूर्वक ही अर्थका उपार्जन करे, क्‍योंकि न्‍यायसे उपार्जित अर्थका ही दान - भोग सफल होता है।

अध्यापन, याजन तथा प्रतिग्रह - ये तीनों ब्राह्मणोंकी वृत्ति (आजीविका) हैं। उनके लिये कुसीद अर्थात्‌ सूदखोरी, कृषिकर्म तथा वाणिज्य अथवा क्षत्रियवृत्ति (युद्धादि कृत्य) त्याज्य है। उत्त्क सद्वृत्तिसे प्राप्त हुआ धन यदि सुयोग्य पात्रोंको दिया जाता है तो उसीको दान कहा जाता है। यह नित्य, नैमित्तिक, काम्य और विमल - चार प्रकारका कहा गया है।

फलकी अभिलाषा न रखकर प्रत्युपकारकी भावनासे रहित होकर ब्राह्मणको प्रतिदिन जो दान दिया जाता है, वह नित्यदान है। अपने पापोंकी शान्तिके लिये विद्वान्‌ ब्राह्मणोंके हाथोंपर जो धन दिया जाता है, सत्पुरुषोंके द्वारा अनुष्ठित ऐसा दान नैमित्तिक दान है। संतान, विजय, ऐश्वर्य और स्वर्ग - प्राप्तिकी इच्छासे जो दान किया जाता है, उसको धर्मवेत्ता ऋषिगण काम्य दान कहते हैं। ईश्वरकी प्रसन्नताको प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मवित्‌ - जनोंको सत्त्ववृत्तिसे युत्तू चित्तवाले मनुष्यके द्वारा जो दान दिया जाता है, वह विमल दान है। यह दान कल्याणकारी है।

ईखकी हरी - भरी फसलसे युत्तू या यव - गेहूँकी फसलसे सम्पन्न (शस्य-श्यामल) भूमिका दान वेदविद्‌ ब्राह्मणोंको जो देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। भूमिदानसे श्रेष्ठ दान न हुआ है और न होगा ही।

ब्राह्मणको विद्या प्रदान करनेसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन ब्रह्मचारीको श्रद्धापूर्वक विद्या प्रदान करता है, वह सभी पापोंसे विमुक्त होकर ब्रह्मलोकके परमपदको प्राप्त करता है।

वैशाखमासकी पूर्णिमा तिथिको उपवास रखकर जो व्यक्ति पाँच या सात ब्राह्मणोंकी विधिवत्‌ पूजा करके उन्हें मधु, तिल और घृतसे संतुष्ट करता है तथा उनकी गन्धादिसे भली प्रकार पूजा करके उनसे यह कहलवाता है या स्वयं कहता है -

प्रीयतां धर्मराजेति यथा मनसि वर्तते॥

(हे धर्मराज! मेरे मनमें जैसा भाव है, उसीके अनुकूल आप प्रसन्न हों।)

- ऐसा कहनेपर उसके जन्मभर किये गये समस्त पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं।

जो व्यक्ति स्वर्ण, मधु एवं घीके साथ तिलोंको कृष्ण - मृगचर्ममें रखकर ब्राह्मणको देता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है।

वैशाखमासमें घृत, अन्न और जलका दान करनेसे विशेष फल प्राप्त होता है। अत: उस मासमें धर्मराजको उद्देश्य करके घृत, अन्न और जलका दान ब्राह्मणोंक लिये अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेसे सभी प्रकारके भयसे मुक्ति हो जाती है। द्वादशी तिथिमें स्वयं उपवास रखकर पापोंका विनाश करनेवाले भगवान्‌ विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे निश्चित ही मनुष्यके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य जिस देवताकी पूजा करनेके लिये इच्छा करता है, उसकी पूजा वह अपने इष्टको प्राप्त करनेके लिये करे और उसको उस देवकी प्रतिमूर्ति मानकर प्रयत्नपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें भोजन भी कराये। साथ ही सौभाग्यवती स्त्रियों तथा अन्य देवोंको भी पूजन - भोजनादिके द्वारा संतुष्ट करे।

संतान - प्राप्तिके इच्छुक व्यक्तिको इन्द्रदेवका पूजन करना चाहिये। ब्रह्मवर्चसकी कामना करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मरूपमें ब्राह्मणोंको स्वीकार करके उनकी पूजा करे। आरोग्यकी इच्छावाला मनुष्य सूर्यकी तथा धन चाहनेवाला मनुष्य अग्निकी पूजा करे। कार्योमें सिद्धि प्राप्त करनेकी अभिलाषा करनेवाला व्यक्ति विनायक (गणेश) - का पूजन करे। भोगकी कामना होनेपर चन्द्रमाकी तथा बल - प्राप्तिकी इच्छा होनेपर वायुकी पूजा करे। संसारसे मुक्त होनेकी अभिलाषा होनेपर प्रयत्नपूर्वक भगवान्‌ हरिकी आराधना करनी चाहिये। निष्काम तथा सकाम सभी मनुष्योंको भगवान्‌ गदाधर हरिकी पूजा करनी चाहिये।

जलदानसे तृप्ति, अन्नदानसे अक्षय सुख, तिलदानसे अभीष्ट संतान, दीपदानसे उत्तम नेत्र, भूमिदानसे समस्त अभिलषित पदार्थ, सुवर्णदानसे दीर्घ आयु, गृहदानसे उत्तम भवन तथा रजतदानसे उत्तम रूपकी प्राप्ति होती है।

(वारिदस्तृप्तिमाप्रोति सुखमक्षयमन्नद।

तिलप्रद: प्रजामिष्टा दीपदश्चक्षुरुत्तमम्‌॥

भूमिद: सर्वमाप्रोति दीर्घमायुर्हिरण्यद:।

गृहदोऽग्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम्‌ ॥)

वस्त्र प्रदान करनेसे चन्द्रलोक तथा अश्वदान करनेसे अश्विनीकुमारके लोककी प्राप्ति होती है। अनडुह्(बैल) - का दान देनेसे विपुल सम्पत्तिका लाभ और गोदानसे सूर्यलोक प्राप्त होता है। यान और शय्याका दान करनेपर भार्या तथा भयार्त (भयभीत) - को अभय प्रदान करनेसे ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। धान्य - दानसे शाश्वत (अविनाशी) सुख तथा वेदके (वेदाध्यापन) दानसे ब्रह्मका सांनिध्य लाभ होता है। वेदविद्‌ ब्राह्मणको ज्ञानोपदेश करनेसे स्वर्गलोककी प्राप्ति तथा गायको घास देनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। ईंधन (अग्निको प्रज्वलित करने) - के लिये काष्ठ आदिका दान करनेपर व्यक्ति प्रदीप्त अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है। रोगियोंके रोगशान्तिके लिये औषधि, तेल आदि पदार्थ एवं भोजन देनेवाला मनुष्य रोगरहित होकर सुखी और दीर्घायु हो जाता है।

छत्र और जूतेका दान करनेवाला मनुष्य प्रचण्ड धूपके कारण तीक्ष्ण तापवाले तथा तलवारके समान तीक्ष्ण धारवाली नुकीली पत्तियोंसे परिव्याप्त असिपत्रवन नामके नारकीय मार्गोको पार कर जाता है। जो मनुष्य परलोकमें अक्षय सुखकी अभिलाषा रखता है, उसे अपने लिये संसार या घरमें जो वस्तु अभीष्टतम है तथा प्रिय है, उस वस्तुका दान गुणवान्‌ ब्राह्मणको करना चाहिये।

(वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्चिसालोक्यमश्वदः।

अनडुद्द:श्रियं पुष्टां गोदो ब्रध्रस्य विष्टपम्‌॥

यानशय्याप्रदो भारयामैश्वर्यमभयप्रद:।

धान्यद: शाश्वत सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्म शाश्वतम्‌॥

वेदवित्सु ददज्ज्ञानं स्वर्गलोके महीयते।

गवां घासप्रदानेन सर्वपापै: प्रमुच्यते॥

इन्धनानां प्रदानेन दीसाग्निर्जायते नर:।

औषध॑ स्रेहमाहारं रोगिरोगप्रशान्तये॥

ददानो रोगरहितः सुखी दीर्घायुरेव च।

असिपत्रवनं मार्गं क्षुरधारासमन्वितम्‌॥

तीक्ष्णातपं च तरतिच्छत्रोपानत्प्रदो नर:।

यद्यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे॥

तत्तद्गुणवत्ते देयं तदेवाक्षयमिच्छता।

अयने विषुवे चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो:॥

संक्रान्त्यादिषु कालेषु दत्तं भवति चाक्षयम्‌।)

उत्तरायण (मकर राशिसे मिथुन राशितक सूर्यके रहनेके कालको उत्तरायण कहते हैं। यह माघ माससे आषाढ़ मासतकका काल है।), दक्षिणायन ("कर्क राशिसे धनु राशितक सूर्यके रहनेके कालकों दक्षिणायन कहते हैं। यह श्रावण माससे पौष मासतकका काल है।), महाविषुवत्काल (जिस कालमें दिन - रात दोनों बराबर होते हैं, वह विषुवकाल कहा जाता है। यह काल तुला और मेषकी सूर्य - संक्रान्तिका होता है ।), सूर्य तथा चन्द्रग्रहणमें एवं कर्क, मेष - मकरादिकी संक्रान्तियोंके आनेपर ब्राह्मणोंको दिया गया दान परलोकमें अक्षय सुख देनेवाला होता है। इस प्रकारके दानका महत्त्व प्रयागादि तीर्थोमें बहुत है, गया - क्षेत्रके तीर्थोमें किया गया दान विशेष महत्त्व रखता है।(प्रयागादिषु तीर्थेषु गयायां च विशेषतः॥)

दान - धर्मसे बढ़कर श्रेष्ठ धर्म इस संसारमें प्राणियोंके लिये कोई दूसरा नहीं है। दान स्वर्ग, आयु तथा ऐश्वर्यको प्राप्त करनेकी इच्छासे और अपने पापोंकी उपशान्तिके लिये भी किया जाता है। गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा देवोंको दिये जानेवाले दानसे जो मनुष्य मोहवश दूसरोंको रोकता है, वह पापी तिर्यक्‌ (पक्षीकी) - योनिको प्राप्त करता है। जो व्यक्ति दुर्भिक्षकालमें और मरणासन्न ब्राह्मणको अन्नादिका दान नहीं करता है, वह ब्रह्महत्या करनेवालेके समान तथा अति निन्दित है।