गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
102 - वानप्रस्थ - धर्म - निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा - हे महर्षियो! अब मैं वानप्रस्थाश्रमके धर्मका वर्णन कर रहा हूँ, आप सभी इसका श्रवण करें।
वानप्रस्थ - आश्रममें प्रविष्ट पुरुषको अपनी पत्नीके संरक्षणका भार पुत्रोंके ऊपर छोड़कर अथवा पत्नीके सहित वनमें जाना चाहिये।
वानप्रस्थ - धर्मका पालन करनेवाला ब्रह्मचर्य - व्रतका निर्वाह करते हुए अपनी श्रौत - अग्नि एवं गृह - अग्निके साथ वनमें जाय। शान्त एवं क्षमावान् रहकर वह अहर्निश देवोपासनामें निमग्न रहे। वह बिना जोती हुई भूमिसे उत्पन्न अन्नके द्वारा अग्निदेव, पितरों, देवताओं, अतिथियों तथा भृत्योंको तृप्त (संतुष्ट) करे। आत्मज्ञानमें तत्पर रहनेवाला वह
वानप्रस्थी दाढ़ी, जटा तथा लोमराशिको धारण करे, इन्द्रियोंका दमन करे, त्रिकाल स्नान करे एवं अपनेको प्रतिग्रह अर्थात् दान - ग्रहणसे दूर रखे।
ऐसे व्यक्तिको स्वाध्यायवान्, भगवद् ध्यान परायण तथा सभी लोगोंके हितसाधनमें लगे रहना चाहिये। उसको जीवनयापनके लिये सीमित अर्थ - संग्रह करना चाहिये।
उसके पास जो कुछ शेष सामग्री हो, उसका आश्विन - मासमें परित्यागकर वह व्रतादिके द्वारा ही समय व्यतीत करे। यदि शक्ति हो तो एक मास या एक पक्षका व्रतकर मास या पक्षके अन्तमें ही भोजन करे। ऐसे व्रती अपने दाँतोंको ही उलूखल मानकर उन्हींसे अन्नको तुषसे विहीनकर अपनी प्राण - रक्षाके लिये उपयोगमें लाते हैं।
वानप्रस्थीको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये, भूमिपर सोना चाहिये और वह अपने सभी धार्मिक कृत्योंका सम्पादन यथासम्भव फलसे करे (अन्नसे नहीं)। वह ग्रीष्म - ऋतुमें पञ्चग्निके (चार दिशाओंमें चार अग्नि और ऊपर सूर्य।) मध्य स्थित रहे, वर्षा - ऋतुमें स्थण्डिल (खुले चबूतरे) - पर शयन करे तथा हेमन्त - ऋतुमें आर्द्रवस्त्रोंको धारण करके योगाभ्यासके द्वारा अपने दिन व्यतीत करे।
जो काँटोंसे उसे पीड़ा पहुँचाये उसके प्रति भी क्रोध न करे और जो अङ्गोंमें चन्दनका अनुलेपन करे उसपर भी प्रसन्न न हो, उन दोनोंके प्रति वह समान भाव रखे। वानप्रस्थियोंमें दु:ख और सुख भोगनेकी एक समान ही क्षमता होनी आवश्यक है।