गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
226 - अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका माहात्म्य
सूतजीने कहा - हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं समस्त अङ्गोंसहित महायोगका वर्णन करूँगा। यह महायोग मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेका श्रेष्ठतम साधन है। भक्तिपूर्वक इस महायोगकी विधिका पाठ करने मात्रसे मनुष्यके सभी पापोंका विनाश हो जाता है, इसे अब आप सुनें।
महामति भगवान् दत्तात्रेयने राजा अलर्कसे कहा था कि हे राजन्! ममता ही दुःखका मूल है और ममताका परित्याग ही दुःखसे निवृत्तिका उपाय है। अहंकार अज्ञानरूपी महातरुका अंकुर है। ममता उसका तना है। घर और क्षेत्र आदि उसकी शाखाएँ हैं। पत्नी उसका पल्लव है तथा धन - धान्य महान् पत्र हैं और पाप ही उसका अत्यन्त दुर्गम मूल है। इस प्रकार पापमूलक आपातरमणीय सुख - शान्तिके लिये यह अज्ञान रूपी महातरु पैदा हुआ है। जो लोग ज्ञानरूपी कुल्हाड़ीसे अज्ञानरूप महावृक्षको काट गिराते हैं, वे ही परमब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। तदनन्तर ब्रह्मरसको प्राप्तकर उसका भलीभाँति निष्कण्टक पान करके प्राज्ञ पुरुष नित्य - सुख एवं परम शान्तिको प्राप्त करते हैं।
समस्त दृश्य - प्रपञ्च एवं इन्द्रियाँ भी उसी(परब्रह्म) - में लीन हो जाती हैं। हे राजन्! वहाँपर न तो ‘तुम’ रहते हो और न ‘मैं’ ही रहता हूँ, न शब्दादि तन्मात्राएँ रहती हैं और न अन्तःकरण ही रहता है। हे राजेन्द्र! हम दोनोंके बीच कौन - सा तत्त्व प्रधान है? वास्तवमें हम दोनों नि:सार हैं।
हे राजन्! जीव और आत्मामें ऐक्य होनेपर भी पृथक् - भावका बोध होता है। यह पृथक् - भावका बोध ज्ञान (स्वरूप ज्ञान) - के तिरोधानसे होता है। यद्यपि ज्ञानका तिरोधान योगी (ब्रह्माभिन्न जीव) - में नहीं होना चाहिये, पर भेदबुद्धि एवं भेदबुद्धि मूलक समस्त प्रपञ्च सबके अनुभवमें आ रहा है; अतः इसकी उपपत्तिके लिये यह मानना पड़ता है कि ज्ञानका तिरोधान अनादिकालसे चला आ रहा है। यह ज्ञानका तिरोधान अज्ञान मूलक है। इसीलिये अज्ञानको ज्ञाननाशकी दशा कहा जाता है। यह ज्ञान नाशकी दशा ज्ञानके वियोगकी दशा है और यह ज्ञानका वियोग ही जीवात्मा एवं आत्मा(ब्रह्म) - का पृथक् - भाव है तथा इस पृथक् - भावके ज्ञानका नाश जीव एवं आत्मा (ब्रह्म) - के ऐक्य ज्ञानसे ही होता है। यह ऐक्य ज्ञान(ऐक्यका प्रत्यक्षात्मक अनुभव)ही मुक्ति है। अनैक्यका अनुभव तो प्राकृतगुणों (मायिक विस्तार) - के कारण होता है।
प्राणीका जिसमें निवास होता है, वह घर है। जिसके द्वारा उसके जीवनकी रक्षा होती है, वह भोज्य पदार्थ है। जो मुक्तिका हेतु है, वह ज्ञान है और जो बन्धनका हेतु है, वह अज्ञान है। हे राजन्! प्राणियोंके पुण्य और पापका विनाश उसके द्वारा किये जानेवाले (सुख - दुःखात्मक) भोगोंसे होता है और अवश्य करणीय जो कर्तव्य हैं, उनको न करनेसे पुण्यका क्षय हो जाता है।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह - ये पाँच यम हैं। शौच दो प्रकारका बताया गया है - बाह्यशौच और अन्त:शौच । संतोष, तपस्या, शान्ति, नारायणका पूजन और इन्द्रियदमन - ये योगके साधन हैं। आसनोंके पद्म आदि भेद हैं।
शरीरके अन्तर्गत प्रवाहित होनेवाली वायुपर विजय प्राप्त करना ‘प्राणायाम’ है प्रत्येक प्राणायाम पूरक, कुम्भक और रेचकके भेदसे तीन प्रकारका होता है। यही तीन प्राणायाम जब दस मात्राओंका होता है तो इसे लघु प्राणायाम तथा इससे दुगुनी मात्राका मध्यम प्राणायाम और तीन गुनी मात्राओंका उत्तम प्राणायाम कहा गया है। जिस प्राणायाममें योगिजन जप और ध्यानसे युक्त होते हैं, उसे ‘सगर्भ’ प्राणायाम और उसके अतिरिक्त प्राणायाम (अर्थात् जप तथा ध्यानसे रहित होनेपर) ‘अगर्भ’ नामक प्राणायाम कहलाता है। प्रथम प्राणायामसे योगी स्वप्नपर जय प्राप्त करता है, द्वितीय प्राणायामसे योगी कम्पपर और तृतीय प्राणायामसे विपाकपर(विपाक - कर्मफल) जय प्राप्त करता है। इस प्रकार इन तीनों दोषोंको योगी प्राणायामसे जीत लेता है।
योगीको आसन लगाकर ‘प्रणव’ में चित्त एकाग्र करके ध्यान और जप करना चाहिये। इस स्थितिमें वह अपनी दोनों एड़ियोंसे लिंग और अण्डकोशोंको दबाकर एकाग्र मनसे स्थित रहे। जो योगमार्गसे भलीभाँति परिचित है, उसे अपनी रजोवृत्तिसे तमोवृत्तिको तथा सत्त्ववृत्तिसे रजोवृत्तिको निरुद्ध करके निश्छल - भावसे प्रणवका जप करते हुए ध्यान करना चाहिये। इन्द्रियों, प्राण और मन आदिको उनके विषयोंसे निगृहीत करना चाहिये। इस तरह एक साथ ही प्रत्याहार (विषयोंसे इन्द्रियोंको हटाकर अन्तर्मुख करना) - का उपक्रम करना चाहिये।
विधिवत् अठारह बार किया गया जो प्राणायाम है, उसे योगमें ‘धारणा’ के नामसे स्वीकार किया जाता है। योगके तत्त्वको जाननेवाले योगिजन ऐसी धारणाकी दो आवृत्तिको ही योग कहते हैं। योगियोंकी पहली धारणा नाड़ीमें, दूसरी हृदयमें, तीसरी वक्ष:स्थलमें, चौथी उदरमें, पाँचवीं कण्ठमें, छठी मुखमें, सातवीं नासाग्रपर, आठवीं नेत्रमें, नवीं दोनों भौंहोंके मध्य और दसवीं मूर्धास्थानमें होती है। इस प्रकार योगमें इस धारणाको दस प्रकारका माना गया है। इन दसों धारणाओंमें सफलता प्राप्त करके योगी अक्षर रूपता(ब्रह्मत्व) - को प्राप्त कर लेता है।
जिस प्रकार अग्निमें छोड़ी गयी अग्नि एकाकार हो जाती है, उसी प्रकार परमात्माके ध्यानमें लगायी गयी आत्मा तदाकार हो जाती है। ऐसी स्थितिमें योगीको ब्रह्म स्वरूप महा पुण्यदायक ‘ॐ’ इस महा मन्त्रका जप करना चाहिये। इस प्रणव - महामन्त्रमें ‘अकार, उकार और मकार’- ये तीन अक्षर हैं। इन तीन अक्षरोंके अतिरिक्त इस महा मन्त्रमें सत्त्व, रजस् तथा तमसू - इन तीन मात्राओंका योग भी है जो क्रमश: सात्तिविक तथा राजसिक और तामसिक मनोवृत्तिका परिचायक है। ॐ कारमें जो चतुर्थ आद्य अर्धमात्रा स्थित है, वह निर्गुण है तथा केवल योगियों द्वारा ही जानने योग्य है। गान्धार स्वर(ग) - के आश्रित रहनेवाली इस अर्ध मात्राको गान्धारी नामसे जानना चाहिये। यह अक्षर परम ब्रह्म ॐ कारके नामसे योग मार्गमें स्वीकृत है। अत: इस महामन्त्रका जप और ध्यान करते हुए अपनी मुक्तिके लिये इस प्रकार अपनेमें ब्रह्म भावनाका निश्चय करना चाहिये - ‘मैं स्थूल देहसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं जरा - मरणसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं इस पृथ्वीके सभी मलोंसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं वायु और आकाशसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं सूक्ष्म देहसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं समस्त स्थान या अस्थानसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म (परम व्यापक ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, उसका कोई आश्रय नहीं है। इसलिये उसके स्थान या स्थानाभावकी कल्पना सर्वथा असम्भव है।)हूँ । मैं गन्ध तन्मात्रासे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं श्रोत्रेन्द्रप और त्वचा नामक इन्द्रियसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं जिह्वा तथा प्राणेन्द्रियसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं प्राण तथा अपान वायुसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं व्यान और उदान वायुसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं अज्ञानसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकारसे रहित तुरीयावस्थामें विद्यमान परमपदस्वरूप, ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं नित्य - शुद्ध - बुद्ध, मुक्त, आनन्दमय, अद्वैत, ज्ञानस्वरूप, ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ।’
सूतजीने कहा - हे शौनक! इस प्रकार मैंने मुक्ति देनेवाले अष्टाङ्गयोगका वर्णन कर दिया है। जो लोग मायापाशसे आबद्ध हैं, वे सभी नित्य - नैमित्तिक ही कार्य करते हैं और उसीमें अन्ततक लगे रहते हैं। इस कारण उन्हें परमात्माका ऐक्य प्राप्त नहीं होता, वे पुनः इस संसारमें जन्म लेते हैं। जो अज्ञानसे मोहित हैं, वे ज्ञानयोग प्राप्त करके अज्ञानसे मुक्त हो जाते हैं। उसके बाद वह जीवन्मुक्त योगी न कभी मरता है, न दुःखी होता है; न रोगी होता है और न संसारके किसी बन्धनसे आबद्ध होता है। न वह पापोंसे युक्त होता है, न तो उसे नरक यातनाका ही दुःख भोगना पड़ता है और न वह गर्भवासमें दुःखी ही होता है। वह स्वयं अव्यय नारायणस्वरूप हो जाता है। इस प्रकारकी अनन्य भक्तिसे वह योगी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् नारायणको प्राप्त कर लेता है।
ध्यान, पूजा, जप, स्तोत्र, व्रत, यज्ञ और दानके नियमोंका पालन करनेसे मनुष्यके चित्तकी शुद्धि होती है। चित्तशुद्धिसे ज्ञान प्राप्त होता है। प्रणवादि मन्त्रोंका जप करके द्विजोंने मुक्ति प्राप्त की है। इन्द्रने भी इन्द्रासन प्राप्त किया। श्रेष्ठ गन्धर्वों और अप्सराओंने उच्च पद प्राप्त किया। देवताओं ने देवत्व और मुनियोंने मुनित्व प्राप्त किया। गन्धर्वोंने गन्धर्वत्व तथा राजाओंने राजत्वको प्राप्त किया।