118 - अखण्ड द्दादशी व्रत

ब्रह्माजीने कहा - अब मैं मोक्ष तथा शान्तिप्रद अखण्डद्वादशीव्रतका वर्णन करता हूँ। मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिमें गौके दूध - दही आदिको भोजन रूपमें स्वीकार करके व्रत करनेवाले उपासकको जगत्के स्वामी भगवान्‌ विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। चार मासपर्यन्त अर्थात्‌ फाल्गुन मासतक वह व्रती पाँच प्रकारके धान्यसे पूर्ण पात्र ब्राह्मणको दान दे और भगवान्‌ विष्णुकी इस प्रकार प्रार्थना करे-

सप्तजन्मनि हे विष्णो यन्मया हि व्रतं कृतम्‌।

भगवंस्त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे॥

यथाखण्डं जगत्सर्वं त्वमेव पुरुषोत्तम।

तथाखिलान्यखण्डानि व्रतानि मम सन्‍तु वै॥

हे विष्णो! सात जन्मोंमें मैंने जो व्रत किये हैं, हे भगवन्‌! वे आपकी कृपासे इस जन्ममें पूर्ण हों। हे पुरुषोत्तम! जिस प्रकार आप ही इस सम्पूर्ण अखण्ड ब्रह्माण्डके रूपमें अवस्थित हैं, उसी प्रकार मेरे द्वारा किये गये ये सभी व्रत भी अखण्ड हो जायँ।

चैत्रादि (चार) मासमें सत्तूसे पूर्ण पात्र और श्रावण आदि चार महीनोंमें घृतपूर्ण पात्र ब्राह्मणको दान देना चाहिये।

इस विधिसे वर्षपर्यन्त द्वादशीव्रतका संकल्प लेकर जो व्रती अपने व्रतको पूर्ण करता है, वह स्त्री - पुत्रादिसे सम्पन्न होकर अन्तमें स्वर्गलोकका सुखोपभोग करता है।