गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
195 - सर्वकाम प्रदा विद्या
श्रीहरिने कहा - हे शिव! अब मैं ‘सर्वकाम प्रदा विद्या’ का वर्णन करता हूँ, उसे सुनें। इसकी उपासना मात्र सात रात करनेसे ही सभी कामनाएँ सफल हो जाती हैं। सर्वकामप्रदा विद्या इस प्रकार है -
(सर्वकामप्रदां विद्यां सप्तरात्रेण तां शृणु।
नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि॥
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नम: संकर्षणाय च।
नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये॥
आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये।
त्वद्रूपाणि च सर्वाणि तस्मात् तुभ्यं नमो नम:॥
हृषीकेशाय महते नमस्तेऽनन्तमूर्तये।
यस्मिन्निदं यतश्चैतत् तिष्ठत्यग्रेऽपि जायते॥
मृण्मयीं वहसि क्षोणीं तस्मैं ते ब्रह्मणे नम:।
यन्न स्पृशन्ति न विदु: मनोबुद्धीन्द्रियासव:।
अन्तर्बहिस्त्वं चरसि व्योमतुल्यं नमाम्यहम्॥
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाभूतपतये
सकलसत्त्वभाविव्रीडनिकरकमलरेणूत्पलनिभधर्माख्यविद्यया
चरणारविन्दयुगल परमेष्ठिन् नमस्ते।
अवाप विद्याधरतां चित्रकेतुश्च विद्यया॥)
हे भगवान् वासुदेव! आपका मैं ध्यान करता हूँ, आपको नमस्कार है। हे प्रद्यम्न! हे अनिरुद्ध! हे संकर्षण! आपको नमस्कार है। हे परमानन्दस्वरूप! आप मात्र अनुभवजन्य हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप आत्माराम एवं शान्तमूर्ति हैं तथा द्वैत - दृष्टिसे परे हैं, आपको मेरा नमस्कार है। यह समस्त चराचर जगत् आपका ही रूप है, आपको बारंबार प्रणाम है। हे अनन्तमूर्ति भगवान् हषीकेश! आप महत्स्वरूपको नमस्कार है। प्रलयकालमें यह सारा जगत् जिस मूर्तिमें प्रविष्ट होकर स्थित रहता है और पुनः प्रलयकालके पश्चात् सृष्टिके प्रारम्भमें सबसे पहले उत्पन्न भी होता है तथा जो इस मृण्मयी पृथ्वीको धारण करता है, उस ब्रह्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिस देवको स्पर्श करने और पहचाननेमें न मन-बुद्धि समर्थ हैं, न ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय और प्राण समर्थ हैं तथा आकाशके समान जो देव समस्त चराचर प्राणियोंके अंदर और बाहर विचरण करते हैं, ऐसे व्योमस्वरूप आप (देव) - को मैं नमस्कार करता हूँ। हे पञ्चभूतोंके स्वामी ऐश्वर्यमूर्ति महापुरुष भगवान् वासुदेव! आपको नमस्कार है। हे परमेष्ठिन्! आपसे सकल सत्त्वोंकी उत्पत्ति होती है तथा आपके चरणारविन्दयुगल मानो शील - समूहरूपी कमलोंकी धर्माख्यविद्यारूप रेणूत्पल हैं, आपको नमस्कार है। चित्रकेतुने इस विद्याके द्वारा विद्याधरत्वको प्राप्त किया था।