गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
60 - ग्रहदशा, यात्राशकुन, छींकका फल तथा सूर्यचक्र आदिका निरूपण
श्रीहरिने कहा - [हे शिव! अब मैं ग्रहोंकी महादशाका वर्णन कर रहा हूँ।] सूर्यकी दशा छः वर्ष, चन्द्रकी दशा पंद्रह वर्ष, मंगलकी दशा आठ वर्ष, बुधकी दशा सत्रह वर्ष, शनिकी दशा दस वर्ष, बृहस्पतिकी दशा उन्नीस वर्ष, राहुकी दशा बारह वर्ष तथा शुक्रकी दशा इक्कीस वर्ष रहती है।
(यहाँपर ग्रहोंकी महादशाओंका जो योग्य समय तथा उनका क्रम दिया गया है, वह महर्षि पराशर आदि द्वारा निर्दिष्ट विंशोत्तरी महादशासे भिन्न है। इसमें केतुकी दशा भी नहीं दिखलायी गयी है। महर्षि पराशरके अनुसार ग्रहोंका क्रम तथा उनकी भोग्यवर्ष - संख्या इस प्रकार है - सूर्यकी महादशा छ: वर्ष रहती है, चन्द्रदशा दस वर्ष रहती है। इसी प्रकार मंगल सात वर्ष, राहु अठारह वर्ष, बृहस्पति सोलह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष, बुध सत्रह वर्ष, केतु सात वर्ष तथा शुक्र बीस वर्षतक भोग करता
है। इनका योग एक सौ बीस वर्ष होता है, जो महर्षि पराशरद्वारा मानव - आयुका परिमाण है, इसीलिये यह विंशोत्तरी महादशा कहलाती है, इसी प्रकार दूसरा अष्टोत्तरी महादशा क्रम भी है, किंतु गरुडपुराणमें निर्दिष्ट क्रम तथा दशा - वर्ष सर्वथा भिन्न है।)
सूर्यकी दशा दुःख देनेवाली होती है और उद्वेगको पैदा करती है तथा राजाका नाश करती है। चन्द्रकी दशा ऐश्वर्य देनेवाली, सुख पैदा करनेवाली तथा (इष्ट) मनोऽनुकूल अन्न देनेवाली होती है।
मंगलकी दशा दु:ख देनेवाली तथा राज्यादिका विनाश करनेवाली है। बुधकी दशा दिव्य स्त्रीका लाभ, राज्य - प्राप्ति एवं कोषवृद्धि करनेवाली है। शनिकी दशा राज्यका नाश और बनन्धु - बान्धवोंको कष्ट प्रदान करनेवाली है। बृहस्पतिकी दशा राज्य - लाभ और सुख - समृद्धि तथा धर्म देनेवाली है। राहुकी दशा राज्यका नाश करती है, व्याधियोंकी प्राप्ति कराती है और दुःख पैदा करती है। शुक्रकी दशामें हाथी, घोड़ा, राज्य तथा स्त्रीका लाभ होता है।
मेष मंगलका, वृष शुक्रका, मिथुन बुधका और कर्क चन्द्रमाका क्षेत्र कहा गया है। सूर्यका क्षेत्र सिंह एवं बुधका क्षेत्र कन्याराशि है। तुलाराशि शुक्रका क्षेत्र है और वृश्चिक मंगलका क्षेत्र है। बृहस्पतिका क्षेत्र धनु, शनिका क्षेत्र मकर एवं कुम्भ और मीन बृहस्पतिका क्षेत्र कहा गया है।
कर्कराशिमें सूर्य आ जानेपर भगवान विष्णु शयन करते हैं।
अश्विनी, रेवती, चित्रा, धनिष्ठा - ये नक्षत्र आभूषण धारण करनेमें उत्तम माने गये हैं।
यात्रामें यदि दाहिने हरिण, साँप, बन्दर, बिलाव, कुत्ता, सुअर, पक्षी (नीलकण्ठ आदि), नेवला तथा चूहा दिखायी दें तो यात्रा मङ्गलकारी होती है। यात्रामें ब्राह्मणकी कन्याका दर्शन हो जाना मङ्गल होनेका सूचक है तथा शङ्ख और मृदंगकी आवाज सुनना एवं सदाचारी श्रीमन्त व्यक्तिका दर्शन हो जाना, वेणु, स्त्री, जलसे भरा कलश दिखायी देना कल्याण - प्राप्तिका सूचक है।
यात्रामें बायीं ओर श्रृगाल, ऊँट और गदहा आदिका दिखायी देना मङ्गलकारी होता है। यात्रामें कपास, ओषधि, तेल, दहकते अंगारे, सर्प, बाल बिखेरे, लाल माला पहने और नग्न अवस्थामें यदि कोई व्यक्ति दिखायी दे तो अशुभ होता है।
अब मैं हिक्का (छींक) - के शुभ - अशुभ फलोंका वर्णन कर रहा हूँ। पूर्व दिशामें छींक होनेपर बहुत बड़ा फल प्राप्त होता है। अग्निकोणमें छींक होनेपर शोक और संताप तथा दक्षिणमें छींक होनेपर हानि उठानी पड़ती है। नैर्ऋत्य कोणमें छींक होनेपर शोक और संताप तथा पश्चिममें छींक होनेपर मिष्टान्नकी प्राप्ति होती है। वयाव्य कोणमें छींक होनेपर धनकी प्राप्ति और उत्तरमें छींक होनेपर कलह होता है। ईशान कोणमें छींक होनेपर मरणके समान कष्ट प्राप्त होना बतलाया गया है।
मनुष्यके आकारमें भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका चित्रण करे। सूर्यकी प्रतिमा बनानेके दिन सूर्य जिस नक्षत्रपर हों, उस नक्षत्रसे तीन नक्षत्र उस प्रतिमाके मस्तकपर अंकित करे। मुखके मध्यमें अंकित सूर्यनक्षत्रसे आगे तीन नक्षत्र लिखे और उससे आगे एक - एक नक्षत्र दोनों कन्धोंपर लिखे। फिर उससे आगे एक - एक नक्षत्र दोनों भुजाओंपर लिखे और उससे आगेके एक - एक नक्षत्र दोनों हाथोंपर लिखे। उससे आगे पाँच नक्षत्र हृदय - प्रदेशपर लिखे तथा उससे आगे एक नक्षत्र नाभिमण्डलमें लिखे। उससे आगे गुह्यस्थानमें एक नक्षत्र लिखे। उससे आगे एक - एक नक्षत्र दोनों घुटनोंपर लिखे। शेष नक्षत्र सूर्यके चरणोंपर लिखे।
सूर्यचक्रके चरणोंमें जातकका जन्मनक्षत्र पड़ता हो तो जातक अल्पायु होता है। वही नक्षत्र यदि घुटनोंपर पड़ता है तो जातक विदेश यात्रावाला होता है और यदि गुह्यस्थानपर पड़े तो पर - स्त्रीगामी होता है। नाभिस्थानमें पड़नेपर थोड़ेमें ही प्रसन्न हो जानेवाला होता है। यदि हृदयस्थानमें पड़ता है तो महेश्वर होता है। यदि पाणिस्थानमें पड़ता है तो चोर होता है। वही यदि भुजाओंपर पड़ता है तो उसका कहीं निश्चित स्थान नहीं रहता। यदि कन्धोंपर पड़ जाय तो वह धनपति - कुबेर होता है। यदि मुखपर पड़ जाय तो मिष्टान्न प्राप्त करता रहता है और यदि मस्तकपर जातक - नक्षत्र पड़ जाय तो जातक रेशम - वस्त्रधारी होता है।