Read Garuda Purāṇa’s Āchāra Khaṇḍa in Hindi

This page contains the Hindi Table of Contents for the Garuda Purāṇa’s Āchāra Khaṇḍa. For the English Table of Contents, please see Read Garuda Purāṇa’s Āchāra Khaṇḍa. For Telugu Table of Contents, please refer to Read Garuda Purāṇa’s Āchāra Khaṇḍa in Telugu. For general information about the Purāṇa, please see Garuda Purāṇa. For general information about this Khaṇḍa, please see Āchāra Khaṇḍa.

सनातन धर्म के अष्टादश महापुराणों में गरुड़ पुराण परम भास्वर और अक्षय ज्ञान का ऐसा अमृत-समुद्र है, जिसे साक्षात् भगवान् विष्णु ने वैकुण्ठ धाम में अपने परम भक्त और पक्षीराज गरुड़ जी को प्रदान किया था। आचार खण्ड और प्रेत खण्ड के दिव्य प्रकाश के अनन्तर, गरुड़ पुराण का यह अंतिम और सर्वोत्कृष्ट भाग ‘ब्रह्म खण्ड‘ इस महापुराण के मुकुटमणि तथा दार्शनिक हृदय के रूप में सुशोभित होता है। यह पावन खण्ड एक अखण्ड गुरु-परम्परा के माध्यम से संरक्षित हुआ—जहाँ सर्वेश्वर भगवान् नारायण ने इसका उपदेश ब्रह्मा जी को दिया, ब्रह्मा जी ने महर्षि व्यास को, और व्यास जी की अनुकम्पा से सूत गोस्वामी जी ने नैमिषारण्य के पवित्र तपोवन में सहस्र-वर्षीय महायज्ञ में एकत्र हुए शौनकादि ऋषियों को इसका श्रवण कराया। भक्तिमयी गाथा-शैली में रचा गया यह ब्रह्म खण्ड भौतिक संसार के बन्धनों से मुक्त होकर जीव को साक्षात् परब्रह्म के परम पद तक पहुँचाने वाला एक अविचल सेतु है।


आचार खण्ड के मूल दर्शन में भगवान् विष्णु को सर्वोपरि परब्रह्म और ब्रह्माण्ड के एकमात्र संरक्षक के रूप में घोषित किया गया है, जो समस्त चेतनाओं के परम स्रोत और आत्यंतिक गन्तव्य हैं। इसका एक केंद्रीय इतिवृत्त आचार-साधना है, जिसमें बाह्य शारीरिक पवित्रता, नैतिक अनुशासन और वर्णाश्रम धर्म के निष्ठापूर्वक पालन द्वारा मन का क्षालन होता है और देहधारी जीव परम तत्त्व के साक्षात्कारों हेतु प्रस्तुत होता है। यह शास्त्र विष्णु-भक्ति की महिमा को सर्वोपरि स्थान देता है, और यह प्रदर्शित करता है कि नित्य अर्चन, पावन नाम-संकीर्तन, ध्यान तथा मन्दिर-प्रतिष्ठा किस प्रकार साधारण जीवन को विशुद्ध प्रेममयी समर्पणांजलि में रूपान्तरित कर देते हैं। इसके अतिरिक्त, आचार खण्ड धनवन्तरि आयुर्वेद, रत्नपरीक्षा शास्त्र, नीतिशास्त्र और व्याकरण शास्त्र जैसे व्यावहारिक विज्ञानों को धर्म के ताने-बाने में समरसता से पिरोता है, और यह सिद्ध करता है कि ज्ञान की समस्त शाखाएँ मानव जाति को मोक्ष मार्ग पर अग्रसर करने हेतु परमेश्वर से ही प्रादुर्भूत हुई हैं।

Read Garuda Purāṇa’s Āchāra Khaṇḍa Online in Hindi

आचार कांड – केवल अनुवाद

हर अध्याय का विवरण

अध्याय १ – मङ्गलाचरण-सूतगमन (Maṅgalācharaṇa-Sūtagamana)

नैमिशारण्य (Naimishāraṇya) के परम पवित्र वन में, जहाँ पूज्य महर्षि जगत्-कल्याण के लिए सहस्र-वर्षीय यज्ञ सम्पन्न करने हेतु एकत्र हुए थे, पूज्य सूत गोस्वामी (Sūta Gosvāmī) गरुड़ पुराण की कथा का आरम्भ करने से पूर्व भगवान् विष्णु के श्रीचरणों में साक्षात् दण्डवत् प्रणाम अर्पित करते हैं। महर्षि शौनकादि (Maharshi Shaunaka) ऋषियों द्वारा परम मुक्ति के मार्ग के विषय में पूछे गए विनम्र प्रश्नों से प्रेरित होकर, सूत गोस्वामी उस अलौकिक संवाद का पुनर्गान आरम्भ करते हैं, जो वैकुण्ठ (Vaikuṇṭha) में प्रभु नारायण और उनके दिव्य वाहन गरुड़ के मध्य घटित हुआ था।

अध्याय २ – अवतारनिरूपण (Avatāraniroopaṇa)

सूत गोस्वामी एकत्र हुए ऋषियों के समक्ष भगवान् विष्णु के अलौकिक अवतारों का महिमामय वर्णन करते हैं। वे यह प्रकट करते हैं कि किस प्रकार परम पुरुष धर्म की रक्षा और सज्जनों के उद्धार हेतु विभिन्न युगों में इस भौतिक जगत् में अवतरित होते हैं। यह पावन आख्यान वराह (Varāha), नृसिंह (Narsiṁha), वामन (Vāmana), राम (Rāma) और कृष्ण (Kṛshṇa) सहित भगवान् के दिव्य प्राकट्यों का चित्रण करता है, और यह उद्घाटित करता है कि ये अवतार सत्, चित् और आनन्द के विशुद्ध स्वरूप हैं, जो ब्रह्माण्डीय सन्तुलन की पुनर्स्थापना और जीवों पर करुणावृष्टि करने के लिए ही गृहीत होते हैं।

अध्याय ३ – सृष्टिक्रम (Sṛshṭikrama)

भगवान् विष्णु अपने वाहन गरुड़ को ब्रह्माण्डीय सृष्टि की महान् प्रक्रिया का गूढ़ ज्ञान प्रदान करते हैं। वे विस्तार से बताते हैं कि किस प्रकार परम पुरुष की दिव्य दृष्टि से अव्यक्त प्रकृति जाग्रत होती है। जैसा कि होता है, महत्-तत्त्व (Mahat-tattva), अहङ्कार (Ahamkāra) और सूक्ष्म पञ्चभूत (Panchabhūtas) क्रमिक रूप से प्रकट होते हैं, जिससे ब्रह्माण्डीय अण्ड का निर्माण होता है, और प्रभु नारायण की नाभि-कमल से ब्रह्मा (Brahma) प्रकट होकर बहुआयामी लोकों की रचना करते हैं।

अध्याय ४ – प्रजापतिसृष्टि (Prajāpatisṛshṭi)

ब्रह्मा भगवान् विष्णु की दिव्य आज्ञा का पालन करते हुए ब्रह्माण्डीय लोकों को प्रजा से परिपूर्ण करने के लिए मरीचि (Marīchi), अत्रि (Atri), अङ्गिरा (Angiras), पुलस्त्य (Pulastya), पुलह (Pulaha), क्रतु (Kratu) और वशिष्ठ (Vashishṭha) सहित मानस-पुत्र प्रजापतियों की रचना करते हैं। महर्षि कश्यप (Sage Kashyapa) और अदिति (Aditi) के माध्यम से आदित्यों (Ādityas), देवों तथा विविध जीव-जातियों का ब्रह्माण्ड में प्राकट्य होता है, जहाँ प्रत्येक जीव अपने संचित कर्मों के अनुसार उपयुक्त शरीर धारण करता है।

अध्याय ५ – सूर्यपूजाविधि (Sūryapūjāvidhi)

भगवान् विष्णु गरुड़ को सूर्यदेव (Sūryadeva) के पावन अनुष्ठानिक पूजन की विधि सिखाते हैं, जो अम्बर में परम पुरुष के प्रत्यक्ष चक्षु के रूप में देदीप्यमान हैं। यह आख्यान सौर मण्डल के न्यास, पवित्र मन्त्रों के जप तथा प्रातःकाल अर्घ्य (Arghya) दान की विधि का विस्तार से वर्णन करता है, जो भक्त को शारीरिक ओज, मानसिक निर्मलता, रोग-मुक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है।

अध्याय ६ – विष्णुपूजाविधि (Vishṇupūjāvidhi)

परम पुरुष भगवान् विष्णु स्वयं अपनी पूजन-पद्धति का क्रमबद्ध विधान निरूपित करते हैं। वे विशुद्ध जल, तुलसी (Tulasī) दल, चन्दन तथा सुगन्धित धूप की अलौकिक महत्ता को प्रकट करते हैं। भगवान् विष्णु समझाते हैं कि परम प्रेम और पूर्ण आत्म-समर्पण के साथ की गई पूजा समस्त संचित कर्म-मलों को भस्म कर देती है और साधक के हृदय को अलौकिक शान्ति एवं अविचल आनन्द से भर देती है।

अध्याय ७ – शिवपूजाविधि (Shivapūjāvidhi)

भगवान् विष्णु ब्रह्माण्डीय भक्ति के अनिवार्य अङ्ग के रूप में महादेव शिव (Mahādeva Shiva) के पूजन की महिमा का गान करते हैं, और परम पुरुष तथा उनके परम भक्त शिव के मध्य की अभेद दिव्य एकता को उद्घाटित करते हैं। पञ्चामृत (Panchāmṛta), पवित्र बिल्व (Bilva) पत्र तथा पञ्चाक्षर मन्त्र (Panchākshara Mantra) के द्वारा लिङ्ग-अभिषेक (Linga-abhisheka) की अनुष्ठानिक विधियों को अज्ञान के निवारण और मन की शुद्धता प्राप्ति के अचूक साधन के रूप में वर्णित किया गया है।

अध्याय ८ – गणेशपूजाविधि (Gaṇeshapūjāvidhi)

यह पावन प्रसङ्ग विघ्नहर्ता और समस्त शुभ कार्यों के स्वामी गणेश (Gaṇesha) के पवित्र पूजन का वर्णन करता है। भगवान् विष्णु शिक्षा देते हैं कि प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान के आरम्भ में गणेश का आह्वान करने से कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होते हैं, और साधक को तीव्र बुद्धि, समृद्धि तथा आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त होती है।

अध्याय ९ – लक्ष्मीपूजाविधि (Lakshmīpūjāvidhi)

भगवान् विष्णु अपनी नित्य अर्धाङ्गिनी देवी लक्ष्मी (Goddess Lakshmī) के पूजन का विधान बताते हैं, जो दिव्य कृपा, मङ्गलमयता और आध्यात्मिक ऐश्वर्य की साक्षात् मूर्ति हैं। यह ग्रन्थ मङ्गल-कलश की स्थापना, मङ्गलमय स्तौत्रों का पाठ तथा स्वार्थरहित दान के आचरण का निरूपण करता है, जो गृहस्थ के जीवन में भौतिक समृद्धि और विशुद्ध आध्यात्मिक भक्ति दोनों को आकर्षित करता है।

अध्याय १० – नवव्यूहपूजा (Navavyūhapūjā)

परम पुरुष नवव्यूह-पूजन के गूढ़ विज्ञान को प्रकट करते हैं, जिसमें पवित्र मण्डलों में भगवान् विष्णु के नौ दिव्य रूपों की आराधना की जाती है। सटीक न्यास (Nyāsa) तथा वासुदेव (Vāsudeva), सङ्कर्षण (Sankarshaṇa), प्रद्युम्न (Pradyumna) और अनिरुद्ध (Aniruddha) पर एकाग्र ध्यान के माध्यम से साधक अपनी सूक्ष्म ऊर्जा नाड़ियों को ब्रह्माण्डीय दिव्य चेतना से एकाकार कर लेता है।

अध्याय ११ – दीक्षाविधि (Deekshāvidhi)

भगवान् विष्णु प्रमाणिक गुरु द्वारा सुयोग्य शिष्य को दी जाने वाली दीक्षा (Deekshā) की पावन प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। यह ग्रन्थ समझाता है कि किस प्रकार गुरु पावन यज्ञ-अनुष्ठानों द्वारा शिष्य का शोधन करते हैं, पवित्र बीज मन्त्रों (Bīja Mantras) का उपदेश देते हैं, और जीवात्मा को सीधे दिव्य कृपा की अमर परम्परा से जोड़ देते हैं।

अध्याय १२ – पूजाक्रम (Pūjākrama)

दिव्य जगद्गुरु भगवान् विष्णु साधकों के लिए दैनिक पूजन-क्रम का क्रमबद्ध विधान निर्धारित करते हैं, जिसमें प्रातःकालीन शौच-स्नान, आचमन (Āchamana), भूतशुद्धि (Bhūtashuddhi), मानस पूजा (Mānasa Pūjā) तथा बाह्य आवाहन (Āvāhana) सम्मिलित हैं। भगवान् विष्णु पुनः इस बात पर बल देते हैं कि बाह्य अनुष्ठानों का ध्येय मन को स्थिर करना है ताकि परम पुरुष का निरन्तर, अखण्ड स्मरण स्वाभाविक बन जाए।

अध्याय १३ – विष्णुपञ्जरस्तोत्र (Vishṇupanjarastotra)

परम पुरुष सुप्रसिद्ध विष्णुपञ्जर स्तोत्र (Vishṇupanjara Stotra) का उपदेश देते हैं, जो दिव्य नामों और अस्त्रों का एक परम शक्तिशाली आध्यात्मिक कवच है। यह साधक को नकारात्मक शक्तियों, ग्रहीय पीड़ाओं तथा शारीरिक सङ्कटों से सुरक्षित रखने हेतु निर्मित किया गया है। इस पावन स्तोत्र का पाठ करने से साधक के चारों ओर दसों दिशाओं में दिव्य प्रकाश का एक अभेद्य पिञ्जर निर्मित हो जाता है।

अध्याय १४ – विष्णुसहस्रनामस्तोत्र (Vishṇusahasranāmastotra)

भगवान् विष्णु अपने सहस्र (हज़ार) दिव्य नामों को प्रकट करते हैं, जो उनके अनन्त गुणों, ब्रह्माण्डीय लीलाओं और अलौकिक स्वरूप को अभिव्यक्त करते हैं। यह ग्रन्थ इस स्तोत्र के जप की परम महिमा का गान करता है, और यह घोषणा करता है कि यह पर्वत-सदृश पापों का क्षालन करता है, आरोग्य एवं दीर्घायु प्रदान करता है, और आत्मा को वैकुण्ठ लोक में उन्नत करता है।

अध्याय १५ – सन्ध्याविधि (Sandhyāvidhi)

यह प्रसङ्ग प्रातः, मध्याह्न और सायं—इन तीन ब्रह्माण्डीय सन्धिकालों में की जाने वाली सन्ध्यावन्दन (Sandhyāvandana) के पावन कर्तव्य की व्याख्या करता है। भगवान् विष्णु जल अर्घ्य, प्राणायाम (Prāṇāyāma) तथा गायत्री जप (Gāyatrī Japa) के माध्यम से शुद्धि का वर्णन करते हैं, जो साधक के भीतर सुप्त आध्यात्मिक अग्नि को प्रज्वलित करती है और ब्रह्माण्ड के साथ सामञ्जस्य बनाए रखती है।

अध्याय १६ – स्नानविधि (Snānavidhi)

भगवान् विष्णु स्नान के आध्यात्मिक विज्ञान की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं, जिसमें स्नान को शारीरिक, मानसिक और मन्त्र-सिञ्चित शुद्धि में वर्गीकृत किया गया है। स्नान के समय गङ्गा (Gaṅgā), यमुना (Yamunā) और सरस्वती (Sarasvatī) जैसी पवित्र नदियों का आवाहन करके साधक अपने भौतिक शरीर और सूक्ष्म मन दोनों को संचित मलों से मुक्त कर लेता है।

अध्याय १७ – तर्पणपूजनियम (Tarpaṇapūjāniyama)

दिव्य जगद्गुरु देवों, ऋषियों और पितरों (Pitṛs) को तर्पण (Tarpaṇa) नामक जल-अर्पण करने के दैनिक नियम का उपदेश देते हैं। यह पावन आचरण सृष्टि की शक्तियों और पितृ-परम्परा के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता है, जिससे आने वाली पीढ़ियों में शान्ति और समृद्धि का प्रवाह बना रहता है।

अध्याय १८ – विष्ण्वर्चनफल (Vishṇuarchanaphala)

भगवान् विष्णु विग्रह के समक्ष निष्कपट पूजन, पुष्प-अर्पण तथा दीप प्रज्वलित करने से प्राप्त होने वाले अपार आध्यात्मिक पुण्य की महिमा का वर्णन करते हैं। परम पुरुष गरुड़ को आश्वस्त करते हैं कि प्रेमपूर्वक किया गया छोटा-सा भक्ति-कार्य भी इस लोक और परलोक दोनों में अनन्त फल प्रदान करता है।

अध्याय १९ – मृत्युञ्जयपूजा (Mṛtyunjayapūjā)

परम पुरुष काल के विजेता और आरोग्य-दाता के रूप में मृत्युञ्जय शिव (Mṛtyunjaya Shiva) के पूजन का विस्तृत विधान बताते हैं। पवित्र मन्त्रों के पाठ और अभिमन्त्रित द्रव्यों के अर्पण से साधक अकाल मृत्यु के भय, असाध्य रोगों तथा प्रतिकूल ग्रहीय प्रभावों पर विजय प्राप्त कर लेता है।

अध्याय २० – प्राणेश्वरीविद्या (Prāṇeshvarīvidyā)

भगवान् विष्णु गूढ़ प्राणेश्वरी विद्या (Prāṇeshvarī Vidyā) को प्रकट करते हैं, जो मानव शरीर के भीतर प्राण-शक्तियों को सन्तुलित करने के लिए निर्मित एक शक्तिशाली आध्यात्मिक साधना है। यह ग्रन्थ गुप्त बीज मन्त्रों और ध्यान तकनीकों की रूपरेखा प्रस्तुत करता है जो जीवनी शक्ति को बढ़ाती हैं, सूक्ष्म व्याधियों को दूर करती हैं और आध्यात्मिक एकाग्रता को गहरा करती हैं।

अध्याय २१ – विषापहरणमन्त्र (Vishāpaharaṇamantra)

यह प्रसङ्ग भौतिक और सर्प आदि के विष को निष्प्रभावित करने वाले शक्तिशाली मन्त्रों और सूक्ष्म ऊर्जात्मक अनुष्ठानों को प्रस्तुत करता है। भगवान् विष्णु समझाते हैं कि किस प्रकार दिव्य कृपा से युक्त पवित्र ध्वनियों का एकाग्र स्पन्दन शरीर में विषाक्त तत्त्वों को निष्प्रभावी कर देता है और प्राकृतिक सन्तुलन को पुनर्स्थापित करता है।

अध्याय २२ – गरुड़मन्त्रकथान (Garuḍamantrakathāna)

भगवान् विष्णु गरुड़ को परम गरुड़ मन्त्र (Garuḍa Mantra) प्रदान करते हैं, और सूक्ष्म नकारात्मक शक्तियों, सर्प-विष तथा भय को विनष्ट करने की इसकी अपार शक्ति पर प्रकाश डालते हैं। यह ग्रन्थ व्याख्या करता है कि जो साधक इस मन्त्र का जप करते हैं, वे अविचल साहस, स्पष्टता और बुरी शक्तियों से अभेद्य सुरक्षा प्राप्त करते हैं।

अध्याय २३ – शिवपूजाप्रकार (Shivapūjāprakāra)

दिव्य जगद्गुरु शिव-पूजन के सूक्ष्म विवरणों का और अधिक विस्तार करते हैं, जिसमें भस्म, रुद्राक्ष (Rudrāksha) की माला और बिल्व-पत्र तैयार करने की विधि निर्दिष्ट की गई है। यह ग्रन्थ इस बात पर बल देता है कि विशुद्ध वैराग्य से महादेव का पूजन करने से मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है और आध्यात्मिक जागरण की गति तीव्र हो जाती है।

अध्याय २४ – देवीपूजाप्रकार (Devīpūjāprakāra)

भगवान् विष्णु दुर्गा (Durgā), चण्डी (Chaṇḍī) और काली (Kālī) जैसे विभिन्न रूपों में जगज्जननी देवी के पूजन का वर्णन करते हैं, जो ब्रह्माण्डीय ऊर्जा और दिव्य शक्ति की साक्षात् प्रतीक हैं। यह ग्रन्थ यन्त्र (Yantra) की प्रतिष्ठा, रक्त-पुष्पों के अर्पण और स्तोत्र-पाठ का निरूपण करता है जो आन्तरिक विकारों को नष्ट करता है और सुरक्षा प्रदान करता है।

अध्याय २५ – सूर्यसहस्रनाम (Sūryasahasranāma)

परम पुरुष सूर्यदेव के सहस्र दिव्य नामों का उपदेश देते हैं, और सूर्यदेव की समस्त जीवन के प्राणदाता और ब्रह्माण्ड के चक्षु के रूप में स्तुति करते हैं। इन पवित्र नामों का पाठ करने से शरीर में तेज की वृद्धि होती है, अन्धत्व एवं चर्मरोग दूर होते हैं, और उच्च बौद्धिक व आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।

अध्याय २६ – गोपालपूजा (Gopālapūjā)

भगवान् विष्णु बालगोपाल कृष्ण (Bālagopāla Kṛshṇa) के मधुर और मनमोहक पूजन को प्रकट करते हैं, जो अपने बाल-रूप से समस्त जीवों का चित्त हर लेते हैं। यह प्रसङ्ग भक्ति-गीतों के साथ ताजे माखन, दूध और मिष्ठान्न के अर्पण का विस्तृत विवरण देता है, जो गृहस्थ को आनन्द, सौहार्द और सन्तान-सुख के आशीर्वाद से भर देता है।

अध्याय २७ – त्रैलोक्यमोहनमन्त्र (Trailokyamohanamantra)

दिव्य जगद्गुरु त्रैलोक्यमोहन मन्त्र (Trailokyamohana Mantra) को उद्घाटित करते हैं, जो तीनों लोकों में दिव्य प्रेम, सौहार्द और अनुकूल ब्रह्माण्डीय स्पन्दन को आकर्षित करने वाला एक उत्कृष्ट आध्यात्मिक आह्वान है। निष्काम भाव से प्रयोग किए जाने पर यह मन्त्र शत्रुता को समाप्त करता है और सार्वभौमिक सद्भाव को बढ़ावा देता है।

अध्याय २८ – श्रीधरपूजा (Śrīdharapūjā)

भगवान् विष्णु अपने वक्षःस्थल पर देवी लक्ष्मी को धारण करने वाले श्रीधर (Śrīdhara) रूप के पूजन का वर्णन करते हैं। यह ग्रन्थ उन विशिष्ट अनुष्ठानों का निरूपण करता है जो साधक के परिवार को स्थायी समृद्धि, आध्यात्मिक सन्तोष और दिव्य संरक्षण प्रदान करते हैं।

अध्याय २९ – विष्वक्सेनपूजा (Vishvaksenapūjā)

परम पुरुष वैकुण्ठ में दिव्य सेनाओं के अध्यक्ष विष्वक्सेन (Vishvaksena) के पूजन का विवरण देते हैं। प्रमुख आध्यात्मिक कार्यों से पूर्व विष्वक्सेन का आह्वान करने से विघ्न दूर होते हैं और समस्त पावन अनुष्ठानों का सुगम सम्पादन सुनिश्चित होता है।

अध्याय ३० – सुदर्शनमन्त्र (Sudarshanamantra)

भगवान् विष्णु अपने दिव्य सुदर्शन चक्र (Sudarshana Chakra) की महिमा का गान करते हैं, जो अग्नि-सम अलौकिक ऊर्जा का देदीप्यमान चक्र है तथा दुष्टों का विनाश और भक्तों की रक्षा करता है। यह आख्यान सुदर्शन मन्त्र और उसके ध्यान की रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जो अभिचार, ईर्ष्या और गम्भीर भयों को छिन्न-भिन्न कर देता है।

अध्याय ३१ – हयग्रीवपूजा (Hayagrīvapūjā)

भगवान् विष्णु अपने हयग्रीव (Hayagrīva) अवतार के पूजन का वर्णन करते हैं, जिन्होंने असुर मधु और कैटभ (Madhu and Kaiṭabha) द्वारा चुराए गए वेदों को पुनः प्राप्त किया था। यह ग्रन्थ परम ज्ञान के रूप में हयग्रीव के ध्यान का विवरण देता है, जो समस्त शास्त्रों पर प्रभुत्व, स्मरण-शक्ति और वाक्-सिद्धि प्रदान करता है।

अध्याय ३२ – गायत्र्युपासना (Gāyatrīupāsanā)

परम पुरुष वेदों की माता और दिव्य प्रकाश की मूर्ति देवी गायत्री (Gāyatrī) की उत्कृष्ट उपासना को आलोकित करते हैं। भगवान् विष्णु प्रातः, मध्याह्न और सायं—इन तीनों कालों में गायत्री के तीन रूपों की व्याख्या करते हैं, और यह प्रकट करते हैं कि किस प्रकार उनकी उपासना बुद्धि को शुद्ध करती है और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करती है।

अध्याय ३३ – सन्ध्यामन्त्रकथान (Sandhyāmantrakathāna)

भगवान् विष्णु प्रातः, मध्याह्न और सायं सन्ध्या-कृत्यों के दौरान किए जाने वाले सटीक मन्त्रों और जल-तर्पण विधियों का निरूपण करते हैं। यह प्रसङ्ग दर्शाता है कि किस प्रकार ये पावन मन्त्र आन्तरिक अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, मानव-ऊर्जा को ब्रह्माण्डीय लयबद्धता के साथ एकीकृत करते हैं, और साधक की आध्यात्मिक अन्धकार से रक्षा करते हैं।

अध्याय ३४ – विश्णुन्यास (Vishṇunyāsa)

परम पुरुष विष्णु-न्यास (Vishṇu Nyāsa) की पावन कला की शिक्षा देते हैं, जिसमें साधक अपने भौतिक शरीर के विभिन्न अङ्गों पर दिव्य मन्त्रों और भगवान् विष्णु के स्वरूपों का मानसिक न्यास करता है। यह अनुष्ठान भौतिक शरीर को एक जीवन्त मन्दिर में रूपान्तरित कर देता है, और साधक को दिव्य ऊर्जा से आच्छादित कर देता है।

अध्याय ३५ – कवचकथान (Kavachakathāna)

भगवान् विष्णु विभिन्न देवों को समर्पित रक्षात्मक कवच (Kavacha) स्तोत्रों को प्रस्तुत करते हैं, और यह व्याख्या करते हैं कि ये आध्यात्मिक ढालें किस प्रकार शरीर और मन की अदृश्य सङ्कटों, नकारात्मक प्रभावों और शारीरिक व्याधियों से रक्षा करती हैं। दिव्य जगद्गुरु गरुड़ को आश्वस्त करते हैं कि इन कवचों का पाठ करने से अविचल आत्मविश्वास प्राप्त होता है।

अध्याय ३६ – द्वादशाक्षरमन्त्र (Dvādaśāksharamantra)

दिव्य जगद्गुरु पावन द्वादशाक्षर मन्त्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” (Om Namo Bhagavate Vāsudevāya) की महिमा का गान करते हैं, और इसे समस्त वैदिक शास्त्रों का परम सार घोषित करते हैं। अचल श्रद्धा के साथ इस मन्त्र का जप करने से समस्त कर्म-बन्धन क्षीण हो जाते हैं और भगवान् विष्णु की प्रत्यक्ष उपस्थिति आकर्षित होती है।

अध्याय ३७ – अष्टाक्षरमन्त्र (Ashṭāksharamantra)

भगवान् विष्णु अष्टाक्षर मन्त्र “ॐ नमो नारायणाय” (Om Namo Nārāyaṇāya) को प्रकट करते हैं, और इसकी उस शाश्वत नौका के रूप में स्तुति करते हैं जो जीवों को संसार-सागर से सकुशल पार कराती है। यह ग्रन्थ वर्णन करता है कि किस प्रकार इस मन्त्र का निरन्तर स्मरण शान्ति, वैराग्य और आत्यन्तिक मुक्ति प्रदान करता है।

अध्याय ३८ – विष्णुभक्तिमाहात्म्य (Vishṇubhaktimāhātmya)

परम पुरुष विष्णु-भक्ति (Vishṇu Bhakti) की अनुपम महिमा की उद्घोषणा करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि निष्कपट भक्ति समस्त कठोर तपस्याओं, विशाल यज्ञों और विद्वत्तापूर्ण ज्ञान से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। भगवान् विष्णु गरुड़ को आश्वस्त करते हैं कि जो भक्त प्रेमपूर्वक एक पत्ता या जल की एक बूँद भी अर्पित करता है, वह उन्हें सर्वाधिक प्रिय है।

अध्याय ३९ – पूजाद्रव्यलक्षण (Pūjādravyalakshaṇa)

भगवान् विष्णु पूजन में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों जैसे पुष्प, पत्र, धूप, दीप और शुद्ध जल के आवश्यक गुणों को निर्दिष्ट करते हैं। यह प्रसङ्ग बल देता है कि शुद्ध और निर्दोष सामग्री से निष्कपट हृदय द्वारा की गई भेंट महान् आध्यात्मिक पुण्य लाती है, जबकि अशुद्ध वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए।

अध्याय ४० – नैवेद्यविधि (Naivedyavidhi)

परम पुरुष भगवान् विग्रह को नैवेद्य (Naivedyavidhi) अर्पण करने की अनुष्ठानिक विधि का वर्णन करते हैं, जिसमें शुद्ध शाकाहारी पकवानों, फलों और मिष्ठान्न की उचित तैयारी का विवरण है। भगवान् विष्णु समझाते हैं कि उन्हें अर्पित किया गया भोजन महाप्रसाद (Mahāprasāda) बन जाता है, जो इसका सेवन करने वालों के मन और शरीर को शुद्ध करने में समर्थ है।

अध्याय ४१ – आरतिकफल (Āratikaphala)

भगवान् विष्णु विग्रह के समक्ष आरती (Āratika) करने अर्थात् प्रज्वलित दीपों को घुमाने से प्राप्त होने वाले गूढ़ आध्यात्मिक पुण्य को प्रकट करते हैं। यह ग्रन्थ यह दर्शाता है कि किस प्रकार प्रकाशमान दिव्य स्वरूप के दर्शन मन के अन्धकार को दूर करते हैं, मङ्गलमयता प्रदान करते हैं और घर को दिव्य ज्योति से भर देते हैं।

अध्याय ४२ – विष्णुमन्दिरमाहात्म्य (Vishṇumandiramāhātmya)

दिव्य जगद्गुरु भगवान् विष्णु को समर्पित मन्दिरों के निर्माण और रखरखाव की महिमा का गान करते हैं, और यह घोषणा करते हैं कि पूजा-स्थल का निर्माण उच्च लोकों में शाश्वत निवास की गारंटी देता है। यह प्रसङ्ग स्पष्ट करता है कि मन्दिर के प्राङ्गण में गुहार लगाने (सफ़ाई करने) या उसे सजाने मात्र से भी अपार आध्यात्मिक पुण्य अर्जित होता है।

अध्याय ४३ – प्रतिष्ठाविधि (Pratishṭhāvidhi)

भगवान् विष्णु पावन प्राण-प्रतिष्ठा (Pratishṭhā) समारोह का विवरण देते हैं, जिसके द्वारा उत्कीर्ण विग्रह स्वरूप में वैदिक मन्त्रों और अनुष्ठानों के माध्यम से दिव्य प्राण-शक्ति का संचार किया जाता है। यह ग्रन्थ समझाता है कि किस प्रकार प्रतिष्ठित मूर्ति समस्त भक्तों के लिए परमात्मा का एक जीवन्त, सुलभ प्राकट्य बन जाती है।

अध्याय ४४ – मन्दिरनिर्माण (Mandiranirmāṇa)

परम पुरुष मन्दिर-निर्माण के स्थापत्य सिद्धान्तों की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं, जिसमें भूमि-चयन, मृदा-परीक्षण, भूमि-शोधन तथा गर्भगृह के अनुपातों को निर्दिष्ट किया गया है। यह प्रसङ्ग भौतिक स्थापत्य को सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय ज्यामिति से जोड़ता है, जिससे दिव्य उपस्थिति हेतु एक पवित्र स्थल का निर्माण होता है।

अध्याय ४५ – मूर्तिलक्षण (Mūrtilakshaṇa)

भगवान् विष्णु विभिन्न देवों की पवित्र मूर्तियों को गढ़ने के लिए सटीक कलात्मक माप और लक्षण-विधान का वर्णन करते हैं। यह ग्रन्थ बल देता है कि शास्त्रीय अनुपातों के अनुकूल निर्मित मूर्तियाँ शान्ति, सौंदर्य और आध्यात्मिक ओज का विकिरण करती हैं।

अध्याय ४६ – शालग्रामलक्षण (Shālagrāmalakshaṇa)

दिव्य जगद्गुरु गण्डकी नदी (Gandaki River) में प्राप्त होने वाले स्वयं-भू पावन पत्थरों, शालग्राम शिलाओं (Shālagrāma Śilās) के दिव्य उद्भव और लक्षणों को प्रकट करते हैं। भगवान् विष्णु विभिन्न चिह्नों, चक्रों और रंगों का वर्णन करते हैं जो इन पवित्र पत्थरों के भीतर परम पुरुष के विशिष्ट स्वरूपों की पहचान कराते हैं।

अध्याय ४७ – शालग्रामपूजाफल (Shālagrāmapūjāphala)

भगवान् विष्णु घर में शालग्राम शिला के पूजन के असाधारण आध्यात्मिक पुण्य की उद्घोषणा करते हैं, और यह बताते हैं कि जहाँ भी शालग्राम का पूजन होता है, वह स्थान समस्त तीर्थों के सम्मिलित स्वरूप के समान पवित्र हो जाता है। दिव्य जगद्गुरु वचन देते हैं कि नित्य पूजन स्वास्थ्य, समृद्धि और मुक्ति प्रदान करता है।

अध्याय ४८ – द्वारवतीशिलालक्षण (Dvāravatīśilālakshaṇa)

परम पुरुष द्वारका (Dvārakā) के पवित्र तट से प्राप्त होने वाली द्वारवती शिलाओं (Dvāravatī Śilās) का वर्णन करते हैं, उनके विशिष्ट श्वेत चिह्नों और आध्यात्मिक महत्त्व का विवरण देते हैं। शालग्राम शिलाओं के साथ द्वारवती शिलाओं का पूजन करने से गृहस्थ जीवन में पूर्ण मङ्गलमयता और दिव्य संरक्षण प्राप्त होता है।

अध्याय ४९ – एकादशीव्रतमाहात्म्य (Ekādaśīvratamāhātmya)

भगवान् विष्णु दोनों पक्षों की एकादशी (Ekādaśī) तिथि के परम व्रत की महिमा का गान करते हैं, और इसे अपना सर्वाधिक प्रिय व्रत घोषित करते हैं। एकादशी का उपवास संचित पापों का प्रक्षालन करता है, नकारात्मक कर्मों को भस्म कर देता है, और प्रभु नारायण के चरण-कमलों में नित्य भक्ति प्रदान करता है।

अध्याय ५० – जन्माष्टमीव्रत (Janmāshṭamīvrata)

दिव्य जगद्गुरु भगवान् कृष्ण के शुभ प्राकट्य दिवस जन्माष्टमी (Janmāshṭamī) के उत्सव और उपवास के नियमों का विस्तार से वर्णन करते हैं। मध्यरात्रि में पूजन करना, पूर्ण उपवास रखना और कृष्ण की अलौकिक लीला-कथाओं का श्रवण करना अपार आनन्द, सन्तान-सुख और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।

अध्याय ५१ – श्रीरामनवमीव्रतम् (Śrīrāmanavamīvratam)

भगवान् विष्णु (Bhagavān Vishṇu) अयोध्यापुरी में प्रभु श्रीरामचन्द्र (Prabhu Śrī Rāmachandra) के दिव्य अवतार दिवस ‘श्रीरामनवमी’ (Śrī Rāmanavamī) के पवित्र व्रत का महिमामय वर्णन करते हैं। इस पावन तिथि पर उपवास रखकर, प्रभु श्रीराम के शान्त एवं मङ्गलमय स्वरूप का ध्यान करते हुए उनकी अलौकिक लीलाओं का श्रवण करने से पूर्वजन्मों के संचित पाप विनष्ट हो जाते हैं, नैतिक बल की वृद्धि होती है, और परम प्रभु की शरणागति में नित्य शान्ति प्राप्त होती है।

अध्याय ५२ – शिवरात्रिव्रतम् (Shivarātrivratam)

दिव्य जगद्गुरु भगवान् विष्णु महादेव शिव (Mahādeva Shiva) को परम प्रिय शिवरात्रि (Shivarātri) की रात्रि को निष्ठापूर्वक जागरण, सम्पूर्ण उपवास तथा बिल्व-पत्रों (Bilva leaves) द्वारा शिवलिङ्ग (Shivalinga) के निरन्तर पूजन हेतु सर्वश्रेष्ठ समय निरूपित करते हैं। इस पावन रात्रि में परम भक्तिभाव से महादेव की आराधना करने से घोर पापों का प्रक्षालन होता है, सांसारिक दुःखों का निवारण होता है, और जीवात्मा के आत्यन्तिक मुक्ति का मार्ग सुगम हो जाता है।

अध्याय ५३ – अनन्तचतुर्दशीव्रतम् (Anantachaturdashīvratam)

भगवान् विष्णु अनन्त चतुर्दशी (Ananta Chaturdashī) व्रत के अनुष्ठान की विधि का उद्घाटन करते हैं, जिसमें भक्त चौदह ग्रन्थियों (गाँठों) से युक्त पवित्र अनन्त सूत्र (Ananta thread) को धारण कर प्रभु नारायण के अनन्त स्वरूप की आराधना करते हैं। यह पावन व्रत नष्ट हुए ऐश्वर्य की पुनर्प्राप्ति कराता है, हृदयविदारक कष्टों को दूर करता है, और सर्वेश्वर के चरणों में समर्पित परिवारों को निरन्तर दिव्य संरक्षण प्रदान करता है।

अध्याय ५४ – वामनद्वादशीव्रतम् (Vāmanadvādashīvratam)

परम पुरुष भगवान् विष्णु राजा बलि (Rājā Bali) से तीन पगों में इस ब्रह्माण्ड का उद्धार करने वाले भगवान् वामन (Bhagavān Vāmana) के महिमामय प्राकट्य का स्मरण कराने वाले वामन द्वादशी (Vāmana Dvādashī) व्रत का विस्तार से वर्णन करते हैं। इस पवित्र दिन वामन रूप की आराधना करने से आध्यात्मिक अहङ्कार भस्म हो जाता है, सच्चे विनय की प्राप्ति होती है, और धर्मानुकूल ऐश्वर्य के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति सिद्ध होती है।

अध्याय ५५ – नृसिंहचतुर्दशीव्रतम् (Narsiṁhachaturdashīvratam)

भगवान् विष्णु परम भक्त प्रह्लाद महाराज (Prahlāda Mahārāja) की रक्षा हेतु अवतरित हुए नृसिंह अवतार के दिव्य दिवस ‘नृसिंह चतुर्दशी’ (Narsiṁha Chaturdashī) व्रत का वर्णन करते हैं। दृढ निष्ठा के साथ उपवास रखकर भगवान् नृसिंह की आराधना करने से समस्त भय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, शत्रुओं का नाश होता है, और भक्त को समस्त आपदाओं से दिव्य संरक्षण प्राप्त होता है।

अध्याय ५६ – कार्तिकव्रतम् (Kārtikavratam)

दिव्य जगद्गुरु पावन कार्तिक मास (Kārtika māsa) की महिमा का गान करते हुए प्रकट करते हैं कि इस मास में किए जाने वाले भक्ति-कृत्य, दीप-दान, प्रातःकालीन स्नान तथा तुलसी-पूजन अनन्त आध्यात्मिक पुण्य-फल प्रदान करते हैं। जैसा कि होता है, शरणागत हृदय से कार्तिक व्रत का आचरण करने से प्रभु नारायण की विशेष कृपा प्राप्त होती है और वैकुण्ठ (Vaikuṇṭha) धाम की प्राप्ति सुनिश्चित होती है।

अध्याय ५७ – मकरसङ्क्रान्तिव्रतम् (Makarasaṅkrāntivratam)

भगवान् विष्णु सूर्यदेव (Sūryadeva) के उत्तरायण (Uttarāyaṇa) काल में प्रवेश करने वाले मकर सङ्क्रान्ति (Makara Saṅkrānti) पर्व के आध्यात्मिक महत्त्व की व्याख्या करते हैं। इस पवित्र तिथि पर पुण्य-नदियों में स्नान, भास्कर (Bhāskara) को अर्घ्य-दान तथा दान-धर्म करने से आयु, आरोग्य और आध्यात्मिक मार्ग पर अविचल प्रगति प्राप्त होती है।

अध्याय ५८ – सूर्यसङ्क्रान्तिव्रतम् (Sūryasaṅkrāntivratam)

परम पुरुष द्वादश राशियों में सूर्यदेव के मासिक सङ्क्रमण से जुड़े व्रतों और दान-धर्मों का स्पष्ट विधान निर्दिष्ट करते हैं। इन पावन सङ्क्रान्ति कालों में स्नान, अर्घ्य-दान तथा अन्न-वस्त्र का दान सूर्यदेव को प्रसन्न करता है और साधक के मार्ग में आने वाले पूर्वकर्मों के अवरोधों को समाप्त कर देता है।

अध्याय ५९ – षष्ठीव्रतम् (Shashṭhīvratam)

भगवान् विष्णु बालकों के आरोग्य एवं रक्षा हेतु षष्ठी देवी (Shashṭhī Devī) तथा देवसेना देवी (Devasenā Devī) को समर्पित षष्ठी व्रत का वर्णन करते हैं। भक्तिभाव से इस उपवास का आचरण करने से सन्तान को दीर्घायु, शारीरिक कान्ति तथा उज्ज्वल भविष्य प्राप्त होता है, और सम्पूर्ण परिवार की अदृश्य पीड़ाओं से रक्षा होती है।

अध्याय ६० – सप्तमीव्रतम् (Saptamīvratam)

दिव्य जगद्गुरु सुप्रसिद्ध रथसप्तमी (Rathasaptamī) सहित सूर्यदेव को समर्पित विविध सप्तमी व्रतों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। इन उपवासों के पालन से असाध्य शारीरिक व्याधियाँ विनष्ट हो जाती हैं, मानसिक तेज में वृद्धि होती है, और भक्त का जीवन भास्कर के तेजोमय प्रकाश से आलोकित हो जाता है।

अध्याय ६१ – अष्टमीव्रतम् (Ashṭamīvratam)

भगवान् विष्णु दुर्गाष्टमी (Durgāshṭamī) और कालाष्टमी (Kālāshṭamī) जैसे अष्टमी व्रतों, उनके उपवास-नियमों तथा जगज्जननी की आराधना-विधियों का निरूपण करते हैं। इन पावन व्रतों का अनुष्ठान नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है, आध्यात्मिक धैर्य का संचार करता है, और साधक को आन्तरिक मनोबल से समृद्ध करता है।

अध्याय ६२ – नवमीव्रतम् (Navamīvratam)

परम पुरुष चण्डी देवी (Chaṇḍī Devī) और प्रभु श्रीरामचन्द्र की उपासना को समर्पित नवमी व्रतों का विवरण देते हैं। एकाग्र भक्ति से नवमी व्रत का आचरण करने से आन्तरिक षड्रिपुओं पर विजय प्राप्त होती है, सत्सङ्कल्प सिद्ध होते हैं, और मन उच्चतर आध्यात्मिक चेतना की ओर उन्नत होता है।

अध्याय ६३ – दशमीव्रतम् (Dashamīvratam)

भगवान् विष्णु असत्य पर सत्य की विजय के शाश्वत प्रतीक विजयादशमी (Vijayadashamī) सहित विभिन्न दशमी व्रतों का गान करते हैं। श्रद्धापूर्वक इस तिथि का आचरण करने से नैतिक बल जाग्रत होता है, धर्मानुकूल कार्यों में विजय प्राप्त होती है, और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।

अध्याय ६४ – द्वादशीव्रतभेदः (Dvādashīvratabhedaḥ)

दिव्य जगद्गुरु श्रवण द्वादशी (Shravaṇa Dvādashī) और तिलदा द्वादशी (Tiladā Dvādashī) जैसे विशिष्ट द्वादशी व्रतों की व्याख्या करते हैं। प्रत्येक द्वादशी व्रत विशेष आध्यात्मिक पुण्य संचित करता है, विविध पापों का क्षालन करता है, स्वास्थ्य प्रदान करता है, और प्रभु नारायण के प्रति जीवात्मा के प्रेम को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है।

अध्याय ६५ – त्रयोदशीव्रतम् (Trayodashīvratam)

भगवान् विष्णु महादेव शिव को समर्पित पवित्र प्रदोष व्रत (Pradosha Vrata) सहित त्रयोदशी उपवासों का विस्तार से उपदेश देते हैं। प्रदोष काल में उपवास रखकर बिल्व-पत्रों द्वारा शिवजी का पूजन करने से पूर्वकृत पाप नष्ट हो जाते हैं, जिससे मानसिक शान्ति और आध्यात्मिक निर्मलता प्राप्त होती है।

अध्याय ६६ – पूर्णिमाव्रतम् (Pūrṇimāvratam)

परम पुरुष पूर्णिमा की तिथियों पर किए जाने वाले व्रतों, विशेषकर भगवान् सत्यनारायण (Bhagavān Satyanārāyaṇa) की पूजन-पद्धति का वर्णन करते हैं। पूर्णिमा के दिन मिष्ठान्न नैवेद्य से सत्यनारायण का पूजन कर उनकी अलौकिक लीला-कथाओं का श्रवण करने से परिवार में सौहार्द, समृद्धि और धार्मिक मनोरथों की शीघ्र सिद्धि होती है।

अध्याय ६७ – अमावास्याव्रतम् (Amāvāsyāvratam)

भगवान् विष्णु अमावास्या तिथि पर पालनीय नियमों, विशेषतः पितृ-तर्पण (Pitṛ-tarpaṇa) और दान-धर्म का निरूपण करते हैं। अमावास्या को पितरों के निमित्त जल, तिल तथा अन्न का दान करने से पितृगण तृप्त होते हैं और गृहस्थ को उनका नित्य आशीर्वाद प्राप्त होता है।

अध्याय ६८ – व्रतोद्यापनविधिः (Vratodyāpanavidhiḥ)

दिव्य जगद्गुरु दीर्घकालिक आध्यात्मिक व्रतों की पूर्णता पर सम्पादित की जाने वाली शास्त्रीय उद्यापन विधि का निर्देश देते हैं। विधिपूर्वक पूजन, पावन हवन तथा सदाचारी ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर उद्यापन करने से व्रत का सम्पूर्ण आध्यात्मिक पुण्य-फल सदा के लिए सुदृढ़ हो जाता है।

अध्याय ६९ – तीर्थमाहात्म्यम् (Tīrthamāhātmyam)

भगवान् विष्णु पुण्यभूमि भारतवर्ष में विराजमान परम पवित्र तीर्थक्षेत्रों की महिमा का गान करते हैं। इन पावन धामों के दर्शन, वहाँ के पवित्र जल में स्नान तथा परमात्मा का ध्यान करने से मन निर्मल होता है, संचित कर्म भस्म हो जाते हैं, और सांसारिक बन्धन छिन्न-भिन्न हो जाते हैं।

अध्याय ७० – गङ्गामाहात्म्यम् (Gaṅgāmāhātmyam)

परम पुरुष तीनों लोकों को पवित्र करने हेतु भगवान् विष्णु के श्रीचरणों से प्रकट हुई आकाशगङ्गा की महिमा का गान करते हैं। गङ्गा जी के पावन जल में स्नान करने अथवा भक्तिपूर्वक उनके दिव्य नाम का स्मरण करने मात्र से पर्वत-सदृश पाप भस्म हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अध्याय ७१ – प्रयागमाहात्म्यम् (Prayāgamāhātmyam)

भगवान् विष्णु गङ्गा, यमुना और गुप्त रूप से प्रवाहित होने वाली सरस्वती के सङ्गम-स्थल तीर्थराज प्रयाग (Prayāga) की महत्ता प्रकट करते हैं। जैसा कि होता है, पुण्यकाल में त्रिवेणी सङ्गम (Triveṇī Saṅgama) में स्नान करने से सौ अश्वमेध यज्ञों के समान आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होता है।

अध्याय ७२ – काशीमाहात्म्यम् (Kāshīmāhātmyam)

दिव्य जगद्गुरु महादेव के त्रिशूल पर विराजमान शाश्वत नगरी काशी (Kāshī) का महिमामय वर्णन करते हैं। भगवान् विष्णु निरूपित करते हैं कि काशी मोक्ष का द्वार है, जहाँ देहत्याग करने वाले जीवों को साक्षात् शिवजी तारक मन्त्र का उपदेश देकर मुक्ति प्रदान करते हैं।

अध्याय ७३ – गयामाहात्म्यम् (Gayāmāhātmyam)

भगवान् विष्णु पितरों के उद्धार हेतु गया (Gayā) क्षेत्र की परम पवित्रता की सराहना करते हैं। वे यह प्रकट करते हैं कि विष्णुपाद पर भगवान् विष्णु का चरण-चिह्न किस प्रकार दिवंगत पूर्वजों को सद्गति प्रदान करता है। गया-क्षेत्र में पिण्डदान (Piṇḍadāna) करने से पितर अधोगति से सर्वदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

अध्याय ७४ – मथुरामाहात्म्यम् (Mathurāmāhātmyam)

परम पुरुष भगवान् कृष्ण की पावन जन्मभूमि मथुरा (Mathurā) को दिव्य प्रेम और अलौकिक लीलाओं से परिपूर्ण तीर्थ के रूप में वर्णित करते हैं। मथुरा और वृन्दावन (Vṛndāvana) के दर्शन से हृदय में विशुद्ध प्रेम-भक्ति जाग्रत होती है और गोलोक (Goloka) में नित्य निवास प्राप्त होता है।

अध्याय ७५ – द्वारकामाहात्म्यम् (Dvārakāmāhātmyam)

भगवान् विष्णु पश्चिम समुद्र के तट पर प्रभु कृष्ण द्वारा निर्मित द्वारका (Dvārakā) नगरी की महिमा का गान करते हैं। द्वारका की यात्रा करने तथा द्वारकाधीश के दिव्य मङ्गल स्वरूप के दर्शन करने से सांसारिक भयों से पूर्ण मुक्ति मिलती है और आध्यात्मिक मोक्ष सिद्ध होता है।

अध्याय ७६ – पुरुषोत्तमक्षेत्रमाहात्म्यम् (Purushottamakshētramāhātmyam)

दिव्य जगद्गुरु भगवान् जगन्नाथ (Bhagavān Jagannātha), बलभद्र (Balabhadra) तथा देवी सुभद्रा (Devī Subhadrā) के धाम पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथ पुरी (Jagannātha Purī) का वर्णन करते हैं। जगन्नाथ महाप्रसाद (Mahāprasāda) का सेवन करने तथा रथयात्रा के समय श्रीहरि के दिव्य स्वरूप का दर्शन करने से तत्काल आध्यात्मिक पवित्रता और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अध्याय ७७ – नैमिशारण्यमाहात्म्यम् (Naimishāraṇyamāhātmyam)

भगवान् विष्णु उस पावन अरण्य नैमिशारण्य (Naimishāraṇya) की महिमा प्रकट करते हैं जहाँ धर्मचक्र प्रतिष्ठित हुआ था और जहाँ महर्षिगण निरन्तर यज्ञ एवं शास्त्र-चिन्तन करते हैं। नैमिशारण्य में ध्यान लगाने से तीव्र आध्यात्मिक सिद्धि और भगवत्-कृपा प्राप्त होती है।

अध्याय ७८ – पुष्करमाहात्म्यम् (Pushkaramāhātmyam)

परम पुरुष ब्रह्मा द्वारा निर्मित पवित्र पुष्कर (Pushkara) सरोवर की मानसिक शुद्धि और व्रत-साधना हेतु सर्वश्रेष्ठ तीर्थ के रूप में प्रशंसा करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर सरोवर में स्नान करने से अपार आध्यात्मिक पुण्य और दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है।

अध्याय ७९ – कुरुक्षेत्रमाहात्म्यम् (Kurukshetramāhātmyam)

भगवान् विष्णु उस परम पावन धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र (Kurukshetra) का वर्णन करते हैं जहाँ प्रभु कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmadbhagavadgītā) का उपदेश दिया था। सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दान-धर्म तथा आध्यात्मिक अनुष्ठान करने से अनन्त कर्म-क्षय होता है।

अध्याय ८० – बदरिकाश्रममाहात्म्यम् (Badarīkāshramamāhātmyam)

दिव्य जगद्गुरु हिमालय में लोक-कल्याण हेतु नर-नारायण (Nara-Nārāyaṇa) द्वारा निरन्तर तपे जा रहे बदरिकाश्रम (Badarīkāshrama) का यशोगान करते हैं। बदरीनाथ (Badarīnātha) के दर्शन अचल आध्यात्मिक ज्ञान और परमात्मा से प्रत्यक्ष सम्बन्ध प्रदान करते हैं।

अध्याय ८१ – तीर्थयात्राविधिः (Tīrthayātrāvidhiḥ)

भगवान् विष्णु पावन तीर्थयात्राओं के समय पालनीय सदाचार-नियमों का स्पष्ट निर्देश देते हैं। परम पुरुष बल देकर कहते हैं कि वास्तविक तीर्थयात्रा हेतु अहिंसा, सत्य, इन्द्रिय-निग्रह तथा विनम्र हृदय अनिवार्य हैं; इनके बिना केवल भौतिक यात्रा करने से आध्यात्मिक फल प्राप्त नहीं होता।

अध्याय ८२ – मन्वन्तरस्वरूपम् (Manvantarasvaroopam)

दिव्य जगद्गुरु मन्वन्तर (Manvantara) नामक ब्रह्माण्डीय कालचक्रों का वर्णन करते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर एक विशिष्ट मनु (Manu), इन्द्रदेव (Indradeva), सप्तर्षियों के समूह तथा विष्णु के विशिष्ट अवतार द्वारा प्रशासित होता है। यह कालचक्र-वर्णन कोटि-कोटि वर्षों से ब्रह्माण्ड में चल रहे सुव्यवस्थित शासन को उद्घाटित करता है।

अध्याय ८३ – स्वायम्भुवमन्वन्तरम् (Svāyambhuvamanvantaram)

भगवान् विष्णु स्वायम्भुव मनु के शासनकाल वाले प्रथम मन्वन्तर का वर्णन करते हैं। यह अध्याय मानव समाज के प्रारम्भिक संगठन, मौलिक धर्म-नियमों की स्थापना तथा मानवजाति का मार्गदर्शन करने हेतु यज्ञ (Yagña) और कपिल (Kapila) जैसे प्रथम अवतारों के प्राकट्य का विस्तृत विवरण देता है।

अध्याय ८४ – स्वारोचिषमन्वन्तरम् (Svārochishamanvantaram)

परम पुरुष स्वारोचिष मनु के द्वितीय मन्वन्तर की व्याख्या करते हैं। यह आख्यान इस प्राचीन युग में धर्म को धारण करने वाले प्रमुख महर्षियों, देवों तथा रोचन (Rochana) अवतार के प्रसङ्गों का चित्रण करता है।

अध्याय ८५ – उत्तममन्वन्तरम् (Uttamamanvantaram)

भगवान् विष्णु उत्तम मनु द्वारा प्रशासित तृतीय मन्वन्तर का निरूपण करते हैं। यह ग्रन्थ सत्य की रक्षा करने वाले तथा असुरों के सङ्कट से सज्जनों का परित्राण करने वाले सत्यसेन (Satyasena) दिव्य अवतार की महिमा स्पष्ट करता है।

अध्याय ८६ – तामसमन्वन्तरम् (Tāmasamanvantaram)

दिव्य जगद्गुरु तामस मनु के चतुर्थ मन्वन्तर को प्रकट करते हैं। यह प्रसङ्ग ग्राह (नक्र) के चंगुल से गजेन्द्र का उद्धार करने वाले हरि (Hari) अवतार की दिव्य लीला का वर्णन करता है, जो विशुद्ध भक्ति और पूर्ण शरणागति की अनन्त शक्ति को सिद्ध करता है।

अध्याय ८७ – रैवतमन्वन्तरम् (Raivatamanvantaram)

भगवान् विष्णु रैवत मनु द्वारा प्रशासित पञ्चम मन्वन्तर का वर्णन करते हैं। यह अध्याय मानस (Mānasa) अवतार के प्रसङ्गों, उस युग के महर्षियों तथा भगवत्-मार्गदर्शन में ब्रह्माण्डीय धर्म के निरन्तर प्रवाह का निरूपण करता है।

अध्याय ८८ – चाक्षुषमन्वन्तरम् (Chākshushamanvantaram)

परम पुरुष चाक्षुष मनु के छठे मन्वन्तर का विवरण देते हैं। यह कथा वैकुण्ठ (Vaikuṇṭha) अवतार के प्राकट्य तथा अमृत एवं लक्ष्मी देवी के प्राकट्य हेतु हुए समुद्र-मन्थन (Samudra-manthana) के महान् प्रसङ्ग को उजागर करती है।

अध्याय ८९ – वैवस्वतमन्वन्तरम् (Vaivasvatamanvantaram)

भगवान् विष्णु सम्प्रति चल रहे वैवस्वत मनु के सातवें मन्वन्तर की व्याख्या करते हैं। दिव्य जगद्गुरु इस युग को पावन करने वाले महर्षियों, सूर्य एवं चन्द्र वंशों तथा मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, राम और कृष्ण अवतारों के अलौकिक वैभव का गान करते हैं।

अध्याय ९० – भविष्यत्मन्वन्तराणि (Bhavishyatmanvantarāṇi)

परम पुरुष सावर्णि मनु से लेकर इन्द्रसावर्णि मनु तक आने वाले भावी मन्वन्तरों का पूर्व-कथन करते हैं। यह अध्याय ब्रह्माण्ड में धर्म-रक्षा हेतु प्रकट होने वाले भावी मनुओं, महर्षियों तथा दिव्य अवतारों के विवरण निर्दिष्ट करता है।

अध्याय ९१ – सूर्यवंशअनुकीर्तनम् (Sūryavaṁshaanukīrtanam)

भगवान् विष्णु सूर्यदेव तथा वैवस्वत मनु से उद्भूत महान् सूर्यवंश के इतिहास का गान करते हैं। यह आख्यान सत्य और धर्म के साक्षात् स्वरूप इक्ष्वाकु (Ikshvāku), हरिश्चन्द्र (Harishchandra), सगर (Sagara), भगीरथ (Bhagīratha) तथा प्रभु श्रीरामचन्द्र जैसे तेजोमय रघुवंशी राजाओं का यशोगान करता है।

अध्याय ९२ – चन्द्रवंशअनुकीर्तनम् (Chandravaṁshaanukīrtanam)

दिव्य जगद्गुरु सोम (Soma), बुध (Budha) और पुरूरवा (Purūravā) से प्रवाहित चन्द्रवंश के इतिहास का वर्णन करते हैं। ययाति (Yayāti), यदु (Yadu), कुरु (Kuru) तथा धर्मपरायण पाण्डवों (Pāṇḍavas) की राजवंश परम्परा का वर्णन करते हुए यह अध्याय प्रभु श्रीकृष्ण के दिव्य अवतार-प्राकट्य के साथ अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है।

अध्याय ९३ – याज्ञवल्क्यधर्मशास्त्रसारः (Yāgñavalkyadharmashāstrasāraḥ)

भगवान् विष्णु महर्षि याज्ञवल्क्य (Maharshi Yāgñavalkya) के परम पावन नैतिक उपदेशों के सार का सङ्कलन करते हैं, और यह उद्घोषित करते हैं कि सद्गुण, दान-धर्म, आत्म-निग्रह, अहिंसा तथा वेदाध्ययन मानवीय श्रेष्ठता और सामाजिक समरसता की शाश्वत नींव हैं।

अध्याय ९४ – वर्णाश्रमधर्मः (Varṇāshramadharmaḥ)

परम पुरुष मानसिक गुणों और जीवन की अवस्थाओं के अनुसार मानव-विकास हेतु निर्मित वर्णाश्रम व्यवस्था की व्याख्या करते हैं। यह शास्त्र बल देता है कि अपने सहज धर्म का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।

अध्याय ९५ – ब्रह्मचर्यधर्मः (Brahmacharyadharmaḥ)

भगवान् विष्णु विद्यार्थी जीवन की अवस्था ब्रह्मचर्य धर्म के नियमों का विस्तार से उपदेश देते हुए गुरु-भक्ति, ब्रह्मचर्य-पालन, वेदाध्ययन तथा अनुशासित जीवन पर बल देते हैं। जैसा कि होता है, यह प्राथमिक अवस्था निर्मल चरित्र, मानसिक एकाग्रता और नैतिक बल का निर्माण करती है।

अध्याय ९६ – गृहस्थधर्मः (Gṛhasthadharmaḥ)

दिव्य जगद्गुरु समस्त आश्रमों का मुख्य आधार स्तम्भ कहे जाने वाले गृहस्थाश्रम (Gṛhasthāshrama) की महिमा का गान करते हैं। वे पञ्चमहायज्ञों (Panchamahāyagñas) का सम्पादन, दैनिक अतिथि-सत्कार तथा धर्मानुकूल उपार्जन को गृहस्थ का महान् कर्तव्य घोषित करते हैं।

अध्याय ९७ – विवाहविधिः (Vivāhavidhiḥ)

भगवान् विष्णु अष्टविध विवाह-पद्धतियों, अनुकूल जीवनसाथी के चयन तथा पवित्र परिणय-संस्कारों के सम्पादन से सम्बद्ध धर्म-नियमों को प्रकट करते हैं। यह शास्त्र स्पष्ट करता है कि विवाह दम्पति की परस्पर आध्यात्मिक उन्नति हेतु रचा गया एक पावन दिव्य बन्धन है।

अध्याय ९८ – आह्निककृत्यम् (Āhnikakṛtyam)

परम पुरुष उषाकाल में ब्राह्ममुहूर्त (Brāhmamuhūrta) में जागरण से लेकर रात्रि-विश्राम तक श्रेष्ठ साधक द्वारा पालनीय दैनिक आह्निक-क्रियाओं का वर्णन करते हैं। नित्य प्रार्थना, पवित्रता, ध्यान और ईमानदारी से किया गया कार्य मनुष्य को ब्रह्माण्डीय दिव्य शक्ति से जोड़ देता है।

अध्याय ९९ – भोजननियमः (Bhojananiyamaḥ)

भगवान् विष्णु भोजन के नियमों तथा आहार-ग्रहण की मर्यादाओं को निर्दिष्ट करते हैं। भोजन को सर्वप्रथम परमात्मा को निवेदित करना, शान्त वातावरण में कृतज्ञतापूर्वक ग्रहण करना तथा शुद्ध सात्त्विक आहार स्वीकार करना शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है और मानसिक पवित्रता को बढ़ावा देता है।

अध्याय १०० – सदाचारलक्षणम् (Sadāchāralakshaṇam)

दिव्य जगद्गुरु सत्य वाणी, विनय, सर्वभूत-दया, ईर्ष्या-रहितता तथा गुरुजनों के प्रति आदर जैसे श्रेष्ठ चरित्र एवं सदाचार के लक्षणों को सङ्कलित करते हैं। सदाचार का पालन करते हुए जीवन व्यतीत करना साधक की समस्त बुराइयों से रक्षा करता है।

अध्याय १०१ – वानप्रस्थधर्मः (Vānaprasthadharmaḥ)

भगवान् विष्णु (Bhagavān Vishṇu) वानप्रस्थ आश्रम (Vānaprasthāshrama) के नियमों को निरूपित करते हैं, जिसमें गृहस्थ अवस्था पूर्ण कर चुके साधक धीरे-धीरे सांसारिक मोहासक्तियों से निवृत्त होकर, एकान्त चिन्तन में प्रवृत्त होते हैं, कठोर तपस्या का आचरण करते हैं, और अपने मन को पूर्णतः आध्यात्मिक साक्षात्कार पर एकाग्र करते हैं। जैसा कि होता है, जीवन का यह पवित्र चरण सूक्ष्म शरीर को शुद्ध करता है और आत्मा को आत्यन्तिक संन्यास के लिए प्रस्तुत करता है।

अध्याय १०२ – संन्यासधर्मः (Sannyāsadharmaḥ)

दिव्य जगद्गुरु भगवान् विष्णु संन्यास आश्रम (Sannyāsa) का विस्तार से वर्णन करते हैं, जिसका लक्षण सांसारिक सम्पत्तियों से पूर्ण वैराग्य, समस्त जीवों के प्रति सार्वभौमिक सद्भाव, आत्मा (Ātman) का निरन्तर चिन्तन तथा भगवान् विष्णु के श्रीचरणों में पूर्ण आत्म-समर्पण है। जैसा कि होता है, जो परिव्राजक संन्यासी हरि का अनवरत स्मरण बनाए रखता है, वह पुनर्जन्म के बन्धनों को सर्वदा के लिए छिन्न-भिन्न कर देता है।

अध्याय १०३ – दानमाहात्म्यम् (Dānamāhātmyam)

भगवान् विष्णु निष्काम दान (Dāna) की महिमा का गान करते हुए घोषणा करते हैं कि फल की इच्छा के बिना, नम्रतापूर्वक तथा योग्य पात्रों को उचित समय पर दिया गया दान संचित पापों का क्षालन कर देता है। जैसा कि होता है, प्रभु नारायण (Prabhu Nārāyaṇa) की प्रसन्नता के लिए दी गई स्वार्थरहित भेंट इस लोक और परलोक दोनों में अनन्त आध्यात्मिक कृपा के रूप में पुनः प्राप्त होती है।

अध्याय १०४ – दानभेदः (Dānabhedaḥ)

परम पुरुष भूमि-दान, गो-दान, अन्न-दान, स्वर्ण-दान, जल-दान तथा विद्या-दान सहित विभिन्न प्रकार के दानों का वर्गीकरण करते हैं। जैसा कि होता है, समस्त दानों में विद्या-दान (Vidyā Dāna) और अन्न-दान (Anna Dāna) को मानव अज्ञान तथा शारीरिक दुःखों के निवारण हेतु सर्वश्रेष्ठ बताया गया है, जो वैकुण्ठ (Vaikuṇṭha) धाम में शाश्वत निवास प्रदान करते हैं।

अध्याय १०५ – पूर्तधर्ममाहात्म्यम् (Pūrtdharmamāhātmyam)

भगवान् विष्णु कूप-निर्माण, छायादार वृक्षारोपण, विश्रामगृह तथा चिकित्सालयों के निर्माण जैसे लोक-कल्याणकारी पूर्त धर्म (Pūrta Dharma) के कार्यों की प्रशंसा करते हैं। जैसा कि होता है, करुणा से भरे ये जनहित के कार्य अक्षय पुण्य उत्पन्न करते हैं जो मृत्यु के पश्चात् भी आत्मा के साथ जाते हैं और भगवत्-कृपा तथा सार्वभौमिक शान्ति दिलाते हैं।

अध्याय १०६ – शौचनियमः (Shauchaniyamaḥ)

दिव्य जगद्गुरु आन्तरिक और बाह्य पवित्रता अर्थात् शौच (Shaucha) के नियमों का विशद विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, शुद्ध जल तथा मृत्तिका से शारीरिक शोधन और सत्य, अहिंसा एवं ध्यान से प्राप्त मानसिक पवित्रता का सङ्गम साधक में पूर्ण व्यक्तिगत सामञ्जस्य बनाए रखता है तथा प्रभु नारायण की पावन उपस्थिति को आकर्षित करता है।

अध्याय १०७ – द्रव्यशुद्धिः (Dravyashuddhiḥ)

भगवान् विष्णु अशुद्धियों से दूषित गृहस्थी के सामान, धातुओं, वस्त्रों, अन्नों तथा स्थानों को शुद्ध करने की विधियों की व्याख्या करते हैं। जैसा कि होता है, जल, अग्नि, सूर्य-प्रकाश, वायु तथा पावन मन्त्रों के प्रयोग से दैनिक वस्तुओं की अनुष्ठानिक और भौतिक पवित्रता पुनर्स्थापित होती है, जिससे पावन पूजन के अनुकूल वातावरण निर्मित होता है।

अध्याय १०८ – नीतिशास्त्रबृहस्पतिचाणक्यसारः (Nītishāstrabrihaspatichāṇakyasāraḥ)

परम पुरुष महर्षि बृहस्पति (Brihaspati) तथा चाणक्य (Chāṇakya) द्वारा उपदिष्ट लौकिक नीति तथा राजनीतिक विवेक अर्थात् नीतिशास्त्र (Nīti Shāstra) के मूलभूत सिद्धान्तों को प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ सच्चे मित्रों की पहचान करने, दुष्टों की सङ्गति से बचने, संसाधनों का उचित प्रबन्धन करने तथा नैतिक दृढ़ता के साथ जटिल मानवीय परिस्थितियों का सामना करने के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।

अध्याय १०९ – मित्रतालक्षणम् (Mitratālakshaṇam)

भगवान् विष्णु सच्चे मित्र के लक्षणों का निरूपण करते हैं जो विपत्ति, बीमारी और सङ्कट के समय साधक के साथ अविचल भाव से खड़ा रहता है। जैसा कि होता है, यह प्रसङ्ग साधकों को निष्ठावान् तथा गुणवान् मित्रों का आदर करने और आत्यन्तिक विनाश का कारण बनने वाले कपटी चाटुकारों का त्याग करने की सलाह देता है।

अध्याय ११० – शत्रुलक्षणनीतिः (Shatrulakshaṇanītiḥ)

दिव्य जगद्गुरु गुप्त शत्रुओं को पहचानने, दूरदर्शिता के साथ विरोध का सामना करने और आत्म-रक्षा बनाए रखने की रणनीतियों का विस्तार से वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ प्रत्यक्ष शत्रुता की अपेक्षा कूटनीति, सतर्कता, आत्म-संयम और नैतिक श्रेष्ठता पर बल देता है, जिससे शान्ति और स्थिरता की रक्षा होती है।

अध्याय १११ – राजधर्मः (Rājadharmaḥ)

भगवान् विष्णु राजा के पावन कर्तव्यों का निरूपण करते हैं, जिसमें प्रजा की रक्षा, निष्पक्ष न्याय-प्रणाली, कानून व्यवस्था का पालन तथा विद्या के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। जैसा कि होता है, जो धर्मपरायण शासक धर्म की रक्षा करता है, वह सम्पूर्ण राष्ट्र के आध्यात्मिक पुण्य का भागी बनता है और भगवत्-कृपा प्राप्त करता है।

अध्याय ११२ – राजकोशगुप्तिः (Rājakoshaguptiḥ)

परम पुरुष सुदृढ़ आर्थिक शासन, राजकोश प्रबन्धन तथा न्यायसङ्गत कर-नीतियों का उपदेश देते हैं। जैसा कि होता है, राजा को सलाह दी जाती है कि वह प्रजा को पीड़ित किए बिना उसी प्रकार कोमलता से कर एकत्र करे जैसे भौंरा पुष्पों से मधु एकत्र करता है, जिससे सुदीर्घ समृद्धि सुनिश्चित होती है।

अध्याय ११३ – दूतलक्षणम् (Dūtalakshaṇam)

भगवान् विष्णु राजदूतों के लिए आवश्यक योग्यताओं का वर्णन करते हैं, जिनमें तीव्र बुद्धि, वाक्-पटुता, साहस, निष्ठा तथा मानव-मनोविज्ञान की गहरी समझ सम्मिलित है। जैसा कि होता है, एक कुशल दूत कूटनीति के माध्यम से विवादों को सुलझाता है और राज्य की युद्ध से रक्षा करता है।

अध्याय ११४ – दण्डनीतिः (Daṇḍanītiḥ)

दिव्य जगद्गुरु दण्ड (Daṇḍa) के सिद्धान्त की व्याख्या करते हैं, जो न्यायसङ्गत दण्ड व्यवस्था के रूप में व्यवस्था बनाए रखने और निर्बलों की अत्याचार से रक्षा करने का अनिवार्य साधन है। जैसा कि होता है, निष्पक्ष और न्यायोचित रूप से दिया गया दण्ड सामाजिक सन्तुलन की रक्षा करता है और धर्म के शासन को स्थापित रखता है।

अध्याय ११५ – सेवाधर्मः (Sevādharmaḥ)

भगवान् विष्णु सेवा-धर्म (Sevā) के नैतिक सिद्धान्तों का वर्णन करते हैं, और गुरुजनों, समाज तथा परमात्मा की सेवा करते समय निष्ठा, परिश्रम, ईमानदारी और विनम्रता पर प्रकाश डालते हैं। जैसा कि होता है, निष्काम भाव से की गई श्रेष्ठ सेवा अहङ्कार का शोधन करती है और साधक को आध्यात्मिक पूर्णता की ओर उन्नत करती है।

अध्याय ११६ – व्यवहारविधिः (Vyavahāravidhiḥ)

परम पुरुष न्यायिक प्रक्रिया अर्थात् व्यवहार (Vyavahāra) का निरूपण करते हैं, जिसमें न्यायालय की कार्यवाही, साक्ष्य के नियम, साक्षी की गवाही तथा न्यायाधीशों की योग्यताओं का विस्तृत विवरण दिया गया है। जैसा कि होता है, सत्य और शास्त्रों पर आधारित निष्पक्ष न्याय समाज को नैतिक पतन से बचाता है और प्रभु नारायण को प्रसन्न करता है।

अध्याय ११७ – ऋणादानप्रकरणम् (Ṛṇādānaprakaraṇam)

भगवान् विष्णु वित्तीय ऋणों, ब्याज-दरों, ऋण-वसूली तथा ऋण-चुकाऊ उत्तरदायित्वों से सम्बद्ध विधिक नियमों को रेखाङ्कित करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ ऋण लेने वालों की अत्यधिक ब्याज से तथा ऋण देने वालों की धोखाधड़ी से रक्षा करता है, और सत्यनिष्ठ आर्थिक नीतियों की स्थापना करता है।

अध्याय ११८ – निक्षेपप्रकरणम् (Nikshepaprakaraṇam)

दिव्य जगद्गुरु धरोहर (अमानत) के रूप में रखी गई वस्तुओं के सम्बन्ध में विधिक नियमों का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, धरोहर के रूप में रखी गई वस्तु का दुरुपयोग करना घोर नैतिक पाप घोषित किया गया है, जबकि धरोहर को सुरक्षित लौटाना सामाजिक विश्वास और व्यक्तिगत धर्म की रक्षा करता है।

अध्याय ११९ – अस्वामिविक्रयः (Asvāmisvikrayaḥ)

भगवान् विष्णु दूसरों के स्वामित्व वाली सम्पत्ति की अनधिकृत बिक्री से सम्बद्ध कानूनों का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ चोरी की गई अथवा अनधिकृत वस्तुओं को बेचने पर दण्ड निर्धारित करता है, जिससे सम्पत्ति के वैध स्वामित्व अधिकारों की रक्षा होती है और व्यापारिक धोखाधड़ी पर रोक लगती है।

अध्याय १२० – सम्भूयसमुत्थानम् (Sambhūyasamutthānam)

परम पुरुष सञ्चालित व्यापारिक उद्यमों तथा व्यावसायिक साझेदारी हेतु दिशा-निर्देश निर्धारित करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ निवेशित पूँजी और श्रम के अनुपात में लाभ और हानि के विभाजन को निर्दिष्ट करता है, जिससे न्यायसङ्गत सहकारी व्यापार और आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।

अध्याय १२१ – दत्तानुपाकर्म (Dattānupākarma)

भगवान् विष्णु दान अथवा वचनों को वापस लेने की विधिक वैधता का समाधान करते हैं। जैसा कि होता है, यह प्रसङ्ग यह स्पष्ट करता है कि दान कब कानूनी रूप से बाध्यकारी और अपरिवर्तनीय होता है, जिससे निष्कपट भाव से किए गए वैध दानों की रक्षा होती है और नैतिक प्रतिबद्धता लागू होती है।

अध्याय १२२ – वेतनादानम् (Vetanādānam)

दिव्य जगद्गुरु श्रम-नियमों, मजदूरी के गैर-भुगतान अथवा विलम्ब तथा नियोक्ताओं एवं श्रमिकों के बीच संविदात्मक कर्तव्यों का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, निष्पक्ष व्यवहार और समय पर मजदूरी का भुगतान अनिवार्य नैतिक कर्तव्यों के रूप में लागू किए जाते हैं, जो सामाजिक शान्ति बनाए रखते हैं।

अध्याय १२३ – संवित्व्यतिक्रमः (Samvitvyatikramaḥ)

भगवान् विष्णु समझौतों के उल्लङ्घन, व्यापारिक नियमों के अवहेलना अथवा नागरिक प्रतिज्ञाओं को तोड़ने के विधिक परिणामों को रेखाङ्कित करते हैं। जैसा कि होता है, गम्भीर प्रतिज्ञाओं का दृढतापूर्वक पालन करना व्यापारिक तथा सामाजिक जीवन में स्थिरता बनाए रखता है।

अध्याय १२४ – क्रयविक्रयानुशयः (Krayavikrayānushayaḥ)

परम पुरुष निर्धारित निरीक्षण अवधि के भीतर क्रय अथवा विक्रय समझौतों के रद्दकरण से सम्बद्ध नियमों का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, ये नियम उपभोक्ताओं और विक्रेताओं की सदोष वस्तुओं तथा कपटपूर्ण प्रस्तुतिकरण से रक्षा करते हैं।

अध्याय १२५ – स्वामिपालविवादः (Svāmipālavivādaḥ)

भगवान् विष्णु पशु-स्वामियों और चरवाहों के मध्य पशुओं की देखभाल, फसल के नुकसान तथा लापरवाही के दण्ड से सम्बद्ध विवादों के विधिक समाधान प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, ये दिशा-निर्देश कृषि-सम्बन्धी सामञ्जस्य बनाए रखते हैं और पशु-कल्याण की रक्षा करते हैं।

अध्याय १२६ – सीमाविवादः (Sīmāvivādaḥ)

दिव्य जगद्गुरु ऐतिहासिक चिह्नों, वरिष्ठों की गवाही तथा आधिकारिक सर्वेक्षणों के माध्यम से पड़ोसी भू-स्वामियों अथवा गाँवों के बीच भूमि-सीमा सम्बन्धी विवादों को सुलझाने के तन्त्र का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, स्पष्ट सीमा-निर्धारण सङ्घर्षों को रोकता है और शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देता है।

अध्याय १२७ – दण्डपारुष्यम् (Daṇḍapārushyam)

भगवान् विष्णु शारीरिक हमले, शारीरिक चोट तथा मारपीट की विधिक परिभाषाओं और दण्डों को रेखाङ्कित करते हैं। जैसा कि होता है, अपराध की गम्भीरता के अनुसार निर्धारित दण्ड हिंसा को रोकता है और समाज में शारीरिक सुरक्षा की रक्षा करता है।

अध्याय १२८ – वाक्पारुष्यम् (Vākpārushyam)

परम पुरुष मौखिक दुर्व्यवहार, मानहानि, निन्दा तथा अपमानजनक शब्दों के दण्ड निर्धारित करते हैं, जिससे दुर्भावनापूर्ण भाषा से व्यक्तिगत सम्मान और गरिमा की रक्षा हो सके। जैसा कि होता है, सम्मानजनक वाणी का पालन करना सार्वजनिक जीवन में नैतिक व्यवस्था को बनाए रखता है।

अध्याय १२९ – स्तेयप्रकरणम् (Steyaprakaraṇam)

भगवान् विष्णु चोरी, सेंधमारी तथा डकैती के प्रकारों का वर्गीकरण करते हैं, और तदनुसार विधिक हर्जाना, शारीरिक अथवा वित्तीय दण्ड निर्धारित करते हैं। जैसा कि होता है, चोरी के विरुद्ध कठोर निवारक उपाय निजी सम्पत्ति तथा सार्वजनिक विश्वास की रक्षा करते हैं।

अध्याय १३० – साहसप्रकरणम् (Sāhasaprakaraṇam)

दिव्य जगद्गुरु आगजनी, अपहरण, विष देने तथा सशस्त्र डकैती जैसे हिंसक अपराधों (Sāhasa) को परिभाषित करते हैं। जैसा कि होता है, शान्तिप्रिय नागरिकों की हिंसक अपराधियों से रक्षा करने और नागरिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कठोर और त्वरित दण्ड का विधान किया गया है।

अध्याय १३१ – स्त्रीसंग्रहणम् (Strīsaṁgrahaṇam)

भगवान् विष्णु वैवाहिक बेवफाई, व्यभिचार तथा स्त्रियों के उत्पीड़न से सम्बद्ध विधिक प्रावधानों और नैतिक चेतावनियों का विस्तार से वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, कठोर दण्ड पारिवारिक अखण्डता की रक्षा करते हैं और महिलाओं के प्रति गहरे आदर का भाव स्थापित करते हैं।

अध्याय १३२ – स्त्रीधर्मव्यवहारः (Strīdharmavyavahāraḥ)

परम पुरुष स्त्रीधन (Strīdhana), विधिक सुरक्षा तथा उत्तराधिकार के अधिकारों की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, स्त्रीधन को महिला का अनन्य स्वामित्व घोषित किया गया है, जो किसी भी स्वेच्छया जब्ती से मुक्त रहता है और उसकी वित्तीय सुरक्षा की गारंटी देता है।

अध्याय १३३ – दायभागप्रकरणम् (Dāyabhāgaprakaraṇam)

भगवान् विष्णु उत्तराधिकार, पैतृक सम्पत्ति के विभाजन तथा वारिसों के बीच उत्तराधिकार के नियमों को प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ पारिवारिक सम्पत्तियों के न्यायसङ्गत वितरण के लिए स्पष्ट नियम प्रदान करता है, जिससे पारिवारिक विवादों की रोकथाम होती है।

अध्याय १३४ – द्यूतसमाह्वयः (Dyūtasamāhvayaḥ)

दिव्य जगद्गुरु द्यूत (जुआ) तथा सट्टेबाज़ी के खेलों को नियन्त्रित करते हैं, और कड़े राजकीय निरीक्षण, कर-प्रणाली तथा धोखाधड़ी पर प्रतिबन्धों को निर्धारित करते हैं। जैसा कि होता है, यह नियमन व्यसन से होने वाली पारिवारिक बर्बादी को रोकता है और सार्वजनिक क्रीड़ाओं को नियन्त्रण में रखता है।

अध्याय १३५ – प्रायश्चित्तप्रकरणम् (Prāyaschittaprakaraṇam)

भगवान् विष्णु प्रायश्चित्त (Prāyaschitta) के आध्यात्मिक विज्ञान का निरूपण करते हैं, और यह व्याख्या करते हैं कि किस प्रकार सच्चा पश्चाताप, तपस्या, उपवास तथा दान पूर्वपापों के सूक्ष्म नकारात्मक भार को समाप्त कर देते हैं। जैसा कि होता है, प्रायश्चित्त नैतिक पवित्रता और आन्तरिक शान्ति को पुनर्स्थापित करता है।

अध्याय १३६ – महापातकनिरूपणम् (Mahāpātakaniroopaṇam)

परम पुरुष ब्राह्मण-द्रोह, स्वर्ण-स्तेय, मद्यपान तथा विश्वासघात जैसे महापातकों (Mahāpātakas) की गणना करते हैं। जैसा कि होता है, इन घोर कर्म-भारों के प्रक्षालन हेतु कठोर प्रायश्चित्तीय तपस्याओं का विस्तार से वर्णन किया गया है।

अध्याय १३७ – अनुपातकनिरूपणम् (Anupātakaniroopaṇam)

भगवान् विष्णु अनुपातकों (Anupātakas) अर्थात् उप-पापों और गौण दोषों की सूची प्रस्तुत करते हैं, और आध्यात्मिक प्रगति पर उनके सूक्ष्म कर्म-प्रभाव की व्याख्या करते हैं। जैसा कि होता है, निरन्तर नैतिक निखार सुनिश्चित करने हेतु आनुपातिक प्रायश्चित्त व्रतों का विधान किया गया है।

अध्याय १३८ – प्रायश्चित्तविधिः (Prāyaschittavidhiḥ)

दिव्य जगद्गुरु विभिन्न श्रेणियों के नैतिक उल्लङ्घनों के क्षालन हेतु आवश्यक विशिष्ट पावन अनुष्ठानों, मन्त्र-जप, तीर्थयात्राओं तथा दान-धर्म का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, इन अनुष्ठानों का श्रद्धापूर्वक पालन मन को ग्लानि से मुक्त करता है।

अध्याय १३९ – कृच्छ्रव्रतम् (Kṛchchhra Vratam)

भगवान् विष्णु कृच्छ्र व्रत (Kṛchchhra Vratas) नामक कठोर तपस्या-व्रतों का वर्णन करते हैं, जिनमें निश्चित अवधि के लिए नियन्त्रित उपवास तथा आहार-अनुशासन सम्मिलित हैं। जैसा कि होता है, ये तपस्याएँ पूर्व के नकारात्मक संस्कारों को भस्म करती हैं और आध्यात्मिक ओज को पुनर्स्थापित करती हैं।

अध्याय १४० – चान्द्रायणव्रतम् (Chāndrāyaṇavratam)

परम पुरुष चान्द्रायण (Chāndrāyaṇa) व्रत का विवरण देते हैं, जहाँ चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं के सामञ्जस्य में भोजन की मात्रा घटाई और बढ़ाई जाती है। जैसा कि होता है, यह चान्द्र-व्रत शरीर और मन को पूर्णतः शुद्ध करता है और गहरे संचित पापों को मिटा देता है।

अध्याय १४१ – अशौचनिर्णयविधिः (Āshauchanirṇayavidhiḥ)

भगवान् विष्णु परिवार में जन्म अथवा मृत्यु के पश्चात् अशौच (Āshaucha) अर्थात् अशौच-अवधि के निर्धारण की विधियों को रेखाङ्कित करते हैं। जैसा कि होता है, इन शुद्धि-नियमों का पालन ऊर्जात्मक पुनर्संरेखण और आध्यात्मिक सुरक्षा प्रदान करता है।

अध्याय १४२ – ज्योतिषशास्त्रसारः (Jyotishashāstrasāraḥ)

दिव्य जगद्गुरु वैदिक ज्योतिष (Jyotisha) के मूलभूत सिद्धान्तों को प्रस्तुत करते हैं, और यह व्याख्या करते हैं कि किस प्रकार बारह राशियाँ, सत्ताइस नक्षत्र तथा नौ ग्रह मानव जीवन को प्रभावित करते हैं। जैसा कि होता है, ब्रह्माण्डीय गतियों को समझना सार्वभौमिक लयबद्धता के साथ तालमेल बिठाने में सक्षम बनाता है।

अध्याय १४३ – ग्रहगोचरः (Grahagocharaḥ)

भगवान् विष्णु जन्मकालीन चन्द्र-राशि के आधार पर ग्रहों के गोचर (Gochara) और स्वास्थ्य, भाग्य तथा मानसिक स्थिति पर उनके विशिष्ट प्रभावों का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, ग्रहीय गतियों की जागरूकता साधकों को बुद्धिमत्तापूर्वक जीवन के उतार-चढ़ाव से पार पाने में सहायता करती है।

अध्याय १४४ – ग्रहशान्तिविधिः (Grahashāntividhiḥ)

परम पुरुष विशिष्ट मन्त्र-जप, यज्ञ (Yagña) तथा लक्षित दानों के माध्यम से प्रतिकूल ग्रहीय प्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिए ग्रह-शान्ति (Graha Shānti) उपायों का निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, इन उपायों का सम्पादन ब्रह्माण्डीय सन्तुलन और शान्ति को पुनर्स्थापित करता है।

अध्याय १४५ – मुहूर्तनिर्णयः (Muhūrtanirṇayaḥ)

भगवान् विष्णु विवाह, गृह-निर्माण, यात्रा तथा पावन अनुष्ठानों जैसे कार्यों के आरम्भ के लिए शुभ मुहूर्त (Muhūrta) का चयन करने के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं। जैसा कि होता है, शुभ मुहूर्तों में कार्य करने से सफलता और भगवत्-कृपा सुनिश्चित होती है।

अध्याय १४६ – आयुर्वेदधन्वन्तरिउपदेशः (Āyurvedadhanvantariupadeshaḥ)

दिव्य जगद्गुरु भगवान् विष्णु के दिव्य चिकित्सक अवतार धन्वन्तरि (Dhanvantari) के उपदेशों को प्रस्तुत करते हैं, जो आयुर्वेद (Āyurveda) का दीर्घायु और समग्र कल्याण के पावन विज्ञान के रूप में निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखना प्रभु नारायण की निर्विघ्न आध्यात्मिक सेवा को सम्भव बनाता है।

अध्याय १४७ – शरीररचना (Sharīrarachanā)

भगवान् विष्णु मानव शरीर की सूक्ष्म रचना का विवरण देते हैं, जिसमें सात धातुओं (Dhātus), चयापचय स्रोतों (Srotas), मर्म-स्थलों (Marmas) तथा सूक्ष्म ऊर्जा-मार्गों का वर्णन किया गया है। जैसा कि होता है, शारीरिक संरचना को समझना इस भौतिक शरीर रूपी यन्त्र का बुद्धिमत्तापूर्वक रखरखाव करने में सक्षम बनाता है।

अध्याय १४८ – दोषधातुमलविज्ञानम् (Doshadhātumalavigñānam)

परम पुरुष वात (Vāta), पित्त (Pitta) और कफ (Kapha) के त्रिदोष सिद्धान्त की व्याख्या करते हैं, और यह विस्तार से बताते हैं कि किस प्रकार दोषों, धातुओं तथा मलों के बीच सन्तुलन उत्तम स्वास्थ्य का निर्माण करता है। जैसा कि होता है, शारीरिक दोषों को समझना रोगों की रोकथाम करता है और दीर्घायु को बढ़ावा देता है।

अध्याय १४९ – ज्वरनिदानम् (Jvaranidānam)

भगवान् विष्णु ज्वर (Jvara) के कारणों, लक्षणों तथा वर्गीकरण का वर्णन करते हैं, और यह व्याख्या करते हैं कि किस प्रकार मानसिक तनाव, अनुचित आहार तथा ऋतु-परिवर्तन शरीर के दोषों को कुपित करते हैं। जैसा कि होता है, सटीक निदान पूर्ण उपचार की ओर प्रथम और महत्त्वपूर्ण चरण है।

अध्याय १५० – ज्वरचिकित्सा (Jvarachikitsā)

दिव्य जगद्गुरु ज्वर के समग्र उपचार की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं, जिसमें जड़ी-बूटियों के काढ़े, उपवास, चिकित्सीय आहार तथा खनिज औषधियों के विधान शामिल हैं। जैसा कि होता है, ये प्राकृतिक उपचार शरीर के तापमान को सामान्य करते हैं और जठराग्नि को प्रज्वलित करते हैं।

अध्याय १५१ – अतीसारनिदानचिकित्सा (Atīsāranidānachikitsā)

भगवान् विष्णु (Bhagavān Vishṇu) अतीसार (Atīsāra) अर्थात् पेचिश और तीव्र अतिसार के कारणों, नैदानिक लक्षणों तथा औषधीय उपचारों का निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु आंतों की सूजन को शांत करने, द्रव की हानि को रोकने और जठराग्नि को पुनर्स्थापित करने के लिए बिल्व (Bilva), कुटज (Kutaja) और अनार के छिलके का उपयोग करके कषाय काढ़े का विधान करते हैं।

अध्याय १५२ – ग्रहणीचिकित्सा (Grahaṇīchikitsā)

दिव्य जगद्गुरु ग्रहणी (Grahaṇī) अर्थात् संग्रहणी और पुरानी पाचन दुर्बलता की चिकित्सा का विस्तार से वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु अग्नि को प्रज्वलित करने और पोषक तत्वों के अवशोषण को पुनर्स्थापित करने के लिए छाछ के प्रयोग, पाचक चूर्ण और जीरा तथा अदरक जैसे मसालों की अनुशंसा करते हैं।

अध्याय १५३ – अर्शचिकित्सा (Arshachikitsā)

भगवान् विष्णु अर्श (Arsha) अर्थात् बवासीर के लिए व्यापक उपचार प्रदान करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ सूजन को कम करने, पीड़ा से राहत देने और आंतों के सहज कार्य को पुनर्स्थापित करने के लिए शामक लेपों, आहार सम्बन्धी परिवर्तनों और अभयारिष्ट (Abhayārishta) जैसी औषधियों का विवरण देता है।

अध्याय १५४ – अजीर्णचिकित्सा (Ajīrṇachikitsā)

परम पुरुष अजीर्ण (Ajīrṇa) अर्थात् अपच के विभिन्न रूपों के लिए प्रभावी उपचार प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु संचित विषैले पदार्थों (आम) को भस्म करने और पाचन अग्नि को पुनर्स्थापित करने के लिए अदरक, सेंधा नमक, गुनगुने जल और नियन्त्रित उपवास जैसे सरल किन्तु अचूक उपायों की व्याख्या करते हैं।

अध्याय १५५ – विसूचिकाचिकित्सा (Visūchikāchikitsā)

भगवान् विष्णु विसूचिका (Visūchikā) अर्थात् हैज़ा जैसी तीव्र आंत्रशोथ स्थितियों के लिए आपातकालीन उपचार का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु अकस्मात उल्टी, पेट के मरोड़ और निर्जलीकरण को रोकने के लिए पुनर्जलीकरण काढ़ों, गर्म सेक और शीतल औषधीय लेपों का विधान करते हैं।

अध्याय १५६ – कासश्वासचिकित्सा (Kāsashvāsachikitsā)

दिव्य जगद्गुरु कास (Kāsa) अर्थात् पुरानी खांसी और श्वास (Shvāsa) अर्थात् तीव्र श्वसन कष्ट के लिए जड़ी-बूटियों के योग प्रदान करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु श्वास नली को साफ करने, फेफड़ों को राहत देने और श्वास को सहज बनाने के लिए पिप्पली (Pippalī), तुलसी (Tulasī), वासा (Vāsā) और शहद का सुझाव देते हैं।

अध्याय १५७ – राजयक्ष्माचिकित्सा (Rājayakshmāchikitsā)

भगवान् विष्णु राजयक्ष्मा (Rājayakshmā) अर्थात् यक्ष्मा या टीबी के लिए उपचार निरूपित करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ क्षीण धातुओं के पुनर्निर्माण और शारीरिक ओज को पुनर्स्थापित करने के लिए पौष्टिक च्यवनप्राश (Chyawanprāsha), सिद्ध घृत और दुग्ध-आहार का विधान करता है।

अध्याय १५८ – हिक्काचिकित्सा (Hikkāchikitsā)

परम पुरुष हिक्का (Hikkā) अर्थात् निरन्तर आने वाली हिचकी के औषधीय उपचार का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु डायफ़्राम में कुपित वात को शांत करने और श्वसन ऐंठन को ठीक करने के लिए सुगन्धित धूम्रपान, औषधीय तेलों और चूर्ण योगों का विवरण देते हैं।

अध्याय १५९ – छर्दिचिकित्सा (Chhardichikitsā)

भगवान् विष्णु छर्दि (Chhardi) अर्थात् तीव्र जी मिचलाने और उल्टी को नियन्त्रित करने के लिए प्रभावी योगों का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु पेट को शांत करने के लिए शीतल काढ़ों, इलायची, अनार के रस और शांत मानसिक एकाग्रता का सुझाव देते हैं।

अध्याय १६० – तृष्णाचिकित्सा (Trishṇāchikitsā)

दिव्य जगद्गुरु तृष्णा (Trishṇā) अर्थात् असाध्य और अत्यधिक प्यास के उपचार प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु आन्तरिक पित्त की गर्मी को शांत करने और शरीर के द्रवों का सन्तुलन पुनर्स्थापित करने के लिए खस, चन्दन और धनिए के जल का विधान करते हैं।

अध्याय १६१ – मूर्च्छाचिकित्सा (Mūrchchhāchikitsā)

भगवान् विष्णु मूर्च्छा (Mūrchchhā) अर्थात् बेहोशी और चेतना के लोप हेतु आपातकालीन उपायों का निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, परम पुरुष चेतना को लौटाने और तन्त्रिका ऊर्जा को स्थिर करने के लिए तीक्ष्ण सुगन्धित नस्य, ठण्डे जल के छिड़काव और तन्त्रिका रसायन का विधान करते हैं।

अध्याय १६२ – रक्तपित्तचिकित्सा (Raktapittachikitsā)

परम पुरुष रक्तपित्त (Raktapitta) अर्थात् रक्तस्राव विकारों और आन्तरिक रक्तस्राव के उपचार का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु रक्तस्राव को रोकने और कुपित रक्त को शीतल करने के लिए शताब्दी (Shatāvarī), वासा (Vāsā) और आमलकी (Āmalakī) जैसी शीतल कषाय जड़ी-बूटियों का विधान करते हैं।

अध्याय १६३ – उन्मादचिकित्सा (Unmādachikitsā)

भगवान् विष्णु उन्माद (Unmāda) अर्थात् गम्भीर मानसिक विकारों के लिए समग्र चिकित्सा प्रदान करते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु विक्षिप्त मानसिक मार्गों को शांत करने और भावनात्मक सन्तुलन बहाल करने के लिए ब्राह्मी (Brāhmī), शङ्खपुष्पी (Shankhapushpī), सिद्ध घृत और शांत आध्यात्मिक वातावरण का विधान करते हैं।

अध्याय १६४ – अपस्मारचिकित्सा (Apasmārachikitsā)

दिव्य जगद्गुरु अपस्मार (Apasmāra) अर्थात् मिर्गी और तन्त्रिका सम्बन्धी विकारों के लिए जड़ी-बूटियों के योग निरूपित करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु सूक्ष्म तन्त्रिका नाड़ियों को स्वच्छ करने और मस्तिष्क के कार्य की रक्षा हेतु वचा (Vachā), ब्राह्मी घृत (Brāhmī ghṛta) और विशिष्ट नस्य का विधान करते हैं।

अध्याय १६५ – वातव्याधिचिकित्सा (Vātavyādhichikitsā)

भगवान् विष्णु पक्षाघात, गृध्रसी (साइटिका) और जोड़ों की जकड़न सहित वातव्याधियों (Vātavyādhi) की व्यापक चिकित्सा का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ पीड़ा से राहत देने और शारीरिक गतिशीलता को पुनर्स्थापित करने के लिए गर्म औषधीय तेल की मालिश, निर्गुण्डी (Nirguṇḍī), दशमूल काढ़ा (Dashamūla) और बाष्प स्नान को निर्दिष्ट करता है।

अध्याय १६६ – वातरक्तचिकित्सा (Vātaraktachikitsā)

परम पुरुष वातरक्त (Vātarakta) अर्थात् गठिया और जोड़ों की सूजन के उपचार प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु सूजे हुए जोड़ों को शांत करने और हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने के लिए गिलोय (Guḍūchī), गुग्गुलु (Guggulu) और रक्त-शोधक जड़ी-बूटियों के योग का विधान करते हैं।

अध्याय १६७ – गण्डमालाचिकित्सा (Gaṇḍamālāchikitsā)

भगवान् विष्णु गण्डमाला (Gaṇḍamālā) अर्थात् ग्रन्थियों की सूजन और लसिका ग्रन्थि वृद्धि के उपचार निरूपित करते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु ग्रन्थियों की रुकावटों को दूर करने और लसिका तन्त्र को शुद्ध करने के लिए काञ्चनार गुग्गुलु (Kānchanāra Guggulu) और लेपों की अनुशंसा करते हैं।

अध्याय १६८ – प्रमेहचिकित्सा (Pramehachikitsā)

दिव्य जगद्गुरु प्रमेह (Prameha) अर्थात् चयापचय विकारों और मधुमेह के लिए औषधीय उपचारों का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु रक्त शर्करा को नियन्त्रित करने, चयापचय को सन्तुलित करने और महत्त्वपूर्ण अङ्गों की रक्षा के लिए हरिद्रा (Haridrā), आमलकी (Āmalakī), शिलाजतु (Shilājīt) और तिक्त काढ़ों का विधान करते हैं।

अध्याय १६९ – कुष्ठचिकित्सा (Kushtachikitsā)

भगवान् विष्णु कुष्ठ (Kushta) अर्थात् चर्म रोगों और गम्भीर त्वचा विकारों के व्यापक उपचार का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ आन्तरिक अशुद्धियों को साफ करने और स्वस्थ त्वचा को पुनर्स्थापित करने के लिए नीम, खदिर, तुवरक तेल और रक्त-शोधन चिकित्सा का विवरण देता है।

अध्याय १७० – श्वित्रचिकित्सा (Shvitrachikitsā)

परम पुरुष श्वित्र (Shvitra) अर्थात् सफ़ेद दाग के लिए प्रभावी योग प्रदान करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु त्वचा के प्राकृतिक रङ्ग को पुनर्स्थापित करने के लिए बाकुची (Bākuchī) के बीज, नियन्त्रित धूप चिकित्सा और यकृत को उत्तेजित करने वाली जड़ी-बूटियों का विधान करते हैं।

अध्याय १७१ – विसर्पचिकित्सा (Visarpachikitsā)

भगवान् विष्णु विसर्प (Visarpa) अर्थात् त्वचा के दाद और फैलने वाले घावों के उपचार का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु तीव्र जलन को शांत करने और त्वचा के घावों को भरने के लिए शीतल कमल-लेप, चन्दन और रक्त-शोधक काढ़ों का उपयोग करते हैं।

अध्याय १७२ – शिराक्षिमुखरोगचिकित्सा (Shirākshiprotective)

दिव्य जगद्गुरु सिर, आँखों और मुख को प्रभावित करने वाले रोगों के उपचार निरूपित करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु ज्ञानेन्द्रियों की रक्षा करने और तीव्र दृष्टि बनाए रखने के लिए त्रिफला (Triphalā) से नेत्र प्रक्षालन, सिद्ध नस्य और कवल (गरारे) निर्दिष्ट करते हैं।

अध्याय १७३ – शूलचिकित्सा (Shūlachikitsā)

भगवान् विष्णु शूल (Shūla) अर्थात् पेट के तीव्र दर्द और मरोड़ के उपचार का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, परम पुरुष आंतों की ऐंठन से राहत देने और पाचन-प्रवाह को पुनर्स्थापित करने के लिए हिंग्वाष्टक चूर्ण (Hingvāshtaka churna), जीरा और गर्म सेक का विधान करते हैं।

अध्याय १७४ – गुल्मचिकित्सा (Gulmachikitsā)

परम पुरुष गुल्म (Gulma) अर्थात् पेट की गाँठों और ट्यूमर के उपचार प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु आन्तरिक गांठों को गलाने और उदर स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने के लिए क्षार योगों, अरंडी के तेल और वात-शामक जड़ी-बूटियों का उपयोग करते हैं।

अध्याय १७५ – उदररोगचिकित्सा (Udararogachikitsā)

भगवान् विष्णु उदररोग (Udararoga) अर्थात् जलोदर और यकृत-प्लीहा वृद्धि की चिकित्सा का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु संचित द्रव को बाहर निकालने और यकृत के कार्य को पुनर्स्थापित करने के लिए केवल छाछ के सेवन, पुनर्नवा (Punarnavā) और मृदु विरेचन का विधान करते हैं।

अध्याय १७६ – पाण्डुरोगचिकित्सा (Pāṇḍurogachikitsā)

दिव्य जगद्गुरु पाण्डुरोग (Pāṇḍu) अर्थात् रक्ताल्पता (एनीमिया) और पीलिया के लिए योग प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण और यकृत की शक्ति बढ़ाने के लिए लौह भस्म (Lauha Bhasma), पुनर्नवा और आमलकी की अनुशंसा करते हैं।

अध्याय १७७ – सर्वरोगसामान्यचिकित्सा (Sarvarogasāmānyachikitsā)

भगवान् विष्णु रोगों के निवारण और उपचार के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य सिद्धान्तों का सार प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, परम पुरुष बल देते हैं कि सन्तुलित सात्त्विक आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त विश्राम और मानसिक शान्ति ही समग्र स्वास्थ्य और दीर्घायु को बनाए रखती है।

अध्याय १७८ – रसायनविधि (Rasāyanavidhi)

परम पुरुष रसायन (Rasāyana) कायाकल्प चिकित्सा का विस्तार से वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, वे बताते हैं कि किस प्रकार हरीतकी (Harītakī), आमलकी (Āmalakī) और शिलाजतु (Shilājīt) जैसी पवित्र जड़ी-बूटियाँ बुढ़ापे को रोकती हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती हैं, बुद्धि को तीव्र करती हैं और प्रभु नारायण की नित्य सेवा हेतु ओज को बनाए रखती हैं।

अध्याय १७९ – वाजीकरणविधि (Vājīkaraṇavidhi)

भगवान् विष्णु जनन क्षमता और उत्तम सन्तान प्राप्ति हेतु वाजीकरण (Vājīkaraṇa) चिकित्सा प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ बल और ओज की वृद्धि के लिए अश्वगन्धा (Ashvagandhā), कपिकच्छू (Kapikachchhu), शताब्दी और सिद्ध दुग्ध का विवरण देता है।

अध्याय १८० – कौमारभृत्य (Kaumārabhritya)

दिव्य जगद्गुरु बाल-चिकित्सा और शिशु स्वास्थ्य देखरेख अर्थात् कौमारभृत्य (Kaumārabhritya) का निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु शिशुओं के पोषण, विकास की निगरानी, प्राकृतिक प्रतिरक्षण और सौम्य बाल-औषधियों का विवरण देते हैं ताकि बालक स्वस्थ और बलवान् बनें।

अध्याय १८१ – सूतिकारोगचिकित्सा (Sūtikārogachikitsā)

भगवान् विष्णु प्रसूता स्त्रियों की देखरेख अर्थात् सूतिका (Sūtikā) नियम और रोगों का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ माता की शक्ति पुनर्स्थापित करने और माता व शिशु दोनों की रक्षा हेतु पौष्टिक काढ़ों, उदर बन्धन, मालिश और दुग्धवर्धक जड़ी-बूटियों का विधान करता है।

अध्याय १८२ – बालरोगचिकित्सा (Bālarogachikitsā)

परम पुरुष दाँत निकलते समय के बुखार, पेट के मरोड़ और खांसी जैसे बाल-रोगों के लिए सौम्य उपचार प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु अतिविषा (Ativishā), पिप्पली और शहद जैसी सौम्य औषधियों का विधान करते हैं।

अध्याय १८३ – औषधिगुणविज्ञान (Oshadhiguṇavigñāna)

भगवान् विष्णु औषधीय वनस्पतियों का क्रमबद्ध वर्गीकरण करते हैं, और पवित्र जड़ी-बूटियों के रस, वीर्य, विपाक और विशिष्ट सुधारात्मक गुणों का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, यह ज्ञान औषधियों का सटीक प्रयोग सम्भव बनाता है।

अध्याय १८४ – द्रव्यगुणशास्त्र (Dravyaguṇashāstra)

दिव्य जगद्गुरु अन्न, दालों, दुग्ध उत्पादों, तेलों और खनिजों सहित प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के गुणों का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, आहार के गुणों को समझना साधकों को ऐसे बुद्धिमत्तापूर्ण आहार चयन में मार्गदर्शन करता है जो शारीरिक सामञ्जस्य बनाए रखता है।

अध्याय १८५ – विषचिकित्सा (Vishachikitsā)

भगवान् विष्णु विष-विज्ञान अर्थात् विषचिकित्सा (Vishachikitsā) प्रस्तुत करते हैं, जिसमें सर्वविषह्र औषधियों, आमाशय शोधन और आन्तरिक विषों को निष्प्रभावी करने वाले योगों का निरूपण किया गया है। जैसा कि होता है, इन उपायों का त्वरित प्रयोग आकस्मिक विषपान से जीवन की रक्षा करता है।

अध्याय १८६ – सर्पविषचिकित्सा (Sarpavishachikitsā)

परम पुरुष विषैले सर्पदंश के लिए विशिष्ट उपचार प्रदान करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु विष को बाहर निकालने और जीवन की रक्षा के लिए आपातकालीन बन्धन, पवित्र मन्त्र-जप और नागदन्ती (Nāgadantī) जैसी विषघ्न औषधियों का विधान करते हैं।

अध्याय १८७ – वृश्चिकविषचिकित्सा (Vrischikavishachikitsā)

भगवान् विष्णु बिच्छू के डङ्क और विषैले कीटों के काटने के उपचार का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ विष को निष्प्रभावी करने और पीड़ा को शांत करने के लिए जड़ी-बूटियों के लेप, नमक के सेंक और स्थानीय वेदना-शामक लेपों को निर्दिष्ट करता है।

अध्याय १८८ – अलार्कविषचिकित्सा (Alārkavishachikitsā)

दिव्य जगद्गुरु पागल पशुओं के काटने अर्थात् अलार्क विष (Alārka Visha) के उपचार प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु रेबीज के सङ्क्रमण को रोकने के लिए घाव के दाहे जाने, धतूरा आधारित विषघ्न औषधियों और रक्त-शोधक जड़ी-बूटियों को निर्दिष्ट करते हैं।

अध्याय १८९ – हस्त्यायुर्वेद (Hastiāyurveda)

भगवान् विष्णु राजकीय हाथियों की चिकित्सा अर्थात् हस्त्यायुर्वेद (Hasti Āyurveda) का निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ हाथियों के बुखार, पैरों के सङ्क्रमण और पाचन समस्याओं के लिए आवास, आहार, सरसों के तेल की मालिश और जड़ी-बूटी उपचार का विवरण देता है।

अध्याय १९० – अश्वायुर्वेद (Ashvaāyurveda)

परम पुरुष अश्वों की देखरेख हेतु अश्वायुर्वेद (Ashva Āyurveda) का निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु घोड़ों के स्वास्थ्य और बल को बनाए रखने के लिए उचित घुड़साल, व्यायाम, भोजन सारणी और ऋतुचर्या सम्बन्धी देखरेख पर बल देते हैं।

अध्याय १९१ – अश्वलक्षण (Ashvalakshaṇa)

भगवान् विष्णु उत्तम घोड़ों के शुभ शारीरिक लक्षण, भँवरियों, रङ्ग के पैटर्न और स्वभाव का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, इन लक्षणों की पहचान राजसी और सैन्य सेवाओं के लिए योग्य अश्वों का चयन सुनिश्चित करती है।

अध्याय १९२ – अश्वचिकित्सा (Ashvachikitsā)

दिव्य जगद्गुरु घोड़ों के खुरों के सड़ने, श्वास कष्ट, पेट के मरोड़ और जोड़ों की सूजन जैसी बीमारियों के लिए प्रभावी उपचार प्रदान करते हैं। जैसा कि होता है, ये पशु चिकित्सा उपाय घोड़ों की गतिशीलता और स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करते हैं।

अध्याय १९३ – गवायुर्वेद (Gavāyurveda)

भगवान् विष्णु पूज्य गायों और पशुओं की देखरेख हेतु गवायुर्वेद (Gavāyurveda) का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ खुरपका-मुँहपका रोगों, थन के सङ्क्रमणों और पाचन विकारों के प्राकृतिक उपचार का विधान करता है।

अध्याय १९४ – रत्नपरीक्षावज्र (Ratnaparīkshāvajra)

परम पुरुष हीरा (Vajra) परीक्षण से आरम्भ करते हुए रत्नपरीक्षा (Ratnaparīkshā) का परिचय देते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु असली हीरों की स्पष्टता, कट, रङ्ग, निर्दोषता और सूक्ष्म ऊर्जात्मक क्षमता के परीक्षण की विधियों का विवरण देते हैं।

अध्याय १९५ – रत्नपरीक्षामुक्ता (Ratnaparīkshāmuktā)

भगवान् विष्णु प्राकृतिक मोती (Muktā) के परीक्षण का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ सीपियों से मोतियों की उत्पत्ति, उनकी चमक, गोलपन, भार के परीक्षण और निर्दोष मोती धारण करने के स्वास्थ्य लाभों का विवरण देता है।

अध्याय १९६ – रत्नपरीक्षापद्मराग (Ratnaparīkshāpadmarāga)

दिव्य जगद्गुरु माणिक्य या पद्मराग (Padmarāga) के परीक्षण का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु कबूतर के रक्त जैसे लाल रङ्ग, पारदर्शिता, भार और धारण करने वाले पर निर्दोष माणिक्य के सकारात्मक सौर-ऊर्जात्मक प्रभाव का मूल्यांकन करते हैं।

अध्याय १९७ – रत्नपरीक्षामरकत (Ratnaparīkshāmarakata)

भगवान् विष्णु पन्ना (Marakata) के परीक्षण का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, परम पुरुष इसके गहरे हरे रङ्ग, चमक, आन्तरिक दरारों के अभाव और निर्दोष पन्ना धारण करने के शुभ बुध-ग्रहीय लाभों का विवरण देते हैं।

अध्याय १९८ – रत्नपरीक्षाइन्द्रनील (Ratnaparīkshāindranīla)

परम पुरुष नीलम (Indranīla) के परीक्षण का निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु इसके गहरे मखमली नीले रङ्ग, ऊर्जात्मक अनुकूलता के परीक्षण और असली नीलम के शनि-रक्षक गुणों का विवरण देते हैं।

अध्याय १९९ – रत्नपरीक्षावैडूर्य (Ratnaparīkshāvaidūrya)

भगवान् विष्णु लहसुनिया (Vaidūrya) के परीक्षण का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु निर्दोष लहसुनिया की विशिष्ट चमक, कान्ति, भार और केतु ग्रह के दुष्प्रभावों को शांत करने के गुणों का मूल्यांकन करते हैं।

अध्याय २०० – रत्नपरीक्षापुष्पराग (Ratnaparīkshāpushparāga)

दिव्य जगद्गुरु पुखराज (Pushparāga) के परीक्षण का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु इसकी स्वर्णिम पीली आभा, स्पष्टता, भार और इसे धारण करने वाले को प्राप्त होने वाले बृहस्पति ग्रह के ज्ञान और आशीर्वाद का परीक्षण करते हैं।

अध्याय २०१ – रत्नपरीक्षाकर्केतन (Ratnaparīkshākarketana)

भगवान् विष्णु कर्केतन (Karketana) मणियों के परीक्षण और उनके सूक्ष्म ऊर्जात्मक गुणों का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु उनके विशिष्ट रङ्गों, शारीरिक कान्ति और रक्षात्मक स्पन्दनों का विवरण देते हैं जो धारण करने वाले की प्रतिकूल ग्रहीय प्रभावों और सूक्ष्म पीड़ाओं से रक्षा करते हैं।

अध्याय २०२ – रत्नपरीक्षापुलक (Ratnaparīkshāpulaka)

परम पुरुष पुलक (Pulaka) पत्थरों के मूल्यांकन का निरूपण करते हैं, उनके सूक्ष्म रङ्ग-भेदों, शारीरिक कठोरता और ऊर्जात्मक लाभों का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु व्याख्या करते हैं कि किस प्रकार असली पुलक मणि ओज की वृद्धि करती है और निष्ठावान् साधकों को शारीरिक सुरक्षा प्रदान करती है।

अध्याय २०३ – रत्नपरीक्षारुधिर (Ratnaparīkshārudhira)

भगवान् विष्णु रक्त-वर्ण मणियों, रुधिर (Rudhira) का परीक्षण करते हैं, उनकी अग्नि-सम कान्ति और सूक्ष्म ऊर्जात्मक गुणों का मूल्यांकन करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ विवरण देता है कि किस प्रकार निर्दोष रुधिर मणियों को धारण करने से शारीरिक साहस बढ़ता है, परिसञ्चरण सम्बन्धी रुकावटें दूर होती हैं और प्राण-ऊर्जा में वृद्धि होती है।

अध्याय २०४ – रत्नपरीक्षास्फटिकविद्रुम (Ratnaparīkshāsphaṭikavidruma)

दिव्य जगद्गुरु स्फटिक (Sphaṭika) और लाल मूंगा अर्थात् विद्रुम (Vidruma) के मूल्यांकन का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु समझाते हैं कि किस प्रकार शुद्ध स्फटिक मन को शीतल करता है और ध्यान को गहरा करता है, जबकि निर्दोष मूंगा धारण करने वाले को शारीरिक शक्ति और मङ्गल-ग्रह की ऊर्जात्मक समरसता प्रदान करता है।

अध्याय २०५ – व्याकरणकुमारकात्यायनसंवाद (Vyākaraṇakumārakātyāyanasaṁvāda)

भगवान् विष्णु कुमार कार्तिकेय (Kumāra Kārtikeya) और महर्षि कात्यायन (Sage Kātyāyana) के बीच संस्कृत व्याकरण (Vyākaraṇa) पर हुए पावन संवाद का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, यह संवाद व्याकरण को पावन वैदिक मन्त्रों को समझने और शास्त्रीय सत्य की सटीक व्याख्या करने की मौलिक कुंजी के रूप में स्थापित करता है।

अध्याय २०६ – सन्धिप्रकरणम् (Sandhiprakaraṇam)

परम पुरुष संस्कृत व्याकरण में स्वरों, व्यञ्जनों और विसर्ग के मधुर मेल को नियन्त्रित करने वाले सन्धि-नियमों की व्याख्या करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु यह प्रदर्शित करते हैं कि किस प्रकार सटीक सन्धि-प्रयोग वैदिक मन्त्रों की ध्वन्यात्मक पवित्रता और दिव्य स्पन्दन की रक्षा करता है।

अध्याय २०७ – नामप्रकरणम् (Nāmaprakaraṇam)

भगवान् विष्णु संस्कृत व्याकरण में पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग में नाम (संज्ञा) रूपों अर्थात् सुबन्त (Subanta) की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ सटीक शास्त्रीय व्याख्या और दिव्य स्तोत्रों के उचित पाठ हेतु संरचनात्मक नींव रखता है।

अध्याय २०८ – स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् (Strīpratyayaprakaraṇam)

दिव्य जगद्गुरु स्त्री-प्रत्यय (Strīpratyaya) नियमों की व्याख्या करते हैं, और यह दर्शाते हैं कि किस प्रकार पुल्लिंग प्रातिपदिक शब्द स्त्रीलिंग व्याकरणिक रूपों में रूपान्तरित होते हैं। जैसा कि होता है, इन व्याकरणिक व्युत्पत्तियों को समझना पावन श्लोकों के सटीक बोध को सुनिश्चित करता है।

अध्याय २०९ – कारकप्रकरणम् (Kārakaprakaraṇam)

भगवान् विष्णु कारक (Kāraka) सम्बन्धों का विवरण देते हैं, और संस्कृत वाक्य-रचना में संज्ञाओं और क्रियाओं के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध की व्याख्या करते हैं। जैसा कि होता है, कारक नियमों में निपुणता प्राप्त करना साधकों को शास्त्रीय वाक्यों में निहित गूढ़ आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने में सक्षम बनाता है।

अध्याय २१० – समासप्रकरणम् (Samāsaprakaraṇam)

परम पुरुष अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि और द्वन्द्व समासों सहित समास (Samāsa) रचनाओं का निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, समास-व्युत्पत्ति को समझना जटिल दार्शनिक श्लोकों का सटीक पाठ्य-विश्लेषण करने की अनुमति देता है।

अध्याय २११ – तद्धितप्रकरणम् (Taddhitaprakaraṇam)

भगवान् विष्णु तद्धित (Taddhita) प्रत्ययों की व्याख्या करते हैं, और यह दर्शाते हैं कि भाववाचक संज्ञाएँ, गोत्रवाचक शब्द और सम्बन्धवाचक पद किस प्रकार व्युत्पन्न होते हैं। जैसा कि होता है, ये व्याकरणिक नियम दिव्य व्यक्तित्वों के सूक्ष्म वंशक्रम और वर्णनात्मक नामों को प्रकट करते हैं।

अध्याय २१२ – आख्यातप्रकरणम् (Ākhyātaprakaraṇam)

दिव्य जगद्गुरु संस्कृत में विभिन्न कालों, पुरुषों और लकारों में क्रिया पदों अर्थात् आख्यात (Ākhyāta) का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु उन क्रियात्मक संरचनाओं को स्पष्ट करते हैं जो अतीत, वर्तमान और भविष्य के युगों में दिव्य लीलाओं और ब्रह्माण्डीय गतिविधियों का वर्णन करती हैं।

अध्याय २१३ – धातुप्रकरणम् (Dhātuprakaraṇam)

भगवान् विष्णु मूल क्रियाओं अर्थात् धातु (Dhātu) को दस गणों (Gaṇas) में वर्गीकृत करते हैं, और यह व्याख्या करते हैं कि मूल धातुएँ किस प्रकार अर्थ उत्पन्न करती हैं। जैसा कि होता है, धातुओं के उद्भव को समझना दिव्य नामों और मन्त्रों के प्राथमिक ध्वनि-मूलों को प्रकट करता है।

अध्याय २१४ – कृदन्तप्रकरणम् (Kṛdantaprakaraṇam)

परम पुरुष कृदन्त (Kṛdanta) प्रत्ययों की व्याख्या करते हैं, और यह प्रदर्शित करते हैं कि मूल धातुएँ किस प्रकार कृदन्त रूपों में परिवर्तित होती हैं। जैसा कि होता है, ये व्युत्पत्तियाँ संस्कृत काव्य की अभिव्यक्त्यात्मक सुन्दरता और दार्शनिक गम्भीरता का विस्तार करती हैं।

अध्याय २१५ – छन्दःशास्त्रम् (Chhandasshāstram)

भगवान् विष्णु छन्दः शास्त्र (Chhandas Shāstra) का परिचय देते हैं, और गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप् तथा जगती जैसे पावन काव्य-छन्दों का विस्तार से वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, छन्दोबद्ध अनुशासन वैदिक मन्त्रों के सटीक संगीतात्मक प्रवाह और आध्यात्मिक सामर्थ्य की रक्षा करता है।

अध्याय २१६ – वृत्तलक्षणम् (Vṛttalakshaṇam)

दिव्य जगद्गुरु विशिष्ट छन्दोबद्ध संरचनाओं अर्थात् वृत्त (Vṛtta) को परिभाषित करते हैं, और मात्राओं, यति (विराम) तथा काव्यात्मक लयों की व्याख्या करते हैं। जैसा कि होता है, उचित छन्दोबद्ध लय का पालन करना शास्त्रीय पाठ के दौरान दिव्य सामञ्जस्य का आह्वान करता है।

अध्याय २१७ – काव्यलक्षणम् (Kāvyalakshaṇam)

भगवान् विष्णु शास्त्रीय काव्य-शास्त्र (Kāvya Shāstra) को प्रस्तुत करते हैं, साहित्यिक सौंदर्य, भावनात्मक रसों, संरचनात्मक अलङ्कारों और उदात्त विषयों को परिभाषित करते हैं। जैसा कि होता है, साहित्यिक कला दिव्य प्रेम और भक्ति को व्यक्त करने का एक पवित्र माध्यम बन जाती है।

अध्याय २१८ – अलङ्कारशास्त्रम् (Alaṁkārashāstram)

परम पुरुष अलङ्कार शास्त्र (Alaṁkāra Shāstra) का परिचय देते हैं, और यह व्याख्या करते हैं कि काव्यात्मक अलङ्कार किस प्रकार पावन साहित्यों की भावनात्मक गूँज को बढ़ाते हैं। जैसा कि होता है, कलात्मक अलङ्कार प्रभु नारायण की स्तुति को सुशोभित करते हैं।

अध्याय २१९ – शब्दालङ्कारः (Śabdaalaṁkāraḥ)

भगवान् विष्णु अनुप्रास और यमक सहित शब्दालङ्कार (Śabda-Alaṁkāra) का विवरण देते हैं। जैसा कि होता है, ध्वन्यात्मक अलङ्कार मन को लुभाते हैं और शास्त्रीय पाठ के दौरान भक्तिभाव को गहरा करते हैं।

अध्याय २२० – अर्थालङ्कारः (Arthaalaṁkāraḥ)

दिव्य जगद्गुरु उपमा, रूपक और दृष्टान्त जैसे अर्थालङ्कार (Artha-Alaṁkāra) का निरूपण करते हैं। जैसा कि होता है, ये काव्यात्मक रूपक जीवन्त भौतिक बिम्बों के माध्यम से सूक्ष्म आध्यात्मिक सत्यों को आलोकित करते हैं।

अध्याय २२१ – नाट्यशास्त्रसारः (Nāṭyashāstrasāraḥ)

भगवान् विष्णु पावन नाट्य-शास्त्र (Nāṭya Shāstra) का सार प्रस्तुत करते हैं, और यह व्याख्या करते हैं कि पावन नाटक और नृत्य किस प्रकार दिव्य लीलाओं को अभिव्यक्त करते हैं। जैसा कि होता है, नाट्य प्रस्तुति दर्शकों और कलाकारों दोनों में अलौकिक भक्ति-रस जाग्रत करती है।

अध्याय २२२ – साङ्ख्यदर्शनसारः (Sāṁkhyadarshanasāraḥ)

परम पुरुष साङ्ख्य दर्शन (Sāṁkhya) का सार प्रस्तुत करते हैं, चौबीस ब्रह्माण्डीय तत्त्वों (Tattvas) की गणना करते हैं और अविनाशी पुरुष को भौतिक प्रकृति से पृथक् निरूपित करते हैं। जैसा कि होता है, नश्वर प्रकृति से अमर आत्मा का विवेक सांसारिक मोहासक्ति को तोड़ता है।

अध्याय २२३ – योगशास्त्रोपदेशः (Yogashāstraupadeshaḥ)

भगवान् विष्णु विचार-तरङ्गों को शांत करने और अन्तरात्मा का साक्षात्कार करने की व्यावहारिक साधना के रूप में योग शास्त्र (Yoga Shāstra) का परिचय देते हैं। जैसा कि होता है, मानसिक वृत्तियों का निरोध हृदय के भीतर आत्मा के शान्त प्रकाश को प्रकट करता है।

अध्याय २२४ – अष्टाङ्गयोगः (Ashṭāṅgayogaḥ)

दिव्य जगद्गुरु योग के अष्टाङ्ग मार्ग का विवरण देते हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। जैसा कि होता है, क्रमबद्ध योग-अभ्यास शारीरिक नाड़ियों को शुद्ध करता है और दिव्य तन्मयता हेतु मन को निश्चल करता है।

अध्याय २२५ – प्राणायामविधिः (Prāṇāyāmavidhiḥ)

भगवान् विष्णु श्वास-नियन्त्रण तकनीकों अर्थात् प्राणायाम (Prāṇāyāma) का विवरण देते हैं, और पूरक (Inhalation), कुम्भक (Retention) तथा रेचक (Exhalation) की व्याख्या करते हैं। जैसा कि होता है, प्राण-वायु का सन्तुलन सूक्ष्म ऊर्जा मार्गों को स्वच्छ करता है और कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करता है।

अध्याय २२६ – धारणाध्यानम् (Dhāraṇādhyānam)

परम पुरुष एकाग्र एकाग्रता अर्थात् धारणा (Dhāraṇā) और भगवान् विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप पर निरन्तर ध्यान (Dhyāna) का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, हरि का अखण्ड चिन्तन भौतिक संस्कारों को भस्म करता है और चेतना को स्थिर करता है।

अध्याय २२७ – समाधिलक्षणम् (Samādhilakshaṇam)

भगवान् विष्णु समाधि (Samādhi) की अवस्था को परिभाषित करते हैं, जहाँ व्यक्तिगत चेतना दिव्य चेतना में लीन हो जाती है। जैसा कि होता है, समाधि में प्रवेश करने से द्वैत का समस्त भाव नष्ट हो जाता है, जिससे अविचल आनन्द और शान्ति प्राप्त होती है।

अध्याय २२८ – आत्मविज्ञानम् (Ātmavigñānam)

दिव्य जगद्गुरु आत्म-विज्ञान (Ātma-Vigñāna) का उपदेश देते हैं, और यह प्रकट करते हैं कि वास्तविक आत्मा शाश्वत, विशुद्ध चेतना है, जो स्थूल और सूक्ष्म कोशों से भिन्न है। जैसा कि होता है, अपनी अमर पहचान का साक्षात्कार मृत्यु के समस्त भय पर विजय प्राप्त कराता है।

अध्याय २२९ – अद्वैतब्रह्मज्ञानम् (Advaitabrahmajñānaḥ)

भगवान् विष्णु अद्वैत ब्रह्मज्ञान (Advaita Brahma-Jñāna) को आलोकित करते हैं, और यह उद्घोषित करते हैं कि जीवात्मा परम ब्रह्म से भिन्न नहीं है। जैसा कि होता है, यह साक्षात्कार आचार खण्ड को पूर्ण करता है, और परम मोक्ष तथा प्रभु नारायण के श्रीचरणों में नित्य शरणगति प्रदान करता है।

अध्याय २३० – मोक्षसाधनम् (Mokshasādhanam)

भगवान् विष्णु जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति अर्थात् मोक्ष प्राप्त करने के परम व्यावहारिक साधनों को आलोकित करते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु समझाते हैं कि नश्वर भौतिक सुखों के प्रति वैराग्य का विकास करना, कठोर आत्म-अनुशासन का पालन करना, परम ब्रह्म का ध्यान करना और समस्त कर्मों को हरि को समर्पित करना अवशिष्ट कर्म-बन्धनों को सर्वदा के लिए भस्म कर देता है।

अध्याय २३१ – विष्णुभक्तियोगः (Vishṇubhaktiyogaḥ)

परम पुरुष समस्त ब्रह्माण्डीय युगों में आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त करने के सर्वोच्च, सुगम और परम मङ्गलमय मार्ग के रूप में भक्ति योग (Bhakti Yoga) की महिमा का गान करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु गरुड़ को वचन देते हैं कि जो साधक परम प्रेम से अपने समस्त कर्मों, विचारों और वचनों को उन्हें समर्पित कर देता है, वह तत्काल भय से मुक्त हो जाता है और वैकुण्ठ में नित्य निवास प्राप्त करता है।

अध्याय २३२ – जीवन्मुक्तिलक्षणम् (Jīvanmuktilakshaṇam)

भगवान् विष्णु जीवन्मुक्त (Jīvanmukta) अर्थात् जीवित रहते हुए ही मुक्त हुए महापुरुष के लक्षणों और उच्च स्थिति का वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु प्रकट करते हैं कि जीवन्मुक्त व्यक्तिगत कामनाओं, अहङ्कार और सांसारिक आसक्तियों से सर्वथा मुक्त रहता है, और नारायण में मन को प्रतिष्ठित रखकर जगत् में आचरण करते हुए समस्त जीवों को समभाव व करुणा की दृष्टि से देखता है।

अध्याय २३३ – सदाचारपरमधर्मः (Sadāchāraparamadharmaḥ)

परम पुरुष व्यक्तिगत शान्ति और सार्वभौमिक व्यवस्था दोनों को धारण करने वाले सर्वोच्च परम धर्म के रूप में सदाचार (Sadāchāra) की पुनः पुष्टि करते हैं। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु बल देते हैं कि नैतिक जीवन, सत्यनिष्ठा, अहिंसा तथा गुरु व वरिष्ठों के प्रति आदर भाव ही समस्त आध्यात्मिक उन्नति की अनिवार्य नींव हैं।

अध्याय २३४ – पुराणश्रवणफलम् (Purāṇaśravaṇaphalam)

भगवान् विष्णु गरुड़ पुराण के पावन पाठ को पढ़ने, अध्ययन करने या सुनने से प्राप्त होने वाले अपार आध्यात्मिक पुण्य और पवित्र करने वाली शक्ति की घोषणा करते हैं। जैसा कि होता है, यह ग्रन्थ वचन देता है कि भक्तिपूर्वक श्रवण करने से पारिवारिक विघ्न दूर होते हैं, पर्वत-सदृश पाप भस्म होते हैं, और बुद्धि, आरोग्य व पारिवारिक समृद्धि की प्राप्ति होती है।

अध्याय २३५ – गरुड़कश्यपसंवादमाहात्म्यम् (Garuḍakashyapasamvādamāhātmyaḥ)

दिव्य जगद्गुरु गरुड़ और महर्षि कश्यप के मध्य हुए पावन ऐतिहासिक संवाद की महिमा का गान करते हैं, जिसने जगत्-कल्याण के लिए इन शाश्वत उपदेशों को संरक्षित और प्रसारित किया। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु प्रकट करते हैं कि जहाँ भी इस दिव्य संवाद का श्रद्धापूर्वक पाठ किया जाता है, वहाँ से नकारात्मक शक्तियाँ पलायन कर जाती हैं और देवगण दिव्य आशीर्वाद की वर्षा करते हैं।

अध्याय २३६ – विष्णुमाहात्म्यसंग्रहः (Vishṇumāhātmyasaṁgrahaḥ)

भगवान् विष्णु अपनी अनन्त ब्रह्माण्डीय महिमा, दिव्य लीलाओं और समस्त जीवधारियों पर अहेतुकी कृपा का महा-सार प्रस्तुत करते हैं। जैसा कि होता है, परम पुरुष गरुड़ को पुनः आश्वस्त करते हैं कि जो भी जीव उनके चरण-कमलों की शरण लेता है, वह संसार-सागर में कभी भी असहाय या नष्ट नहीं होता।

अध्याय २३७ – सर्वशास्त्रसारकीर्तनम् (Sarvashāstrasārakīrtanam)

परम पुरुष उद्घोषित करते हैं कि आचार खण्ड समस्त वेदों, स्मृतियों, आयुर्वेद, नीति-शास्त्र तथा वेदान्त शास्त्रों के परम सार को अपने में समाहित किए हुए है। जैसा कि होता है, भगवान् विष्णु प्रकट करते हैं कि ज्ञान की समस्त शाखाएँ केवल नारायण के परम सत्य को आलोकित करने के लिए ही अस्तित्व में हैं।

अध्याय २३८ – आचारखण्डफलश्रुतिः (Āchārakhaṇḍaphalaśrutiḥ)

भगवान् विष्णु सम्पूर्ण आचार खण्ड की औपचारिक फलश्रुति (Phalaśruti) की घोषणा करते हैं, और निष्ठावान् पाठकों तथा आचरण करने वालों को प्राप्त होने वाले दिव्य फलों का विस्तार से वर्णन करते हैं। जैसा कि होता है, दिव्य जगद्गुरु समस्त श्रद्धालु साधकों को दीर्घायु, धर्मनिष्ठ सन्तान, भौतिक समृद्धि, रोग-मुक्ति तथा वैकुण्ठ मोक्ष का वरदान देते हैं।

अध्याय २३९ – मङ्गलस्तुतिः (Mangalastutiḥ)

यह आख्यान ब्रह्माण्डीय मङ्गलमयता के एक तेजस्वी स्तोत्र को प्रस्तुत करता है, जिसमें भगवान् नारायण, देवी लक्ष्मी और समस्त दिव्य भक्तों का यशोगान किया गया है। जैसा कि होता है, इस प्रार्थना का पाठ करने से समस्त लोकों में सार्वभौमिक सौहार्द, शान्ति और आध्यात्मिक प्रकाश का विस्तार होता है।

अध्याय २४० – आचारखण्डसमाप्तिः (Āchārakhaṇḍasamāptiḥ)

आचार खण्ड भगवान् विष्णु, गरुड़ और सूत गोस्वामी द्वारा अर्पित एक पावन उपसंहार और महान् दिव्य मङ्गल-आशीर्वाद के साथ पूर्ण होता है। जैसा कि होता है, यह शास्त्र समस्त जीवधारियों के लिए सार्वभौमिक शान्ति, आध्यात्मिक जागरण और शाश्वत कल्याण का आह्वान करता है, और प्रत्येक देहधारी जीव को प्रभु नारायण के चरण-कमलों में नित्य शरण लेने की प्रेरणा देता है।

Read Garuda Purāṇa’s Āchāra Khaṇḍa Online in Hindi

आचार कांड – केवल अनुवाद