गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
157 - अतिसार- ग्रहणी - निदान
धन्वन्तरिजीने कहा - हे सुश्रुत! अब मैं आपको अतिसार तथा संग्रहणी - रोगके(च०चि०अ0 19,अ०हृ०नि०अ0 8, सु०उ०तं,अ0 40) निदानकी बात बताता हूँ।
वात - पित्त - कफ और सन्निपात दोषके कुपित होनेसे ही इन रोगोंकी उत्पत्ति होती है। भय तथा शोकके कारण भी ये प्राणियोंके शरीरमें उत्पन्न हो सकते हैं। अत: वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, भयज तथा शोकजके रूपमें इनके छः भेद हो जाते हैं।
अतिसाररोग अधिक जल पीनेसे होता है। इसके अतिरिक्त सूखे अंकुरित एवं कच्चे अन्न, तेल पदार्थ, बसा(चर्बी) और तिलकुटको अधिक खानेसे भी यह उत्पन्न हो जाता है। मद्यपान, रूक्षाहार, अधिकतम मात्रामें रस और तेलका सेवन तथा उदरजन्य कृमियोंके प्रकोपसे एवं वेगारोधसे शरीरकी वायु प्रकुपित हो उठती है। तदनन्तर वह अपानवायुके रूपमें शरीरके अधोभागमें जाकर उस दोषका विस्तार कर जठराग्नि - शक्तिको ह्त्रासोन्मुखी बना देता है। उस अग्निकी मन्दताके कारण शरीरमें गया हुआ अन्न - पिण्ड और पहलेसे स्थित पुरीष (मल) भस्म अथवा सूखनेकी अपेक्षा द्रवतादिके दोषमें बदलकर अतिसाररोगके लक्षणको प्रकट करता है। उस रोगसे प्रभावित होनेवाले रोगीके हृदय, गुह्यभाग तथा आमाशयादिमें पीड़ा होती है, शरीरमें अवसाद होता है एवं पुरीषका निरोध और अपच होता है। शरीर पसीनेसे युक्त हो जाता है और कष्टकी उत्पत्ति होती है। वातदोषके कारण शरीर शिथिल पड़ जाता है, पाचनशक्ति सुचारुरूपसे कार्य नहीं करती है तथा शरीरमें विशेष प्रकारका ज्वर रहता है। उस दोषके कारण उदरमें कुछ गुड़गुड़ाहट भी बनी रहती है। गुह्य भागसे बार - बार सूखा हुआ फेनसे युक्त स्वच्छ ग्रधित, जलाइन्ध और पिच्छिल (कचड़ाहीन)मल कष्टके साथ होता है। इस रोगमें मलद्वार शुष्क एवं विकृत होकर बाहर निकल जाता है, मल निकलनेमें कष्ट होता है। उस कष्टके कारण रोगी लम्बी - लम्बी श्वासें छोड़ता हुआ काँखता रहता है।
पित्त-दोषसे(सु०उ०अ0 4,अ०हृ०नि०अ०8। ) रोगीको पीत - कृष्ण - हल्दी तथा नवांकुर तृण वर्ण रक्तके सहित अत्यन्त दुर्गन्धपूर्ण दस्त होता है। उसको तृष्णा, मूर्च्छा, स्वेद और दाहका प्रकोप भी होता है। कफजनित अतिसाररोगके होनेपर गुह्य भागमें दाहपाक शूल उठता है और संतापजनित कष्ट होता है। इस रोगमें मल द्रवयुक्त न होकर कठोर, भारी एवं घनीभूत रूपमें गुदाभागसे बाहर निकलता है, वह पिच्छिल (कचड़ाहीन)रहता है। उसीके अनुसार वह बहुत ही कम या अधिक मात्रामें उदरके अंदर विद्यमान मलस्रोतमें पाया जाता है। मल - निस्सारणके समय कष्टके कारण रोगीको रोमाञ्च, हर्ष मिचली और क्लेशकी अनुभूति होती है। शरीरके अंदर भारीपन रहता है और इसीके कारण वस्ति-प्रदेश, गुदाभाग और उदरमें भी भारीपन बना रहता है। ऐसे रोगीको दस्त होनेके उपरान्त भी दस्तकी अनुभूति बनी रहती है। जब वह वात - पित्त तथा कफजन्य सभी दोषपूर्ण लक्षणोंसे युक्त हो जाता है अर्थात् रोगीके शरीरमें सन्निपातजन्य अतिसारका प्रकोप जन्म ग्रहण कर लेता है तो रोगी उस समय उक्त समस्त वातादिक त्रिदोषोंके लक्षणसे समन्वित बन जाता है। भयवश चित्तके विक्षुब्ध होनेपर स्थान - विशेषयमें पड़े हुए रोगीके उदरभागका मल द्रवीभूत हो उठता है। तदनन्तर उस द्रवपूर्ण मलको यथाशीघ्र वायु गुद्यमार्गसे बाहर निकाल देता है अर्थात् भयवशात् रोगीमें मलोत्सर्गकी इच्छा बलवती हो उठती है और अन्ततोगत्वा उसे पानीके समान मल होता है। वात तथा पित्तदोषसे होनेवाले अतिसार रोगके एक समान ही लक्षण बताये गये हैं, वैसे ही लक्षण शोकज अतिसारमें भी उत्पन्न होते हैं।
संक्षिप्ततः अतिसाररोगके दो प्रकार हैं। उनमें प्रथम साम है और द्वितीय निराम है। साम अतिसाररोगमें मल आँवके सहित होता है, किंतु निराम अतिसारमें आँव दोषरहित मल निकलता है, उनमें एक सरक्त होता है और दूसरा बिना रक्तका होता है। साम अतिसारमें मल बड़ा दुर्गन्धित होता है और जलमें डालनेसे डूब जाता है। रोगीके पेटमें गुड़गुड़ाहट, विष्टम्भ वेदना और मुखप्रसेक होता है। निरामके लक्षण सामसे विपरीत होते हैं, कफजन्य होनेके कारण पक्व होनेपर भी मल जलनमें नहीं डूबता है। जो अतिसारमें सावधानी नहीं करता, उसे ग्रहणीरोग हो जाता है।
अग्निमान्दताको बढ़ानेवाले अत्यधिक मात्रामें किये गये दोषपूर्ण आहार - विहारके सेवनसे अतिसाररोगका प्रादुर्भाव होता है। जब रोगीके शरीरसे साम या निराम मल अत्यधिक निकलता है तो उसे अतिसार कहते हैं। मलोत्सर्ग अधिक होनेके कारण इसकी अतिसार संज्ञा है। यह स्वाभाविक आशुकारी है। यही अतिसार जीर्ण होनेपर संग्रहणीरोग बन जाता है। ग्रहणीरोगमें भुक्त अन्नके अजीर्ण होनेपर कभी आमसहित और कभी सान्न मल निकलता है। अन्नके जीर्ण होनेपर कभी पक्व मल निकलता है, कभी कुछ नहीं निकलता और कभी बार - बार बँधा या ढीला दस्त होता है। यह रोग चिरकारी होता है, इसलिये इसे संग्रहणी कहते हैं। संग्रहणी चिरकारी तथा अतिसार आशुकारी होता है।
इस रोगमें(च०चि०अ0 14,अ०हृ०नि०अ0 8)एकाएक मलकी प्रवृत्तिका बारम्बार संघात होता है अथवा वह एकाएक रुक - रुककर बाहर निकलता है। ऐसा यह संग्रहणी रोग वात - पित्त तथा कफजन्य दोषसे तो तीन प्रकारका है ही, किंतु सन्निपातिक दोषके कारण भी उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह चार प्रकारका हो जाता है। रोगीके शरीरमें शिथिलता, अग्निमान्द्य, खट्टी डकार, मुखसे लालास्रव, धूमनिर्गमवत् प्रतीति, तमक, ज्वर, मूर्च्छा, अरुचि, तृष्णा, थकान, भ्रम, अपच, वमन, कानमें भनभनाहट और अन्त्रकूजन - ये ग्रहणीके पूर्वरूप हैं। वातज ग्रहणीरोगमें तालुशोथ, तिमिररोग, दोनों कानोंमें शब्द, पसली, ऊरु, वंक्षण और ग्रीवामें दर्द, बार - बार विसूचिका, सब कुछ भोजनकी इच्छा, क्षुधा, तृषा, कैंचीसे कतरनेकी पीड़ा, अफरा, कुछ भोजन करनेसे स्वस्थता, फेनसहित मल - ये सब लक्षण उपस्थित होते हैं। रोगी वातज, हद्रोग, गुल्म, अर्श, प्लीहा और पाण्डुरोगकी शंका करने लगता है। देरमें कष्टके साथ पतला या गाढ़ा थोड़ा कच्चा एवं फेनयुक्त बार - बार मल आता है। गुदामें दर्द और श्वास - खाँसी भी उठने लगती है।
पित्तज(च०चि०अ0 14, 19, सु०उ०तं0 अ0 40) ग्रहणीरोगमें रोगी पीला पड़ जाता है। उसे पीला, नीला और पतला दस्त होता है। वह दुर्गन्धित खट्टी डकार, हृदय और कण्ठमें दाह, अरुचि और तृषासे पीड़ित रहता है।
पित्तज ग्रहणीके होनेपर रोगीका मल द्रवरूप हो जाता है और कफजन्य ग्रहणीरोग होनेपर रोगीको अन्न कठिनतासे पचता है। उसको छरछराहटभरा वमन होता है। उसे भोजनमें अरुचि होने लगती है उसके मुखमें दाह होता है। उसको कफयुक्त खाँसी आती है। उसके हृदयसे उबकाई छूटती है और जुकाम हो जाता है। उसका हृदय पीड़ित और उदर भारी - सा प्रतीत होता है। उसपर आलस्य छा जाता है। उसे मीठी - मीठी डकार और शरीरमें शिथिलता आने लगती है। रोगीको समान या कुछ कम - अधिक मात्रामें कफसे युक्त मल होता है, जो भारी तथा अम्लताके दोषसे संश्लिष्ट रहता है। उस रूपमें प्राय: मैथुन अशक्ति एवं रोगीकी शक्तिका अधिक ह्त्रास होता है। इस रोगमें बलवान् व्यक्ति भी दुर्बल हो जाता है और उसमें रोगके सभी लक्षण दिखायी देने लगते हैं।
शारीरप्रकरणके अङ्ग - विभाग नामक तीसरे अध्यायमें जो विषम, तीक्ष्ण एवं मन्द नामक तीन पित्ताग्नियाँ कही गयी हैं, वे भी ग्रहणी - दोष ही हैं। केवल समाग्नि उत्तम स्वास्थ्यकी हेतु है। इस रोगमें भी प्राणीको प्यास लगती है, अधिक मल निकलनेके कारण भूख सताती है, हर क्षण शिथिल होते हुए शरीरके कारण उसके मनमें विकृत चिन्ताएँ भी बढ़ जाती हैं। समस्त रोगोंका यही - मल ही कारण है। इसी मलके शरीरमें रहनेपर प्राणीमें वातव्याधि (बाई), अश्मरी(पथरी), कुष्ट (कोढ़), मेह, जलोदर, भगंदर, बवासीर और ग्रहणीरोग होता है - ये आठों रोग महारोग माने गये हैं, इनका निदान अत्यन्त कठिन है और ये कष्टसाध्य हैं।