गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
81 - गङ्गा आदि विविध तीर्थोंकी महिमा
सूतजीने कहा - हे शौनक! अब मैं समस्त तीर्थोंका वर्णन करूँगा। जितने भी तीर्थ हैं, उनमें गङ्गा उत्तमोत्तम तीर्थ है। यद्यपि गङ्गा सर्वत्र सुलभ है, किंतु हरिद्वार, प्रयाग एवं गङ्गासागरके संगम - इन तीन स्थानोंमें वह दुर्लभ है
(सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा॥
गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसङ्गमे।)।
प्रयाग परम श्रेष्ठ तीर्थ है, जो मरनेवालेको मुक्ति और भुक्ति दोनों प्रदान करता है। इस महातीर्थमें स्नान करके जो अपने पितरोंके लिये पिण्डदान करते हैं, वे अपने समस्त पापोंका विनाशकर सभी अभीष्टोंकी सिद्धि प्राप्त करते हैं।
वाराणसी परम तीर्थ है। इस तीर्थमें भगवान् विश्वनाथ और केशव सदैव निवास करते हैं। कुरुक्षेत्र भी बहुत बड़ा तीर्थ है। इस तीर्थमें दानादि करनेसे यह भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति करानेवाला है। प्रभास श्रेष्ठतम तीर्थ है, जहाँपर भगवान् सोमनाथ विराजमान रहते हैं। द्वारका अत्यन्त सुन्दर नगरी है। यह मुक्ति - भुक्ति दोनोंको प्रदान करनेवाली है। पूर्व दिशामें अवस्थित सरस्वती पुण्यदायिनी तीर्थ है। इसी प्रकार सप्तसारस्वत परमतीर्थ है।
केदारतीर्थ समस्त पापोंका विनाशक है। सम्भलग्राम उत्तम तीर्थ है। बदरिकाश्रम भगवान् नर - नारायणका महातीर्थ है, जो मुक्तिप्रदायक है।
श्वेतद्वीप, मायापुरी (हरिद्वार), नैमिषारण्य, पुष्कर, अयोध्या, चित्रकूट, गोमती, वैनायक, रामगिर्याश्रम, कांचीपुरी, तुंगभद्रा, श्रीशैल, सेतुबन्ध - रामेश्वर, कार्तिकेय, भ्रुगुतुंग, कामतीर्थ, अमरकण्टक, महाकालेश्वरकी निवासभूमि उज्जयिनी, श्रीधर हरिका निवासस्थल कुब्जक, कुब्जाम्रक, कालसर्पि, कामद, महाकेशी, कावेरी, चन्द्रभागा, विपाशा, एकाम्र, ब्रह्मेश, देवकोटक, रम्य मथुरापुरी, महानद शोण तथा जम्बूसर नामक स्थानोंको महातीर्थ कहा गया है।
इन तीर्थोमें सदा सूर्य, शिव, गणपति, महालक्ष्मी एवं भगवान् हरि निवास करते हैं। यहाँ और अन्यान्य पवित्र स्थानोंमें किया गया स्नान, दान, जप, तप, पूजा, श्राद्ध तथा पिण्डदानादि अक्षय होता है। इसी प्रकार शालग्राम तथा पाशुपततीर्थ भी परम पवित्र तीर्थ हैं, जो भक्तोंको सब कुछ प्रदान करते हैं।
कोकामुख, वाराह, भाण्डीर और स्वामि नामक तीर्थ महातीर्थके रूपमें विख्यात हैं। लोहदण्ड नामक तीर्थमें महाविष्णु तथा मन्दारतीर्थमें मधुसूदन निवास करते हैं।
कामरूप महान् तीर्थ है। इस स्थानमें कामाख्यादेवी सदा विराजमान रहती हैं। पुण्ड्रवर्धनतीर्थमें भगवान् कार्तिकेय प्रतिष्ठित रहते हैं। विरज, श्रीपुरुषोत्तम, महेन्द्रपर्वत, कावेरी, गोदावरी, पयोष्णी, वरदा, विन्ध्य और नर्मदाभेद नामक महातीर्थ समस्त पापोंके विनाशक हैं। गोकर्ण, माहिष्मती, कलिंजर एवं श्रेष्ठ शुक्लतीर्थकों महातीर्थ माना गया है। यहाँपर स्नान करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। इस तीर्थमें भगवान् शार्ङ्गधारी हरि निवास करते हैं। भक्तोंको सब कुछ देनेवाले विरज तथा स्वर्णक्षतीर्थ भी उत्तम तीर्थ हैं।
नन्दितीर्थ मुक्तिदायक और कोटितीर्थोका फल प्रदान करनेवाला है। नासिक, गोवर्धन, कृष्णा, वेणी, भीमरथी, गण्डकी, इरावती, विंदुसर एवं विष्णुपादोदक महापुण्यप्रदायक परम तीर्थ हैं।
ब्रह्मध्यान और इन्द्रियनिग्रह महान् तीर्थ हैं, दम तथा भावशुद्धि श्रेष्ठ तीर्थ है। ज्ञानरूपी सरोवर और ध्यानरूपी जलमें, राग - द्वेषादि रूप मलका नाश करनेके लिये ऐसे मानस तीर्थमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है।
यह तीर्थ है, यह तीर्थ नहीं है - जो लोग इस प्रकारके भेद - ज्ञानकों रखते हैं, उन्हीं लोगोंके लिये तीर्थणमन और उसके उत्तम फलका विधान किया गया है, किंतु जो ‘सर्वत्र ब्रह्ममय है’ ऐसा स्वीकार करते हैं, उनके लिये कोई भी स्थान अतीर्थ नहीं है। इन सभीमें स्नान, दान, श्राद्ध, पिण्डदान आदि कर्म करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है। समस्त पर्वत, समस्त नदियाँ एवं देवता, ऋषि - मुनि तथा संतों आदिसे सेवित स्थान तीर्थ ही हैं -
इदं तीर्थमिदं नेति ये नरा भेददर्शिनः।
तेषां विधीयते तीर्थगमनं तत्फलं च यत्॥
सर्वं ब्रह्मेति यो वेत्ति नातीर्थं तस्य किञ्चन।
एतेषु स्नानदानानि श्राद्धं पिण्डमथाक्षयम्॥
सर्वा नद्य: सर्वशैला: तीर्थ देवादिसेवितम्।
श्रीरंगपत्तनम् भगवान् हरिका महान् तीर्थ है। ताप्ती एक श्रेष्ठ महानदी है। सप्तगोदावरी एवं कोणगिरि भी महातीर्थ हैं। कोणगिरितीर्थमें महालक्ष्मी नदीके रूपमें स्वयं विराजमान रहती हैं। सह्यपर्वतपर भगवान् देवदेवेश्वर एकवीर तथा महादेवी सुरेश्वरी निवास करती हैं।
गङ्गाद्वार, कुशावर्त, विन्ध्यपर्वत, नीलगिरि और कनखल - इन महातीर्थोंमें जो व्यक्ति स्नान करता है, वह पुनः संसारमें जन्म नहीं लेता -
गङ्गाद्वारे कुशावर्ते विन्ध्यके नीलपर्वते॥
स्नात्वा कनखले तीर्थे स भवेन्न पुनर्भवे।
सूतजीने (आगे) कहा कि उपर्युक्त वर्णित और अन्य जो अवर्णित तीर्थ हैं, सभी स्नानादिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेपर सदैव सब कुछ प्रदान करनेवाले हैं।
इस प्रकार भगवान् श्रीहरिसे तीर्थोका माहात्म्य सुनकर ब्रह्माने दक्ष प्रजापति आदिके साथ महामुनि व्यासको उनका श्रवण कराया और पुनः तीर्थोत्तम एवं अक्षय फल देनेवाले तथा ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले ‘गया’ नामक तीर्थका वर्णन किया।