35 - 37 - गायत्रीन्यास तथा संध्या - विधि

श्रीहरिने कहा - हे शङ्कर! अब मैं गायत्री देवीके [पूजनमें] न्‍यासादिका वर्णन करूँगा, आप इसका श्रवण करें। इस (गायत्री - मन्त्र)- के ऋषि विश्वामित्र, देवता सविता, मस्तक ब्रह्मा और शिखा रुद्र हैं। ये विष्णुके हृदयमें रहनेवाली हैं। ये विनियोग - कालमें एकनेत्रा हैं। इनका प्रादुर्भाव कात्यायन - गोत्रमें हुआ है, तीनों लोक इनके चरण हैं तथा ये पृथ्वीकी कोखमें स्थित रहती हैं। गायत्री देवीके स्वरुपको इस प्रकार जानकर [गायत्री -मन्त्रका ] बराह लाख जप करना चाहिये।

इस मन्त्रके त्रिपाद तथा चतुष्पाद अर्थात्‌ तीन चरण तथा चार चरण होते हैं। त्रिपादके प्रत्येक चरणमें आठ अक्षर तथा चतुष्पादके प्रत्येक चरणमें छ: अक्षर होते हैं। जपमें त्रिपदा और पूजनमें चतुष्पदा गायत्रीके मन्त्रका प्रयोग करनेके लिये कहा गया हैं। (जिस गायत्री - मन्त्रका जप किया जाता है, वह त्रिपदा गायत्री कहलाती है। 'परोरजसेऽसावदोम्‌०' यह गायत्रीका चतुर्थ पाद है। इस चतुष्पदा गायत्रीका प्रयोग सूर्योपस्थान, पूजन आदियें होता है।)

जप, ध्यान, यज्ञादि कृत्य एवं पूजनके कार्योंमें नित्य इस सर्वपापविनाशिनी गायत्री देवीका विधिवत् आपने अङ्गोंमें न्यास करना चाहिये।

पैरके अंगुष्ठ - भागमें, गुल्फके (गुल्फ (पैरकी घुट्ठी) पाँवोंकी गाँठें।) मध्यमें, दोनोंजंघाओं, दोनों जानुओं, ( जानु (घुटना)।) ऊर्रु - भाग,( ऊरु-घुटनेके ऊपरका भाग।) गुह्मस्थान, अण्डकोष, नाडी, नाभि, शरीरके उदरभाग, दोनों स्तन, हृदय, कण्ठ, ओष्ठ, मुख, तालु, दोनों स्कन्धप्रदेश, दोनों नेत्र और भौंहों तथा मस्तकमें इस (गायत्री ) - मन्त्रका न्यास करके क्रमश: - पूर्व, दक्षिण, उत्तर तथा पश्चिम दिशामें इनका न्यास करना चाहिये।

हे रुद्र! इन गायत्री देवीके मन्त्रके वर्णों (रंगों) - को कह रहा हूँ। क्रमश: इसके (चौबीस) अक्षर इन्द्रनीलमणि, अग्निसदृश, पीत, श्याम, कपिलवर्ण, श्वेत, विद्युत्प्रभ, मौक्तिकवर्ण, कृष्ण, रक्त, श्याम, शुक्ल, पीत, श्वेत, पद्मरागतुल्य, शङ्कवर्ण, पाण्डुर, रक्त, आसवके समान रक्तकृष्णमिश्रित, सूर्यसदृश, सौम्य, शवेत, शङ्खकी आभाके समान तथा श्वेत हैं।

गायत्री देवीके मन्त्रका जप करके मनुष्य जिन - जिन वस्तुओंका हाथसे स्पर्श करता है और नेत्रोंसे जिनका - जिनका अवलोकन करता है, वे सभी पवित्र हो जाते हैं। गायत्रीसे श्रेष्ठ कोई दूसरा मन्त्र नहीं है, ऐसा समझना चाहिये -

यद्यत्स्पृशति हस्तेन यच्च पश्यति चक्षुषा।

पूतं भवति तत् सर्वं गायत्र्या न परं विदुः॥

श्रीहरिने पुन: कहा - हे रुद्र! अब पाप विनाशिनी संध्याकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ। उसे आप सुनें। तीन बार प्राणायाम (यहाँ संध्याका प्रकरण प्राणायामसे प्रारम्भ किया गया है, परंतु प्राणायामसे पूर्व संध्योपासनमें मालाधारण, पवित्रीकरण, शिखाबन्धन, भस्मधारण आदि करनेका विधान है। तत्पश्चात्‌ आचमन, मार्जन, भूमिशोधनके अनन्तर संकल्प करके 'ऋतञ्च०' इस मन्त्रसे आचमन करना चाहिये। तदनन्तर गायत्री - मन्त्रसे दिग्रक्षण करनेके पश्चात्‌ विनियोगपूर्वक प्राणायाम करनेकी विधि है। पूरी संध्योपासनविधि जाननेके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म - पूजाप्रकाश ' ग्रन्थ देखना चाहिये।)। करके संध्या (संध्यासे संध्या काल लेना है। यह काल प्रातः, सायं एवं मध्याह्नमें आता है।) - स्नानका उपक्रम करे। प्राणवायुको संयतकर प्रणवमन्त्र (ॐ कार) तथा सप्त व्याहृतिसे युक्त गायत्री - मन्त्रका ( आपो ज्योतीरसोऽमृतं भूर्भुव: स्वरोम्‌) इस गायत्री सिरके साथ तीन बार उच्चारण करनेको प्राणायाम कहते हैं। द्विज प्राणायामोंके द्वारा मानसिक, वाचिक तथा कायिक दोषोंको भस्म कर लेता है। इसीलिये यथाविधि यथानियत सभी कालोंमें प्राणायामपरायण होना चाहिये।

प्रातः 'सूर्यश्च0' ( सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्य: पापेभ्यो रक्षन्ताम्‌। यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिशना रात्रिस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ0 प्र0 10 , अ0 2 5) इस मन्त्रके द्वारा, मध्याह्नमें'आप: पुनन्तु0 '(ॐ आप: पुनन्‍तु पृथिवीं पृथ्वी पूता पुनातु माम्‌। पुनन्‍तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपूता पुनातु माम्‌। यदुच्छिष्टमभोज्यं च यद्दा दुश्चरितं मम। सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रह स्वाहा। (तै0 आ0 प्र0 10 , अ0 23)) इस मन्त्रसे तथा सायंकाल 'अग्निश्च मा मन्युश्च०' (ॐ अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्य: पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यदहा पापमकर्ष मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्तदवलुम्पतू। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ0 प्र0 10 , अ0 24)

इस मन्त्रके द्वारा यथाविधि आचमन करके प्रणव - मन्त्रसे युक्त 'आपों हि०' (आपो हि ष्टा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥ यो व: शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातर:॥ तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च न:॥ (यजु0 11 । 50 -52 ))

इस ऋचासेकुशोदकके द्वारा मार्जन करते हुए प्रत्येक पदपर जल सिरपर छिड़के। रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाले पाप, तमोगुण और अज्ञानजन्य पाप, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकीस्थितिमें होनेवाले पाप तथा कायिक, वाचिक एवं मानसिक - ये नवों पाप इन नौ मन्त्रोंसे ( मार्जनद्वारा) भस्म हो जाते हैं -

रजस्तमःस्वमोहोत्थान्‌ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिजान्।

वाड्मनःकर्मजान्‌ दोषान्‌ नवैतान्‌ नवभिर्दहेत्‌॥

दाहिने हाथमें जल लेकर उसे 'द्रुपदा०' (ॐ द्वपदादिव मुमुचान: स्विन्न: स्नातों मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमाप: शुन्धन्तु मैनस:॥ (यजु0 20।20 )) मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रितकर सिरपर छोड़ दे। अघमर्षण (ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। तत: समुद्रो अर्णव:। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्‌। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व:॥ (ऋग्वेद 10 ।190 ।1) मन्त्रकी तीन, छः, आठ अथवा बारह आवृत्ति करके अघमर्षण करे।

तत्पश्चात्‌ 'उदु त्यं०' (ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव:। दृशे विश्वाय सूर्यँ् स्वाहा॥ (यजु0 7 । 41) तथा 'चित्र' (ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्ने:। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षँ् सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥(यजु0 7 । 42) - इन मन्त्रोंसे सूर्योपस्थान करना चाहिये। इससे दिन तथा रात्रिमें किये गये समस्त पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

प्रात: कालकी संध्या खड़ा होकर तथा मध्याह्न एवं सायंकालकी संध्या बैठकर करनी चाहिये। प्रणव ( ॐ कार) और महाव्याहृतियों अर्थात्‌ 'भू:, भुव:, स्व:' से संयुक्त करके गायत्री - मन्त्रका दस बार जप करनेसे इस जन्मके पाप, सौ बार जप

करनेपर पूर्वजन्मके पाप तथा हजार बार गायत्रीका जप करनेसे तीन युगोंके पाप नष्ट हो जाते हैं -

दशभिर्जन्मजनितं शतेन तु पुरा कृतम्‌।

त्रियुगं तु सहस्त्रेण गायत्री हन्ति दुष्कृतम्‌॥

प्रातः कालमें गायत्री रक्तवर्णा, मध्याह्नकालमें सावित्री शुक्लवर्णा और सायंकालमें सरस्वती कृष्णवर्णा कही गयी हैं।

(गायत्री, सावित्री एवं सरस्वती - ये गायत्रीके ही तीन स्वरूप हैं।)

 गायत्री - मन्त्रकी प्रथम व्याहृति 'भू:' का 'ॐ भू: हृदयाय नमः' से हृदयमें, द्वितीय व्याहति 'भुवः' का 'ॐ भुवः शिरसे स्वाहा' से सिरमें तथा तृतीय व्याहृति 'स्वः' का 'ॐ स्व: शिखायै वषट्‌' से शिखामें न्यास करे।

गायत्री - मन्त्रके प्रथम पाद (तत्सवितुर्वरेण्यं) - का कवचमें, द्वितीय पाद (भर्गों देवस्य धीमहि)- का नेत्रोंमें तथा तृतीय पाद ( धियो यो नः प्रचोदयात्‌) - का अस्त्रमें और चतुर्थ पाद (परोरजसेऽसावदोम्‌)- का सर्वाङ्गमें न्यास करके। संध्याओंके समय इस कथित विधिसे न्यास करके वेदमाता गायत्रीका जप करनेवालेका सब प्रकारसे कल्याण होता है। प्राणायामके अनन्तर सभी अङ्गोंमें न्यास करे।

त्रिपदा गायत्री ब्रह्मा - विष्णु और शिवस्वरूपा है। इसके ऋषि, छन्‍द और विनियोगको भलीभाँति जानकर जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे साधक सभी पापोंसे विमुक्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।

'परोरजसेऽसावदोम्‌' यह गायत्रीका तुरीय पाद कहा जाता है। जो व्यक्ति संध्योपासन नहीं करता है, उसको सूर्यदेव विनष्ट कर देते हैं। तुरीय पादके ऋषि निर्मल तथा छन्द गायत्री एवं देवता परमात्मा हैं।

जो मनुष्य योग और मोक्षको प्रदान करनेवाली परमश्रेष्ठा देवी गायत्रीका जप करता है, उसके महान् - से - महान्‌ पाप नष्ट हो जाते हैं।

प्रात:, मध्याह्न एवं सायं - इन तीनों संध्याओंमें 1008 या 108 बार गायत्री - मन्त्रका जप करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मलोक जानेका अधिकारी हो जाता है।