11  - नवव्यूहार्चनविधि, पूजानुक्रम-निरूपण

श्रीहरिने (रुद्से) कहा - (गरुडने) कश्यप ऋषिको जो नवव्यूहकी पूजाका वर्णन सुनाया था, उसको (अब) मैं कह रहा हूँ, आप सुनें।

साधक सबसे पहले [योग - क्रियाके द्वारा] जीवात्माको मस्तक, नाभि और [हृदयरूपी ] आकाश नामक तत्त्वमें प्रविष्ट करे। तदनन्तर वह ‘रं’(इस अग्निबीज) मन्त्रसे पाञ्चभौतिक शरीरका शोधन करे। उसके बाद वह ‘यं’ (इस वायु) बीजमन्त्रसे उस सम्पूर्ण शरीरके लयकी भावना करे। तत्पश्चात्‌ वह ‘लं’ इस बीजमन्त्रसे चराचर जगत्‌-(के साथ उस विलीन हुए शरीर)-के सम्प्लावित होनेकी भावना करे। उसके बाद वह ‘वं’ इस बीजमन्त्रसे पुन: स्वयंमें अमरत्वकी भावना करे। तदनन्तर [अमृतके] बुद्बुदोंके बीच ‘मैं ही पीताम्बरधारी चतुर्भुज भगवान्‌ श्रीहरि हूँ’ ऐसा मानकर आत्मतत्त्वके ध्यानमें निमग्न हो जाय।

इसके बाद शरीर तथा हाथमें तीन प्रकारका मन्त्र-न्यास करना चाहिये। पहले द्वादशाक्षर बीजमन्त्रसे, तदनन्तर कहे गये बीजमन्त्रसे न्यास और बादमें षडड्गन्यास करे। इससे साधक साक्षात्‌ नारायणस्वरूप हो जाता है। साधक दक्षिण अङ्गुष्ठसे प्रारम्भकर मध्यमा अङ्गुलिपर्यन्त न्यास करे। उसके बाद वह पुनः मध्य अङ्गुलिपर ही दो बीजमन्त्रसे न्यास करके पुनः शरीरके विभिन्‍न अङ्गोंपर न्यास करे। क्रमश: हृदय, सिर, शिखा, कवच, मुख, नेत्र, उदर और पीठ-भागसे अङ्गन्यास करते हुए दोनों बाहु, दोनों हाथ, दोनों जानु और दोनों पैरोंमें भी न्यास करना चाहिये।

तदनन्तर अपने दोनों हाथोंको कमलवत्‌ आकृति प्रदान करके उसके मध्य-भागमें दोनों अङ्गुष्ठोंको संनिविष्ट करे। तत्पश्चात्‌ उसी मुद्राकृतिमें परमतत्त्वस्वरूप, अनामय, सर्वेश्वर भगवान्‌ नारायणका चिन्तन करे।

इसके बाद इन्हीं बीजमन्त्रोंसे क्रमश: तर्जनी आदि अङ्गुलियोंमें न्यास करके यथाक्रम सिर, नेत्र, मुख, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुह्मा, जानुद्दय तथा पादद्वयमें भी न्यास करना चाहिये।

बीजमन्त्रोंसे दोनों हाथोंमें न्यास तथा षडङ्गन्यास करके सम्पूर्ण शरीरमें न्यास करना चाहिये। वह अङ्गुष्ठसे कनिष्ठा अङ्गुलितक पाँच बीजमन्त्रोंसे न्यास करे। उसके बाद हाथके मध्य-भागमें नेत्रके बीजमन्त्रसे न्यास करनेका विधान है। अङ्गन्यासमें भी इसी क्रमसे हृदय-भागमें हृदय, मस्तकमें मस्तक, शिखामें शिखा, दोनों स्तन-प्रदेशमें कवच, नेत्रद्वयमें नेत्र तथा दोनों हाथोंमें अस्त्र-बीजमन्त्रको अवस्थित करना चाहिये।

तदनन्तर उन्हीं बीजमन्त्रोंसे दिशाओंको प्रतिबद्ध करके साधक पूजनकी क्रिया प्रारम्भ करे। सबसे पहले एकाग्रचित्त होकर उसको अपने हृदयमें योगपीठका ध्यान करना चाहिये। उसके बाद वह आग्नेयादिसे पूर्व दिशाओंमें यथाक्रम धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यको विन्यस्त करके पूर्वादि दिशाओंमें अधर्मादिका न्यास करे। यथा-अग्निकोणमें ‘ॐ धर्माय नमः’, नैर्ऋत्यकोणमें ‘ॐ ज्ञानाय नमः’, वायुकोणमें ‘ॐ वैराग्याय नमः’ और ईशानकोणमें ‘ॐ ऐश्वर्याय नमः’, पूर्व दिशामें ‘ॐ अधर्माय नमः’, दक्षिण दिशामें ‘ॐ अज्ञानाय नमः’, पश्चिम दिशामें ‘ॐ अवैराग्याय नमः’ तथा उत्तर दिशामें ‘ॐ अनैश्वर्याय नमः’ कहकर न्यास करे।

साधक इस प्रकार इन न्यास-विधियोंसे आच्छादित अपने शरीरको आराध्यका पीठ और स्वयंको उसीका स्वरूप समझकर पूर्वाभिमुख उन्‍नत अवस्थामें स्थिर होकर अनन्त भगवान्‌ विष्णुको अपनेमें प्रतिष्ठित करे। तदनन्तर ज्ञानरूपी सरोवरमें उत्पन्न ऊपरकी ओर उठी हुई कर्णिकासे युक्त शतपत्रवाले आठों दिशाओंमें प्रसरित श्वेत अष्टदल-कमलका ध्यान करे।

तत्पश्चात्‌ साधकको ऋग्वेदादिके मन्‍त्रोंसे सूर्य, चन्द्र तथा अग्निस्वरूप मण्डलोंका क्रमश: एकके ऊपर एकका ध्यान करना चाहिये। उसके बाद वह पूर्वादि दिशाओंमें भगवान्‌ केशवके पास ही अवस्थित विमलादि शक्तियोंको अष्टदल - कमलपर विन्यस्त करके नवीं शक्तिको कर्णिकामें स्थापित करे।

इस प्रकार ध्यान करके उस साधकको योगपीठकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात्‌ वह पुनः मनसे भगवान्‌ विष्णुका अङ्गसहित आवाहनकर [उस योगपीठमें उन्हें] प्रतिष्ठित करे। तदनन्तर पूर्वादि चारों दिशाओंमें अवस्थित चतुर्दल - कमलपर हृदयादि न्यास करना चाहिये। कमलके मध्यभागमें तथा कोणोंपर अस्त्रमन्त्रका न्यास करे। अर्थात्‌ उसके पूर्व दलमें 'हृदयाय नमः', दक्षिण दलमें 'शिरसे स्वाहा', पश्चिम दलमें 'शिखायै वषट्‌', उत्तर दलमें 'कवचाय हुम्‌', मध्यमें 'नेत्रत्रयाय वौषट्' तथा कोणमें 'अस्त्राय फट्‌' कहकर न्यास करना चाहिये।

तत्पश्चात्‌ पूर्वादि दिशाओंमें यथाक्रम संकर्षण आदिके बीजमन्त्रोंको विन्यस्त करनेका विधान है। तदनन्तर वह पूर्व और पश्चिम दिशाके द्वारपर 'ॐ वैनतेयाय नमः' कहकर वैनतेयको प्रतिष्ठित करे। उसके बाद दक्षिण द्वारपर 'ॐ सुदर्शनाय नमः', 'ॐ सहस्त्राराय नमः' का उच्चारण करके हजार अरोंवाले सुदर्शन चक्रकी वह स्थापना करे।

तदनन्तर दक्षिण द्वारपर 'ॐ श्रिये नमः' मन्त्रसे श्रीका न्यास करके उत्तर द्वारपर 'ॐ लक्ष्म्यै नम:' मन्त्रसे लक्ष्मीको प्रतिष्ठित करे।

साधकको इसके बाद उत्तर दिशामें 'ॐ गदायै नमः' मन्त्रसे गदा, कोणोंमें 'ॐ शङ्खायै नमः' मन्त्रसे शङ्खका न्यास करना चाहिये।

तत्पश्चात्‌ उन विष्णुदेव के दोनों ओर आयुधोंका न्यास करना चाहिये। विद्वान्‌ साधक दक्षिणकी ओर शार्ड्र (धनुष) तथा देवके बायीं ओर इषु (बाणों )- का न्यास करे। इसी प्रकार दोनों भागोंमें खड्ग और चर्मका न्यास करे।

तदनन्तर वह साधक मण्डलके मध्य दिशाभेदके अनुसार पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि लोक पालोंको प्रतिष्ठित करे और उनके आयुधोंको भी स्थापित करे। उसके बाद विद्वान्‌ साधकको ऊपरकी ओर 'ॐ ब्रह्मणे नमः' मन्त्रसे ब्रह्मा तथा नीचेकी ओर 'ॐ अनन्ताय नमः' मन्त्रसे अनन्तदेवका न्यास करना चाहिये।

इस प्रकार साधक सभी देवोंका न्यास एवं ध्यान करके उनकी पूजा करे और उनके सामने उनकी ही मुद्राका प्रदर्शन करे। अन्जलिबद्ध होना प्रथम मुद्रा है। इसके प्रदर्शनसे शीघ्र ही देवसिद्धि हो जाती है। दूसरी वन्दिनी मुद्रा है और तीसरी मुद्रा हृदयासक्ता है। इस मुद्रामें बायें हाथकी मुट्ठीसे दाहिने हाथके अँगूठेको बाँधकर बायें हाथके अँगूठेको ऊपर उठाये हुए हृदयभागसे संलग्न रखना चाहिये। व्यूह-पूजामें मूर्तिभेदसे इन तीन मुद्राओंको साधारण मुद्रा माना गया है। दोनों हाथोंमें अँगूठेसे कनिष्ठापर्यन्त तीन अँगुलियोंको नवाकर क्रमशः उन्हें मुक्त करनेसे आठ मुद्राएँ बनती हैं।

दोनों हाथोंके अँगूठोंसे अपने - अपने हाथकी मध्यमा, अनामिका तथा कनिष्ठा अँगुलियोंको नीचेकी ओर झुकाकर जो मुद्रा बनायी जाती है, उसको 'नरसिंह-मुद्रा' कहते हैं। दाहिने हाथके ऊपर बायें हाथको उत्तान स्थितिमें रखकर प्रतिमाके ऊपर धीरे-धीरे घुमानेको 'वाराही मुद्रा' कहते हैं। भगवान्‌ वाराहको सदा ही यह प्रिय है। दोनों मुट्टियोंको उत्तान रखकर क्रमश: एक-एक अँगुली सीधे खोलते हुए सभीको खोल दे। तदनन्तर उन सभी अँगुलियोंकी पुनः मुट्ठी बाँध ले। यह 'अङ्गमुद्रा' कहलाती है। साधकको इन मुद्राओंका प्रदर्शन क्रमश: दसों दिक्पालोंके लिये करना चाहिये।

भगवान्‌ वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध क्रमश: प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ देव - स्थानके अधिकारी देव हैं। साधकको-'ॐ अं वासुदेवाय नमः' मन्त्रसे वासुदेव, 'ॐ आं बलाय नमः' मन्त्रसे बलराम, 'ॐ अं प्रद्मम्नाय नमः' मन्त्रसे प्रद्युम्न तथा 'ॐ अः अनिरुद्धाय नमः' मन्त्रसे अनिरुद्धकी पूजा करनी चाहिये।

ॐकार, तत्सत्‌, हुं, क्षौं तथा भूः-ये पाँच क्रमश: नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह और महावराह भगवान्‌ के बीजमन्त्र हैं, इसलिये साधक - 'ॐ नारायणाय नमः' मन्त्रसे भगवान्‌ नारायण, 'ॐ तत्सद्‌ ब्रह्मणे नमः' मन्त्रसे पद्मयोनि ब्रह्मा, 'ॐ हुं विष्णवे नमः' मन्त्रसे विष्णु,' ॐ क्षौं नरसिंहाय नमः' मन्त्रसे नरसिंह तथा 'ॐ भू: महावराहाय नमः' मन्त्रसे आदिवराहका पूजन करे।

उपर्युक्त इन नौ देवताओं (वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह तथा महावराह) (नवव्यूह)-का वर्ण क्रमश: श्वेत, अरुण, हरिद्रावत्‌ पीत, नील, श्यामल, लोहित, मेघवत्‌ श्याम, अग्निवत्‌ पीत एवं मधु पिङ्गल है। अर्थात्‌ वासुदेव श्वेत, बलदेव अरुण, प्रद्युम्न हरिद्रावत्‌ पीत, अनिरुद्ध नील, नारायण श्याम, ब्रह्मा रक्ताभ, विष्णु मेघवत्‌ श्याम, नरसिंह अग्निवत्‌ पीत तथा वराहदेव मधु पिङ्गल वर्णकी तेजस्वी आभासे सुशोभित रहते हैं।

'(ॐ) कं टं पं शं' बीजमन्त्रसे गरुड, ' (ॐ) जं खं वं' बीजमन्त्रसे सुदर्शन , '(ॐ) षं चं फं षं' बीजमन्त्रसे गदादेवी, '(ॐ) वं लं मं क्ष' बीजमन्त्रसे शङ्ख, '(ॐ) घं ढं भं हं' बीजमन्त्रसे श्रीलक्ष्मी, '(ॐ) गं जं वं शं' बीजमन्त्रसे पुष्टि, ' (ॐ) घं वं' बीजमन्त्रसे वनमाला, '(ॐ) दं सं' बीजमन्त्रसे श्रीवत्स और '(ॐ) छं डं पं यं' बीजमनत्रसे कौस्तुभमणि युक्त हैं। [इसके अतिरिक्त] मैं स्वयं अनन्त (विष्णु) हूँ। ये सभी उस देवाधिदेव विष्णुके अङ्ग हैं।

गरुड कमलके समान लाल, गदा कृष्णवर्ण, पुष्टि शिरीष-पुष्परंगके समान आभासे समन्वित तथा लक्ष्मी सुवर्ण-कान्तिसे सुशोभित हैं। शङ्क पूर्ण चन्द्रकी कान्तिके समान श्वेत और कौस्तुभमणि नवोदित अरुणके सदृश वर्णवाला है। चक्र सहस्न सूर्योंकी कान्तिके सदृश और श्रीवत्स कुन्द पुष्पके समान श्वेत है। वनमाला पाँच वर्णोंसे युक्त पञ्चवर्णी और अनन्त भगवान्‌ मेघकी भाँति श्याम वर्णका है। जिन अस्त्रोंके रंगोंका वर्णन यहाँ नहीं किया गया है, वे सभी विद्युत्‌-कान्तिके समान हैं। (भगवान्‌ विष्णुके इन समस्त अङ्गोंको) 'पुण्डरीकाक्ष' नामक विद्यासे अर्घ्य और पाद्यादि समर्पित करने चाहिये।