गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
198 - 199 - त्रिपुराभैरवी तथा ज्वालामुखी आदि देवियोंके पूजनकी विधि
भेरवने कहा - इसके बाद मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली त्रिपुरादेवीकी पूजा आदिका वर्णन करूँगा। उसे आप सुनें।
देवीका यथाविधि ‘ॐ ह्रीं आगच्छ देवि’ - इस मन्त्रसे आवाहन करके ‘ऐं ह्रीं ह्रीं’ - इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए रेखा करके ‘ॐ ह्रीं क्लेदिनी भं नमः’ - इस मन्त्रसे उन्हें प्रणाम करे तथा उनकी शक्तियोंके साथ महाप्रेतासनपर विराजमान रहनेवाली देवी त्रिपुराभैरबीका पूजन करे। ‘ऐं ह्रीं त्रिपुरायै नमः’ - इस मन्त्रसे उन्हें नमस्कार करे। देवीके पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व आदि मुखोंको भी नमस्कार करे। ‘ॐ ह्रीं पाशाय नमः ‘, ‘क्रीं अङ्कुशाय नमः, ‘ऐं कपालाय नमः’ इत्यादि मन्त्रोंसे उनके पाश, अंकुश, कपाल आदि आयुधोंको नमस्कार करे। त्रिपुराभैरवी देवीकी पूजामें आठ भैरवों तथा उनके साथ मातृकाओंकी भी पूजा करनी चाहिये। असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्त भैरव, कपालिभैरव, भीषणभैरव तथा संहारभैरव - ये आठ भैरव हैं। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा तथा अपराजिता (दुर्गा) - ये आठ मातृकाएँ हैं। पूजकको चाहिये कि वह ‘ॐ कामरूपाय असिताङ्गाय भैरवाय नमो ब्रह्माण्यै’ - इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें कामरूप असिताङ्गभैरव और देवी ब्रह्माणीका आवाहन पूर्वक पूजन करे। उसके बाद ‘ॐ स्कन्दाय नमः, रुरुभैरवाय नमः, माहेश्वर्यै नमः ‘ मन्त्रोंद्वारा दक्षिण दिशामें स्कन्ददेव, रुरुभैरव और देवी माहेश्वरीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। ‘ॐ चण्डाय नमः, कौमार्यै नमः’ इन मन्त्रोंसे पश्चिम दिशामें चण्डभैरव तथा देवी कौमारीका आवाहन पूर्वक पूजन करे। तत्पश्चात् ‘ॐ उल्काय नमः, ॐ क्रोधाय नमः, ॐ वैष्णव्यै नमः’ - इन मन्त्रोंसे उत्तर दिशामें उल्कादेव, क्रोधभैरव और देवी वैष्णवीका आवाहन पूर्वक पूजन करे। ‘ॐ अघोराय नमः, ॐ उन्मत्तभैरवाय नमः, ॐ वाराहौ नमः’ - इन मन्त्रोंसे अग्निकोणमें अघोरदेव, उन्मत्तभैरव और देवी वाराहीका आवाहनपूर्वक पूजन ‘करे। तदनन्तर ‘ॐ साराय कपालिने भैरवाय नमः, ॐ माहेन्द्र्यै नम:’ - इन मन्त्रोंद्वारा नैर्ऋत्यकोणमें समस्त संसारके सारभूत स्वरूप कपालिभैरव और देवी माहेन्द्रीका आवाहनपूर्वक पूजन करे। उसके बाद साधकको ‘ॐ जालन्धराय नमः, ॐ भीषणाय भैरवाय नमः, ॐ चामुण्डायै नम:’ - इन मन्त्रोंसे वायुकोणमें जालन्धर, भीषणभैरव और देवी चामुण्डाका आवाहनपूर्वक पूजन करना चाहिये। तदनन्तर ‘ॐ वटुकाय नम:, ॐ संहाराय नमः, ॐ चण्डिकायै नम:’ - इन मन्त्रोंसे ईशानकोणमें वटुकदेव, संहारभैरव तथा देवी चण्डिकाका आवाहन करके उनकी पूजा करनी चाहिये।
इसके बाद साधकको रतिदेवी, प्रीतिदेवी, कामदेव और उनके पञ्चबाणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। इस प्रकार सदैव ध्यान, पूजा, जप तथा हो करनेसे देवी सिद्ध हो जाती हैं। नित्यक्लिन्ना, त्रिपुराभैरवी और ज्वालामुखी नामक देवियाँ समस्त व्याधियोंकी विनाशिका हैं। अब मैं ज्वालामुखीदेवीके पूजनका क्रम कहँगा। पद्मके मध्य देवी ज्वालामुखीकी पूजा करनी चाहिये तथा पद्मके बाह्य दलोंमें क्रमश: - नित्या, अरुणा, मदनातुरा, महामोहा, प्रकृति, महेन्द्राणी, कलनाकर्षिणी, भारती, ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री , चामुण्डा, अपराजिता, विजया, अजिता, मोहिनी, त्वरीता, स्तम्भिनी, जुम्भिणी तथा देवी कालिकाकी पूजा करनी चाहिये। देवी ज्वालामुखीकी यथाविधि पूजा करनेसे विष आदि दोष दूर हो जाते हैं।
भैरवने पुनः कहा - चूडामणि - यन्त्रके द्वारा प्रश्वकर्ताको शुभ एवं अशुभ समयका परिज्ञान हो जाता है।