गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
113 - नीतिसार
श्रीसूतजीने कहा - राजाको राज्यकार्यमें गुणवान् पुरुषकी नियुक्ति और गुणहीनका परित्याग करना चाहिये। विद्वान् व्यक्तिमें सभी गुण विद्यमान रहते हैं, किंतु मूर्ख व्यक्तिमें तो केवल दोष ही रहते हैं।
निरन्तर सज्जनोंके साथ रहना चाहिये और सज्जनोंकी ही संगति करनी चाहिये। विवाद एवं मैत्री भी सज्जनोंके साथ ही करनी चाहिये।
दुर्जनोंके साथ कुछ भी नहीं करना चाहिये। पण्डित, विनीत, धर्मज्ञ एवं सत्यवादी जनोंके साथ बन्धनमें भी रहना श्रेयस्कर है, किंतु दुष्टोंके साथ राज्यका भी उपभोग करना उचित नहीं है -
सद्धिरासीत सततं सद्भि: कुर्वीत संगतिम्।
सद्धिरर्विवादं मैत्रीं च नासदद्भि: किंचिदाचरेत्॥
पण्डितैश्च विनीतैश्व धर्मज्ञैः सत्यवादिभि:।
बन्धनस्थोऽपि तिष्ठेच्च न तु राज्ये खलै:सह॥
सभी कार्योंको पूर्ण कर लेना चाहिये। कोई काम अधूरा नहीं छोड़ना चाहिये । इससे सभी प्रकारके अर्थोंकी प्राप्ति हो जाती है।
जिस प्रकार भ्रमर पुष्पके परागको ग्रहण कर लेता है, किंतु पुष्पको नष्ट नहीं करता; जैसे दूध दुहनेवाला व्यक्ति बछड़ेके हितको ध्यानमें रखते हुए दूधको दुहता है, वैसे ही राजाको प्रजाहितका ध्यान रखते हुए प्रजासे करका दोहन करना चाहिये। जिस प्रकार मधुमक्खी एक - एक पुष्पसे मधुको ग्रहण कर उसे एकत्र करती है, उसी प्रकार राजाकों भी प्रजासे धन - संग्रह करना चाहिये।
(मधुहेव दुहेत् सारं कुसुमं च न घातयेत्।
वत्सापेक्षी दुहेत् क्षीरं भूमिं गां चैव पार्थिव:॥
यथा क्रमेण पुष्पेभ्यश्चिनुत मधु षट्पदः।
तथा वित्तमुपादाय राजा कुर्वात संचयम्॥)
जैसे वल्मीक(बाँबी), मधुमक्खीका छत्ता तथा शुक्लपक्षका चन्द्रमा प्रतिदिन थोड़ा - थोड़ा बढ़ता रहता है, वैसे ही राजाका द्रव्य तथा भिक्षा भी धीरे - धीरे थोड़ा - थोड़ा धर्मपूर्वक संग्रह करनेसे बढ़ते रहते हैं।
समुचित रीतिसे अर्जित किये गये धनका भी क्षय होता ही है और श्रद्धापूर्वक दीयमान दान कोटिगुणित होकर यथासमय मिलता ही है - इस वास्तविकताको ध्यानमें रखते हुए अपना कोई भी दिन दान, अध्ययन या सत्कर्मसे विहीन नहीं होने देना चाहिये ।
(अर्जितस्य क्षयं दृष्द्वा सम्प्रदत्तस्य संचयम्।
अवन्ध्यं दिवस कुर्यद्यानाध्ययनकर्मसु॥)
रागी व्यक्तिसे वनमें भी दोष हो जाते हैं। अत: घरमें मनुष्यके द्वारा किया गया पनञ्चेन्द्रियोंका निग्रह तप ही है। जो व्यक्ति जितेन्द्रिय होकर अनिन्दित कर्मोंमें प्रवृत्त हो सन्मार्गकी ओर बढ़ता जाता है, उस विषयवासनाओंसे दूर निवृत्तमार्गवालेके लिये उसका घर ही तपोवन है।
(वनेऽपि दोषा: प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पन्चेन्द्रियनिग्रहस्तप:।
अकुत्सिते कर्मण यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम्॥)
सत्यके पालनसे धर्मकी रक्षा होती है। सदा अभ्यास करनेसे विद्याकी रक्षा होती है। मार्जनके द्वारा पात्रकी रक्षा होती है और शीलसे कुलकी रक्षा होती है -
सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृजया रक्ष्यते पात्र कुलं शीलेन रक्ष्यते॥
विन्ध्याटवीमें निवास करना मनुष्यके लिये अच्छा है, बिना भोजन किये ही मर जाना श्रेयस्कर है, सर्पसे परिव्याप्त भूमिपर सोना तथा कुएँमें गिरकर मृत्युको प्राप्त करना उचित है, जलके आवर्तयुक्त भयंकर भँवरमें डूब मरना श्रेष्ठ है; किंतु अपने ही पक्षके आत्मीय जनसे ‘थोड़ा धन मुझे दे दें’ इस प्रकार याचना करना अच्छा नहीं है।
(वरं विन्ध्याटव्यां निवसनमभुक्तस्य मरणं
वर सर्पाकीर्णे शयनमथ कूपे निपतनम्।
वरं भ्रान्तावर्ते सभयजलमध्ये प्रविशनं
न तु स्वीये पक्षे हि धनमणु देहीति कथनम्॥)
भाग्यका हास होनेसे मनुष्यकी सम्पदाओंका विनाश होता है, न कि उपभोग करनेसे। पूर्वजन्ममें यदि पुण्य अर्जित है तो सम्पत्तिका नाश कभी नहीं हो सकता।
ब्राह्मणोंका आभूषण विद्या, पृथिबीका आभूषण राजा, आकाशका आभूषण चन्द्र एवं समस्त चराचरका आभूषण शील है -
विप्राणां भूषणं विद्या पृथिव्या भूषणं नृप:।
नभसो भूषणं चन्द्र: शीलं सर्वस्य भूषणम्॥
इतिहासप्रसिद्ध ये जो भीमसेन, अर्जुन आदि राजपुत्र हैं - ये सभी चन्द्रके समान कान्तिसम्मन्न, पराक्रमशील, सत्यप्रतिज्ञ, सूर्यके सदृश प्रतापशाली और स्वयं विष्णुके अवतारस्वरूप भगवान् कृष्णसे अभिरक्षित थे, फिर भी इन लोगोंको कृपण धृतराष्ट्रकी परवशताके कारण भिक्षाटन करना पड़ा। इस संसारमें कौन ऐसा है, किसमें ऐसी सामर्थ्य है, जिसको भाग्यके वशीभूत होनेके कारण कर्मरेखा नहीं घुमाती?
(एते ते चन्द्रतुल्या: क्षितिपतितनया भीमसेनार्जुनाद्या:
शूरा: सत्यप्रतिज्ञा दिनकरवपुष: केशवेनोपगूढा:।
ते वै दुष्टग्रहस्था: कृपणवशगता भैक्ष्यचर्या प्रयाता:
को वा कस्मिन् समर्थो भवति विधिवशाद्भ्रामयेत् कर्मरेखा॥)
जिस पूर्वसंचित कर्मके अधीन होकर ब्रह्मा कुम्भकारके समान ब्रह्माण्डरूपी इस महाभाण्डके उदरमें चराचर प्राणियोंकी सृष्टिमें नियमत: लगे रहते हैं, जिस कर्मसे अभिभूत होकर विष्णु दशावतारके कालमें परिव्याप्त असीमित महासंकटमें अपनेको डाल देते हैं, जिस कर्मके अनुसार ही सदाशिव रुद्र हाथमें कपाल धारणकर भिक्षाटन करते हैं और जिस कर्मसे सूर्य नित्य आकाशमें ही चक्कर काटते हैं - उस कर्मको मैं नमस्कार करता हूँ।
(ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे
विष्णु्र्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारित:
सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे॥)
राजा बलि उत्कृष्ट कोटिके दाता थे और याचक स्वयं भगवान् विष्णु थे। विशिष्ट ब्राह्मणोंके समक्ष पृथ्वीका दान दिया गया, फिर भी दानका फल बन्धन प्राप्त हुआ। यह सब दैवका खेल है, ऐसे इच्छानुसार फल देनेवाले दैवको नमस्कार है।
(दाता बलिर्याचकको मुरारिर्दानं महों विप्रमुखस्य मध्ये।
दत्त्वा फल बन्धनमेव लब्ध नमोस्तु ते दैव यथेष्टकारिणे॥)
यदि प्राणीकी माता स्वयं लक्ष्मी हों, पिता साक्षात् भगवान् जनार्दन विष्णु हों, उसके बाद भी प्राणीको यदि कुबुद्धिमें ही विश्वास है तो उसको दण्ड भोगना ही पड़ेगा।
पूर्वजन्ममें प्राणीने जैसा कर्म किया है, उसी कर्मके अनुसार वह दूसरे जन्ममें फल भोगता है। अतः स्वयमेव प्राणी अपने भोग्य फलका निर्माण करता है, अर्थात् वह कर्मफलका स्वयं ही विधाता है।
हम अपने सुख या दुःखके स्वयं ही हेतु हैं। माताके गर्भाशयमें आकर अपने पूर्वदेहमें किये गये कर्मोके फल ही हमें भोगने पड़ते हैं। आकाश, समुद्र, पर्वतीय गुफा तथा माताके सिरपर और माताकी गोदमें अवस्थित रहते हुए भी मनुष्य निश्चित ही उन अपने पूर्वसंचित कर्मफलका परित्याग करनेमें समर्थ नहीं होता।
जिसका दुर्ग ही त्रिकूट पर्वत था, जिसकी परिखा समुद्र ही था, राक्षसगणसे जो अभिरक्षित था, स्वयं जो परम विशुद्ध आचरण करनेवाला था, जिसको नीतिशास्त्रकी शिक्षा शुक्राचार्यसे प्राप्त हुई थी, वह रावण भी काल - वश नष्ट हो गया।
जिस अवस्था, जिस समय, जिस दिन, जिस रात्रि, जिस मुहूर्त अथवा जिस क्षण जैसा होना निश्चित है; वह वैसा ही होगा, अन्यथा नहीं हो सकता -
यस्मिन् वयसि यत्काले यद्दिवा यच्च वा निशि।
यन्मुहूर्ते क्षणे वापि तत्तथा न तदन्यथा॥
सभी अन्तरिक्षमें जा सकते हैं या भूगर्भमें प्रवेश कर सकते हैं अथवा दसों दिशाओंको अपने ऊपर धारण कर सकते हैं, किंतु अप्रदत्त वस्तुको प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
पूर्वजन्ममें अर्जित की गयी विद्या, दिया गया धन तथा सम्पादित कर्म ही दूसरे जन्ममें आगे - आगे मिलते जाते हैं। अर्थात् प्राणीने पूर्वजन्ममें जैसा कर्म किया है, उसको इस जन्ममें वैसा ही प्राप्त होता है।
(पुराधीता च या विद्या पुरा दत्तञ्च यद्धनम्।
पुरा कृतानि कर्माणि ह्याग्रे धावति धावति॥)
इस संसारमें कर्म ही प्रधान है। सुन्दर नक्षत्र था, ग्रहोंका योग था, स्वयं वसिष्ठ मुनिके द्वारा निर्धारित लग्नमें विवाह - संस्कार कराये जानेपर भी जानकी - सीताको [पूर्वजन्ममें संचित कर्मके अनुसार] दुःख भोगना पड़ा। विशाल जंघाओंवाले श्रीराम, शब्दकी गतिसे चलनेवाले श्रीलक्ष्म्ण तथा सघन केशवाली शुभलक्षणा श्रीसीताजी - ये भी तीनों जब अपने कर्मके अनुसार दुःखके भाजन हो गये तो सामान्य जनके विषयमें कुछ कहना ही व्यर्थ है। न पिताके कर्मसे पुत्रको सदगति मिल सकती है और न पुत्रके कर्मसे पिताको सदगति मिल सकती है। सभी लोग अपने - अपने कर्मसे ही अच्छी गति प्राप्त करते हैं।
(कर्माण्यत्र प्रधानानि सम्यगृक्षे शुभग्रहे।
वसिष्ठकृतलग्नाऽपि जानकी दुःखभाजनम्॥
स्थूलजंघो यदा राम: शब्दगामी च लक्ष्मण:।
घनकेशी यदा सीता त्रयस्ते दुःखभाजनम्॥
न पितुः कर्मणा पुत्र: पिता वा पुत्रकर्मणा।
स्वयं कृतेन गच्छन्ति स्वयं बद्धा: स्वकर्मणा॥)
पूर्वजन्ममें अर्जित कर्मफलके अनुसार प्राप्त शरीरमें शारीरिक और मानसिक रोग उसी प्रकार आकर अपना दुष्प्रभाव प्रकट करते हैं, जिस प्रकार कुशल वीर धरनुर्धरोंके द्वारा छोड़े गये बाण लक्ष्यको बेधकर कष्ट पहुँचाते हैं। बाल - युवा तथा वृद्ध जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, वह जन्म - जन्मान्तरमें उसी अवस्थाके अनुसार उस फलका भोग करता है। उस पूर्वार्जित फलको न देखनेवाला एवं विदेशमें रहता हुआ भी मनुष्य अपने कर्मरूपी जहाजके संयमित पवन - वेगके द्वारा उस फलतक पहुँचा दिया जाता है।
(बालो युवा च वृद्धश्च य: करोति शुभाशुभम्।
तस्यां तस्यामवस्थायां भुङ्के जन्मनि जन्मनि॥
अनीक्षमाणोऽपि नरो विदेशस्थोऽपि मानव:।
स्वकर्मपोतवातेन नीयते यत्र तत्फलम्॥)
मनुष्य अपने प्रारब्धका फल प्राप्त करता है। देवता भी उस फलभोगको रोकनेमें समर्थ नहीं हैं। इसीलिये मैं कर्मफलके विषयमें चिन्ता नहीं करता हूँ और न मुझे आश्चर्य ही है, क्योंकि जो मेरा है, उसे दूसरा कोई नहीं ले सकता -
प्राप्तव्यमर्थ लभते मनुष्यो देवोऽपि तं वारयितुं न शक्त:।
अतो न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न तु तत्परेषाम्॥
जैसे साँप, हाथी और चूहा - ये शीघ्रतावश क्रमश: कुआँ, अपने वासस्थान तथा बिलतक ही भाग सकते हैं, इससे आगे कहाँतक जा सकते हैं? इसी तरह अपने कर्म अथवा भाग्यसे कौन भाग सकता है? सब तो उसीके अधीन हैं।
सद्विद्या देनेसे उसी प्रकार बढ़ती रहती है कम नहीं होती, जिस प्रकार कुएँसे जल ग्रहण कर लेनेपर भी कुएँका जल बढ़ता ही रहता है [घटता नहीं]। जो धन धर्मानुसार अर्जित किया जाता है वही [वास्तविक] धन है। अधर्मसे प्राप्त हुआ धन तो मनुष्यके ऐश्वर्यका नाशक होता है। इस संसारमें धर्मार्थी ही महान् होता है। धनकी अपेक्षा करनेवाले मनुष्यको निश्चित ही श्रेष्ठजनोंके दृष्टान्तोंको स्मरण करके धनोपार्जनमें तत्पर होना चाहिये। अन्नार्थी कृपण व्यक्ति जिन दुःखोंकों भोगता है, यदि धर्मार्थी होकर वह उन दु:खोंका चिन्तन करे तो पुनः उसको दुःखका पात्र होना ही न पड़े। सभी प्रकारकी शुचितामें अन्नकी शुचिता ही प्रधान है। जो मनुष्य अन्न और अर्थसे पवित्र है [वही शुचि है]। केवल मिट्टी और जलसे शुचिता नहीं आती।
(येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण गता: श्रिय:।
धर्मार्थी च महाँल्लोके तत् स्मृत्वा ह्यामार्थकारणातू॥
अन्नार्थी यानि दुःखानि करोति कृपणो जन:।
तान्येव यदि धर्मार्थी न भूय: क्लेशभाजनमू॥
सर्वेषामेव शौचानामन्नशौचं विशिष्यते।
योऽन्नार्थैं: शुचि: शौचान्न मृदा वारिणा शुचि:॥)
सत्यपालनमें शुचिता, मनःशुद्धि, इन्द्रियनिग्रह, सभी प्राणियोंमें दया और जलसे प्रक्षालन - ये पाँच प्रकारके शौच माने गये हैं। जिसमें सत्यपालनकी शुचिता है, उसके लिये स्वर्गकी प्राप्ति दुर्लभ नहीं है। जो मनुष्य सत्य ही सम्भाषण करता है, वह अश्वमेधयज्ञ करनेवाले व्यक्तिसे भी बढ़कर है -
सत्यं शौचं मन:शौचं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
सर्वभूते दया शौचं जलशौचं च पञ्चमम्॥
यस्य सत्यं हि शौचं च तस्य स्वर्गो न दुर्लभ:।
सत्यं हि वचनं यस्य सोऽश्वमेधाद्विशिष्यते॥
दुष्ट स्वभावसे अपनी आत्माको दबाकर रखनेवाला दुराचारी पुरुष हजारों बार मिट्टीके लेप तथा सैकड़ों बार जलके प्रक्षालनसे पवित्र नहीं हो सकता। जिसके हाथ - पैर एवं मन सुसंयत हैं, जिसे अध्यात्म - विद्या प्राप्त है, जो धर्मपालनके लिये कष्ट सहन करता है तथा जिसने सत्कीर्ति अर्जित की है, वही तीर्थोंका यथार्थ फल भी भोगता है -
यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्।
विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते॥
जो मनुष्य सम्मानसे प्रसन्न नहीं होता, अपमानसे क्रुद्ध नहीं होता एवं क्रोधके आनेपर मुँहसे कठोर वाक्य नहीं निकालता, ऐसे ही मनुष्यको साधुपुरुष समझना चाहिये -
न प्रहृष्यति सम्मानैर्नावमानै: प्रकुप्यति।
न क्रुद्धः परुषं ब्रूयादेतत् साधोस्तु लक्षणम्॥
विद्वान, मधुरभाषी भी कोई व्यक्ति यदि दरिद्र है तो उसके समयोचित हितकारी वचनको सुनकर भी कोई संतुष्ट नहीं होता है। यदि कोई मनुष्य मन्त्र या बलके प्रभावसे अथवा बुद्धि और पौरुषके बलपर अलभ्य - अदृष्ट वस्तुको प्राप्त नहीं कर पा रहा है तो उस विषयमें मनुष्यको किसी प्रकारका खेद नहीं करना चाहिये।
अयाचित कोई वस्तु मुझे प्राप्त हो और पुनः वह मेरे पाससे चली जाय तो कष्ट होता है, किंतु जो जहाँसे आयी थी वह पुनः वहीं चली गयी तो उसमें कैसा दुःख? दुःख करनेका कोई औचित्य ही नहीं है। रात्रिमें सदैव एक ही वृक्षपर नाना प्रकारके पक्षियोंका समूह शरण लेता है, किंतु प्रातःकाल होते ही वे सभी भिन्न - भिन्न दिशाओंमें चले जाते हैं। उस आश्रयके विषयमें उन लोगोंको कौन - सा दुःख होता है? इसी दृष्टान्तको ध्यानमें रखकर मनुष्योंको वियोगजन्य दुःखमें खिन्न नहीं होना चाहिये । एक साथ सामूहिक रूपमें चलनेवालोंमें यदि कोई एक त्वरित गतिसे चल रहा है तो उससे ईर्ष्या क्यों की जाय?
हे शौनक! सभी प्राणियों या पदार्थोंकी उत्पत्तिके पूर्वमें स्थिति नहीं थी और निधनके अन्तमें भी उनकी स्थिति नहीं रहेगी। सभी पदार्थ मध्यमें ही विद्यमान रहते हैं। इसमें दुःख करनेकी क्या बात है -
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि शौनक।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
समय प्राप्त न होनेसे पहले प्राणी सैकड़ों बाण लगनेपर भी नहीं मरता और समयके आ जानेपर कुशकी नोंक लग जानेसे भी वह जीवित नहीं रहता।
(नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि।
कुशाग्रेण तु संस्पृष्ट: प्राप्कालो न जीवति॥)
प्राप्त होने योग्य वस्तु ही प्राप्त होती है, गन्तव्य स्थानपर ही व्यक्ति जाता है। अतः प्राणीको जो दुःख - सुख प्राप्त होने योग्य है वही उसको प्राप्त होता है।
मनुष्य प्राप्त होने योग्य अमुक - अमुक वस्तुको ही प्राप्त करता है तो वह अभिलषित वस्तुके लिये नाना प्रकारसे प्रयास करके कया प्राप्त कर लेगा? उसका तो अपनेको अभावग्रस्त समझकर प्रलाप करना व्यर्थ ही है।
जिस प्रकार प्रार्थना आदिके बिना ही यथासमय वृक्षके द्वारा प्राणीको अपने समयपर ही फल - फूलकी प्राप्ति हो जाती है, उसी प्रकार पूर्वजन्मकृत कर्म भी अपने समयके अनुसार यथोचित फल देता है। व्यक्तिमें अवस्थित शील, कुल, विद्या, ज्ञान, गुण तथा कुल-शुद्धि उसको कुछ देनेमें समर्थ नहीं हैं। पूर्वजन्मकृत तपसे प्राप्त हुआ उसका भाग्य ही समयके अनुसार वृक्षकी भाँति उसे फल देता है।
(आचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च।
स्वकालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम्॥
शीलं कुलं नैव च चैव विद्या ज्ञानं गुणा नैव न बीजशुद्धि:।
भाग्यानि पूर्वं तपसार्जितानि काले फलन्त्यस्य यथैव वृक्षा:॥)
प्राणीकी मृत्यु वहाँ होती है, जहाँ उसका हन्ता विद्यमान रहता है। लक्ष्मी वहीं निवास करती है, जहाँ सम्पत्तियाँ रहती हैं। ऐसे ही अपने कर्मसे प्रेरित होकर प्राणी स्वयं ही उन - उन स्थानोंपर पहुँच जाता है। पूर्वजन्ममें किया गया कर्म कर्ताकि पीछे - पीछे वैसे ही रहता है, जैसे गोष्ठमें हजार गायोंके रहनेपर भी बछड़ा अपनी माताको प्राप्त कर लेता है -
तत्र मृत्युर्यत्र हन्ता तत्र श्रीर्यत्र सम्पद:।
तत्र तत्र स्वयं याति प्रेर्यमाण: स्वकर्मभि:॥
भूतपूर्वं कृतं कर्म कर्तारमनुतिष्ठति।
यथा धेनुसहस्त्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्॥
हे मूर्ख प्राणी! इस प्रकार जब पूर्वजन्म कृत कर्म कर्तामें ही अवस्थित रहता है तो अपने पुण्यका फल भोगो। तुम क्यों संतप्त हो रहे हो? जैसा पूर्वजन्ममें शुभ अथवा अशुभ कर्म किया गया है, वैसा ही फल जन्मान्तरमें कर्ताका अनुसरण करता है, उसके पीछे - पीछे चलता है।
नीच व्यक्ति दूसरेमें सरसोंके बराबर भी स्थित दोष-छिद्रोंको देखता है, किंतु अपनेमें बेल (फल) - के समान अवस्थित दोषोंको देखते हुए भी नहीं देखता।
(नीच: सर्षपमात्राणि परच्छिद्राण पश्यति।
आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति॥)
हे द्विज! राग - द्वेषादिक दोषोंसे युक्त प्राणियोंको कहींपर भी सुख नहीं है। मैं भली प्रकारसे विचार करके यह देखता हूँ कि जहाँ संतोष है, वहाँ सुख है। जहाँ स्नेह है, वहीं भय है। अतः स्नेह ही दुःखका कारण है। प्राणियोंमें स्नेह उत्पन्न करनेके जो मूल हैं, वे ही दुःखके कारण हैं। अत: उनका परित्याग कर देनेपर अर्थात् उनके प्रति अपनी आसक्तिको समाप्त कर देनेसे प्राणीको महान् सुखकी प्राप्ति होती है।
(रागद्वेषादियुक्तानां न सुख कुत्रचिद् द्विज।
विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृति:॥
यत्र स्नेहो भयं तत्र स्नेहों दुःखस्य भाजनम्।
स्नेहमूलानि दुःखानि तस्सिस्त्यक्ते महत्सुखम्॥)
यह शरीर ही दुःख और सुखका घर है। उत्पन्न हुए शरीरके साथ ही वह दुःख - सुख भी उत्पन्न होता है।
पराधीनता ही दुःख है और स्वाधीनता ही सुख है। संक्षेपमें यही सुख - दुःखका लक्षण समझना चाहिये। प्राणीको सुखभोगके पश्चात् दुःख और दुःखके बाद सुखका भोग प्राप्त होता है। इस तरह मनुष्योंके सुख - दुःख चक्रके समान परिवर्तित होते रहते हैं। जो मनुष्य भूतकालिक विषयवस्तुको समाप्त हुआ मान लेता है और भविष्यमें होनेवालेको बहुत दूर समझता है एवं वर्तमानमें अनासक्त - भावसे रहता है, वह किसी भी प्रकारके शोकसे दुःखी नहीं होता।
(सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयो:॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम्।
सुखं दुःखं मनुष्याणां चक्रवत् परिवर्तते॥
यद्गतं तदतिक्रान्तं यदि स्यात् तच्च दूरत:।
वर्तमानेन वर्तेत न स शोकेन बाध्यते॥)