गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
207 - छन्द - विधान
सूतजीने कहा - अब मैं वासुदेव, गुरु, गणपति, शम्भु और सरस्वतीको नमस्कार करके अल्प बुद्धिवालोंके लिये विशिष्ट बुद्धिकी प्राप्ति - हेतु मात्रा और वर्णके भेदके अनुसार छन्द - विधानको कहता हूँ।
सभी गणोंमें आदि, मध्य और अन्त होता है। इसके अतिरिक्त इनमें गुरु तथा लघु होते हैं। (इन्हीं गुरु तथा लघु वर्णोंसे आठ गणोंकी रचना हुई है, जो यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण और सगण हैं ।) लघु (ह्रस्व) - वर्णको ल एवं दीर्घ वर्णको ग कहा गया है। तीन गुरुवर्ण (ऽऽऽ) - को ‘मगण’, तीन लघुवर्ण(।।।) - को ‘नगण’, प्रथम गुरु और दो लघु (ऽ।।) होनेपर ‘भगण’, आदि लघु और इसके बाद दो गुरु (।ऽऽ) होनेपर ‘यगण’, दो आगे - पीछे लघु और मध्यवर्ण गुरु (।ऽ।)होनेपर ‘जगण’, मध्यवर्ण लघु और दोनों ओर दो वर्ण गुरु (।।ऽ) होनेपर ‘रगण’, अन्तवर्ण गुरु और उसके पूर्वके दो वर्ण लघु (।।ऽ) होनेपर ‘सगण’ तथा अन्तवर्ण लघु और उसके पूर्व दो वर्ण गुरु (ऽऽ।)होनेपर ‘तगण’- इस प्रकार तीन - तीन वर्णका एक - एक गण होता है। आर्या छन्द चतुष्कला है, इसके आदि, अन्त तथा मध्य सभी जगह चार - चार गण रहते हैं। व्यञ्जनान्त, विसर्गान्त, अनुस्वारयुक्त, दीर्घ एवं संयुक्त वर्णका पहला वर्ण गुरु होता है। पदके अन्तमें स्थित वर्ण विकल्पसे गुरु होता है। गुरुवर्ण दीर्घ मात्रावाला होता है। श्लोककी श्रवणकी मधुरता आदिके लिये कभी - कभी गुरुवर्ण भी लघुके रूपमें व्यवहृत होता है। छन्दोंको श्लोक तथा आर्यादिके नामोंसे अभिहित किया जाता है। विच्छेद स्थानको यति (विराम) कहा जाता है। इसका नाम विच्छेदन भी है। निर्दिष्ट स्थानमें यति न होनेपर यतिच्छेद या यतिभड्ग होता है। श्लोकके चतुर्थांशको पाद कहा जाता है। समान अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पादको युक् कहा जाता है। विषम अर्थात् प्रथम और तृतीय पादको अयुक् कहा जाता है, वृत्त अर्थात् जिसकी अक्षर - संख्या निर्दिष्ट होती है, वे छन्द तीन प्रकारके हैं - समवृत्त, अर्धसमवृत्त और विषमवृत्त।