228 - नामसंकीर्तनकी महिमा

सूतजीने कहा - मुक्तिके कारणभूत, अनादि, अनन्त, अज, नित्य, अव्यय और अक्षय भगवान्‌ विष्णुको जो मनुष्य नमन करता है, वह समस्त संसारके लिये नमस्कारके योग्य हो जाता है। मैं आनन्द स्वरूप, अद्वैत, विज्ञानमय, सर्वव्यापक एवं सभीके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान्‌ विष्णुको भक्तिभावसे भरे हुए एकाग्र - मनसे सदा प्रणाम करता हूँ। जो ईश्वर अन्तःकरणमें विराजमान रहकर सभीके शुभाशुभ कर्मोंको देखते हैं, उन सर्वसाक्षी परमेश्वर विष्णुको मेरा नमन है।

शरीरमें शक्ति रहते हुए जो मनुष्य भगवान्‌ चक्रपाणि विष्णुको प्रणाम नहीं करता, उससे इस संसारके अति तुच्छ तृण भी उद्विग्न रहते हैं। जलसे परिपूर्ण नूतन - श्यामल मेघों - जैसी सुन्दर कान्तिवाले, लोकनाथ, परमपुरुष तथा अप्रमेय भगवान्‌ कृष्णको भाव - विभोर होकर दृढ़ भक्तिके साथ मात्र एक बार किया गया प्रणाम श्वपच(चाण्डाल) - को भी तत्काल उत्तम गति देनेमें सक्षम है। जो व्यक्ति पृथ्वीपर दण्डवत्‌ प्रणाम करते हुए भगवान्‌ हरिकी पूजा करता है, उसको वह गति प्राप्त होती है, जो सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे भी सम्भव नहीं है। जंगल एवं समुद्रकी भाँति दुर्गम संसारमें दौड़ते हुए पुरुषोंको कृष्णके लिये उनके द्वारा किया गया एक ही प्रणाम उन्हें मुक्ति प्रदान करके तार देगा। बैठा हो, शयन कर रहा हो अथवा जहाँ कहीं भी रह रहा हो - हर स्थितिमें कल्याणकामी पुरुषको ‘नमो नारायणाय’ मन्त्रका स्मरण करना चाहिये।

‘नारायण’ यह शब्द सुलभ है और वागिन्द्रिय मनुष्यके वशमें है, फिर भी मूर्ख मनुष्य नरकमें गिरता है, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा! यदि कोई चार मुखोंसे युक्त हो जाय अथवा उसके करोड़ों मुख हो जायँ, चाहे कोई विशुद्ध चित्तवाला मनुष्य हो, फिर भी वह देवश्रेष्ठ भगवान्‌ विष्णुके गुणोंसे सम्बन्धित दस हजारें भागका भी वर्णन नहीं कर सकता मधुसूदन(श्रीविष्णु) - की स्तुति करनेवाले व्यास आदि मुनि अपनी बुद्धिकी क्षीणताके कारण श्रीविष्णुके गुण - वर्णनसे विरत होते हैं न कि श्रीविष्णुके गुणोंकी इयत्ताके कारण। सिंहसे डरकर मृग जैसे तत्काल भाग जाते हैं वैसे ही श्रीविष्णुके नामोंका कीर्तन करनेसे अशक्त व्यक्तिके भी सभी पातक तत्काल नष्ट हो जाते हैं और निष्पाप होनेके कारण वह व्यक्ति अपने पूरे परिवारके साथ मोक्षके लिये संनद्ध हो जाता है।

स्वप्नमें भी भगवान्‌ नारायणका नाम लेनेवाला मनुष्य अपनी अक्षय पापराशिको विनष्ट कर देता है। यदि कोई मनुष्य प्रबोध - दशामें परात्पर विष्णुका नाम लेता है तो फिर उसके विषयमें कहना ही क्या? ‘हे कृष्ण! हे अच्युत! हे अनन्त! हे वासुदेव! आपको नमस्कार है।’ ऐसा कहकर जो भक्तिभावसे श्रीविष्णुको प्रणाम करते हैं, वे यमपुरी नहीं जाते। अग्निके प्रज्वलित होनेपर अथवा सूर्यके उदित हो जानेपर जैसे अन्धकार विनष्ट हो जाता है, वैसे ही हरिका नाम संकीर्तन करनेसे प्राणियोंके पाप - समूहका विनाश हो जाता है। नाम संकीर्तनसे जिस नित्य सर्वोत्तम अक्षय सुखका अनुभव होता है, उसके सम्मुख अनित्य क्षयशील स्वर्गसुख सर्वथा नगण्य है। जिनका चित्त श्रीकृष्ण चिन्तनमें ही प्रतिक्षण रम रहा है, उनके लिये श्रीकृष्ण धामतक पहुँचनेके लंबे मार्गमें कृष्ण नाम संकीर्तन सर्वोत्तम पाथेय(अनुपम अवलम्ब)है। संसार रूपी सर्पके दंशसे व्याप्त विषके भयंकर उपद्रवको शान्त करनेके लिये एकमात्र औषध ‘श्रीकृष्ण’ नाम है। इस वैष्णव मन्त्रका जप करके मनुष्य संसार बन्धनसे मुक्त हो जाता है -

पाथेयं पुण्डरीकाक्ष नामसंकीर्तन हरेः।

संसारसर्पसंदष्टविषचेष्टैकभेषजम्‌॥

कृतयुगमें भगवान्‌ हरिका ध्यान करते हुए, त्रेतायुगमें इन्हीं भगवान्‌ हरिके मन्त्रोंका जप करते हुए, द्वापरमें इन्हींकी पूजा करते हुए, जो फल प्राणियोंको प्राप्त होता है, वही फल कलियुगमें मनुष्य उन्हीं भगवान्‌ ‘केशव’ के स्मरण मात्रसे प्राप्त कर लेता है -

ध्यायन्‌ कृते जपन्‌ मन्त्रैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्‌।

यदाप्नेति तदाप्नोति कलौ संस्मृत्य केशवम्‌॥

जिस व्यक्तिकी जिह्वाके अग्रभागमें ‘हरि’ ये दो अक्षर विद्यमान होते हैं, वह इस संसार सागरको पार कर विष्णु - पदको प्राप्त करनेमें सफल हो जाता है -

जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्‌।

संसारसागरं तीर्त्वा स गच्छेद्वैष्णवं पदम्‌॥

ज्ञानपूर्वक किये गये हजारों पापोंसे परिशुद्धि प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिके लिये भगवान्‌का नाम परम कल्याणकारी है।भगवान्‌ नारायणके स्तवन और गुणानुवादसे भरी हुई कथाओंके श्रवणमें निमग्न रहनेवाला व्यक्ति स्वप्नमें भी इस संसारको नहीं देखता -

विज्ञातदुष्कृतिसहस्त्रसमावृतोऽपि

श्रेय: परं तु परिशुद्धिमभीप्समान:।

स्वप्नान्तरे न हि पुनश्च भवं स पश्ये -

न्नारायणस्तुतिकथापरमो मनुष्य:॥