गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
159 - प्रमेहरोग - निदान
धन्वन्तरिजीने कहा - हे सुश्रुत! अब मैं आपको प्रमेह(च०चि0 ७, वा0 नि0 10 ।)- रोगोंका निदान सुनाऊँगा, उसे सुनें।
प्रमेह बीस प्रकारके होते हैं। उनमें दस प्रमेह कफजन्य, छ: प्रमेह पित्तजन्य और चार प्रमेह वातजन्य हैं। इन सभीमें मेद, मूत्र और कफकी संसृष्टि होती है।
प्रमेहका सबसे पहला प्रकार हारिद्रमेह है। इस प्रमेहके होनेपर रोगीको कटु, रसमिश्रित मूत्र हल्दीके समान मल - मूत्र होता है। इस प्रमेहका दूसरा प्रकार मंजिष्ठामेह है। मंजिष्ठामेहके होनेपर मंजिष्ठ (मजीठ) - वर्णके जलके सदृश होता है। इसका तीसरा प्रकार है रक्तमेह। इस रक्तमेहके होनेपर रक्तवर्णकी आभावाला कच्चे मांसकी गन्धसे समन्वित उष्ण तथा लवण - तत्त्व - मिश्रित मूत्र होता है। वसामेहमें चर्बी - मिला हुआ मूत्र अथवा केवल चर्बी ही बार - बार निकलती है। वसायुक्त मज्जामेही व्यक्ति वर्ण और गन्धमें समानता रखनेवाले मजा - तत्त्वसे संश्लिष्ट मूत्रत्याग करता है।
जब प्राणी मतवाले हाथीके समान असंयमित वेगसे अधिक समयतक मूत्र निकालता है, जिसके साथ एक चिपचिपा पदार्थ भी आता है और यह यदा - कदा बीच - बीचमें रुक भी जाता है तो उस रोगीको हस्तिमेही मानना चाहिये। हस्तिमेह प्रायः वृद्धावस्थामें होता है। जब व्यक्तिको मधुके समान मूत्र होता है अर्थात् उस मूत्रमें शरीरके अंदर विद्यमान मधुर रसका तत्त्व आने लगता है तो उसे मधुमेही कहा जाता है। यह दो प्रकारका माना गया है। एक तो धातुके क्षीण होनेपर वायुके कुपित होनेसे तथा दूसरा पित्तादि दोषसे वायुका मार्ग रुक जानेसे।
इस प्रमेहसे(च०चि०अ0 6 , अ०हृ०नि०अ0 17।) घिरा हुआ रोगी प्राय: अन्य सभी दोषजन्य प्रमेहोंके लक्षणोंसे संयुक्त हो जाता है। ऐसे रोगीमें अन्य दोषोंके लक्षणोंका आगमन कोई कारण नहीं रखता। यह रोग तो अपनी प्रबलताके प्रभावसे उन्हें बिना निमित्तके ही रोगीके शरीरपर प्रकट कर देता है। यह ऐसा प्रमेह है कि क्षणमात्रमें नष्ट हो सकता है और क्षणमात्रमें ही अपने पूर्ण बलके साथ उभर सकता है। अतः रोगीको चाहिये कि वह कष्ट उठाकर भी इस वर्गभेदवाले मधुमेहरोगका निदान कर ले। इसकी सामयिक उपेक्षा कर देनेपर प्राणीके शरीरका सब कुछ मधुमेहताको ही प्राप्त कर लेता है अर्थात् शरीरके समस्त स्रोतोंमें इसका विकार पहुँच जाता है और एक दिन मधुमेहके अतिरिक्त कुछ शेष ही नहीं रह जाता तथा उसकी असामयिक मृत्यु हो जाती है। इसका विस्तार हो जानेपर सभी प्रकारके मेहरोगोंमें रोगी प्रायः मधुके समान ही गाढ़ा मूत्र नलीसे निकालता है। शरीरमें जो मधुरता है, वह मधुरता इन सभी प्रमेहोंमें नष्ट होती है, इसलिये इन सभी प्रमेहोंको मधुमेह ही कहा जाता है। इस प्रमेहरोगमें रोगी अपच, अरुचि, बमन, अनिद्रा, खाँसी और पीनसके उपद्रवसे ग्रस्त हो जाता है।
क्रफजन्य प्रमेहमें वस्ति तथा मूत्राशय - भागमें पीड़ा, हृष्ट - पुष्ट शरीरका क्षरण और ज्वरके उपद्रव जन्म लेते हैं। पित्तप्रमेह होनेपर रोगीके शरीरमें दाह) तृष्णा, खट्टी डकार, मूर्च्छा, अतिसार एवं मलभेदका विकार होता है। वातज प्रमेहमें उदावर्त, कम्पन, हृदयवेदना, बेचैनी, शूल, अनिद्रा, शुष्कता, श्वास तथा खाँसीके विकार पैदा हो जाते हैं।
शराविका, कच्छपिका, ज्वालिनी, विनता, अलजी, मसूरिका, सर्षपिका, पुत्रिणी, सविदारिका और विद्रधि नामक दस प्रकारकी फुंसियाँ प्रमेह - रोगोंकी उपेक्षा कर देनेपर उत्पन्न होती हैं।
प्राय: कफजन्य(वा०नि0 1०, अ०हृ०नि०अ0 1०।) दोषसे संश्लिष्ट होनेके कारण खाया हुआ अन्न प्रमेहरोगके रूपमें परिणत हो जाता है। उसका रस मूत्रके मार्गसे निकल जाता है। मधुर, अम्ल, लवण, स्निग्ध, भारी, चिकना और शीतल पेय, नया चावल, मदिरा, मिर्च - मसाला, मांस, इक्षुरस, गुड़, गोरसके सेवन, एक स्थान और एक आसनपर शयन इस मधुमेहरोगके उत्पादक हैं। इस प्रमेहरोगके होनेसे कफ वस्तिभागमें पहुँचकर उसको दूषित कर देता है। तदनन्तर वह स्वेद, मेदा, वसा और मांससे युक्त शरीरको दूषित करके शिथिल बना देता है।
जब कफ पहले क्षीण हो जाता है तो वायु मूत्रके सहित पित्त, रक्त और धातुको वस्तिभागमें लाकर उसका वहींपर विनाश करता है। साध्य - असाध्य प्रतीत होनेवाले जो मेह हैं, वे सभी इसी वायु - विकारसे ही उत्पन्न होते हैं। जब वायु, पित्त और कफकी मात्रा निर्दुष्ट होकर समान रहती है, तब मेह भी समान - भावसे रहता है।
उक्त प्रमेह - भेदोंका सामान्य लक्षण तो प्रचुर मात्रामें विकृत मूत्रका होना है, किंतु शरीरमें उस विकारके संयुक्त होते ही विशेष परिस्थितिमें भी पड़े हुए मनुष्यके लिये अपेक्षित है कि उस दोषका निवारण कर ले। मूत्रके वर्णादिक लक्षणोंके अनुसार इन प्रमेहरोगोंमें भेदकी कल्पना की जाती है। यह मेहरोग दस प्रकारका है। सामान्यतः मूत्र स्वच्छ,अत्यन्त श्वेत, शीतल, गन्धहीन तथा जलके समान होता है, किंतु जो प्राणी उदकमेहसे ग्रसित है, वह कुछ मटमैले और चिपचिपे मूत्रका क्षरण करता है। इक्षुमेह - रोगीके शरीरसे इक्षुरसके समान अत्यन्त मधुर मूत्र निकलता है। सान्द्रमेहसे प्रभावित रोगी बासी रखे हुए जलके समान मूत्र छोड़ता है। सुरामेही रोगीका मूत्रस्राव सुरा (मदिरा) - के सदृश होता है, जो ऊपरसे देखनेमें स्वच्छ तथा - सान्द्र प्रतीत होता है, किंतु अंदरसे गाढ़ा रहता है। पिष्टमेहसे ग्रसित रोगीको प्रायः मूत्रस्रावके समय रोमाञ्च हो उठता है। वह तण्डुलमिश्रित जलके समान अत्यन्त श्वेत मूत्रका परित्याग करता है। जो शुक्रमेही है, उसको शुक्रमिश्रित अथवा शुक्रके समान वर्णवाला मूत्र गिरता है। सिकता अर्थात् रेतमेहसे पीड़ित व्यक्तिको रेतके समान ही मूत्र तथा उसके सदृश मल अथवा विकार हो जाता है। शीतमेही रोगीको प्रायः अधिक मात्रामें मधुर और अत्यन्त शीतल मूत्र गिरता है। जो रोगी शनैर्मेही विकारसे संतप्त होता है, वह धीरे - धीरे, बार - बार, मन्द - मन्द गतिसे मूत्र - क्षरण किया करता है।
लालामेही रोगी लालातन्तु अर्थात् लारके समान तार बनानेवाले चिपचिपे मूत्रकी धार छोड़ता है। क्षारमेह(मा०नि०प्र0 33 - 13,14।) होनेपर रोगी गन्ध, वर्ण, रस तथा स्पर्श समान क्षारयुक्त मूत्र करता है। नीलमेही नीलवर्णके समान और मसी अर्थात् स्याहीके सदृश कृष्णवर्णवाले मूत्रका परित्याग करता है।
संधिस्थान(वा०नि0 10 , अ०हृ०नि०अ0 10 , सु०नि0 6।) , मर्मस्थल, मांसलभाग तथा कोष्ठ - प्रदेशोंमें जो प्रमेह पिडिका होती है, वह अन्तमें उन्नत, मध्यमें निम्न, आर्द्रतासे रहित और सहन करनेवाली पीड़ासे समन्वित होती है।
जो पिडिका (फुंसी) किनारोंपर ऊँची, बीचमें नीची, श्यामवर्ण, क्लेद और वेदनासे युक्त होती है तथा जिसकी शराव (मिट्टीका कसोरा) - के समान स्थिति और आकृति होती है, उसे शराविका कहते हैं। जो पिडिका कछुएके समान होती है और उसमें जलन रहती है, उस पिडिकाको विद्वान् लोग कच्छपिका नामसे स्वीकार करते हैं। बहुत बड़ी नीलवर्णके समान दिखायी देनेवाली पिडिकाको विनताके नामसे माना गया है। शरीस्में जिस पिडिकाके उभर आनेसे त्वचामें जलन होती और रोगी कष्टका अनुभव करता है, उस पिडिकाको ज्वालिनी कहा जाता है। रक्त - श्वेत तथा स्फोटका रूप धारण करनेवाली कठोर पिडिकाका नाम अलजी है। जो पिडिकाएँ मसूरके समान आकृतिवाली हैं, उन्हें मसूरिकाके नामसे जानना चाहिये। जिह्नामें सरसोंके समान छोटे - छोटे उभरे हुए दानोंको सर्षपिका कहा जाता है, जो रोगीको अत्यधिक कष्ट देते हैं। पुत्रिणी नामक पिडिका बड़ी अथवा छोटी होती है। यह अत्यन्त सूक्ष्म भी हो सकती है। जो पिडिका विदारीकन्दके समान गोल तथा कठोर होती है, उसका नाम विदारिका है। विद्रधिके लक्षणोंसे युक्त अर्थात् पीपसे युक्त पिडिकाको विद्रधिका कहा जाता है।
पुत्रिणी और विदारी नामक प्रमेहजनित पिडिकाएँ अत्यन्त कष्टकारी होती हैं। सद्यः पित्तके प्रकुपित होनेसे मेदको अल्प मात्रामें विकृत करनेवाली अन्य पिडिकाएँ उत्पन्न होती हैं। प्रायः शरीरमें जैसे - जैसे दोषकी अभिवृद्धि होती है, वैसे - ही - वैसे उन सभी पिडिकाओंका आविर्भाव होता है। मेदको विकृत करनेवाली इन पिडिकाओंका जन्म तो बिना प्रमेहेक भी हो सकता है। जबतक पिडिका वर्णरहित होती है, तबतक उसके प्रधान लक्षणको निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता। जो हल्दीके समान अथवा रक्तवर्ण या प्रारम्भिक स्वरूपका परित्याग करनेवाले रक्त मूत्रका क्षरण करता है, उसको प्रमेहरोगके बिना रक्तपित्तरोग जानना चाहिये। रक्तपित्तरोगके प्रभावसे ही मूत्रका रंग हरिद्रा एवं रक्तवर्णका हो जाता है।
प्रमेहरोगका(वा०नि0 10। ) पूर्वरूपमें स्वेद, अङ्ग - विशेषमें अप्रिय गन्ध और अङ्गोमें शिथिलता, शय्या ,भोजन, निद्रा तथा सुखकी आसक्ति, हृदय, नेत्र, जिह्वा एवं कानोंमें असाधारण या साधारण भारीपन, जलन, बाल और नाखूनोंमें अभिवृद्धि, शीतल यदार्थोंकि प्रति प्रेम, कण्ठ तथा तालुमें शोथ, मुखपर माधुर्यभाव और हाथ - पैरमें जलनके लक्षण दिखायी देते हैं। प्रायः इन सभी प्रमेहरोगोंके रोगीके द्वारा किये गये मूत्रपर चीटियाँ दौड़ने लगती हैं।
प्रमेहरोगमें तृष्णा, मधुरता तथा चिकनाहटका लक्षण तो सामान्य है, किंतु मधुमेह होनेपर अनेक प्रकारके विकारोंका जन्म हो जाता है। शरीरमें इस रोगके परिव्याप्त होनेपर इसकी उत्पत्तिका कारण कफजन्य मानना चाहिये अथवा सभी दोषोंके क्षीण हो जानेपर यदि प्रमेहका कोई विकार दिखायी देता है तो वह वायुजन्य होता है। प्रमेहके ये सभी प्रकार तो कफ और पित्तसे युक्त होते हैं, यथाक्रम जिनकी उत्पत्ति रति - प्रसंगकी आसक्तिके कारण रोगीके मूत्र - भागमें होती है। जो प्रमेह पित्तदोषके कारण उत्पन्न होते हैं, वे याप्य हैं। साध्य वही प्रमेय होता है जो अपने सम्पूर्ण लक्षणोंसे समन्वित होकर रोगीके शरीरमें दिखायी नहीं देता। यदि वह सभी लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है तो उसका निवारण असम्भव ही है।