74 - पुष्पराग मणिकी परीक्षा - विधि

सूतजीने पुनः कहा - देवशत्रु बलासुरके शरीरकी त्वचा हिमालय पर्वतपर गिरी थी, जिनसे महागुणसम्पन्न पुष्परागमणियोंका प्रादुर्भाव हुआ। जो पाषाण पूर्णपीत एवं पाण्डुरवर्णकी सुन्दर आभासे समन्वित रहता है, उसका नाम ‘पद्मराग’है। यदि वह लोहित और पीतवर्णकी आभासे युक्त है तो उसको ‘कौकण्टक’नामसे जानना चाहिये।

जो पाषाण पूर्ण लोहित एवं सामान्य पीतवर्णसे संयुक्त होता है, उसे ‘काषायकमणि’कहते हैं। जिस पत्थरका वर्ण पूर्णरूपसे नीला और शुक्लवर्ण समन्वित तथा स्निग्ध होता है, वह सोमालक गुणयुक्त मणि है। जो पत्थर अत्यन्त लोहित वर्णका होता है, उसीको ‘पद्मराग’कहा जाता है। जो पूर्ण नीलवर्णकी सुन्दर आभासे सम्पन्न रहता है, उसे ‘इन्द्रनीलमणि’ कहते हैं।

मणि शास्त्रवेत्ताओंने वैदूर्य मणिके समान ही पुष्पराग मणिका मूल्य स्वीकार किया है। इसको धारण करनेसे वही फल प्राप्त होते हैं, जो वैदूर्य मणिके धारणसे होते हैं। नारियोंके द्वारा धारण किये जानेपर यह मणि उन्हें ‘पुत्र’ प्रदान करती है।