गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
34 - भगवान् हयग्रीवके पूजनकी विधि
रुद्रने कहा - हे हृषीकेश! हे गदाधर! आप पुनः देवार्चन विधिको बतायें। आपके द्वारा बार - बार देव - पूजन विधिको सुनकर भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है।
श्रीहरिने कहा - हे रुद्र! अब मैं हयग्रीव नामके देवके पूजन विधानको कहता हूँ, आप सुनें। उसके करनेसे जगतके स्वामी भगवान् विष्णु अत्यन्त संतुष्ट हो जायँगे।
हे शङ्कर! उस पूजनका मूल मन्त्र हयग्रीव देवका ही वाचक है। वह परम पुण्यशाली मन्त्र इस प्रकार है -
'ॐ सौं क्षौं शिरसे नमः' यह प्रणव - युक्त मन्त्र सभी प्रकारकी विद्याओंको प्रदान करनेवाला है।
'ॐ क्षां हृदयाय नम:, ॐ क्षीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्षूं शिखायै वषट्,
ॐ क्षै कवचाय हुम्, ॐ क्षौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ ह: अस्त्राय फट्
- इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास और करन्यास करना चाहिये।
हे शङ्कर! वे हयग्रीव देव शङ्ख , कुन्दपुष्प, चन्द्रके सदृश श्रेतवर्ण, कमलनालतन्तु और रजतधातुकी कान्तिके समान देहकान्तिको धारण करनेवाले, गौके दुग्धकी भाँति और करोड़ों सूर्योके सदृश प्रतिभासित होनेवाले, शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्मको धारण किये हुए चार भुजावाले हैं। वे सर्वव्यापी देवता मुकुट, कुण्डल, वनमालासे सुशोभित, सुदर्शनचक्रसे युक्त, सुन्दर - सुन्दर कपोलोंवाले, पीताम्बरको धारण किये हुए हैं।
सभी देवोंसे युक्त उन विराट्देवकी अपनेमें भावना करके अङ्गमन्त्रोंसे तथा मूल मन्त्रसे न्यास करना चाहिये। इसके पश्चात् मूल मन्त्रसे ही शङ्ख, पद्मादिकी मङ्गलमयी मुद्राएँ प्रदर्शित करनी चाहिये। हे शङ्कर! इस प्रकार मुद्राएँ दिखा करके मूल मन्त्रसे विष्णुका ध्यान करके अर्चा करनी चाहिये।
हे रुद्र! इसके बाद हयग्रीवके आसनके संनिकट अवस्थित रहनेवाले जो अन्य देव हैं, उनका आवाहन करना चाहिये। यथा -
'ॐ हयग्रीवासनस्य आगच्छत च देवता:।'
- इस प्रकार आवाहन करके स्वस्तिक या सर्वतोभद्र मण्डलके अन्तर्गत उन देवोंका पूजन करके द्वारपर धाता और विधाताकी पूजा सम्पन्न करनी चाहिये।
है वृषध्वज! 'समस्तपरिवाराय अच्युताय नमः'- इस मन्त्रसे मण्डलके मध्यमें भगवान् विष्णुका पूजन करके द्वारपर गङ्गा , महादेवी तथा शङ्ख एवं पद्म नामक निधिकी पूजा करके अग्रभागमें गरुड तथा मध्यभागमें आधार नामवाली शक्तिकी पूजा करनी चाहिये।
हे महादेव! तदनन्तर कूर्म, अनन्त एवं पृथ्वीका पूजन करे और अग्निकोणमें धर्म, नैर्ऋत्यकोणमें ज्ञान, वायुकोणमें वैराग्य तथा ईशान कोणमें ऐश्वर्यका पूजन करना चाहिये। इसके बाद पूर्व दिशामें अधर्म, दक्षिण दिशामें अज्ञान, पश्चिम दिशामें अवैराग्य तथा उत्तर दिशामें अनैश्वर्यका भी पूजन करना चाहिये। इसके बाद मण्डलके मध्यमें सत्त्व, रजस् तथा तमस्-इन तीन गुणोंकी पूजा करके मध्यभागमें ही कन्द, नाल और पद्मकी विधिवत् पूजा करे। तदनन्तर मध्यदेशमें अर्क, सोम और
अग्नि मण्डलका पूजन करना चाहिये।
हे वृषध्वज! विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना तथा अनुग्रहा नामक ये शक्तियाँ हैं। पूर्वादि दिशाओंमें - पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तरमें अवस्थित पद्मपत्रोंपर यथाक्रम,
'ॐ विमलायै नमः', ' ॐ उत्कर्षिण्यै नमः', 'ॐ ज्ञानायै नमः',
'ॐ क्रियायै नमः', 'ॐ योगायै नमः'
इत्यादि मन्त्रोंसे विमलादि शक्तियोंका पूजन करना चाहिये। कल्याणकामी व्यत्तिूको चाहिये कि वे अनुग्रहा नामक शत्तिूकी पूजा पद्मकी कर्णिकामें 'ॐ अनुग्रहायै नमः' इस मन्त्रसे करें।
इस विधिसे स्नान, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य समर्पण करके देवके आसनका मङ्गलमय पूजन करना चाहिये। इस पूजाके पश्चात् देवाधिदेव भगवान् हयग्रीवदेवका मण्डलमें आवाहन करना चाहिये। आवाहन करके समाहित होकर उनका न्यास भी करना चाहिये। न्यास करनेके पश्चात् देवों और असुरोंसे नमस्कृत देवाधिदेव परमेश्वर भगवान् हयग्रीवका पुनः ध्यान करना चाहिये और शङ्क -चक्रादि मङ्गलमयी मुद्राएँ प्रदर्शित करनी चाहिये। उसके बाद पाद्य, अर्घ्य, आचमन तथा स्नान प्रदान करे। हे वृषध्वज! उन्हें वस्त्र प्रदान करनेके बाद आचमन प्रदानकर उनको सुन्दर यज्ञोपवीत समर्पित करना चाहिये और उन्हें पाद्य, अर्घ्य, आदि प्रदान करना चाहिये। अनन्तर मूल मन्त्रसे भैरवदेवको पाद्यादि प्रदान करते हुए उनका विधिवत् पूजन करना चाहिये।
हे शिव! इसके बाद शुभदायिनी तथा ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली परमादेवी लक्ष्मीकी पूजा करे। पूर्व दिशामें 'ॐ शङ्काय नमः' कहकर शङ्कका, दक्षिण दिशामें 'ॐ पद्माय नमः ' कहकर पद्मका, पश्चिम दिशामें ' ॐ चक्राय नमः ' से चक्रका तथा उत्तर दिशामें ' ॐ गदायै नमः ' से गदाका यथाक्रम पूजन करे।
इसी प्रकार पुनः पूर्व दिशामें 'ॐ खड़्गाय नमः' से खड़्ग, दक्षिण दिशामें 'ॐ मुसलाय नमः ' से मुसल, पश्चिम दिशामें ' ॐ पाशाय नमः' से पाश, उत्तर दिशामें 'ॐ अंकुशाय नमः' से अंकुश तथा मध्यमें 'ॐ सशराय धनुषे नमः' कहकर शरयुक्त धनुषकी पूजा करनी चाहिये।
हे रुद्र! पुनः पूर्व आदि चार दिशाओंमें श्रीवत्स, कौस्तुभ, वनमाला और मङ्गलमय पीताम्बरकी पूजा करके पुन: शङ्क , चक्र, गदाधारी भगवान् हयग्रीवकी पूजा करे।
तदनन्तर 'ॐ ब्रह्मणे नमः' से ब्रह्मा, 'ॐ नारदाय नमः ' से नारद, 'ॐ सिद्धाय नमः' से सिद्ध, ' ॐ गुरुभ्यो नमः' से गुरु, 'ॐ परगुरुभ्यो नमः' से परगुरु और ' ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः ' से गुरुपादुका की पूजा करे।
तत्पश्चात्
'ॐ सवाहनाय सपरिवाराय इन्द्राय नमः ',
'ॐ सवाहनाय सपरिवाराय अग्नये नमः', 'ॐ यमाय नमः',
'ॐ निर्ॠतये नमः', ॐ वरुणाय नमः ', 'ॐ वायवे नमः ',
'ॐ सोमाय नमः ', ' ॐ ईशानाय नमः ',
' ॐ अनन्ताय नमः ', 'ॐ ब्रह्मणे नम:'
- इन मन्त्रोंसे पूर्व आदि दिशाओंसे ऊर्ध्वदिशापर्यन्त इन्द्र, अग्नि आदि सभी दिग् - देवताओंकी पूजा करनी चाहिये।
इसके बाद
'ॐ वज्राय नमः ', 'ॐ शक्तये नमः ', ॐ दण्डाय नमः',
'ॐ खड्गाय नमः', 'ॐ पाशाय नम:', 'ॐ ध्वजाय नमः', 'ॐ गदायै नमः',
'ॐ त्रिशूलाय नमः','ॐ चक्राय नमः:', 'ॐ पद्माय नम:'
- इन मन्त्रोंसे वज्र, शक्ति आदि आयुधोंकी पूजा करे।
तत्पश्चात् ईशानकोणमें 'ॐ विष्वक्सेनाय नमः' इस मन्त्रसे विष्वक्सेनकी पूजा करे। इसी प्रकार अनन्तकी भी पूजा करे। हे वृषभध्वज! भगवान् हयग्रीवके मूल मन्त्रसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्यके द्वारा उनकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् उन (देव हयग्रीव) - की प्रदक्षिणा करके नमस्कार करे और यथाशक्ति मूल मन्त्रका जपकर उन्हें समर्पित कर दे । तदनन्तर देवेश्वर भगवान् हयग्रीवकी इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये -
ॐ नमो हयशिरसे विद्याध्यक्षाय वै नमः॥
नमो विद्यास्वरूपाय विद्यादात्रे नमो नमः।
नमः शान्ताय देवाय त्रिगुणायात्मने नमः॥
सुरासुरनिहन्त्रे च सर्वदुष्टविनाशिने।
सर्वलोकाधिपतये ब्रह्मरूपाय वै नमः॥
नमश्चेश्वरवन्द्याय शख्ङचक्रधराय च।
नम आद्याय दान्ताय सर्वसत्त्वहिताय च॥
त्रिगुणायागुणायैव ब्रह्मविष्णुस्वरूपिणे।
कर्त्रे हर्त्रे सुरेशाय सर्वगाय नमो नमः॥
'सर्वविद्याधिपति अश्वशिर भगवान्को नमस्कार है। विद्यास्वरूप, विद्याप्रदायक उन देवके लिये बार - बार नमन है । शान्तस्वरूप, त्रिगुणात्मक, सुर तथा असुरोंका निग्रह करनेवाले, सभी दुष्टोंका विनाश करनेवाले, सर्वलोकाधिपति ब्रह्मस्वरूप उन देव हयग्रीवके लिये नमस्कार है। महे श्वरके लिये भी वन्दनीय, शख्ङ - चक्रधारी, जगत्के आदि कारण, परम उदार तथा सभी प्राणियोंका हित करनेवाले देवके लिये नमस्कार है। त्रिगुणात्मक, त्रिगुणातीत, ब्रह्मा-विष्णुस्वरूप, जगतूकी सृष्टिके कर्ता, संहर्ता, देवेश्वर तथा सर्वव्यापक उन भगवान् हयग्रीवको बारम्बार नमस्कार है।
इस प्रकार स्तुति करके अपने हृदयकमलके मध्य शख्ङ ,चक्र और गदाको धारण करनेवाले, करोड़ों सूर्योके समान कान्तिमान्, सर्वाङ्गसुन्दर, अविनाशी महेश्वरके भी ईश, देवाधिदेव, परमात्मा हयग्रीवका ध्यान करना चाहिये।
हे शङ्कर! इस प्रकार मैंने भगवान् हयग्रीवकी पूजा - विधिका वर्णन किया। परम भक्तिपूर्वक जो इसका पाठ करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है।