233 - मृत्य्वष्टक स्तोत्र( मृत्युका निवारक आठ श्लोकोंका स्तोत्र।)

सूतजीने कहा - हे शौनक! अब मैं। मार्कण्डेयमुनिके द्वारा कहे गये स्तोत्रकों बतलाता हूँ जो इस प्रकार है-

दामोदरं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्यु: करिष्यति॥

शङ्ख चक्रधरं देवं व्यक्तरूपिणमव्ययम्‌।

अधोक्षजं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्यु: करिष्यति॥

वराहं वामनं विष्णुं नारसिंहं जनार्दनम्‌।

माधवं च प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्यु: करिष्यति॥

पुरुषं पुष्करक्षेत्रबीजं पुण्यं जगत्पतिम्‌।

लोकनाथं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्यु: करिष्यति॥

सहस्रशिरसं देवं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्‌।

महायोगं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्यु: करिष्यति॥

भूतात्मानं महात्मानं यज्ञयोनिमयोनिजम्‌।

विश्वरूपं प्रपन्नोऽस्मि किन्नो मृत्यु: करिष्यति॥

इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तोत्रं तस्य महात्मन:।

अपयातस्ततो मृत्युर्विष्णुदूतै: प्रपीडित॥

इति तेन जीतो मृत्युर्मार्कण्डेयेन धीमता।

प्रसन्‍ने पुण्डरीकाक्षे नूसिंहे नास्ति दुर्लभम्‌॥

मैं भगवान्‌ दामोदरकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं शंखचक्र धारी, व्यक्त, अव्यय, अधोक्षजकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं वराह, वामन, विष्णु, नृसिंह, जनार्दन, माधवके शरणागत हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं पुराण पुरुष, पुष्करक्षेत्रके (मूलतत्त्व) बीजभूत, (मूल पुरुष) महापुण्य, जगत्पति, लोकनाथकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं सहस्र सिरवाले, व्यक्त,अव्यक्त, सनातन, महायोगेश्वरकी शरणमें हूँ, मृत्यु मेरा क्‍या करेगी? मैंने प्राणियोंमें ‘आत्मा’ स्वरूपसे विद्यमान रहनेवाले, महात्मा, यज्ञयोनि, अयोनिज, विश्वरूप भगवान्‌की शरण ग्रहण कर ली है, अब मृत्यु मेरा क्या करेगी? इस प्रकार उन महात्मा मार्कण्डेय मुनिके द्वारा की गयी स्तुतिको सुनकर विष्णु - दूतोंसे संत्रस्त मृत्यु भाग जाती है। इस स्तोत्रका पाठकर बुद्धिमान श्रीमार्कण्डेयने मृत्युपर विजय प्राप्त कर ली। पुण्डरीकाक्ष श्रीनृसिंह महाविष्णुके प्रसन्‍न होनेपर कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

यह मृत्य्वष्टक स्तोत्र महा पुण्यशाली है, मृत्युका विनाश करनेवाला और मङ्गलदायक है। मार्कण्डेय मुनिका कल्याण करनेके लिये भगवान्‌ विष्णुने स्वयं इस स्तोत्रको कहा था। जो मनुष्य नित्य तीनों कालोंमें पवित्रतासे भक्तिपूर्वक इस स्तुतिका नियम पूर्वक पाठ करता है, वह विष्णुभक्त अकाल मृत्युसे ग्रस्त नहीं होता। जो योगी अपने हृदय कमलमें पुराण पुरुष, सनातन, अप्रमेय तथा सूर्यसे भी अत्यधिक तेजस्वी नारायणका ध्यान करता है, वह मृत्युपर विजय प्राप्त कर लेता है।