गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
52 - प्रायश्चित्त-निरूपण
ब्रह्माजीनी कहा - हे ब्राह्मणो! अब इसके बाद मैं प्रायश्चित्त - विधिको भली प्रकार कह रहा हँ - ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला ब्रह्महन्ता, मदिरा - पान करनेमें निरत मद्यपी, चोरी करनेवाला स्तेयी तथा गुरुकी पत्नीके साथ गमन करने वाला गुरुतल्पगामी (गुरुपत्नीगामी) - ये चार महापातकी हैं। इन सभीका संसर्ग (साथ) करनेवाला पाँचवाँ महापातकी है। गोहत्यादि जो अन्य पाप होते हैं - वे उपपातक हैं, ऐसा देवताओंका कहना है।
जिसने ब्रह्महत्या की है, उसे वनमें स्वयं पर्णकुटी बनाकर उसीमें उपवास करते हुए बारह वर्षोतक रहना चाहिये अथवा पर्वतके उस ऊँचे भागसे गिरकर अपने प्राणोंका परित्याग करना चाहिये, जिस भागसे गिरनेपर कहीं बीचमें रुकनेकी सम्भावना न हो और मरण निश्चित हो। इसके अतिरिक्त जलती हुई अग्निमें प्रवेशकर प्राण - परित्याग, अगाध जलमें प्रवेशकर प्राण - परित्याग, ब्राह्मण या गौकी रक्षाके लिये प्राण - परित्याग भी ब्रह्महत्या - दोषके निवारक होते हैं। इतना अवश्य ध्यानमें रखना है कि ब्रह्महत्याके दोष - निवारणके लिये प्राण - परित्यागके जो साधन बताये गये हैं, उनको करनेके पहले यथाशक्ति विद्वान् ब्राह्मणको अन्नदान करना अनिवार्य है।
अश्वमेध - यज्ञके अन्तमें होनेवाले अवभृथ - स्नानसे ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। वेदविद् ब्राह्मणको सर्वस्व दान करनेसे ब्रह्महत्या जनित पापका नाश हो जाता है। सरस्वतीजी, गङ्गा तथा यमुना - इन नदियोंके पवित्र संगमपर तीन रात्रियोंतक उपवास रख करके प्रतिदिन तीनों कालोंमें स्नान करके भी द्विज ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। सेतुबन्ध रामेश्वरम् (कपालमोचन तीर्थ या वाराणसीके पवित्र तीर्थ) - में स्नान करके ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति हो जाती है।
मद्यपी द्विज अग्निवर्णके सदृश (अन्त: करणको जला देनेवाली) खौलती हुई मदिरा अथवा दूध, घृत या गोमूत्रका पान करके तज्जनित पापसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है। सुवर्णकी चोरी करनेवाला राजाओंके द्वारा दण्डरूपमें मूसलप्रहारसे पापमुक्त हो जाता है अथवा जीर्ण - शीर्ण वस्त्र धारण करके वनमें ब्रह्म हत्यानाशक प्रायश्चित्त - व्रतको करनेसे पापमुक्त हो जाता है।
कामसे मोहित ब्राह्मण यदि अपने गुरुकी पत्नीके पास जाता है तो उसे इस गुरुपत्नी गमनरूप पापसे मुक्त होनेके लिये जलती हुई - तपती हुई लौह - निर्मित स्त्रीका सर्वाङ्ग आलिंङ्गन करना चाहिये। अथवा ब्रह्महत्याके पापसे मुक्तिके लिये जो व्रत विहित है, उस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। चार या पाँच चान्द्रायणव्रत करनेसे भी गुरुपत्नी गमनजनित पापसे मुक्ति हो सकती है।
जो द्विज पतितजनोंका संसर्ग करता है, उसे विभिन्न संसर्गोंसे होनेवाले पापोंको दूर करनेके लिये उन - उन पापोंके निमित्त कहे गये व्रतोंका पालन करना चाहिये। अथवा वह आलस्यसे रहित होकर एक संवत्सरपर्यन्त तप्तकृच्छू व्रतका अनुपालन करे। विधिवत् किया गया सर्वस्वदान सभी पापोंको दूर करनेवाला होता है। अथवा विधिवत् चान्द्रायण व्रत तथा अतिकृच्छू व्रत भी सभी पापोंको दूर करनेवाला होता है।
गया आदि पुण्यक्षेत्रोंकी यात्रा करनेसे भी ऐसे पापोंका विनाश हो जाता है। अमावास्या तिथिमें जो महादेव भगवान् शंङ्करकी सम्यक् - रूपसे आराधना करके ब्राह्मणोंकों भोजन प्रदान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।
जो मनुष्य कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें उपवास रखकर संयतचित्तसे पवित्र नदीमें स्नान करके ॐकारसे युक्त यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल तथा सर्वभूतक्षय - इन नामोंका उच्चारणकर तिलसे संयुक्त सात जलांजलियोंसे तर्पण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
इन व्रतोंके पालन करते समय शान्त रहकर तथा मनका निग्रहकर, ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए भूमिपर सोना चाहिये और उपवास रखकर ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। (कार्तिक) शुक्लपक्षकी षष्टी तिथिमें उपवास रखकर सप्तमी तिथिको सूर्यदेवकी पूजा करनेसे भी सभी प्रकारके पापोंसे मुक्ति हो जाती है।
शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिमें निराहार रहकर जो द्वादशी तिथिमें जनार्दन भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह समस्त महापापोंसे मुक्त हो जाता है।
सूर्य - चन्द्र - ग्रहण आदि समयोंमें मन्त्रका जप, तपस्या, तीर्थसेवन, देवार्चन तथा ब्राह्मण - पूजन - ये सभी कृत्य भी महापातकोंको नष्ट करनेवाले होते हैं। समस्त पापोंसे युक्त मनुष्य भी पुण्य - तीर्थोमें जाकर नियम पूर्वक अपने प्राणोंका परित्याग कर समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
पतिव्रता नारी पतिके देहावसानके बाद पतिका वियोग असह्य होनेके कारण पति - धर्मके अनुसार पतिके शरीरके साथ शास्त्रीय विधिका पालन करते हुए अग्निमें प्रवेश करती है तो ब्रह्महत्या, कृतघ्नता आदि बड़े - बड़े पातकोंसे दूषित भी अपने पतिका उद्धार कर देती है।
जो स्त्री पतिव्रता है, अपने पतिकी सेवा - शुश्रूषामें दत्तचित्त रहती है, उसको इस लोक तथा परलोकमें कोई पाप नहीं लगता। वह वैसे ही निर्दोष रहती है, जैसे दशरथपुत्र श्रीरामकी पत्नी जगद्विख्यात भगवती सीतादेवी लङ्कामें रहकर भी निर्दोष रहीं तथा (अपने पातिव्रतके प्रभावसे) उन्होंने राक्षसराज रावणपर विजय प्राप्त की।
हे यतव्रत! संयतचित्त होकर विविध शास्त्रीय व्रतका अनुष्ठान करनेवाले! भगवान् विष्णुने मुझसे बहुत पहले ही यह बताया था कि गयामें स्थित फल्गु (नदी) आदि तीर्थोंमें यथाविधि श्रद्धाके साथ स्नान करनेवाला व्यक्ति सभी प्रकारके पातकोंसे मुक्त हो जाता है और समस्त सदाचरणका फल भी प्राप्त करता है।