गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
158 - मूत्राघात - निदान
धन्वन्तरिजीने कहा - हे सुश्रुत! अब इसके बाद आप मूत्राघातका निदान सुनें।
वस्ति(सु०नि०अ0 3, मा०नि०पृ0 505, सु०उ०त0 58)(पे ड़ू अर्थात् नाभि - प्रदेशसे नीचे और मूत्र - प्रवाहिकाके ऊपरका भाग), वस्तिशिर (मूत्र - प्रवाही नली), मेढ़ (जननेन्द्रिय अर्थात् लिंग),कटी (कूल्हेके भागके गड्ढे), वृषण और पायु (गुदा) नामक शरीरके ये छ: अङ्ग विशेष हैं, जो परस्पर एक - दूसरेसे सम्बद्ध और एक ही जगह ग्रथित हैं। इन सभीका आश्रय गुदाभागमें रहनेवाले अस्थि - विशेषके छिद्रसे सम्बद्ध रहता है। पेड़ू (वस्ति) अधोमुखी है। इसमें चारों ओरसे सूक्ष्म शिराओंके मुखभागसे होकर रिसाव होता रहता है, इससे वस्ति मूत्रसे भरी रहती है। इन्हीं शिराओंसे वात - पित्तादि दोष भी वस्तिमें प्रविष्ट हो जाते हैं, जिससे मूत्राशयमें बीस प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। मर्माश्रित होनेके कारण ये प्रमेहादि रोग अत्यन्त कष्ट - साध्य हैं, अर्थात् इन रोगोंके होनेसे रोगीको मर्माहत करनेवाली पीड़ा होती है। रोगीके पेड़ू, वंक्षण और लिंगभागमें भी कष्ट होता है। उस कष्टसे गुप्ताङ्गोंके द्वारा होता हुआ मूत्र अल्पमात्रामें बार - बार निकलता है। वातजरोगमें प्राणीको मूत्र कष्टके साथ होता है। पित्तज मूत्राघात होनेपर मूत्र पीला, लाल तथा दाहसे युक्त हो जाता है और उसके मूत्राशयमें रुके रहनेपर अत्यन्त पीड़ा होती है। जब यह रोग कफज होता है तो उसके पेड़ू और लिंगमें भारीपन तथा शोथ आ जाता है। मूत्र पिच्छल और रुक - रुककर होता है। रोगीपर सर्व - दोषजन्य मूत्राघात होनेसे सभी लक्षण पाये जाते हैं। जब वायु वस्तिके मुखको आच्छादित कर कफ, मूत्र और वीर्यको शुष्क कर देता है, उस समय रोगीके शरीरमें अश्मरी (पथरी) नामक रोग उत्पन्न हो जाता है। यह रोग बड़ा भयंकर होता है। जैसे गायका पित्त सूखकर गोरोचन बन जाता है, वैसे ही यह अश्मरी होती है। प्रायः सभी प्रकारकी पथरियाँ कफाश्रित ही होती हैं। इस रोगका पूर्वलक्षण इस प्रकार है - इस रोगके होनेमें वस्तिभागमें अवरोध होता है अथवा उसके सन्निकट अन्य किसी भागमें भी हो सकता है। जिस भागमें होता है उस भागके चारों ओर अवयवोंमें अत्यधिक पीड़ा होती है। वस्तिभागमें मूत्रका अवरोध तथा उसकी कृच्छूता बनी रहती है। रोगीके मूत्रमें अजामूत्रके समान गन्ध, ज्वर और अरुचि होती है। इस रोगका सामान्य लक्षण तो यह है कि रोगीके नाभि - लिंगमणि और वस्तिके शिरोभागमें कष्ट रहता है। अश्मरीद्वारा मार्गावरोधके कारण वहाँ उस समय पर्याप्त भागमें मूत्र फैल जाता है। वह रुक - रुककर बाहर निकलता है। मूत्र निकलनेपर रोगीको सुखानुभूति होती है। उस मूत्रका वर्ण गोमेद या गोमूत्रके समान झलकता रहता है।
मूत्र - निर्गमनमें (1.वा०नि0 9, अ०हृ०नि०अ0 9।) ऐसा प्रकोप हो जानेपर रक्त, मांस तथा धातु - प्रवाहके मार्गमें कष्ट होता है। बातजरोगसे व्यथित रोगी अपने दाँतोंको किटकिटाता हुआ काँपता है। मूत्रसे भरे हुए नाभिसे नीचे स्थित वस्तिभागको पकड़कर दबाता हुआ वह कराह उठता है। अपानवायुके सहित मल - पिण्ड उसके गुह्यभागसे निकलता है और बूँद - बूँद करके मूत्र टपका करता है। वातज दोषके कारण शरीरमें उत्पन्न हुई अश्मरीरोगका वर्ण श्याम है। उसमें रूक्षता रहती है। देखनेमें वह काँटोंसे बिंधी हुई - सी प्रतीत होती है।
पित्तज दोषके कारण उत्पन्न इस अश्मरीरोगमें वस्तिभाग जलने लगता है। उसमें ऐसा प्रतीत होता है, जैसे अंदर - ही - अंदर कुछ पक रहा हो। इस पित्त - दोषजन्य अश्मरीका स्वरूप भल्लातक (भिलावेके बीज) - के समान होता है। इसका वर्ण लाल, पीला अथवा काला होता है।
कफजन्य अश्मरी होनेसे वस्तिभागमें पीड़ा होती है। उस स्थानमें भारीपन तथा शीतलताका अनुभव होता है। इस रोगमें उत्पन्न हुई अश्मरी आकारमें बड़ी, चिकनी, मधु (शहद) अथवा श्वैतवर्णा होती है। ये तीनों अश्मरी प्राय: बालकोंमें हुआ करती हैं। आश्रय, मृदुता और उपचयकी अल्पताके कारण बालकोंकी अश्मरी ग्रहण करके सुखपूर्वक निकाली जा सकती है।
शुक्रके वेगको रोकनेसे प्राणीके शरीरमें शुक्राश्मरी नामक भयंकर रोगकी उत्पत्ति होती है। जब धातु - प्रवाहिका नाड़ीसे गिरा हुआ अथवा कुपित वीर्य दोनों अण्डकोशोंके बीच रुक जाता है और लिंग - मार्गसे वह बाहर नहीं निकलता, तब वहाँस्थित विकृत वायु विक्षुब्ध होकर उसको सुखा देता है, उसी दोषसे इस शुक्राश्मरीका जन्म होता है। इस रोगमें भी वस्तिभागमें पीड़ा होती है। रोगीको मूत्र (सु०नि०अ0 3, अ०हृ०नि०अ0 9।) निर्गत करनेमें कष्ट होता है। इसका भी वर्ण श्वेत माना गया है। इसके कारण मूत्रावरोध होनेसे तत्सम्बन्धी स्थानोंमें सूजन आ जाती है। अण्डकोष और उपस्थेन्द्रियके बीचमें हाथसे दबाया जाय तो वह विलीन हो जाती है। इस रोगके हो जानेपर रोगीको पीड़ा होती है, उसके दुष्प्रभावसे ज्वर हो जाता है, रोगीको खाँसी आने लगती है। इसी अश्मरीरोगके कारण रोगीके शरीरमें शर्करारोगका विकार भी उत्पन्न हो जाता है। यदि इसकी अनुलोम गति होती है तो यह मूत्रके साथ बाहर निकल जाती है अथवा मूत्रके साथ प्रतिलोम - अवस्थामें अंदर ही रुक जाती है। क्रुद्ध हुआ वायु वस्तिभागके मुखको रोककर आमाशयके जलस्रोतसे नीचे आनेवाले उस मलिन जलको एकत्र कर देता है। इस मूत्रके संचित होनेसे वस्तिभागमें विकारकी उत्पत्ति होती है, रोगीको कष्ट होता है और उस भागमें खुजलाहट होने लगती है।
रोगीके शरीरमें विक्षुब्ध वह वायु वस्तिभागके मुखको विधिवत् ढककर मूत्रावरोध उत्पन्न करता है तथा वस्तिको अपने स्थानसे हटाता हुआ उल्टा या इधर - उधर करके वस्तिमें विकृति उत्पन्नकर गर्भ - जैसा स्थूल (मोटा) बना देता है एवं उस स्थानको पीड़ित करता है। वहाँ उसके कारण जलन होती है। उसमें स्पन्दन होने लगता है और कूल्होंमें भी पीड़ा प्रारम्भ हो जाती है। रोगीका मूत्र बिन्दुवत् टपकता है, वह अपने सही वेगसे नहीं निकलता। वस्तिभागमें पीड़ा बनती रहती है। दबानेपर मूत्र धारा - रूपमें निकलता है। वायुजन्य इस रोगको वातवस्तिके नामसे स्वीकार किय गया है।
वातवस्तिके(मा०नि0 मूत्राघात प्र0 4।) दो भेद हैं - पहला वस्तिके मुखको रोकनेवाला दुस्तर कहलाता है और दूसरा दुस्तरतर।
वस्तिके मुखको ऊपर करनेवाला अत्यन्त कृच्छ्रसाध्य है, क्योंकि इसमें वायुका विशेष प्रकोप होता है। मलमार्ग तथा वस्तिभागके बीच स्थित वायु अष्ठीलाकृति अर्थात् गोलककडी या अँठुलीके समान घनीभूत शक्तिशाली, मज़बूत ग्रन्थि (गाँठ) उत्पन्न करता है, जिसके कारण इसको वाताष्टीला नामसे अभिहित किया गया है। इस रोगमें वायु रोगीके अपानवायु तथा मल - मूत्रको अवरुद्ध कर देता है। वस्तिभागमें विद्यमान कुपित वायु कुण्डली मारकर तीव्र पीड़ाको जन्म देता है। वहाँ मूत्रको रोककर वह उसमें अत्यधिक स्तम्भनका दोष उत्पन्न करता है। ऐसी अवस्थामें रोगीको बहुत ही अल्प मात्रामें बार - बार मूत्र होता है तथा ऐसी अवस्थामें रोगी मूत्रको अधिक देरतक रोकनेमें असमर्थ रहता है। ऐसे रोगको वातकुण्डलिका
(मा०नि0 मुत्राघात प्र0 2 , 3 , श्लोक 7 , 8।) कहते हैं। जब रोगी रुके हुए मूत्रको निकालनेमें पीड़ाका अनुभव करता है तो वह निरुद्ध मूत्र - कृच्छ्ररोग है अथवा मूत्रको अधिक कालतक रोकनेके पश्चात् यदि उसका वेग नहीं आता है या रुक - रुककर आता है और कुछ कष्ट होता है तो उसको मूत्रातीत कहा जाता है।
मूत्रके वेगको रोकनेसे प्रतिहत हुआ मूत्र अथवा वायुसे पीछेको घुमाया हुआ मूत्र जब नाभिके नीचे उदरमें भर जाता है, तब वह तीव्र वेदना और आध्मान पैदा करता है और मलका संग्रह करता है। इसे मूत्रजठर कहते हैं। मूत्रके दोषसे अथवा कुपित वायुके द्वारा आक्षिप्त हुआ थोड़ा - सा मूत्र वस्ति, नाल, उपस्थकी मणिमें स्थित होकर थोड़ा - थोड़ा दर्द करता हुआ अथवा बिना दर्दके ही निकलता है, इसे मूत्रोत्सर्ग या मूत्रजठर कहते हैं।
अबाधगतिसे(सु०उ0 85 , अ०ह०नि०अ0 9।) मूत्रोत्सर्ग होना प्राणीके श्रेष्ठ अण्डकोषोंपर निर्भर होता है। एकाएक रुका हुआ मूत्र निकल जानेपर अन्तःकरण और मुख शुष्क हो जाता है। अधिकाधिक या अल्प मात्रामें प्राणीको प्यास लगती है। वस्तिके आभ्यन्तर भागमें मूत्रावरोधके कारण अश्मरीके सदृश एक ग्रन्थि पड़ जाती है, जिसको मूत्रग्रान्थि कहते हैं। मूत्र - रोगे(सु०उ०तं०अ0 58।) - ग्रसित रोगीका जब स्त्रीके साथ सहवास होता है तो उस समय वायुके द्वारा ही स्त्रीके गर्भाशयमें शुक्र पहुँच जाता है, किंतु स्थान - विशेषसे निकला हुआ वह शुक्र मूत्र - क्षरण होनेसे पहले अथवा बादमें लिंगसे बाहर आता है। इसका स्वरूप भस्ममिश्रित जलके समान होता है। उसको वैद्यकमें मूत्रशुक्रके नामसे जाना जाता है।
जब रूक्षता और दुर्बलताके कारण वातजन्य दोषसे उदावर्त उपद्रव होता है अर्थात् शरीरके अंदर विद्यमान अपानवायु व्यानवायुसे घिर जाता है अर्थात् मलावरोध हो उठता है तो उस कालमें वह मल - मूत्र स्रोतकी संसृष्टिसे संयुक्त हो जाता है। इसमें मूत्र बूँद - बूँद ही होता है और इस टपकनेवाले मूत्र - बिन्दुओंमें एक दुर्गन्ध - सी रहती है। ऐसे रोगको मूत्रविघातके नामसे स्वीकार किया जाता है।
पित्त,(सु०उ0 57।) व्यायाम, तीक्ष्ण और अम्लाहार तथा आध्मान (पेट फूलने) अथवा अन्य विकृतियोंके द्वारा शरीरके आभ्यन्तरिक भागमें बढ़ा हुआ पित्त - वायु - विकार वस्तिभागमें दाह उत्पन्न कर देता है ,जिसके कारण रक्तयुक्त मूत्र निकलता है अथवा उष्ण रक्त ही उसकी मूत्र - प्रवाहिकासे बार - बार कष्टपूर्वक गिरता है। इस प्रकारके कष्टको उत्पन्न करनेके कारण लोगोंने उस रोगको उष्णवातकी संज्ञा दी है।
रूक्षाहार(सु०अ0 85।) तथा परिश्रम करनेसे श्रान्त रोगीका पित्त और वायु कुपित हो उठता है। वह उसके वस्तिभागमें मूत्रावरोध, पीड़ा, क्षय और जलन उत्पन्न कर देता है। उस लक्षणसे युक्त मूत्राघात - कष्टको मूत्रक्षय कहा गया है।
यदि कुपित वायुके द्वारा पित्त और कफ अथवा इन दोनोंको संक्षुब्ध कर दिया जाता है तो उस समय प्राणीको जलन, कष्टसाध्य मूत्र - निर्गमन होता है। उसके मूत्रका वर्ण पीला, रक्त तथा श्वेत हो जाता है और उसमें गाढ़ापन भी आ जाता है। वस्तिभागमें दाहभरी जलन होती है। जो मूत्र निकलता है, उसका वर्ण सूखे गोरोचन तथा शंख - चूर्णके समान होता है। इस रोगको कृच्छ्रमूत्रसाद कहते हैं। इस प्रकार विस्तारपूर्वक मूत्रमें होनेवाले रोगोंको भी मैंने बता दिया है।