214 - स्नान तथा संक्षेपमें संध्या - तर्पणकी विधि

(इस अध्यायमें मन्त्रोंके प्रतीकमात्र दिये गये हैं। जिज्ञासु विभिन्न मन्त्रसंहिताओंसे मन्त्रोंको जान लें।)

ब्रह्माजीने कहा - अब मैं स्नानकी विधि कहता हूँ, क्योंकि सभी क्रियाएँ स्नानमूलक हैं अर्थात्‌ स्नानके बिना कोई भी क्रिया सफल नहीं हो सकती। स्नानार्थी व्यक्तिको स्नानके पूर्व मिट्टी, गोमय, तिल, कुश, सुगन्धित पुष्प - ये सभी द्रव्य एकत्र कर लेना चाहिये। गन्ध आदि स्नानोपयोगी पदार्थोंको जलके समीप स्वच्छ स्थान - भूमिपर रखना चाहिये।

तदनन्तर विद्वान्‌ व्यक्ति एकत्र किये हुए मिट्टी और गोमयको तीन भागोंमें विभक्त करके मिट्टी और जलके द्वारा दोनों पैर तथा दोनों हाथका प्रक्षालन करे। बायें कंधेपर यज्ञोपवीत रखकर शिखाबन्धनपूर्वक मौन होकर आचमन करे। ‘ॐ उरुं हि राजा०’

(ॐ उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थानमन्वेत वाउ।

प्रतिधाता च वक्तारस्ताहृदयाविपश्चित्‌।

नमोऽग्न्यरुणाया भिष्टुतोवरुनस्य पाशः। वरुणाय नम:॥)

इत्यादि मन्त्रोंसे दक्षिणभागमें जलको स्थापित करे। फिर ‘ॐ ये ते शतं०’

(ॐ ये ते शतं वरुणये सहस्रं यज्ञिया: पाशा वितता महान्त:।

तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुत: स्वर्का: स्वाहा॥)

इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करके उस जलका अभिमन्त्रण करे। ‘ॐ सुमित्रिया न आप०’

(ॐ सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु।

दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्देष्टि यञ्च वयं द्विष्म॥)

इस मन्त्रसे अञ्ज्लिमें जल लेकर पहले मार्जन करे, फिर शेष जलको बाहर फेंके। तदनन्तर दोनों चरण, और कटिप्रदेशमें तीन - तीन बार मिट्टी लगाये। इसके पश्चात्‌ दोनों हाथ धोकर आचमन करके जलको नमस्कार करे। इसके बाद ‘ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे०’ का पाठ करके ‘ॐ भू: स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा’इत्यादि महाव्याहृति मन्त्रसे आचमन और ‘ॐ इदं विष्णु०’ आदि मन्त्रसे मिट्टीद्वारा अङ्गोंका मार्जन करे। फिर सूर्याभिमुख होकर ‘ॐ आपो अस्मान्०’ इत्यादि मन्त्रसे जलमें डुबकी लगाये। तदनन्तर शरीरको मल - मलकर स्वच्छ करे और धीरे - धीरे डुबकी लगाते हुए स्नान करे।

इसके बाद ‘ॐ मा नस्तोके तनये मा न०’ इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करके गोमयके द्वारा अङ्गका लेपन करे। फिर ‘ॐ इमं मे वरुण०’ इत्यादि वारुण मन्त्रसे यथाक्रम अपने मस्तक आदिका अभिषेक करे। पूर्वोक्त मन्त्रोंसे विधिवत्‌ आत्माभिषेक करके जलमें डुबकी लगाकर पुन: आचमन करे। ‘ॐ आपो हि ष्ठा०’, ‘ॐ इदं आपो हविष्मती०’, ‘ॐ देवी राप०’, ‘ॐ द्रुपदादिव०’ तथा ‘ॐ शं नो देवी०’ इत्यादि पावमानी मन्त्रोंसे समाहित होकर मार्जन करे। ‘ॐ हिरण्यवर्णा०’, ‘ॐ पवमानसूक्तम्‌०’, ‘ॐ तरत्सामाः०’ तथा ‘ॐ शुद्धवत्य:०’ आदि पवित्र करनेवाले मन्त्रों एवं वारुणमन्त्रोंसे यथाशक्ति जलाभिषेक करे।

ओंकार और व्याहृतिसमन्वित गायत्री - मन्त्रका पाठ करते हुए स्नानके आदि और अन्तमें जलाभिषेक करे। जलके मध्यमें रहकर ही मार्जन करनेका विधान है। जलमें डूबकर अघमर्षण - मन्त्रको तीन बार पढ़ना चाहिये। इसके बाद ‘ॐ द्रुपदा०’ इत्यादि मन्त्रका तीन बार पाठ करके ‘ॐ आयं गौ:०’ इत्यादि तीन ऋचाओंका पाठ करे। तदनन्तर स्मृतियोंमें निर्दिष्ट स्नानाङ्ग - मन्त्रोंका समाहितचित्तसे पाठ करे अथवा महाव्याहृति और प्रणवसे युक्त गायत्रीका जप करे या प्रणवकी आवृत्ति करे अथवा अव्यय विष्णुका स्मरण करे। जल ही विष्णुका आयतन है। विष्णु ही जलके अधिपति कहे गये हैं। जलमें विष्णुका स्मरण करे। ‘ॐ तद्‌ विष्णो: परमं पदम्‌०’ इत्यादि कहकर बार - बार स्नान करे। यह वैष्णवी गायत्री विष्णुके सर्वाङ्ग - स्मरणमें निमित्त है। ‘ॐ इदमाप: प्रवहतः०’ इत्यादि पवित्र मन्त्रोंसे अपने मलका निवारण करते हुए मार्जन करे और अपनेको निर्मल शरीरवाला बना ले। फिर ‘ॐ तद्विष्णो: परम पदम्‌०’ इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करे।

यथाविधि स्नान क्रियाको सम्पन्नकर धोये हुए अखण्डित पवित्र दो वस्त्रोंको पहनकर मिट्टी और जलके द्वारा हाथ तथा पैरका प्रक्षालन करके संध्या एवं तर्पण करना चाहिये। स्नान और भोजनके आरम्भमें आचमनकर पुन: मन्त्रके द्वारा अन्तमें आचमन करना चाहिये। आचमनके बाद तीन बार ‘ॐ द्रुपदादिव०’ इत्यादि मन्त्रका पाठकर जलद्वारा मूर्धाभिषेक तथा अघमर्षण करे। पुन: आचमन और मार्जन तथा तीन बार आचमनकर धीरे - धीरे प्राणायाम करे। इसके बाद अञ्जलिमें जल एवं पुष्प धारण करके सूर्याध्य दे और ऊर्ध्वबाहु होकर समाहितचित्त हो सूर्यका निरीक्षण करते हुए ‘ॐ उदु त्यं०’, ‘ॐ चित्र देवानां०’, तथा ‘ॐ तच्चक्षुर्देवहितं०’ एवं ‘ॐह स: शुचिषद्‌०’ इत्यादि मन्त्रोंका पाठ करते हुए सूर्योपस्थापन करे। इस प्रकार सूर्योपस्थापन करके यथाशक्ति गायत्रीका जप करना चाहिये। इसके पश्चात्‌ ‘ॐ बिभ्राट्‌०’ अनुवाक, पुरुषसूक्त, शिवसंकल्पसूक्त, मण्डलब्राह्मण इत्यादि सूर्यके मन्त्रोंका सभी देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यथाशक्ति जप करे अथवा जपकी साङ्गोंपाङ्ग पूर्णताके लिये विधिवत्‌ अध्यात्मविद्याका जप करे। तदनन्तर सव्य होकर तीन बार आचमनकर श्री, मेधा, धृति, क्षिति, वाक्‌, वागीश्वरी, पुष्टि, तुष्टि, उमा, अरुन्धती, शची, मातृगण, जया, विजया, सावित्री, शान्ति, स्वाहा, स्वधा, धृति, श्रेष्ठ अदिति, ऋषिपत्नियों, ऋषिकन्याओं और अन्य काम्य देवताओंका तर्पण करे। इसके बाद समाहितचित्त होकर सभीकी मंगलकामनासे सर्वमंगलादेवीको तृप्त करे और ‘ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत्‌ तृप्यत्विति’ इस मन्त्रसे तीन अञ्जलि जल देते हुए तर्पण - क्रियाकी सम्पन्नताकी कामना करे।