गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
90 - प्रम्लोचा नामक अप्सराकी दिव्य कन्या मानिनीसे प्रजापति रुचिका विवाह
मार्कण्डेय मुनिने कहा - पितरोंकी कृपासे उसी समय उस नदीके मध्यसे ही रुचिके समीप प्रम्लोचा नामकी मनको प्रिय लगनेवाली कृशाङ्गी, सुन्दर श्रेष्ठ एक अप्सरा प्रकट हुई। उस श्रेष्ठ अप्सराने प्रिय एवं मधुर वाणीमें महात्मा रुचिसे कहा - हे तपस्विश्रेष्ठ! मेरी प्रसन्नतासे वरुणके पुत्र महात्मा पुष्करद्वारा मेरी एक अतिशय सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई है। मैं उस सुन्दर स्वरूपवाली मानिनी नामवाली कन्याको भार्याके रूपमें आपको प्रदान करती हूँ, आप इसे वरण करें इस कन्यासे अतिशय बुद्धिमान् मनु नामक आपका पुत्र उत्पन्न होगा।
इसपर उस रुचिने ‘ऐसा ही होगा।’- इस प्रकार कहा। ऐसा कहनेपर उस नदीके मध्य - जलसे मानिनी नामकी शरीर धारिणी एक दिव्य कन्या निकली।
उस नदीके तटपर मुनिश्रेष्ठ रुचिने अनेक महामुनियोंको बुलाकर विधिपूर्वक कन्याके साथ पाणिग्रहण किया। उस कन्यासे अतिशय पराक्रमी और महाद्युति तथा पिताके नामसे रौच्यके रूपमें विख्यात एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो रौच्य मन्वन्तरका अधिपति हुआ।