गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
89 - रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य
पितृजनोंके द्वारा उस प्रकारके वाक्यको सुनकर वे ब्रह्मर्षि रुचि मन - ही - मन अत्यधिक व्याकुल हो उठे और कन्या प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथिवीलोकमें विचरने लगे, किंतु उन्हें कोई कन्या प्राप्त हो सकी। अतएव पितरोंके उक्त वचनरूपी अग्निसे संतप्त हुए वे अतिशय चिन्ताग्रस्त होकर व्यग्र - मनसे इस प्रकार सोचने लगे - 'मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पितृगणोंका और मेरा अभ्युदय करनेवाला वह स्त्री - परिग्रह (विवाह - संस्कार) किस प्रकार हो सकेगा?'
इस प्रकार चिन्तन करते हुए उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं कमलयोनि उन ब्रह्माको ही तपस्याके द्वारा प्रसन्न करता हूँ। तदनन्तर महात्मा रुचिने सौ दिव्य वर्षोंतक कठिन तप किया। वे तपस्याके लिये वनमें एक ही स्थानपर चिरकालतक अवस्थित रहे।
तत्पश्चात् जगत्पितामह ब्रह्माने दर्शन दिया और कहा कि मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम अपनी अभिलाषा प्रकट करो। तदनन्तर सम्पूर्ण संसारको गति प्रदान करनेवाले उन आराध्य - देव ब्रह्माको प्रणाम करके रुचिने पितृजनोंके कथनानुसार जो - जो उनकी अभिलाषा थी। उनसे निवेदन किया।
इसपर ब्रह्माजीने कहा - हे विप्र! तुम प्रजापति होओगे। तुम्हारे द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि होगी। प्रजारूपी पुत्रोंकी उत्पत्ति करके ही तुम पितृजनोंके लिये श्राद्ध एवं पिण्डदानादिको सम्पन्न करनेके पश्चात् साधिकार उक्त कामनाकी सिद्धि प्राप्त कर सकोगे। अतः तुम्हारे पितरोंके द्वारा उचित ही कहा गया है कि 'तुम स्त्री - परिग्रह करो।' इस अभिलाषाको भलीभाँति ध्यानमें रखते हुए, तुम्हें पितरोंकी ही पूजा करनी चाहिये। प्रसन्न होकर वे ही पितृगण तुम्हारी इस कामनाको पूर्ण करेंगे। सम्यक् पूजासे संतुष्ट हुए पितामहादि पितृगण स्त्री - पुत्र आदि क्या नहीं दे सकते।
ब्रह्माजीका इस प्रकारका वचन सुनकर ऋषि रुचिने नदीके एकान्त तटपर पहुँच करके अपने पितरोंका तर्पणकर उन्हें संतृप्त किया। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर भक्तिपूर्वक वे इन स्तुतियोंके द्वारा पितरोंकी आराधना करने लगे -
(रूचिरुवाच - नमस्येऽहं पितॄन् भक्त्या ये वसन्त्यधिदैवतम्।
देवैरपि हि तर्प्यन्ते ये श्राद्धेषु स्वधोत्तरे:॥
नमस्येऽहं पितॄन् स्वर्गे ये तर्प्यन्ते महर्षिभि:।
श्राद्धैर्मनोमयैर्भकत्या भुक्तिमुक्तिमभीप्सुभि:॥
नमस्येऽहं पितॄन् स्वर्गे सिद्धा: संतर्पयन्ति यान्।
श्राद्धेषु दिवयै:सकलैरूपहारैरानुत्तमै:॥
नमस्येऽहं पितॄन् भक्त्या येऽर्च्यन्ते गुह्यकैर्दिव।
तन्मयत्वेन वा ञ्छद्धिर्ऋद्धिमात्यन्तिकीं पराम्॥
नमस्येऽहं पितॄन् मर्त्यैरचर्यन्ते भुवि ये सदा।
श्राद्धेषु श्राद्धयाभीष्टलोकपुष्टिप्रदायिन:॥
नमस्येऽहं पितॄन् विप्रैरच्र्यन्ते भुवि ये सदा।
वाजञ्छिताभीष्टलाभाय प्राजापत्यप्रदायिन:॥
नमस्येऽहं पितॄन् ये वै तर्प्यन्तेऽरण्यवासिभि:।
वन्यै: श्राद्धैर्यताहारैस्तपोनिर्धूतकल्मषै:॥
नमस्येऽहं पितॄन् विप्रैनैष्टिकैर्धर्मचारिभि:।
ये संयतात्मभिर्नित्यं संतर्प्यन्ते समाधिभि:॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धै राजन्यास्तर्पयन्ति यान्।
कव्यैरशेषैर्विधिवल्लोकद्वयफलप्रदान्॥
नमस्येऽहं पितॄन् वैश्यैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा।
स्वकर्माभिरतैर्न्नित्यं पुष्पधूपान्नवारिभि:॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धै शूद्रैरपि च भक्तित:।
संतर्प्यन्ते जगाकृस्त्नं नाम्ना ख्याता: सुकालीन:॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धे पाताले ये महासुरै:।
संतर्प्यन्ते सुधाहारास्त्यक्तदम्भमदै: सदा॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धैरर्च्यन्ते ये रसातले।
भोगैरशेषैर्विधिवन्नागै: कामानभीप्सुभि:॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धै: सर्पै: संतर्पितान् सदा।
तत्रैव विधिवन्मन्त्रभोगसम्पत्समन्वितै:॥
पितॄन्नमस्ये निवसन्ति साक्षाघद्दे देवलोकेऽथ महीतले वा।
तथान्तरिक्षे च सुरारिपूज्यास्ते वै प्रतीच्छन्तु मयोपनीतम्॥
पितॄन्नमस्ये परमार्थभूता ये वै विमाने निवसन्त्यमूर्ता:।
यजन्ति यानस्तमलैर्मनोभिर्योगीश्वरा: क्लेशविमुक्तिहेतून्॥
पितॄन्नमस्ये दिवि ये च मूर्त्ता: स्वधाभुजः काम्यफलाभिसन्धौ।
प्रदानशक्ता: सकलेप्सितानां विमुक्तिदा येऽनभिसंहितेषु॥
तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितर: समस्ता इच्छावतां ये प्रदिशन्ति कामान्।
सुरत्वमिन्द्रत्वमितोऽधिकं वा गजाश्वरत्नानि महागृहाणि॥
सोमस्य ये रश्मिषु येऽर्कबिम्बे शुक्ले विमाने च सदा वसन्ति।
तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयैर्गन्धादिना पुष्टिमितो व्रजन्तु॥
येषां हुतेऽग्रौ हविषा च तॄसिर्ये भुञ्चते विप्रशरीरसंस्था:।
ये पिण्डदानेन मुदं प्रयान्ति तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयै:॥
ये खड्गमांसेन सुरैरभीष्टै: कृष्णैस्तिलैर्दिव्यमनोहरैश्च।
कालेन शाकेन महर्षिवर्यै: संप्रीणितास्ते मुदमत्र यान्तु॥
कव्यान्यशेषाणि च यान्यभीष्टान्यतीव तेषां मम पूजितानाम्।
तेषां च सांनिध्यमिहास्तु पुष्पगन्धाम्बुभोज्येषु मया कृतेषु॥
दिने दिने ये प्रतिगृह्णतेऽर्चां मासान्तपूज्या भुवि येऽष्टकासु।
ये वत्सरान्तेऽभ्युदये च पूज्या: प्रयान्तु ते मे पितरोऽत्र तुष्टिम्॥
पूज्या द्विजानां कुमुदेन्दुभासो ये क्षत्रियाणां ज्वलनार्कवर्णा:।
तथा विशां ये कनकावदाता नीलीप्रभा: शूद्रजनस्य ये च॥
तेऽस्मिन्समस्ता मम पुष्पगन्धधूपाम्बुभोज्यादिनिवेदनेन।
तथाग्निहोमेन च यान्ति तृप्तिं सदा पितृभ्य: प्रणतोऽस्मि तेभ्य:॥
ये देवपूर्वाण्यभितृसिहेतोरश्नन्ति कव्यानि शुभाहृतानि।
तृसाश्च ये भूतिसृजो भवन्ति तृप्यन्तु तेऽस्मिन् प्रणतोऽस्मि तेभ्य:॥
रक्षांसि भूतान्यसुरांस्तथोग्रान् निर्णाशयन्तु त्वशिवं प्रजानाम्।
आद्या: सुराणाममरेशपूज्यास्तृप्यन्तु तेऽस्मिन् प्रणतोऽस्मि तेभ्य:॥
अग्निष्वात्ता बर्हिषद आज्यपा: सोमपास्तथा।
व्रजन्तु तृप्तिं श्राद्धेऽस्मिन्पितरस्तर्पिता मया॥
अग्निष्वात्ता: पितृगणा: प्राचीं रक्षन्तु मे दिशम्।
तथा बर्हिषदः पान्तु याम्यां मे पितर: सदा।
प्रतीचीमाज्यपास्तद्वदुदीचीमपि सोमपा:॥
रक्षोभूतपिशाचेभ्यस्तथैवासुरदोषत:।
सर्वतः पितरो रक्षां कुर्वन्तु मम नित्यश:॥
विश्वो विश्वभुगाराध्यो धर्मों धन्यः शुभानन:।
भूतिदो भूतिकृद् भूति: पितृणां ये गणा नव॥
कल्याण: कल्यद: कर्ता कल्य: कल्यतराश्रय:।
कल्यताहेतुरनघ:षडिमे ते गणा: स्मृता:॥
वरो वरेण्यो वरदस्तुष्टिदः पुष्टिदस्तथा।
विश्वपाता तथा धाता सप्तैते च गणा: स्मृता:॥
महान्महात्मा महितो महिमावान्महाबल:।
गणा: पञ्च तथैवैते पितॄणां पापनाशना:॥
सुखदो धनदश्चान्यो धर्मदोऽन्यश्च भूतिद:।
पितॄणां कथ्यते चैव तथा गणचतुष्टयम्॥
एकत्रिंशत्पितृगणा यैर्व्याप्तमखिलं जगत्।
त एवात्र पितृगणास्तुष्यन्तु च मदाहितात्॥
मार्कण्डेय:
एवं तु स्तुवतस्तस्य तेजसो राशिरुच्छित:।
प्रादुर्बभूव सहसा गगनव्याप्तिकारक:॥
तददृष्ठा सुमहत्तेज: समाच्छाद्य स्थितं जगत्।
जानुभ्यामवनीं गत्वा रुचि: स्तोत्रमिदं जगौ॥
रुचिरुवाच:
अर्चितानाममूर्तानां पितॄणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्॥
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान्नमस्यामि कामदान्॥
मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्द्रमसोस्तथा।
तान्नमस्याम्यहं सर्वान् पितॄनप्युदधावपि॥
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:॥
प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:॥
नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वायम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे॥
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्॥
अग्निरूपांस्तथैवान्यान्नमस्यामि पितॄनहम्।
अग्निसोममयं विश्वं यत एतदशेषत:॥
ये च तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:॥
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।
नमो नमो नमस्तेऽस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज:॥
मार्कण्डेय उवाच:
एवं स्तुतास्ततस्तेन तेजसो मुनिसत्तमा:।
निश्चक्रमुस्ते पितरों भासयन्तो दिशों दश॥
निवेदनं च यत्तेन पुष्पगन्धानुलेपनम्।
तद्भूषितानथ स तान् ददृशे पुरत: स्थितान्॥
प्रणिपत्य रुचिर्भक्त्या पुनरेव कृतांजलि:।
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यमित्याह पृथगादृत:॥)
रुचि बोले - जो अधिदेवताके रूपमें विद्यमान रहते हैं और जो श्राद्धके अवसरपर देवताओंसे, स्वधाद्वारा तृप्त किये जाते हैं, मैं उन पितृगणोंको नमस्कार करता हूँ। स्वर्गमें भी अवस्थित महर्षिगण भुक्ति और मुक्तिकी कामनासे मानसिक श्राद्धके द्वारा जिनको भक्तिपूर्वक तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ।
स्वर्गमें सिद्धजन श्राद्धके सुअवसरोंपर सभी दिव्य उत्तम उपहारोंके द्वारा जिन पितरोंको भलीभाँति संतुष्ट करते हैं, उन पितरोंको मेरा नमन है। गुह्यकजन स्वर्गमें आत्यन्तिकी श्रेष्ठ ऋद्धिकी कामनासे भक्तिपूर्वक तन्मयभावसे जिन पितरोंका पूजन करते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ। पृथिवीपर मनुष्योंके द्वारा श्राद्धोंमें सदैव जिनकी पूजा होती है, जो श्रद्धापूर्वक स्वजनोंसे पूजित होकर अभीष्ट लोक प्रदान करते हैं, मैं उन पितृगणोंको प्रणाम करता हूँ। इस पृथिवीपर ब्राह्मणजन वांछित अभीष्ट लाभके लिये प्राजापत्यलोक प्रदान करनेवाले जिन पितरोंकी सदैव पूजा करते हैं, मैं उन सभीको नमन करता हूँ।
तपके द्वारा निर्धूतकल्मष, संयत आहार करनेवाले अरण्यवासी मुनियोंके द्वारा वनमें उत्पन्न पदार्थोके माध्यमसे किये गये श्राद्धद्वारा जिन पितरोंको तृप्ति प्रदान की जाती है, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।
नैष्टिक धर्मचारी, जितेन्द्रिय एवं समाधिस्थ ब्राह्मणोंके द्वारा जो विधिवत नित्य संतृप्त किये जाते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। क्षत्रियगण इस लोक तथा स्वर्गलोकका फल प्रदान करनेवाले जिन पितृगणोंको श्राद्धमें प्रदत्त कव्य - पदार्थोसे संतुष्ट करते हैं, उन सभी पितरोंको मेरा नमन है। स्वकर्मनिरत वैश्यगण पृथ्वीपर सदा जल, पुष्प, धूप तथा अन्नादिके द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। शूद्रगण इस भूतलपर भक्तिपूर्वक श्राद्धमें जिन समस्त लोकको संतृप्त करते हैं, में ऐसे सुकालिन् नामसे विख्यात पितरोंको प्रणाम करता हूँ।
पाताललोकमें रहनेवाले असुरगण अपने दम्भ एवं अहंकारका परित्यागकर श्राद्धमें जिन अमृतपान करनेवाले पितरोंको तृप्ति प्रदान करते हैं, मैं उन सभी पितृजनोंको नमन करता हूँ। रसातलमें अवस्थित नागगण अपनी मनोवांछित कामनाओंको पूर्ण करनेकी अभिलाषाओंसे प्रेरित होकर विधिपूर्वक श्राद्धमें प्रदत्त भोग - पदार्थोके द्वारा जिन पितृगणोंकी पूजा करते हैं, मैं उन पितरोंको नमस्कार करता हूँ। रसातलमें स्थित सर्पगण भी विधिवत मन्त्रोचचारके साथ प्रदान किये गये भोग - पदार्थोसे समन्वित श्राद्धके द्वारा जिन पितृगणोंकी अर्चना करते हैं, मैं उन सभीको प्रणाम करता हूँ। जो देवलोक, अन्तरिक्ष एवं पृथिवीलोकमें प्रत्यक्षरूपसे निवास करते हैं, देवताओं तथा दैत्योंके भी जो पूज्य हैं, ऐसे उन पितृजनोंको मैं नमन करता हूँ। वे मेरे द्वार निवेदित वस्तुओंको प्राप्त करें।
जो परमार्थ अर्थात् दूसरेका हित करनेके लिये पितृयोनिमें रहकर भी अमूर्तरूपसे विमानमें विद्यमान रहते हैं, श्रेष्ठ योगीजन कष्टोंमें मुक्ति प्रदान करनेवाले जिन पितृजनोंकी पूजा अपने निर्मल मनसे करते हैं, मैं उन पितरोंको नमस्कार करता हूँ। जो स्वर्गमें मूर्तिमान् होकर निवास करते हैं एवं स्वधाभोजी हैं, जो सभी अभिलषित जनोंको उनकी इच्छित कामनाओंका फल प्रदान करनेमें समर्थ हैं और जो निष्काम - जनोंकी मुक्तिके कारण हैं, मैं उन पितरोंको प्रणाम करता हूँ।
जो इच्छुकजनोंके अभीष्टको इसी लोकमें सिद्ध कर देते हैं तथा देवत्व, इन्द्रतव और उससे भी अधिक श्रेष्ठ पद अथवा हाथी, घोड़े, रत्न और उत्तम प्रकारके भवन प्रदान करनेमें सक्षम हैं, वे समस्त पितृजन मेरी इस प्रार्थनासे संतुष्ट हों। जो चन्द्ररश्मि, सूर्यमण्डल और स्वच्छ विमानमें सदा निवास करते हैं, वे पितृजन इस पूजामें हमारे द्वारा प्रदत्त अन्न, जल, गन्धादिके द्वारा संतुष्ट हों और शक्तिवान् बनें।
अग्निमें प्रदान की गयी हविष्यकी आहुतिसे जिन्हें संतुष्टि प्राप्त होती है, जो ब्राह्मणके शरीरमें प्रविष्ट होकर श्राद्ध - भोजन करते हैं, जो पिण्डदान देनेसे प्रसन्न होते हैं, वे सभी पितृगण हमारी इस पूजामें प्रदान किये गये अन्न - जलसे संतुष्ट हों। जो काले - काले सुन्दर तिलोंद्वारा प्रसन्न होते हैं, जो महर्षिजनोंके द्वारा श्राद्धमें उस कालमें प्राप्त शाकपातसे आनन्दित हो उठते हैं, वे पितृजन प्रसन्न हों।
मेरे उन पूज्य पितरोंके जो अतिशय प्रिय समस्त कव्य पदार्थ हैं, उन्हें उन सभी पदार्थोंकी प्राप्ति, इस पूजामें मेरे द्वारा प्रदान किये गये पुष्प, गन्ध, जल तथा पक्वान्न - भोज्य पदार्थोंमें ही हो जाय। इस भूलोकमें प्रतिदिन जो पितृगण श्रद्धावान् जनोंके द्वारा सम्पन्न की गयी पूजाकों स्वीकार करते हैं, जो प्रत्येक मासकी अन्तिम तिथि तथा अष्टकाकालमें श्रद्धालुओंके पूज्य हैं और जिन पितृजनोंकी पूजा वर्षान्त एवं अभ्युदयकालमें होती है, वे सभी मेरे पितृगण इस श्राद्धमें संतुष्टि प्राप्त करें।
कुन्द-पुष्प तथा चन्द्रके समान स्वच्छ गौर वर्णकी कान्तिको धारण करनेवाले जो पितृजन ब्राह्मणोंके पूज्य हैं, देदीप्यमान सूर्यके समान वर्णवाले जिन पितरोंका पूजन क्षत्रियजन करते हैं, स्वर्णके समान कान्तिको धारण किये हुए जो पितृगण वैश्यवर्ण और नीली कान्तिसे सुशोभित जो पितृजन शूद्रवर्णके पूजनीय हैं, वे सभी इस पूजामें मेरे द्वारा निवेदित गन्ध, पुष्प, धूप, जल एवं भोज्यादि - पदार्थ तथा अग्निमें समर्पित आहुतिसे सदाके लिये तृप्ति प्राप्त करें। मैं उन सभी पितरोंको प्रणाम करता हूँ।
श्राद्धादिमें अपनी क्षुधाको पूर्णरूपसे संतुष्ट करनेके निमित्त जो पितृगण देवताओंके पूर्व ही श्रद्धालु व्यक्तियोंके द्वारा अर्पित कव्य - पदार्थोंको ग्रहण कर लेते हैं और संतुष्ट होकर जो अपने स्वजनोंके लिये ऐश्वर्योंकी सृष्टि करते हैं, मैं इस श्राद्धमें उन सभी पितरोंको प्रणाम करता हूँ। जो देवताओंके आदिपुरुष एवं देवराज इन्द्रसे भी पूजित हैं, वे राक्षस, भूत, वेताल, असुर तथा उग्र योनिवाले (हिंसक जीव - जन्तुओं) - का विनाश करके अपनी प्रजा (संतति) - की रक्षा करें। मैं उन पितरोंको प्रणाम करता हूँ।
जो अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, आज्यप तथा सोमप नामक पितृगण हैं, वे सभी इस श्राद्धमें मेरे द्वारा संतृप्त होकर तृप्तिको प्राप्त करें। अग्निष्वात्त पितर मेरी पूर्व दिशाकी रक्षा करें। बर्हिषद् नामक पितृगण सर्वदा मेरी दक्षिण दिशाकी अभिरक्षा करें। आज्यप पितृजन पश्चिम दिशा तथा सोमप पितृगण उत्तर दिशाकी रक्षा करें। ये समस्त पितृजन राक्षस, भूत, पिशाच एवं असुरगणोंके कारण उत्पन्न दोषोंसे नित्य सब प्रकारसे हमारी रक्षा करें।
विश्व, विश्वभुकू, आराध्य, धर्म, धान्य, शुभानन, भूतिद, भूतिकृत् और भूति नामक जो पितरोंके नौ गण हैं तथा कल्याण और कल्यद, कल्यकर्ता, कल्यतराश्रय, कल्यताहेतु एवं अनघ नामक जो पितरोंके छः गण कहे गये हैं और वर, वरेण्य, वरद, तुष्टिद, पुष्टिद, विश्वपात एवं धाता नामसे विख्यात - ये सात गण तथा पितृगणोंके पापविनाशक जो महान्, महात्मा, महित, महिमावान् और महाबल नामसे प्रसिद्ध - ये पाँच गण हैं, उन गणोंके ही साथ सुखद, धनद, धर्मद और भूतिद नामक पितरोंका एक अन्य गण - चतुष्टय कहा गया है। इस प्रकार कुल मिलाकर उन पितरोंके एकतीस गण हो जाते हैं, जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् परिव्याप्त है। ये सभी पितृजन इस श्राद्धमें मेरे द्वारा प्रदत्त कव्यादिसे संतुष्ट हों।
इस प्रकार उस रुचिकी स्तुतिसे पितर अत्यन्त प्रसन्न हो गये। उसी समय सहसा एक दिव्य तेजोराशि उत्पन्न हुई, जो आकाशमण्डलको अपने तेजसे चतुर्दिक् परिव्याप्त कर रही थी। सम्पूर्ण विश्वको अपने तेजसे भलीभाँति आच्छादित करनेवाली उस तेजोराशिको देखकर रुचि पृथिवीपर घुटने टेककर पुन: इस स्तुतिका गान करने लगे - रुचि बोले - 'जो सर्वपूज्य, अमूर्त, देदीप्यमान तेजसे युक्त, ध्यानियोंके हृदयमें विराजमान रहनेवाले एवं दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न पितृजन हैं, उन सभीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो इन्द्रादि देवगण, दक्ष, मरीचि एवं सप्तर्षियों तथा अन्य श्रेष्ठजनोंके नायक और सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं उन पितरोंको मैं नमन करता हूँ। जो मनु आदि तथा सूर्य, चन्द्र एवं समुद्रके भी अधिनायक हैं, उन समस्त पितृगणोंको मैं प्रणाम करता हूँ। जो नक्षत्र, ग्रह, वायु, अग्नि, आकाश, स्वर्ग और पृथिवीके नेता हैं, उन पितरोंको मैं हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ ।'
मैं प्रजापति, कश्यप, सोम, वरुण और श्रेष्ठ योगीजनोंको सर्वदा हाथ जोड़कर नमन कराता हूँ। मैं सातों लोकमें अवस्थित सप्तगणोंको प्रणाम करता हूँ। स्वयम्भू और योगचक्षुष् ब्रह्माको नमन करता हूँ।
जो चन्द्रलोककी भूमिपर अवस्थित रहनेवाले एवं योगमूर्ति - स्वरूप हैं, ऐसे पितरोंको नमस्कार करता हूँ तथा इस जगत्के पितृदेव सोमको भी मैं नमन कराता हूँ।
अग्नि ही जिनका रूप है - ऐसे पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। उसी प्रकार जिनसे यह सम्पूर्ण विश्व अग्नि - सोममय है, ऐसे पितरोंको भी नमस्कार करता हूँ। जो तेजमें विद्यमान रहते हैं, जो चन्द्र - सूर्य और अग्निकी प्रतिमूर्ति हैं, जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं - ऐसे उन योगपरायण समस्त पितरोंको संयतचित्तसे अवस्थित होकर मैं बार - बार नमस्कार करता हूँ। वे सभी स्वधाभुजी पितृजन प्रसन्न हों।’
मार्कण्डेयजीने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ क्रौञ्चकि! रुचिके द्वारा इस प्रकार स्तुति किये गये तेज:स्वरूप वे सभी पितृगण दसों दिशाओंको प्रतिभासित करते हुए प्रत्यक्ष प्रकट हो गये।
रुचिने जिन पुष्प, गन्ध और अनुलेप पदार्थका उन्हें निवेदन किया था, उन्हींसे विभूषित उन पितरोंको उन्होंने अपने समक्ष उपस्थित देखा।
रुचिने पुनः भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर प्रणाम निवेदन किया और ‘पृथक् - पृथक् - रूपसे आप सभीको नमन है, नमन है’- ऐसा आदरपूर्वक कहा - प्रसन्न होकर उन पितृजनोंने उन मुनिश्रेष्ठ रुचिसे ‘वर माँगो’- ऐसा कहा। नतमस्तक रुचिने उन पितरोंसे कहा - रुचिने कहा - हे पितृदेव! ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टि करनेके लिये मुझे आदेश दिया है। अत: मैं आपसे संतानोत्पादनमें समर्थ, श्रेष्ठ एवं दिव्य पत्नीकी कामना करता हूँ।
पितरोंने कहा - हे मुनिसत्तम! इसी स्थानपर आपको अभी इसी क्षण मनोरमा पत्नीकी प्राप्ति होगी, उसीसे आपको पुत्र होगा। हे रुचि! वह बुद्धिमान् मन्वन्तराधिप होकर आपके ही रौच्य इस नामसे तीनों लोकोंमें ख्याति प्राप्त करेगा। उसके भी अतिशय बलवान, महा पराक्रमशाली, महात्मा और पृथिवीका पालन करनेवाले बहुत - से पुत्र होंगे। आप भी प्रजापति होकर चार प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करके अधिकार समाप्त होनेपर धर्मके तत्त्वज्ञानको प्राप्तकर सिद्धि प्राप्त करेंगे।
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस स्तुतिसे हम सभीको संतुष्ट करेगा, उससे प्रसन्न होकर हम लोग उसे उत्तम भोग, आत्मविषयक उत्तम ध्यान, आयु, आरोग्य तथा पुत्र - पौत्रादि प्रदान करेंगे। अतः कामनाओंकी पूर्ति चाहनेवाले श्रद्धालुओंको निरन्तर इस स्तोत्रसे पितरोंकी स्तुति करनी चाहिये। जो मनुष्य श्राद्धमें भोजन कर रहे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके समक्ष भक्तिपूर्वक अत्यन्त प्रिय इस स्तोत्रका पाठ करेगा तो उस स्तवनको सुननेके प्रेमसे हम सबकी भी वहाँ उपस्थिति रहेगी। हम लोगोंकी उपस्थितिसे वह श्राद्ध अक्षय होगा, इसमें संदेह नहीं है।
(स्तोत्रेणानेन च नरो योऽस्मांस्तोष्यति भक्तित:।
तस्य तुष्टा वयं भोगानात्मजं ध्यानमुत्तमं॥
आयुरारोग्यमर्थं च पुत्रपौत्रादिक तथा।
वाञ्छद्धि: सततं स्तव्या: स्तोत्रेणानेन वै यत:॥
श्राद्धेषु य इमं भक्त्या त्वस्मप्रीतिकरं स्तवम्।
पठिष्यति द्विजाग्रयाणां भुञ्चतां पुरतः स्थितः॥
स्तोत्रश्रवणसंप्रीत्या संनिधाने परे कृते।
अस्माभिरक्षयं श्राद्धं तद्भविष्यत्यसंशयम्॥)
जिस श्राद्धमें इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, उस श्राद्धमें हमारी तृप्ति बारह वर्षतकके लिये हो जाती है। हेमन्त - ऋतुमें इस स्तोत्रका पाठ बारह वर्षपर्यन्त हमें संतृप्ति प्रदान करता है। शिशिर - ऋतुमें इस शुभ स्तोत्रका पाठ करनेसे चौबीस वर्षोंतक हमारी तृप्ति रहती है। वसन्त एवं ग्रीष्म - ऋतुमें सम्पन्न होनेवाले श्राद्ध - कर्मके अवसरपर इस स्तोत्रका पाठ हम लोगोंके लिये सोलह वर्षोतक तृप्ति प्रदान करनेका साधन होता है। हे रुचे! वर्षाकालके दिनोंमें इस स्तोत्र - पाठके साथ किया गया श्राद्ध हम सभीके लिये अक्षय तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है। शरत्कालमें सम्पादित श्राद्धके अवसरपर पठित यह स्तोत्र हम लोगोंको पंद्रहवर्षीय तृप्ति प्रदान करता है।
जिस घरमें लिखकर यह सम्पूर्ण स्तोत्र सदैव रखा रहता है, वहाँ श्राद्ध करनेपर हमारी उपस्थिति विद्यमान रहती है अर्थात् उस श्राद्धमें हम लोग उपस्थित रहते हैं। हे महाभाग! इसलिये श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंके सामने हम लोगोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले इस स्तोत्रको सुनाना चाहिये।
(यस्मिन् गेहे च लिखितमेतत्तिष्ठति नित्यदा।
संनिधाने कृते श्राद्धे तत्रास्माकं भविष्यति॥
तस्मादेतत्त्वया श्राद्धे विप्राणां भुञ्चतां पुर:।
श्रावणीयं महाभाग अस्माकं पुष्टिकारकम्॥)