121 - चातुर्मास्य व्रतका निरूपण

ब्रह्माजीने कहा - अब मैं चातुर्मास्य व्रतको कहता हूँ। इस व्रतका आरम्भ आषाढ़ मासकी एकादशी या पूर्णिमा तिथिमें सब प्रकारसे भगवान्‌ हरिका पूजन करके करे। व्रतारम्भके समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये -

इदं व्रतं मया देव गृहीतं पुरतस्तव।

निर्विघ्नं सिद्धिमाप्नोतु प्रसन्ने त्वयि केशव॥

गृहीतेऽस्मिन्‌ व्रते देव यद्यपूर्णे प्रियाम्यहम्‌।

तन्मे भवतु सम्पूर्णं त्वत्प्रसादाज्जनार्दन॥

हे देव! आपके समक्ष मैंने इस व्रतको ग्रहण किया है। हे केशव! आपके प्रसन्न होनेपर मुझे निर्विघ्न सिद्धि प्राप्त हो। हे देव! ग्रहण किये गये इस व्रतकी अपूर्णतामें ही यदि मैं मृत्युको प्राप्त हो जाता हूँ तो भी हे जनार्दन! आपकी कृपासे यह मेरा व्रत पूर्ण हो। इस प्रकार हरिका पूजन करके व्रत, पूजन और जपादिका नियम ग्रहण करना चाहिये। जो हरिके व्रतकों करनेकी इच्छा करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। साधक स्नान करके भगवान्‌ हरिका पूजन कर इस पूजा तथा जपादिकी विहित क्रियाओंकी पूर्तिका संकल्प ले तथा आषाढ़ आदि चार मासोंतक एकभक्त व्रत करता हुआ विष्णुकी पूजा करे। ऐसा करनेवाला विष्णुके परम पवित्र निर्मल लोकमें चला जाता है।

मधु, मांस, सुरा और तेलका परित्याग करनेवाला जो वेदपारंगत, कृच्छुपादव्रती (कृच्छपाद व्रत - यह तीन दिनका व्रत है। पहले दिन दिनमें एक बार हविष्यान्न - ग्रहण, दूसरे दिन अयाचित रूपमें हविष्यान्नका एक बार ग्रहण और तीसरे दिन अहोरात्र उपवास। (याज्ञ०स्मृति, प्राय0 श्लोक (31 8)) विष्णुभक्त हरिका पूजन करता है, वह विष्णु लोकको प्राप्त हो जाता है। एक रात्रिका उपवास करनेसे वैमानिक (विमानपर चढ़कर भ्रमण करनेवाला) देवता हो जाता है। तीन रात्रि पर्यन्त उपवास कर षष्ठांश भोजन करनेसे साधकको श्वेतद्वीपकी प्राप्ति होती है। चान्द्रायण व्रत ( चान्द्रायणव्रत - यह व्रत अनेक प्रकारका है। मनु0 11216 के अनुसार यह है - प्रतिदिन तीनों काल स्तान। पूर्णिमासे व्रतका आरम्भ। इस दिन पंद्रह ग्रास हविष्यान्नमात्र ग्रहण पूर्णिमाके बाद कृष्ण पक्षकी प्रतिपदासे एक - एक ग्रास कम करते हुए अर्थात्‌ 14,13,12 इस संख्यामें ग्रास ग्रहण करते हुए कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको एक ग्रास ग्रहण। तदनन्तर अमावास्याको पूर्ण उपवास। पुनः अमावास्याके बाद शुक्ल प्रतिपदासे एक - एक ग्रास बढ़ाकर 1, 2, 3 इस क्रममें दूसरी पूर्णिमाको पंद्रह ग्रास ग्रहण। इस प्रकार एक मासमें यह व्रत पूर्ण होता है।)

करनेसे तो भगवान्‌ हरिका लोक और मुक्ति बिना माँगे ही मिल जाती है। प्राजापत्य व्रत(प्राजापत्य व्रत - यह व्रत बारह दिनका होता है। प्रथम तीन दिन केवल दिनमें हविष्यान्न - ग्रहण। तत्पश्चात्‌ तीन दिन केवल रातमें हविष्यान्न - ग्रहण। तदनन्तर तीन दिन बिना माँगे जो मिल जाय, उतनामात्र एक बार ग्रहण। अन्तिम तीन दिन पूर्णरूपमें उपवास।) (मनु0 11211) करनेसे विष्णुलोक तथा पराक व्रत (पराकव्रत - इस व्रतमें बारह दिनतक केवल जल ग्रहण करके रहा जाता है।) (याज्ञ०स्मृति, प्राय0 श्लोक 320, मनु०11215) करनेसे हरिकी प्राप्ति होती है।

इस व्रतमें सत्तू, यवान्नकी भिक्षा कर, दूध, दही तथा घृतका प्राशन कर, गोमूत्रयावकका आहार कर, पञ्चगव्यका पान कर अथवा सभी प्रकारके रसोंका परित्याग कर शाक - मूल - फलादिका भक्षण करते हुए जो साधक विष्णुकी भक्ति करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है।