164 - कुष्टरोगका निदान

धन्वन्तरिजीने कहा - हे सुश्रुत! मिथ्या एवं विरोधी आहार - विहार करनेसे तथा सज्जनोंकी निन्‍दा एवं अपमान और वध या हत्या करनेसे, दूसरोंकी धन - सम्पत्तिके हरण एवं पाप - कृत्यसे, पूर्वजन्मकृत पापका उदय होनेसे वातादि दोष कुपित होकर शिराओंमें जाकर त्वचा, लसीका, रक्त एवं मांसको दूषित और अंगोंकी क्रिया - हानि करके वे दोष बाहर आकर त्वचापर विविध प्रकारके कुष्ठको(सु०नि०अ० 5)उत्पन्न करते हैं।

सामयिक उपेक्षा करनेपर यह रोग आभ्यन्तरिक समस्त कोष्ठकोंके सहित शरीरमें व्याप्त होकर बाहर और भीतर रहनेवाली सभी धातुओंको गलाकर अपना अधिकार कर लेता है। इस रोगमें पसीनेके जलबिन्दुओंसे युक्त प्राणीके शरीरपर कुछ आर्द्रता होती है। इसमें अत्यन्त कष्टदायक बहुत ही छोटे - छोटे कीड़े होते हैं। इन सभी लक्षणोंसे युक्त यह रोग क्रमशः रोगीके रोम, त्वचा, स्नायु तथा धमनियोंपर आक्रमण करता है।

बाह्य भागमें फैला हुआ कुष्ठरोग प्राणीके उस आक्रान्तित शरीरको भस्मसे आच्छादित हुएके समान रूक्ष बना देता है। वात, पित्त, श्लेष्म, वातपित्त, वातश्लेष्म, पित्तश्लेष्म और संनिपात - दोषजन्य प्रभावसे यह रोग सात प्रकारका होता है। इन सभी प्रकारके कुष्ठ - भेदोंमें वात - पित्त तथा कफज दोषके अन्तर्गत प्राप्त होनेवाली विकृति अधिक रहती है।

वात - दोषसे कापाल, पित्त - दोषसे उदुम्बर, कफ - दोषसे मण्डल तथा विचर्चिका नामक कुष्ठ उत्पन्न होता है। वातपित्तज दोषसे ऋक्ष, वातश्लेष्मजन्य दोषसे चर्म, एककुष्ठ, किटिम, सिध्म, अलसक तथा विपादिका नामक कुष्ट होते हैं। श्लेष्म पित्तजन्य दोषसे दद्रु, शतारुषी, पुण्डरीक, विस्फोट, पामा और चर्मदल नामक कुष्टोंकी उत्पत्ति होती है। इन सभी दोषोंकी संनिपात - अवस्था आनेपर 18 प्रकारके कुष्ठ - रोग उत्पन्न होते हैं।

इनमें पूर्वमें कहे - कापाल, उदुम्बर तथा मण्डल - ये तीन और दद्रु, काकण, पुण्डरीक तथा अरिजिह्वा नामक इन सात कुष्ठोंको महा कुष्ठ माना गया है। शेष ग्यारह क्षुद्र कुष्ठ कहलाते हैं।

कुष्ठरोग(सु०नि०अ० 5; च०चि०अ० 5,7; अ०हृ०नि०अ०14; वा०नि० 7) होनेके पूर्व रोगीकी त्वचामें अत्यन्त चिकनाहट, रूक्षता, स्पर्शता, स्वेद, अस्वेद, वर्णभेद, दाह, खुजली, स्पर्शानुभूतिकी कमी, सुई चुभानेसे होनेवाली पीड़ाके समान कष्ट, पित्तीका उछलना और अनायास श्रमकी अनुभूति, रोगीके घावोंमें अत्यधिक पीड़ा, व्रणोंका यथाशीघ्र उद्भव, अधिक समयतक उन व्रणोंका रहना, व्रण - भरावके समय रूक्षता, सामान्य तथा थोड़ेसे कारणपर रोगीको अत्यधिक क्रोध, रोमाञ्च तथा रक्तका काला होना - ये दोषपूर्ण कुलक्षण दिखायी देते हैं।

कापाल कुष्ठका वर्ण काला और लाल होता है अथवा आँवेंमें पकाये गये मिट्टीके खप्परके सदृश वह देखनेमें लगता है। उसमें रूक्षता और कठोरता होती है। इस कुष्ठ - रोगकी आकृति शरीरके अधिक भागमें फैली रहती है। उन स्थानोंमें रहनेवाले रोमसमूह भी दूषित हो जाते हैं। उन दूषित स्थानोंपर सूचिकाभेदनसे होनेवाली पीड़ाके समान अत्यधिक पीड़ा भी होती है। वह कुष्ठ विषम अर्थात्‌ दुःसाध्य माना गया है।

जो कुष्ठरोग उदुम्बर अर्थात्‌ गूलर - फलके समान दिखायी देता हो, उसको औदुम्बर कुष्ठरोग कहना चाहिये। इसकी आकृति वर्तुलाकार होती है। इसमें अत्यधिक गीलापन, दाह और पीड़ा होती है। जिस प्रकार बिना छानी गयी मदिराका वर्ण होता है, जिसमें छोटे - छोटे कीड़े भरे रहते हैं; वैसे ही सामान्य पके हुए उदुम्बरका फल पीत और लाल होता है, उसी रूपमें इस कुष्ठरोगका वर्ण स्वीकार करना चाहिये। इसमें रोगजन्य कृमि रहते हैं, जिसके कारण उस व्रणमें खुजली भी होती है।

जो कुष्ठ स्थिर, गोल, भारी, चिक्कण, श्वेत या रक्त - वर्णवाला और मल समन्वित हो, उसके वर्ण परस्पर मिले हों, उसमें अत्यधिक खुजलाहट उत्पन्न करनेवाले कृमि हों, उनसे पीब निकलता रहे तथा वह चिकने, पीत वर्णकी आभासे युक्त मण्डलके समान दिखायी देता हो तो उसको मण्डल कुष्ठरोग कहा गया है।

खुजलाहटसे भरी हुई फुंसियोंवाले धूसर वर्णसे युक्त और स्राव - समन्वित कुष्ठका नाम विचर्चिका कुष्ठ है। जो कुष्ठ कर्कश होता है, जिसके किनारेपर लाल वर्ण और बीचमें काला वर्ण विद्यमान रहता है, जिसकी आकृति ऊँची और रीछ अर्थात्‌ भालूकी जिह्वाके समान होती है, जिसमें बहुत - से कृमि भी होते हैं; उसको आयुर्वेदमें ऋष्यजिह्वा या ऋक्षजिह्वा कुष्ठके नामसे अभिहित किया गया है।

हाथीके चमड़ेके समान रोगीका खरखराहट - भरा चमड़ा होनेपर गजचर्मकुष्ठ कहा जाता है। जो कुष्ठ पसीनेसे रहित मछलीके शल्क (अभ्रकवत्‌ चर्म) - के सदृश होता है, उसे एककुष्ठ कहते हैं। जो कुष्ठ रूखा, अग्निके समान वर्णवाला या काला, स्पर्श करनेमें कष्टकारी, खुजलाहटसे युक्त तथा कठोर होता है, वह किटिम कुष्ठ माना है। सिध्म कुष्ठ अन्तर्भागसे रूक्ष और बाह्यरूपमें स्निग्ध होता है। इसके आभ्यन्तरिक भागको रगड़नेसे बालूके कणके समान रज गिरता है। इस रोगके होनेपर शरीरका स्पर्श करनेसे चिकनाहटका अनुभव होता है। इसमें स्वच्छता होती है। इसकी वर्णाकृति काले पुष्पके समान दिखायी देती है, यह कुष्ठ प्राय: शरीरके ऊपरी भागमें होता है।

अलंशुका (अलसक) कुष्ठमें खुजली और लाल रंगकी पिडिका होती है। विपादिका कुष्ठमें हाथ और पाँव फट जाते हैं, अत्यन्त वेदना और खुजली होती है तथा लाल वर्णकी फुंसियाँ हो जाती हैं। जिस कुष्ठमें दद्रु या दाद दूर्वाके समान बहुत जगहमें फैल जाता हो तथा अलसीके फूलके सदृश कान्ति दिखायी देती हो और ऊँचे - ऊँचे गोल चकत्ते हों, ऐसा खुजलाहटसे परिव्याप्त कुष्ठ दद्रु या दाद कुष्ठ कहलाता है।

अपने मूलभागमें स्थूल, दाह और वेदनासे समन्वित रक्तस्राववाले प्रचुर व्रणोंसे युक्त कुष्ठरोगकानाम शतारुषी है। इस प्रकारके कुष्ठरोगमें दाह, क्लेद और वेदना होती है । यह प्राय:अस्थिके जोड़ोंमें होता है। जिस कुष्ठमें कुष्ठ - स्थानका मण्डल रक्तसे भरा हुआ तथा पाण्डु वर्णका होता है, उसमें दाह और खुजलाहट - भरी पीड़ा भी होती है, खिले हुए रक्तवर्ण और जलसे संसिक्त पुण्डरीक - दल अर्थात्‌ श्वेत कमलकी पंखुड़ियोंके समान शरीरपर उभरा हुआ और व्रणके किनारे पद्मपत्रकी जल - विन्दुओंसे युक्त मांसवाले दिखायी देते हैं, उसे पुण्डरीक कुष्ठ कहते हैं। विस्फोटक कुष्ठ पतले चमड़ेसे ढका होता है तथा सफेद और लाल फुंसियोंसे व्याप्त होता है।

पामा नामक कुष्ठ पककर फूटनेवाली छोटी - छोटी असंख्य फुंसियोंसे भरा होता है। इसमें खुजली, मलस्राव और वेदना होती है। प्रायः इसका वर्ण श्याम और लाल होता है। इसमें रूक्षता होती है। यह रोगीके कूल्हे, चूतड़ और हाथके रोम - छिद्रोंमें होता है। चर्मदल नामक कुष्ठ फोड़ा - फुंसीके रूपमें उभरकर फफोले पड़कर फूटता है, यह किये गये स्पर्शको सहन करनेमें समर्थ नहीं होता। इसमें खुजलाहट होती है, रक्तस्राव होता है, जलन भी होती है और मांस गलकर गिरता है।

काकण नामक कुष्ठमें अत्यन्त दाह और तीव्र वेदना होती है। गुंजाफलके समान यह पहले लाल और काले अनेक रंगका होता है। अपने - अपने कारणोंसे सब कुष्ठोंके लक्षण इसमें पाये जाते हैं।

दोष - भेदके(सू०सू०अ० 12)अनुसार त्रिदोषोंमें जो दोष कुषमें अधिक विहित हो, उसीके लक्षण और कर्मके अनुसार त्रिदोषज कुष्ठका स्वरूप समझना चाहिये। जो कुष्ठ - भेद अपने ही दोषका अनुगमन करता है अर्थात्‌ वह द्वन्द्वज दोष या संनिपातज दोषसे सम्पृक्त नहीं होता तो उसकी चिकित्सा सम्भव है। किंतु जब वह सभी दोषोंसे परिव्याप्त हो जाता है तो उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये, वह असाध्य हो जाता है।

उपर्युक्त जितने भी कुष्ट हैं, उनमेंसे जो कुष्ठ अस्थि, मज्जा और शुक्राणुओंमें प्रविष्ट हो गया है, वह कुष्ठ भी असाध्य है। जो कुष्ठ मेदागत है और जो स्नायु, अस्थि एवं मांसमें पहुँच गया है, वह अधिक कष्टसाध्य नहीं है। जिस कुष्ठका जन्म कफ और वातके कारण त्वचापर ही होता है, जिसमें विशेष दोष नहीं रहता, वह कष्टसाध्य नहीं होता। सामान्य चिकित्सासे ही उसकी शान्ति हो सकती है।

त्वचाभागपर ऐसे कुष्ठके उभर आनेसे शरीरक़ा वर्ण बदल जाता है, उसमें रूक्षता आ जाती है। तदनन्तर जब वह कुष्ठ रक्त और मांसमें प्रविष्ट हो जाता है तो रोगीके शरीरमें स्वेद, ताप तथा शोथके लक्षण उभर आते हैं। रोगीके हाथ और पैरोंमें फोड़े हो जाते हैं। शरीरके संधि - भागोंमें अधिक पीड़ा होती है। दोषाधिक्य होनेपर वह मेदामें पहुँच जाता है, जिसके कारण उसमें उपद्रव होने लगता है। रोगीकी इन्द्रियोंमें संज्ञाशून्यता बढ़ जाती है अर्थात्‌ वह चलने - फिरनेमें अशक्त हो जाता है। रोगीके शरीरकी मज्जा और अस्थिमें जब वह कुष्ठ पहुँच जाता है तो उसके नेत्रोंकी ज्योति तथा वाणीके स्वरोंमें भेद उत्पन्न हो जाता है।

कुष्ठरोगके कृमियोंके द्वारा रोगीके वीर्यमें विकार उत्पन्न हो जानेपर वह दोष स्त्री और संतानके लिये बाधायुक्त हो जाता है। रस - रक्तादि धातुगत कुष्ठोंमें अपने - अपने लक्षणोंके अतिरिक्त यथापूर्व धातुगत कुष्ठोंक लक्षण भी हो जाते हैं।

श्वित्र और कुष्ठ इन दोनों रोगोंकी उत्पत्तिका कारण एक ही है और इनकी चिकित्सा भी एक ही है। इसीको किलास तथा दारुण भी कहते हैं। इनमें अन्तर यही है कि कुष्ठ संनिपातिक है और श्वित्र अलग - अलग दोषोंसे उत्पन्न होता है। कुष्ठ स्नावी है और श्वित्र अपरिस्नावी। कुष्ठ रसादि सातों धातुओंपर आक्रमण करता है और श्वित्र रक्त, मांस तथा मेद - इन तीन धातुओंका आश्रय ग्रहण करता है।

वातज और आभ्यन्तरिक रूक्षताके कारण उत्पन्न हुआ श्वित्र कुष्ठरोग अरुण वर्णका होता है। जब वह पित्तज दोषके कारण जन्म लेता है तो उसका वर्ण पद्मपत्रके समान या ताम्रवत्‌ होता है। यह दाहयुक्त और रोमविनाशक होता है। कफज दोषके कारण उभरा हुआ श्वित्र श्वेतवर्ण, सघन,भारी और खुजलीसे युक्त होता है।

ये श्वित्र क्रमशः रक्त, मांस और मेदामें पहुँचकर आश्रय ग्रहण करते हैं अर्थात्‌ वातज श्वित्र रक्तमें, पित्तज श्रित्र मांसमें तथा कफज श्वित्र मेदमें होता है। अरुण आदि वर्णके आधारपर ही श्वित्रके वातादिक दोष तथा रक्तादि आश्रय - दोनों ही जाने जाते हैं। उत्तरोत्तर इनकी चिकित्सा कष्ट - साध्य होती है अर्थात्‌ यह श्वित्ररोग जबतक रक्ताश्रित होता है, तबतक उसकी चिकित्सा सम्भव है। मांसगत होते ही यह कष्टसाध्य हो जाता है और उसके बाद तो जब यह मेदामें पहुँच जाता है, तब अत्यन्त कष्टसाध्य हो जाता है।

जो श्वित्र कृष्ण वर्णवाले रोमोंसे भरा हुआ होता है, उसके दाग एक - दूसरेसे संश्लिष्ट नहीं होते। वह अधिक समयका न होकर नया ही होता है और उसका जन्म अग्निसे जलनेके कारण नहीं हो तो उसे चिकित्सा - साध्य समझना चाहिये। इन लक्षणोंके विपरीत होनेपर इसका उपचार करना चिकित्सकके लिये त्याज्य है, क्योंकि यह असाध्य हो जाता है। रोगीके गुह्मभाग, करतल और ओष्ट - प्रदेशमें तो यथाशीघ्र भी उत्पन्न हुआ यह रोग असाध्य बन जाता है। यश प्राप्त करनेके इच्छुक वैद्यको तो किलास नामक श्वित्र - भेदकी चिकित्साको सर्वथा त्याग देना चाहिये, क्योंकि उसका उपचार सम्भव नहीं है।

प्राय: सभी रोग संक्रामक होते हैं। रोगीका स्पर्श करनेसे, उसके साथ बैठकर भोजन करनेसे, उसके साथ रहनेसे, एक शय्या और आसनपर उसके साथ सोने और बैठनेसे तथा उस रोगीके द्वारा प्रयुक्त वस्त्र, माला एवं अनुलेप - पदार्थका प्रयोग करनेसे दूसरे प्राणीमें रोगोंका प्रादुर्भाव हो जाता है।