7 - 10 - देवपूजा - विधान, विष्णुपूजोपयोगी वज्रनाभमण्डल, विष्णुदीक्षा तथा लक्ष्मी - पूजा

श्री हरिने कहा - हे रुद्र! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करनेवाली सूर्यादि देवोंकी पूजाका मैं वर्णन करता हूँ। हे वृषभध्वज! ग्रहदेवताओंके आसनकी पूजाकर निम्न मन्‍त्रों-

ॐ नमः सूर्यमूर्तये। ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः। ॐ सोमाय नमः। ॐ मङ्गलाय नमः। ॐ बुधाय नमः। ॐ बृहस्पतये नम:। ॐ शुक्राय नमः। ॐ शनैश्चराय नम:। ॐ राहवे नमः। ॐ केतवे नम:। ॐ तेजश्चण्डाय नम: - से आसन, आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नमस्कार, प्रदक्षिणा और विसर्जन आदि उपचारोंको प्रदान करके सूर्यादि ग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये।

ॐ ह्रां शिवाय नमः - मन्त्रसे आसनकी पूजाकर ॐ ह्रां शिवमूर्तये शिवाय नमः - मन्त्रसे नमस्कार करे और साधक शिवपूजामें सर्वप्रथम - ॐ ह्रां हृदयाय नम:। ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा। ॐ ह्रूम शिखायै वषट्। ॐ ह्रैम कवचाय हुं। ॐ ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ ह्रः अस्त्राय नमः - इन मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास करे। तत्पश्चात् - ॐ ह्रां सद्योजाताय नम:। ॐ ह्रीं वामदेवाय नम:। ॐ ह्रू अघोराय नम:। ॐ ह्रै तत्पुरुषाय नमः। ॐ ह्रो ईशानाय नमः - इन मन्त्रोंसे शिवके पाँचों मुखोंको नमस्कार करना चाहिये।

इसी प्रकार विष्णुपूजामें ॐ वासुदेवासनाय नमः - मन्त्रसे भगवान्‌ विष्णुके आसनकी पूजा करे और - ॐ वासुदेवमूर्तये नम:। ॐ अं ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः। ॐ आं ॐ नमो भगवते सङ्कर्षणाय नमः। ॐ अं ॐ नमो भगवते प्रद्युम्नाय नम:। ॐ अ: ॐ नमो भगवते अनिरुद्धाय नम: - इन मन्त्रोंके द्वारा साधक हरिके चतुर्व्यूहको नमन करे। उसके बाद - ॐ नारायणाय नमः। ॐ तत्सद्ब्राह्मणे नम:। ॐ हूं विष्णवे नमः। ॐ क्षौं नमो भगवते नरसिंहाय नमः। ॐ भूः ॐ नमो भगवते वराहाय नमः। ॐ कं टं पं शं वैनतेयाय नम:। ॐ जं खं रं सूदर्शनाय नमः। ॐ खं ठं फं षं गदायै नम:। ॐ वं लं मं क्षं पाँच्जन्याय नम:। ॐ घं ढं भं हं श्रियै नमः। ॐ गं डं वं सं पुष्टयै नम:। ॐ धं षं वं सं वनमालायै नम:। ॐ सं दं लं श्रीवत्साय नमः।

ॐ ठं चं भं यं कौस्तुभाय नम:। ॐ गुरुभ्यो नमः। ॐ इन्द्रादिभ्यो नम:। ॐ विष्वक्सेनाय नमः - इन मन्त्रोंसे भगवान्‌ श्रीहरिके अवतारों, आयुधों एवं वाहन आदिको नमस्कार करते हुए उन्हे आसनादि उपचार प्रधान करना चाहिये।

हे वृषध्वज! भगवान्‌ विष्णुकी शक्ति देवी सरस्वतीकी मङ्गलकारिणी पूजामें ॐ ह्रीं सरस्वत्यै नमः-इस मन्त्रसे देवी सरस्वतीको नमस्कारकर निम्न मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास करना चाहिये -

ॐ ह्रां हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं शिरसे नमः। ॐ हूं शिखायै नम:। ॐ ह्रै कवचाय नम:। ॐ ह्रो नेत्रत्रयाय नम:। ॐ ह्र: अस्त्राय नमः।

इसी प्रकार श्रद्धा, ऋद्धि, कला, मेधा, तुष्टि, पुष्टि, प्रभा तथा मति-ये जो सरस्वतीदेवीकी आठ शक्तियाँ हैं, इनका पूजन निम्न नाममन्त्रोंसे करे -

ॐ ह्रीं श्रद्धायै नम:। ॐ ह्रीं ऋध्धायै नमः। ॐ ह्रीं कलायै नमः। ॐ ह्रीं मेधायै नम:। ॐ ह्रीं तुष्टयै नम:। ॐ ह्रीं पुष्टयै नमः। ॐ ह्रीं प्रभायै नमः। ॐ ह्रीं मत्यै नमः।

[इन शक्तियोंकी पूजा करनेके पश्चात्‌] क्षेत्रपाल, गुरु और परम गुरुका ॐ क्षेत्रपालाय नमः। ॐ गुरुभ्यो नम:। ॐ परमगुरुभ्यो नम: - इन मन्त्रोंसे नमस्कार करना चाहिये।

तदनन्तर कमलवासिनी सरस्वतीदेवीको आसनादि उपचार प्रदान करने चाहिये। पूजनके अनन्तर सूर्यादि देवताओंके लिये प्रयुक्त होनेवाले मन्त्रोंसे उनका पवित्रारोहण करना चाहिये।

श्री हरिने कहा - हे शिव! भगवान्‌ विष्णुकी विशेष पूजाके लिये पाँच प्रकारके रंगोंसे बने हुए चूर्णके द्वारा वज्रनाभ - मण्डलका निर्माण करना चाहिये, जो सोलह समान कोष्ठकोंसे संयुक्त हो।

वज्रनाभ - मण्डल बनाकर सबसे पहले न्यास करे और उसके बाद भगवान्‌ श्रीहरिकी पूजा करे। हृदयके मध्यमें भगवान्‌ विष्णु, कण्ठमें सङ्कर्षण, सिरपर प्रद्युम्न, शिखाभागमें अनिरुद्ध, सम्पूर्ण शरीरमें ब्रह्मा तथा दोनों हाथोंमें श्रीधरका न्यास करे। तत्पश्चात्‌ ‘अहं विष्णु:’ (मैं ही विष्णु हूँ) - ऐसा ध्यान करते हुए पञ्चके कर्णिका - भागमें भगवान्‌ श्रीहरिकी स्थापना करे। इसी प्रकार मण्डलके पूर्वमें सङ्कर्षण, दक्षिणमें प्रद्युम्न,पश्चिममें अनिरुद्ध और उत्तरमें ब्रह्मकी स्थापना करे। तदनन्तर ईशानकोणमें श्रीधर तथा पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि देवोंकी स्थापना करनी चाहिये । यथा - पूर्व दिशामें (ॐ इन्द्राय नमः मन्त्रसे) इन्द्र, अग्निकोणमें (ॐ अग्नये नमः मन्त्रसे) अग्नि, दक्षिण दिशामें (ॐ यमाय नमः मन्त्रसे)यम, नैर्ऋत्यकोणमें (ॐ निर्ऋतये नमः मन्त्रसे) निर्ऋ्रति, पश्चिम दिशामें (ॐ वरुणाय नमः मन्त्रसे) वरुण, वायुकोणमें (ॐ वायवे नमः मन्‍त्रसे) वायु, उत्तर दिशामें (ॐ कुबेराय नमः मन्त्रसे) कुबेर और ईशानकोणमें (ॐ ईशानाय नम: मन्त्रसे) ईशान नामक दिक्पालकी स्थापना करे। उसके बाद उन सभी देवोंकी गन्धादि उपचारोंके द्वारा पूजा करनी चाहिये। इससे साधक परमपदको प्राप्त हो जाता है।

श्री हरिने पुन: कहा - हे रुद्र! दीक्षित शिष्यको वस्त्रसे अपने दोनों नेत्र बंद करके अग्निमें देवताके मूलमन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। हे रुद्र! पुत्र - लाभके लिये द्विगुण (दो सौ सोलह), साधनासिद्धिके निमित्त त्रिगुण (तीन सौ चौबीस) और मोक्ष - प्राप्तिकी कामनासे देशिक (उपदेष्टा आचार्य) - को चाहिये कि वह चतुर्गुण(चार सौ बत्तीस) आहुतियाँ उसी विष्णु - मन्त्रसे प्रदान करे।

विद्वान देशिकको सबसे पहले भगवान्‌का ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर वे वायवी कला (यं बीज - मन्त्र) - से शिष्योंकी स्थिति, आग्नेय कला (रं बीज - मन्त्रके) - द्वारा उनकी मनस्ताप - वेदना तथा वारुण कला (वं बीज - मन्त्र)-से हृदयकी स्थिति (धर्मकी अभिरुचि) - का विचार करें। इसके बाद देशिकको उस परम तेजमें आत्मतेजका निक्षेप करके जीवात्मा और परमात्माके ऐक्य अर्थात्‌ अभेद - ज्ञानका चिन्तन करना चाहिये। तदनन्तर वे आकाश - तत्त्वमें 'ॐकार' का ध्यानकर शरीरमें स्थित अन्य कारणभूत वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी - तत्त्वका चिन्तन करें। इस प्रकार प्रणव (ॐकार) - मन्त्रका चिन्तन करते हुए प्रत्येक कारणभूत तत्त्वोंपर जो साधक विजय प्राप्त करता है, वह शरीरधारी होनेके कारण उस पञ्चमहाभूतके ज्ञानरूपी शरीरको ग्रहण कर लेता है।

अत: हे वृषभध्वज!अपने अन्त:करणमें उस सूक्ष्म शरीरधारी (क्षेत्रज्ञ) ज्ञानको उत्पन्न करके प्रत्येक महाभूतको उसीमें संयुक्त करनेका प्रयत्न करना चाहिये।

मण्डलादिके निर्माणमें जो लोग असमर्थ हैं, वे मात्र मानसमण्डलकी कल्पना करके भगवान्‌ श्री हरि का पूजन करें। [शरीरमें ब्रह्मतीर्थादिकी कल्पना की गयी है। अतएव] उसी क्रमसे वह (मानस - मण्डल भी) चार द्वारोंसे युक्त है। हाथको पद्म तथा अँगुलियोंको पद्मपत्र कहा गया है। हथेली उस पद्मकी कर्णिका है और नख उसके केशर हैं, इसलिये साधकको उस हाथरूपी कमलमें सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, अग्नि तथा यमसहित श्री हरिका ध्यान करके उनकी पूजा करनी चाहिये।

उसके बाद वह देशिक सावधान होकर अपने उस हाथको शिष्यके सिरपर रखे, [क्योंकि हाथमें विष्णु विद्यमान रहते हैं, अत:] यह हाथ स्वयं विष्णु - स्वरूप है। उस हाथके स्पर्शमात्रसे शिष्यके समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर गुरु शिष्यकी विधिवत्‌ पूजा करे और उस शिष्यका नामकरण करे।

श्री हरि ने (रुद्रसे) कहा - [अब मैं] सिद्धि प्राप्त करनेके लिये स्थण्डिल आदिमें की जानेवाली श्री लक्ष्मी की पूजाके सम्बन्धमें कह रहा हूँ। सबसे पहले - ॐ श्रीं ह्रीं महालक्ष्म्यै नम: - यह कहकर साधक - 'श्रां श्री श्रूं श्रें श्रौं श्र:' - इन बीजमन्त्रोंसे क्रमश: हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्रमें (समस्त शरीरकी रक्षक आवरक शक्ति ‘अस्त्र’की कल्पना दोनों हाथोंमें की जाती है।) इस प्रकारसे षडङ्गन्यास करे - 'ॐ श्रां हृदयाय नम:। ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा। ॐ श्रूं शिखायै वषट्‌। ॐ श्रैं कवचाय हुम्‌। ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्‌। ॐ श्र:अस्त्राय फट्।'

साधनारत भक्तको अङ्गन्यास करके आसनसहित श्री महालक्ष्मी की पूजा करनी चाहिये।

इसके बाद चार प्रकारके वर्णोंसे अनुरंच्जित पद्मगर्भ चार द्वार और चौंसठ प्रकोष्ठोंसे युक्त मण्डलके मध्य लक्ष्मी और उनके अङ्गोंका तथा एक कोणमें दुर्गा, गण एवं गुरुका, तदनन्तर अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करनेके लिये तत्पर साधक अग्नि आदि कोणोंमें क्षेत्रपाल देवोंकी पूजा करके हवन करे। तत्पश्चात्‌ वह- 'ॐ घं टं डं हं श्रीमहालक्ष्म्यै नम:' - इस महामन्त्रसे पूर्व उल्लिखित परिवारके सहित श्रीमहालक्ष्मीदेवीका पूजन करे।

तदनन्तर उस साधकको 'ॐ सौं सरस्वत्यै नमः।' 'ॐ ह्रीं सौं सरस्वत्यै नम:।' 'ॐ ह्रीं वद वद वाग्वादिनि स्वाहा।', 'ॐ ह्रीं सरस्वत्यै नमः' - इन मन्त्रोंको कहकर सरस्वतीको नमस्कार करना चाहिये।