गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
114 - नीतिसार
श्रीसूतजीने पुनः कहा - न कोई किसीका मित्र है और न कोई किसीका शत्रु। कारणविशेषसे ही लोग एक - दूसरे मित्र और शत्रु होते हैं। यह दो अक्षरेंवाला रत्नरूपी ‘मित्र’ शब्द किसने बनाया? यह दुःख एवं भयसे प्राणियोंका अभिरक्षक है तथा प्राणिमात्रमें प्रेम और विश्वासको उत्पन्न करनेवाला है।
जिस व्यक्तिने एक बार भी ‘हरि’ इस दो अक्षरसे युक्त शब्दका उच्चारण कर लिया है, वह अपने कटिप्रदेशमें परिकर (फेंटा) बाँधकर मुक्ति प्राप्त करनेके लिये तैयार रहता है। अर्थात् ऐसा मनुष्य मोक्षका अधिकारी हो जाता है -
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्।
बद्ध: परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥
माता, पत्नी, सहोदर बन्धु तथा पुत्रमें पुरुषोंको वैसा विश्वास नहीं होता है, जैसा विश्वास उन्हें स्वाभाविक मित्रमें होता है। यदि मनुष्य किसीके साथ शाश्वत प्रेम करना चाहता है तो उसे उसके साथ द्यूत, अर्थ - व्यवहार (धनका लेन-देन) एवं परोक्षरूपमें उसकी स्त्रीका दर्शन - इन तीन दोषोंका परित्याग कर देना चाहिये माता, भगिनी अथवा पुत्रीके साथ एकान्तमें एक साथ नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि इन्द्रियोंका समूह बलवान् होता है, वह विद्वान्को भी [दुराचरणकी ओर] खींच लेता है -
मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो वसेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥
हे शौनक! उपयुक्त अवसर न होनेसे, एकान्त स्थान न होनेसे तथा प्रार्थचिता व्यक्तिके सुलभ न होनेसे ही स्त्रियोंमें सतीत्व पाया जाता है।
जो मधुर पदार्थोसे बालकको, विनम्रभावसे सज्जन पुरुषको, धनसे स्त्रीको, तपस्यासे देवताको और सद्व्यवहारसे समस्त लोककों अपने वशमें कर लेता है, वही पण्डित है। जो लोग कपटसे मित्र बनाना चाहते हैं, पापसे धर्म कमाना चाहते हैं, दूसरेको संतप्त करके धन-संग्रह करना चाहते हैं, बिना परिश्रमके ही सुखपूर्वक विद्या - अर्जन करना चाहते हैं और कठोर व्यवहारके द्वारा स्त्रियोंको वशमें रखनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे पण्डित (कुशल) नहीं हैं।
फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य यदि फल - समन्वित वृक्षका ही मूलोच्छेद कर डालता है तो वह दुर्बुद्धि है। उसे फल कभी नहीं प्राप्त हो सकता। अविश्वसनीय व्यक्तिका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। मित्रका भी [अधिक] विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि कदाचित् क्रुद्ध होनेपर मित्र भी समस्त गोपनीयताको प्रकट कर सकता है -
न विश्वसेदविश्वस्ते मित्रस्यापि न विश्वसेत्।
कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यां प्रकाशयेत्॥
सभी प्राणियोंमें विश्वास करना, सभी प्राणियोंके प्रति सात्त्तिक भाव रखना एवं अपने सत् - स्वभावकी रक्षा करना - ये सज्जन पुरुषके लक्षण हैं।
दरिद्रके लिये गोष्ठी(मित्रोंको आमन्त्रित कर उनके साथ भोजन - जलपानादिकी व्यवस्था वहन कर मनोरंजन करना आदि ।)विषके समान है और वृद्ध व्यक्तिके लिये युवती विषके समान है। भलीभाँति आत्मसात् न की गयी विद्या विष है तथा अजीर्ण - दशामें किया गया भोजन विषके समान (अनिष्टकारी) है। अकुण्ठित व्यक्तिको गायन, नीच व्यक्तिको उच्च आसनकी प्राप्ति, दरिद्रको दान तथा युवकको तरुणी प्रिय होती है।
अधिक मात्रामें जलका पीना, गरिष्ठ भोजन, धातुकी क्षीणता, मल - मूत्रका वेग रोकना, दिनमें सोना एवं रात्रिमें जागरण करना - इन छ: कारणोंसे मनुष्योंके शरीरमें रोग निवास करने लगते हैं -
अत्यम्बुपानं कठिनाशनं च धातुक्षयो वेगविधारणं च।
दिवाशयो जागरणं च रात्रौ षड्भिर्नराणां निवसन्ति रोगा:॥
प्रातःकालीन धूप, अतिशय मैथुन, श्मशान - धूमका सेवन, अग्निमें हाथ सेंकना और रजस्वला स्त्रीका मुख - दर्शन - ये दीर्घ आयुका विनाश करनेवाले हैं। शुष्क मांस, वृद्धा स्त्री, बालसूर्य, रात्रिमें दहीका प्रयोग, प्रभातकालमें मैथुन एवं [प्रभातकालीन] निद्रा - ये छः सद्य: प्राणविनाशक होते हैं।
तत्काल पकाया गया घृत (ताजा घी), द्राक्षाफल, बाला स्त्री, दुग्ध - सेवन, गरम जल तथा वृक्षोंकी छाया - ये शीघ्र ही प्राण (शक्ति) प्रदान करनेवाले हैं। कुएँका जल और वयवृक्षकी छाया शीतकालमें गरम तथा गर्मीमें शीतल होते हैं। तैलमर्दन और सुन्दर भोजनकी प्राप्ति - ये सद्य: शरीरमें शक्तिका संचार करते हैं, किंतु मार्ग - गमन और मैथुन तथा ज्वर - ये सद्य: पुरुषका बल हर लेते हैं।
जो मलिन वस्त्र धारण करता है, दाँतोंको स्वच्छ नहीं रखता, अधिक भोजन करनेवाला है, कठोर वचन बोलता है, सूर्योदय तथा सूर्यास्तके समय भी सोता है; वह यदि साक्षात् चक्रपाणि विष्णु हो तो उसे भी लक्ष्मी छोड़ देती हैं।
(कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं बह्वाशिनं निष्ठुरवाक्यभाषिणम्।
सूर्योदये ह्मस्तमयेऽपि शायिनं विमुञ्चति श्रीरपि चक्रपाणिम् ॥)
जो मनुष्य नखसे तृणका छेदन करता है, पृथिवीपर लिखता है, चरणोंका प्रक्षालन नहीं करता, दाँत स्वच्छ नहीं रखता, मलिन वस्त्र धारण करता है, केश संस्कारविहीन रखता है, प्रात: एवं सायंकालकी संध्याओंमें सोता है, नग्न शयन करता है, भोजन और परिहास अधिक करता है, अपने अङ्ग और आसनपर बाजा बजाता है तो भगवान् विष्णुके समान होनेपर भी उसे लक्ष्मी त्याग देती हैं। जो पुरुष अपने सिरको जलसे धोकर स्वच्छ रखता है, चरणोंको प्रक्षालित करके मलरहित करता है, वेश्यागमनसे दूर रहता है, अल्पभोजन करता है, नग्न शयन नहीं करता तथा पर्वरहित दिवसोंमें स्त्री - सहवास करता है तो उसके ये षट्कर्म चिरकालसे विनष्ट हुई उसकी लक्ष्मीको पुनः उसके सांनिध्यमें ले आते हैं।
बालसूर्यके तेज, जलती हुई चिताक़ा धुआँ, वृद्ध स्त्री, बासी दही और झाड़की धूलिका सेवन दीर्घ आयुकी कामना करनेवाले पुरुषको नहीं करना चाहिये। हाथी, अश्व, रथ, धान्य तथा गौकी धूलि शुभ होती है। किंतु गधा, ऊँट, बकरी एवं भेड़की धूलिको अशुभ मानना चाहिये। गौकी धूलि, धान्यकी धूलि और पुत्रके अङ्गमें लगी हुई जो धूलि है, वह महान् कल्याणकारी एवं महापातकोंका विनाशक है।
(गवां रजो धान्यरज: पुत्रस्याङ्गभवं रज:।
एतद्रजो महाशस्तं महापातकनाशनम्॥)
सूप फटकनेसे निकली हुई वायु, नखाग्र (नाखून) - का जल, स्नान किये हुए वस्त्रसे निचोड़ा हुआ जल, केशसे गिरता हुआ जल तथा झाड़ूकी धूलि मनुष्यके पूर्वजन्मके अर्जित पुण्यको भी नष्ट कर देती है। ब्राह्मण तथा अग्निके बीचसे, दो ब्राह्मणके बीचसे, पति - पत्नीके बीचसे, स्वामि - स्वामिनीके बीचसे तथा घोड़ा और साँड़के बीचसे नहीं जाना चाहिये।
स्त्री, राजा, अग्नि, सर्प, स्वाध्याय, शत्रुकी सेवा, भोग और आस्वादमें कौन ऐसा बुद्धिमान् होगा जो विश्वास करेगा?
(स्त्रीषु राजाग्निसर्पेषु स्वाध्याये शत्रुसेवने।
भोगास्वादेषु विश्वासं क: प्राज्ञ: कर्तुमर्हति॥)
अविश्वसनीयपर विश्वास तथा विश्वस्त प्राणीपर अधिक विश्वास नहीं करना चाहिये, क्योंकि विश्वास करनेसे जो भय उत्पन्न होता है, वह मनुष्यको समूल नष्ट कर देता है। जो मनुष्य शत्रुके साथ संधि करके आश्वस्त रहता है, वह निश्चित ही वृक्षकी शाखाके अग्रभागपर सोये हुए मनुष्यके समान गिरनेके पश्चात् ही जागता है।
(न विश्वसेदविश्वस्तं विश्वस्तं नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद्धयमुत्पन्नं मूलादपि निकृन्तति॥
वैरिणा सह संधाय विश्वस्तो यदि तिष्ठति।
स वृक्षाग्रे प्रसुप्तो हि पतित: प्रतिबुध्यते॥)
प्राणीको अत्यन्त सरल अथवा अत्यन्त कठोर नहीं होना चाहिये, क्योंकि सरल स्वभावसे सरल और कठोर स्वभावसे कठोर शत्रुको नष्ट किया जा सकता है। अत्यन्त सरल तथा अत्यन्त कोमल नहीं होना चाहिये। सरल अर्थात् सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं, टेढ़े तो यथास्थितिमें खड़े रहते हैं। फलसे परिपूर्ण वृक्ष एवं गुणवान् व्यक्ति विनम्र हो जाते हैं, किंतु सूखे हुए वृक्ष और मूर्ख मनुष्य टूट सकते हैं पर झुक नहीं सकते; अर्थात् वे विनयावनत नहीं हो सकते।
(नात्यन्तं मृदुना भाव्यं नात्यन्तं क्रूरकर्मणा।
मृदुनैव मूदुं हन्ति दारुणेनैव दारुणम्॥
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं नात्यन्तं मृदुना तथा।
सरलास्तत्र छिद्चन्ते कुब्जास्तिष्टन्ति पादपा:॥
नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जना:।
शुष्कवृक्षाश्र मूर्खाश्च भिद्यन्ते न नमन्ति च॥)
जिस प्रकार बिना याचना किये ही दुःख जीवनमें आते हैं और स्वत: चले भी जाते हैं [उसी प्रकार सुखकी भी यही स्थिति है],
कामना करनेवाला मनुष्य तो मार्जार (बिल्ली)- की तरह दुःखोंको ही प्राप्त करता है। सज्जन पुरुषके आगे - पीछे सम्पदाएँ सर्वदा घूमती रहती हैं, दुर्जनके लिये इससे विपरीत स्थिति होती है। अत: जैसा अच्छा लगे वैसा करें। सज्जनता और दुर्जनताका आचरण करना मनुष्यपर निर्भर है।
छ: कानोंतक पहुँची हुई गुप्त मन्त्रणा नष्ट हो जाती है। अतः मन्त्रणाको चार कानोंतक ही सीमित रखना चाहिये दो कानोंतक स्थित मन्त्रणाको तो ब्रह्मा भी जाननेमें समर्थ नहीं हैं।
(षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रश्चतुःकर्णश्च धार्यते।
द्विकर्णस्य तु मन्त्रस्य ब्रह्माप्यन्तं न बुध्यते॥)
उस गायसे क्या लाभ है, जो न दूध देनेवाली है और न गर्भिणी है? उस पुत्रके उत्पन्न होनेसे भी क्या लाभ है, जो न तो विद्वान् है और न धार्मिक? विद्यासम्पन्न एवं बुद्धिमान् तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ एकमात्र सुपुत्रसे भी मनुष्यका कुल वैसे ही सुशोभित हो जाता है, जैसे एक ही चन्द्रमासे आकाश - मण्डल चमकने लगता है। जिस प्रकार एक ही सुपुष्पित और सुगन्धित वृक्षसे सम्पूर्ण वन सुवासित हो जाता है, उसी प्रकार एक ही सुपुत्रसे सम्पूर्ण कुल पवित्र हो जाता है। मनुष्यके लिये गुणवान् एक ही पुत्र अच्छा है, गुणहीन सौ पुत्रोंसे क्या लाभ? चन्द्रमा अकेले ही अन्धकारको नष्ट कर देता है, किंतु हजारों ज्योतिष्पुञ्ज उस अन्धकारको दूर करनेमें असफल रहते हैं।
(एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन धीमता।
कुलं पुरुषसिंहेन चन्द्रेण गगनं यथा॥
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वनं सुवासितं सर्वं सुपुत्रेण कुल यथा॥
एको हि गुणवान् पुत्रो निर्गुणेन शतेन किम्।
चन्द्रो हन्ति तमांस्येको न च ज्योति: सहस्रकम्॥)
मनुष्यको पाँच वर्षतक पुत्रका प्यारसे पालन करना चाहिये, दस वर्षतक उसे अनुशासित रखना चाहिये तथा सोलह वर्षकी अवस्था प्राप्त होनेपर उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करना चाहिये।
(लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाण ताडयेत्।
प्राप्त तु षोडशे वर्षे पुत्र मित्रवदाचरेत्॥)
कुछ व्याघ्र हरिणके समान मुखवाले होते हैं, कुछ हरिण व्याघ्रमुखवाले होते हैं। उनके वास्तविक स्वरूपके परिज्ञानमें पद - पदपर अविश्वास बना ही रहता है। इसलिये बाह्य आकृतिसे प्राणीकी अन्तःप्रवृत्तिको नहीं जानना चाहिये।
(केचिन्मृगमुखा व्याघ्राः केचिद्व्याघ्रमुखा मृगा:।
तत्स्वरूपपरिज्ञाने ह्विश्वास: पदे पदे॥)
क्षमाशील व्यक्तियोंमें एक ही दोष है, दूसरा दोष नहीं है। दोष यह है कि जो क्षमाशील होते हैं, मनुष्य उनको अशक्त (असमर्थ) मानता है-
एक: क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते।
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः॥
प्राणीको यह शास्त्रमत स्वीकार कर लेना चाहिये कि संसारके समस्त भोग क्षणभंगुर ही हैं, इसीलिये अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले स्निग्ध - सुन्दर सुखोपभोगोंके प्रति विद्वान् पुरुषके विचार स्थिर एवं तटस्थ रहते हैं। उनके मनमें उन विषय - वासनाओंके लिये आकर्षण नहीं होता।
हे शौनक! बड़ा भाई पिताके समान है। पिताकी मृत्युके पश्चात् वह सभी छोटे भाइयोंका पिता ही है; क्योंकि वह सभीका पालन - पोषण करता है। वह समस्त छोटोंके प्रति एक - समान भाव रखता है। वह समान उपभोग करनेवाले परिजनोंके विषयमें वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा अपने पुत्रोंके प्रति उसका व्यवहार होता है। अतः छोटे भाइयोंको बड़े भाईके प्रति पिताके समान आदर-भाव रखना चाहिये।
(ज्येष्ट: पितृसमो भ्राता मृते पितरि शौनक।
सर्वेषां स पिता हि स्यात् सर्वेषामनुपालक:॥
कनिष्ठेषु च सर्वेषु समत्वेनानुवर्तते।
समोपभोगजीवेषु यथैवं तनयेषु च॥)
कम शक्तिशाली वस्तुओंका समुदाय (संगठन) भी अत्यधिक शक्तिसम्पन्न हो जाता है, जैसे तृणको बटकर बनायी गयी रस्सीसे हाथी भी बाँध लिया जाता है।
जो दूसरेका धन चुराकर दान देता है, वह नरकमें जाता है। जिसका धन है उसीको उस दानका फल प्राप्त होता है। देव - द्रव्य (देवताओंके पूजन आदिमें समर्पित किये जाने योग्य द्रव्यों) - के विनाश करनेसे, ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे एवं ब्राह्मणका तिरस्कार करनेसे मनुष्योंके वंश नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्महन्ता, मद्यपी, चोर तथा व्रतभंग करनेवाले पापियोंके पापका शमन(इन पापोंके शमनके लिये शास्त्रोंमें प्रायश्चित्तका विधान है, परंतु कृतघ्नके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है।) हो सकता है, किंतु सज्जनोंके द्वारा किये गये उपकारके प्रति कृतघ्नता करनेवाले कृतघ्न व्यक्तिका निस्तार सम्भव नहीं है।
मनुष्यको भूलकर भी दुष्ट एवं छोटे शत्रुकी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि भली प्रकारसे न बुझायी गयी अग्नि भी संसारको भस्म कर सकती है।
जो नयी अवस्थामें अर्थात् युवावस्थामें शान्त रहता है, वही शान्त - स्वभाव है, ऐसा मेरा विचार है; क्योंकि धातुक्षय आदि सब प्रकारकी शक्तियोंके समाप्त हो जानेपर किसमें शान्ति नहीं आ जाती? अर्थात् उस अवस्थामें तो सभी शान्त हो जाते हैं -
नवे वयसि य: शान्तः स शान्त इति मे मति:।
धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते॥
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ। सार्वजनिक मार्गके समान सभी सम्पदाएँ सर्वमान्य हैं। अतएव 'यह सम्पदा मेरी है', ऐसा मानकर मनुष्यको प्रसन्न नहीं होना चाहिये।