गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
18 - मृत्युन्जय - मन्त्र - जपकी महिमा
सूतजीने कहा - अब मैं मृत्युन्जय पूजाका वर्णन करूँगा, जिसको गरुडने कश्यप ऋषिसे कहा था। वह साधकका उद्धार करनेवाली, पुण्यप्रदायिनी एवं सर्वदेवमय पूजा है, ऐसा सभीका अभिमत है।
सूतजीने कहा - मृत्युन्जय - मन्त्र 'ॐ जुं सः' तीन अक्षरोंवाला है। पहले ॐकारका उच्चारण करके जुं(हुं) - का उच्चारण करे। तदनन्तर विसर्गके साथ 'स'(सः) - का उच्चारण करना चाहिये। यह मन्त्र मृत्यु और दरिद्रताका मर्दन करनेवाला है तथा शिव, विष्णु, सूर्य, आदि सभी देवोंका कारणभूत है। 'ॐ जुं सः' यह महामन्त्र अमृतेशके नामसे कहा जाता है। इस मन्त्रका जप करनेसे प्राणी सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है और मृत्युरहित हो जाता है अर्थात् मृत्युके समान होनेवाले उसके कष्ट दूर हो जाते हैं।
इस मन्त्रका सौ बार जप करनेसे वेदाध्ययनजनित पुण्यफल तथा यज्ञकृत फल एवं तीर्थ - स्नान - दान- पुण्यादिका फल प्राप्त होता है। तीनों संध्याओंमें एक सौ आठ बार इस मन्त्रका जप करनेसे मनुष्य मृत्युको जीत लेता है। कठिन - से - कठिन विघ्न - बाधाओंको पार कर जाता है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है।
भगवान् मृत्युन्जय श्वेत कमलके ऊपर बैठे हुए वरद - हस्त तथा अभय - मुद्रा धारण किये रहते हैं। तात्पर्य यह कि उनके एक हाथमें अभय - मुद्रा है और एक हाथमें वरद - मुद्रा। दो हाथोंमें अमृत - कलश है। इस रूपमें अमृतेश्वरका ध्यान करनेके साथ ही अमृतेश्वर भगवान्के वामाङ्गमें रहनेवाली अमृत भाषिणी अमृता देवीका भी ध्यान करना चाहिये। देवीके दायें हाथमें कलश और बायें हाथमें कमल सुशोभित रहता है।
है शिव! यदि एक मासतक अमृता देवीके साथ अमृतेश्वर भगवान्का ध्यान करते हुए मानव 'ॐ जुं सः' इस मन्त्रका तीनों सन्ध्याओंमें आठ हजार जप करे तो वह जरा, मृत्यु तथा महा व्याधियोंसे मुक्त हो जाता है और शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेता है। यह मन्त्र महान् शान्ति प्रदान करनेवाला है।
अमृतेश्वर भगवान्की पूजामें आवाहन, स्थापन, रोधन (प्रतिष्ठा), संनिधान, निवेशन करनेके बाद पाद्य, आचमन, स्त्रान, अर्घ्य, माला, अनुलेपन, दीप, वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य, पान, आचमन, वीजन (पंखेसे हवन करना), मुद्रा - प्रदर्शन, मन्त्र - जप, ध्यान, दक्षिणा, आहुति, स्तुति, वाद्य और गीत तथा नृत्य, न्यासयोग और प्रदक्षिणा, साष्टाङ्ग प्रणति, मन्त्रशय्या, वन्दन आदि उपचारोंको निवेदित करके उनका विसर्जन करना चाहिये।
षडङ्ग प्रकारका पूजन जिसे परमेश परमात्माने अपने मुखसे स्वयं कहा है, वह क्रमसे बतलाया गया है, उसे जो जानता है वही पूजक है। षडङ्ग - पूजा इस प्रकार है -
साधकको प्रारम्भमें अर्घ्य प्रदान करनेके लिये प्रयुक्त पात्रकी पूजा करके अस्त्र अर्थात् फट् मन्त्रसे हस्तताडन (दाहिने हाथके द्वारा बायें हाथपर ध्वनि) करना चाहिये। उसके बाद कवच (हुं) मन्त्रसे शोधनकर अमृतकरणकी क्रियाको पूर्ण करे। तत्पश्चात् आधारशक्ति आदिकी पूजा, प्राणायाम, आसनोपवेशन तथा देहशुद्धि करके भगवान् अमृतेशका ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर अपनी आत्माको देवस्वरूपमें स्वीकारकर अङ्गन्यास, करन्यास करके साधक हृदय कमलमें स्थित ज्योतिर्मय आत्मदेवका पूजन करे।
उसके बाद मूर्तिपर अथवा यज्ञके लिये बनी हुई वेदीपर चित्रित देवके ऊपर सुन्दर पुष्प अर्पित करे। द्वारपर अवस्थित रहनेवाले देवों का आवाहन और पूजन करनेके लिये पहले आधार शक्तिकी पूजा करे। तदनन्तर देवताकी प्रतिष्ठा करके उनके(देव) परिवारका पूजन करना चाहिये; क्योंकि विद्वानोंने बतलाया है कि मुख्य देवके पूजाके साथ उसके अङ्ग - परिवार आदिकी भी पूजा करनेका विधान है। आयुधों एवं परिवारोंके साथ धर्म आदिकी तथा इन्द्र आदिकी, युगों, वेदों और मुहूर्तोंकी भी मुख्य देवके रूपमें पूजा करनी चाहिये। यह पूजा भुक्ति और मुक्ति प्रदान करनेवाली है। अत: साधक विद्वानोंको उनकी षडङ्ग - पूजा करनी चाहिये।
देव मण्डलकी पूजा करनेके पूर्व मातृका, गण देवता, नन्दी और गङ्गाकी पूजा करके देवस्थानके देहली - भागपर महाकाल तथा यमुनाकी पूजा करनी चाहिये। इस पूजामें 'ॐ अमृतेश्वर भैरवाय नम:।' तथा 'ॐ जुं हं सः सूर्याय नमः' कहना चाहिये। इसी प्रकार प्रारम्भमें प्रणव मन्त्र ॐकारको जोड़कर नामोच्चार करते हुए अन्तमें 'नमः' शब्दका प्रयोग करके शिव, कृष्ण, ब्रह्मा, गण, चण्डिका, सरस्वती और महालक्ष्मी आदिकी पूजा करनी चाहिये।