177 - नेत्र, नाक, मुख, गला, अनिद्रा तथा पादरोग और शस्त्राघातादिजनित रोगोंकी चिकित्सा

श्रीहरिने कहा - हे शंकर! मधुके सहित शोभनक वृक्षकी पत्तियोंका रस आँखोंमें डालनेसे निश्चित ही नेत्रका रोग नष्ट हो जाता है। तिल और चमेलीके अस्सी - अस्सी फूल, नीम, आँवला, सोंठ, पीपल तथा चौलाईके शाकको चावलके जलमें पीसकर उनकी वटी बनानी चाहिये।

तदनन्तर छायामें सुखाकर मधुके साथ उसका नेत्रोंमें अंजन करना लाभकारी है। ऐसा करनेसे तिमिरादिक रोग नष्ट हो जाते हैं।

बहेड़ेके गुठलीकी गूदी, शंखनाभि, मैनसिल, नीमकी पत्ती एवं काली मिर्चको बकरीके मूत्रमें घिसकर अंजन बनाना चाहिये। इस प्रकारका सिद्ध अंजन नेत्रोंमें होनेवाले पुष्प-दोष अर्थात्‌ फुल्ला, रतौंधी, तिमिर - विकार तथा पटलरोगको नष्ट कर देता है। शंखभस्म चार भाग, मैनसिल दो भाग एवं सेंधा नमक एक भाग जलमें पीसकर बनायी और छायामें सुखायी गयी वटीका नेत्रोंमें अंजन करनेसे तिमिर, पटल तथा सूजन नष्ट हो जाता है। यह नेत्ररोगोंकी महौषधि है। त्रिकटु, त्रिफला, कंजाके फल, सेंधा नमक और दोनों रजनी, हल्दी, दारुहल्दीको भृंगराजके रसमें पीसकर उसका नेत्रोंमें अंजन देनेसे तिमिरादिक सभी रोग दूर हो जाते हैं। जंगली अड़ूसाकी जड़को कांजीमें पीसकर नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रशूल नष्ट होता है। तक्र अर्थात्‌ मट्ठेके साथ बेरकी जड़को पीसकर पीनेसे भी नेत्रोंकी पीड़ा दूर होती है। सेंधा नमक, कड़ूआ तेल, अपामार्गकी जड़, दूध और कांजीको ताम्रपात्रमें घिसकर उसका नेत्रोंमें अंजन करनेसे पिंजट अर्थात्‌ कीचड़ निकलना बंद हो जाता है।

बिल्व और नील - वृक्षकी जड़ पीसकर बनाये गये अंजनको नेत्रोंमें लगाने मात्रसे तिमिरादिक रोग निश्चित ही नष्ट हो जाते हैं। पिप्पली, तगर, हल्दी, आँवला, वच और खदिर्वारा बनायी गयी बत्तीका अंजन लगानेसे नेत्ररोग नष्ट होता है। जो मनुष्य नित्य प्रात: मुँहमें जल भरकर जलका ही छींटा देकर नेत्रोंको धोता है, वह नेत्रोंके सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है।

श्वेत एरण्डकी जड़ एवं पत्तियोंके रससे सिद्ध बकरीके दूधके उष्णपाकके सेंकसे आँखोंका वात - विकार दूर हो जाता है। चन्दन, सेंधा नमक, पुराने पलाशका पत्र और हरीतकी पटल, कुसुम, नीलीका अंजन चक्रिका (चकाचौंधी) नामक नेत्ररोगोंका विनाशक है।

बकरीके मूत्रमें घिसी गयी गुंजाकी जड़का अंजन तिमिररोगको दूर करता है। हे रुद्र! चाँदी, ताँबे तथा सोनेकी शलाकाको हाथपर घिसकर नेत्रोंमें उसका लगाया गया उबटन कामला नामक रोगका निवारक है। घोषाफल अर्थात्‌ सौंफको सूँघने और सेवन करनेसे पीलिया नामक रोगका विनाश होता है।

दूर्वा, अनारपुष्प, लोध्र और हरीतकीका रस नासार्श तथा वातरक्तके दोषको दूर करता है। हे वृषध्वज! हे नीललोहित! जाङ्गलिकमूल अर्थात्‌ केवाँचकी जड़को भली प्रकारसे पीसकर उसका नस्य लेनेसे नासार्श - रोग नष्ट हो जाता है। हे रुद्र! गोघृत, सर्जरस (राल), धनिया, सेंधा नमक, धतूर तथा गैरिकसे सिद्ध सिक्‍थ अर्थात्‌ मोम तेलमें मिलाकर ओठोंपर लगानेसे ओठोंके घाव तथा ओठ फटनेका रोग दूर हो जाता है। चबाकर सेवन की जानेवाली चमेलीकी पत्तियोंका रस भी मुखरोग - विनाशक है।

केसरके बीजोंको खानेसे हिलनेवाले दाँत दृढ़ हो जाते हैं। मुष्टक (मोथा), कुष्ठ, इलायची, मुलेठी, वालक और धनियाको चबानेसे मुखकी दुर्गन्ध दूर हो जाती है। कषाय द्रव्य या त्रिकटु अथवा तेलयुक्त तिक्त शाकके नित्य भक्षणसे भी मुखकी दुर्गन्ध दूर हो जाती है। इससे सभी प्रकारके दाँतोंसे सम्बन्धित घाव भी नष्ट हो जाते हैं। हे शिव! तेलमें सिद्ध कांजीका कुल्ला करनेसे अथवा उसको मुखमें रखनेसे ताम्बूलके साथ खाये गये चूनेके प्रभावसे हुए घाव या अन्य व्याधियोंका विनाश हो जाता है।

सोंठको चबानेसे जिस प्रकार प्राणी कफके रोगसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार बिजौरा नीबूके बीज, इलायची, मुलेठी, पिप्पली और चमेलीकी पत्तियोंका चूर्ण (शहदमें) चाटनेसे भी कफ - विकारसे मुक्ति मिल जाती है। शेफालिका (सिन्धुवार) तथा जटामांसीका चूर्ण चबानेसे गलशुण्डि अर्थात्‌ तालुभागकी शोथका विनाश होता है।

गुंजा अर्थात्‌ घुँघचीकी जड़को चबानेसे दाँतमें लगे हुए कीड़ोंका विनाश होता है। हे शिव! मधुसहित काकजंघा (घुँघची), स्नुही (सेंहुड़) और नीलका क्वाथ, दन्ताक्रान्त (दन्ताघात) तथा दाँतके कीट-रोगोंका विनाशक है।

कर्कटपाद (कमलकी जड़) - से सिद्ध घृतपाकका मंजन करनेसे दाँतोंकी कटकटाहट दूर हो जाती है। हे शिव! कर्कटपादका दूधके साथ लेप करनेसे भी इस रोगका विनाश हो जाता है। ज्योतिष्मती (मालकँगनी ) - के फलोंको जलमें पीसकर उसके द्वारा तीन सप्ताहतक कुल्ला करनेसे भी इस रोगमें लाभ होता है। विदारीकन्द और हरीतकीके चूर्णका मंजन करनेसे दाँतोंका कालापन विनष्ट होता है।

लोध्र, कुंकुम, मजीठ, अगर, लालचन्दन, यव, चावल तथा मुलेठीको जलमें पीसकर तैयार किया गया मुखलेप स्त्रियोंक मुखको शोभा - सम्पन्न बनाता है। दो प्रस्थ बकरीका दूध, एक प्रस्थ तिलका तेल, एक-एक कर्ष रक्तचन्दन, मंजिष्ठ, लाक्षा-रस, मधुयष्टी और कुंकुमसे सिद्ध लेपपाक एक सप्ताहके अन्तर्गत ही मुखकी शोभाको बढ़ा देता है।

सोंठ, पिप्पली - चूर्ण, गुडूची और कण्टकारीके क्वाथका पान करनेसे जठराग्नि तीव्र हो जाती है। हे महादेव! कंजा, पित्तपापड़ा, बृहती ( भटकटैया), अदरक, हरीतकी तथा गोखरूके द्वारा सिद्ध क्वाथ पीनेसे थकान दूर हो जाती है एवं दाह, पित्त - ज्वर, शारीरिक शुष्कता और मूर्च्छा - दोष भी विनष्ट हो जाते हैं।

मधु, घृत, पिप्पली - चूर्ण एवं दूधसे युक्त क्वाथका पान हृदयरोग, खाँसी तथा विषमज्वरका विनाशक होता है।

हे वृषध्वज! सामान्यत: क्वाथ तथा औषधियोंकी अनुपान - मात्रा आधा कर्ष अर्थात्‌ एक तोला है। विशेष रूपसे रोगीकी आयुके अनुसार उसके परिमाणपर विचार करना चाहिये।

गौके गोबरसे रस निकालकर दूधके साथ पान करनेसे विषमज्वर दूर हो जाता है। काकजंघा (घुँघची) - का रस भी इस ज्वरका नाशक है। सोंठके चूर्णसे युक्त बकरीके दूधका क्वाथ विषम ज्वरको दूर कर देता है।

मुलेठी, खस, सेंधा नमक तथा भटकटैयाका फल पीसकर उसका नस्य देनेसे पुरुषको नींद आने लगती है। हे शिव! काली मिर्चका चूर्ण मिलाकर मधुका नस्य लेनेसे भी प्राणीको नींद आ जाती है। काकजंघा (कालाहिस्रा) - की जड़ मस्तकपर लेप करके भी निद्राको लाया जा सकता है। कांजी तथा धूना नामक वृक्षके गोंदसे सिद्ध तैलपाकको शीतल जलमें मिलाकर सिरपर लेप करनेसे सिर - संताप दूर हो जाता है। यह रक्तदोषज ज्वर और दाहसे उत्पन्न होनेवाले संतापको भी दूर करता है।

शिलाजीत, शैवाल, मन्था (मेथी), सोंठ, पाषाणभेदी (पथरचट्टा), सहिजन, गोखरू, वरुण और सौभञ्जनकी जड़ - इन सबको एकत्र करके बनाया गया जल या क्वाथ हींग तथा यवक्षारके सहित पान करनेसे वातरोगका विनाश होता है।

है शिव! पिप्पली, पिप्पलीमूल तथा भिलावेका जल या क्वाथ भली प्रकारसे शूलरोगको दूर करनेका श्रेष्ठतम योग है।

अश्वगन्धा तथा मूलीके रससे शोधित वामीकी जो मिट्टी होती है, उसको रगड़नेसे दाद और ऊरुस्तम्भ नामक रोग शान्त हो जाते हैं।

बृहतीमूल अर्थात्‌ भटकटैयाकी जड़को पानीमें पीसकर पीनेसे संघातवात नष्ट होता है। अदरक और तगरकी जड़को पीसकर मट्ठेके साथ पीनेसे झिंझिनी अर्थात्‌ झुंझबाईका रोग वैसे ही नष्ट होता है, जैसे वज्रके प्रभावसे वृक्ष धराशायी हो जाता है।

अस्थिसंहारक हरजोड़ अर्थात्‌ ग्रन्थिमान्‌ नामक लताकी जड़को भातके साथ खानेसे अथवा जटामांसीके रसके साथ पान करनेसे वातरोग तथा अस्थिभंगके दोष विनष्ट हो जाते हैं। बकरीके दूध और घृत - मिश्रित सत्तूका लेप दोनों पैरके तलुओंमें करनेसे जलन समाप्त हो जाती है। मधु, घृत, मोम, गुड़, गैरिक, गुग्गुल और रालका रस पैरोंमें लेप करनेसे उनका फटना तथा जलना बंद हो जाता है।

हे वृषध्वज! सरसोंके तेलको पैरोंमें लेपकर निर्धूम अग्निमें जो मनुष्य सेंकता है, उसका पंकिल - मिट्टी खाया हुआ अर्थात्‌ कीचड़में अधिक देरतक रहनेसे दूषित हुआ या उसके समान अन्य किसी कारणसे विकृत हुआ पैर खुजलाहट आदि विकारोंसे रहित हो जाता है।

सर्जरस, मोम, जीरा और हरीतकीसे शोधित घृतपाकका अभ्यङ्ग करनेसे अग्निमें जलनेसे उत्पन्न हुई पीड़ा शान्त हो जाती है। तिलका तेल अग्निमें जलाकर भस्म किये गये यवको प्रचुर मात्रामें बार - बार मिलाकर लेप करनेसे अग्निमें जलनेके कारण उत्पन्न हुए घाव ठीक हो जाते हैं। भैंसके दूधका मक्खन, अग्निमें भूने गये तिलका चूर्ण और भिलावाका रस मिलाकर तैयार किया गया लेप घावको ठीक करता है। इसका नस्य एवं लेप करनेसे हृदय - शूल भी शान्त हो जाता है।

हे हर! दण्ड - प्रहार आदिके कारण शरीरमें उत्पन्न घाव कर्पूर और गोघृत परस्पर मिलाकर भरनेसे ठीक हो जाता है। हे शिव! शस्त्रोंके प्रहारसे होनेवाले घावपर इस औषधिका प्रयोग करके उसे स्वच्छ सफेद कपड़ेसे बाँध देना चाहिये। हे वृषध्वज! इस प्रकारके घाव जब पक रहे हों या उनमें पीड़ा होती हो तो उन्हें हाथका स्पर्श देना (सहलाना) चाहिये। आम्रकी जड़का रस और घृत भरनेसे भी शस्त्राघातका घाव भर जाता है। शरपुंखा (शरफोंका), लज्जालुका (लाजवन्ती) और पाठा (पाढ़ा) नामक औषधियोंकी जड़को जलमें पीसकर उसका लेप लगानेसे भी शस्त्राघातजनित व्रण ठीक हो जाता है। काकजंघाकी जड़को पीसकर शस्त्राघातके घावमें भरनेसे वह घाव तीन रात्रियोंके बीतते ही सूख जाता है। रोहितक नामक या रोहड़ाकी जड़का लेप भी व्रणको नष्ट कर देता है।

लाठी आदिके प्रहारसे उत्पन्न होनेवाली पीड़ा जल एवं तिलके तेलमें सिद्ध अपामार्गकी जड़का लेप लगानेसे तथा आगपर सेंकनेसे शान्त हो जाती है।

है शंकर! हरीतकी, सोंठ और सेंधा नमक पीसकर जलके साथ खानेसे अजीर्ण रोगका विनाश होता है।

निम्बमूल अर्थात्‌ नीमकी जड़को कमरमें बाँधनेपर नेत्रोंकी पीड़ा दूर हो जाती है। शण (पटसन) - की जड़ और पानका भस्म इन्द्रियजन्य विकारका विनाशक है। यवादिक अन्न, हल्दी, सफेद सरसोंकी जड़ और बिजौरा नीबूके बीज समान भागमें

पीसकर इनका उबटन बनाना चाहिये। सात दिनोंतक शरीरमें इसका प्रयोग करनेसे रंग गोरा हो जाता है।

श्वेत अपराजिताकी पत्ती तथा नीमकी पत्तीका रस निकालकर उसका नस्य देनेसे डाकिनी आदि माताओं और ब्रह्मराक्षस्रोंकी छायासे मुक्ति हो जाती है। हे वृषध्वज! मधुसार अर्थात्‌ मुलेठीकी जड़का नस्य देनेसे भी उनकी छाया दूर हो जाती है।

हे रुद्र! पिप्पली, लौहचूर्ण, सोंठ, आँवला, सेंधा नमक, मधु तथा शर्कराका समान योग गूलरके फलके बराबरकी मात्रामें एक सप्ताहपर्यन्त सेवन करनेसे पुरुष बलवान्‌ हो जाता है। यदि वह सदैव इसका सेवन करे तो दो सौ वर्षतक जीवित रहता है।

भल्लूकीके दूधसे भावित रोहित मछलीके मांसद्वारा सिद्ध तैलपाकका अभ्यङ्ग करनेसे शरीरमें स्थित समस्त रोग दूर हो जाते हैं।

चन्दनके जलका नस्य लेनेसे शरीरके गिरे हुए रोम पुनः निकल आते हैं।

हस्त नक्षत्रमें लाङ्गलिकाकन्द अर्थात्‌ कलियारी या जलपिप्पलीकी जड़को लेकर जो व्यक्ति उसका लेप शरीरमें लगाता है, वह बुढ़ौतीके दर्पको नष्ट कर देता है अर्थात्‌ शरीरमें वृद्धावस्थाका प्रभाव नहीं पड़ता।

पुष्य नक्षत्रमें सुदर्शना (चक्रांगी या वृषकर्णी ) नामक लताकी जड़को लाकर घरके मध्य डाल देनेसे सर्प घरसे भाग जाते हैं। हे शिव! रविवारको लायी गयी मन्दारवृक्ष तथा अग्निज्वलिता (जलपिप्पली) - की जड़को पीसकर बनायी गयी बत्ती, सरसोंके तेलसे जलानेपर मार्गमें दंश - प्रहार करनेवाले सर्पका विनाश करती है।

विफला (केतकी) और अर्जुनके पुष्प, भिलावा, शिरीष, लाक्षारस, राल, विड और गुग्गुल - इन सभीके द्वारा बना धूप मक्खियों तथा मच्छरोंका नाश करता है।