50 - संध्योपासन, तर्पण, देवाराधन आदि नित्य कर्मों तथा आशौचका निरूपण

ब्रह्मजीनी कहा - जो मनुष्य प्रतिदिन शास्त्रविहित क्रियाओंको करता है, उसको दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति होती है। अतः ब्राह्म - मुहूर्त्तमें उठकर मनुष्यको धर्म और अर्थका चिन्तन करना चाहिये।

उष:काल होनेपर विद्वान्‌ व्यक्ति सर्वप्रथम अपने हृदयकमलमें विराजमान आनन्दघन, अजर, अमर, सनातन पुरुष भगवान्‌ हरिका ध्यान करे। तदनन्तर यथाविधि शौचादि आवश्यक क्रियाओंसे निवृत्त होकर पवित्र नदियोंमें स्नान करे। प्रात:काल  स्नान करनेसे पापकर्म करनेवाले मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिये यन्त्रपूर्वक प्रातःकाल स्नान करना चाहिये। प्रातःकालके स्नानकी लोगोंने प्रशंसा की है, क्योंकि यह स्नान लौकिक और पारलौकिक फलोंको प्रदान करनेमें समर्थ होता है।

रात्रिमें सुखपूर्वक सोये हुए व्यक्तिके मुखसे निरन्तर लार आदि अपवित्र मल गिरते रहते हैं। (अत: सम्पूर्ण शरीर अपवित्र हो जाता है।) इसलिये प्रथमत: स्नान करके ही संध्या - वन्दनादिके धार्मिक कृत्य करने चाहिये (बिना प्रातःकाल स्नान -  कृत्य किये संध्या - वन्दनादि करना उचित नहीं है)।

प्रात:स्नान करनेसे अलक्ष्मी, कालकर्णी अर्थात्‌ विघ्न डालनेवाली अनिष्टकारी शक्तियाँ, दुःस्वप्न एवं दुर्विचारसे होनेवाले चिन्तनके पाप धुल जाते हैं, इसमें संशय नहीं। यह स्मरणीय है कि बिना स्नानके किये गये कार्य प्रशस्त नहीं होते। अतएव होम और जपादिके कार्योंमें विशेषरूपसे सबसे पहले विधिवत्‌ स्नान करना चाहिये।

अशक्त होनेपर बिना सिरपर जल डाले ही स्नान करनेका विधान है। आर्द्र वस्त्रसे भी शरीरको पोंछा जा सकता है। इसको कायिक स्नान कहते हैं।

ब्राह्य, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और यौगिक - ये छ: प्रकारके स्नान हैं, यथाधिकार मनुष्यको स्नान करना चाहिये। मन्त्रोंसहित कुशके द्वारा जल - विन्दुओंसे मार्जन करना ब्राह्म - स्नान है। सिरसे लेकर पैरतक यथाविधान भस्मके द्वारा अङ्गोंका लेपन आग्नेय - स्नान है। गोधूलिसे शरीरको पवित्र करना वायव्य-स्नान कहा गया है। यह उत्तम स्नान माना जाता है। धूपके साथ होनेवाली वृष्टमिं किये गये स्नानको दिव्य-स्नान कहते हैं। जलमें अवगाहन करना वारुण - स्नान है। योगद्वारा हरिका चिन्तन यौगिक स्नान है। इसीको मानस - आत्मवेदन (ब्रह्माकार अखण्ड चित्तवृत्ति) कहते हैं। यह यौगिक स्नान ब्रह्मवादियोंके द्वारा सेवित है, इसे ही आत्मतीर्थ भी कहते हैं।

(स्नानके पूर्व) दुग्धधारी वृक्षोंसे उत्पन्न काष्ठ, मालती, अपामार्ग, बिल्व अथवा करवीर अर्थात्‌ कनेरकी दातौन लेकर उत्तर या पूर्व दिशाकी ओर पवित्र स्थानमें बैठकर दाँतोंको स्वच्छ करना चाहिये और उसे धोकर उसका पवित्र स्थानमें त्याग करना चाहिये।

तदनन्तर स्नान करके देवताओं, ऋषियों और पितृगणोंका विधिवत्‌ तर्पण करना चाहिये। यहाँ यथाशास्त्र स्नानका अङ्गभूत आचमन एवं संध्योपासनके अङ्गभूत आचमनका विधान है। संध्योपासनके अङ्गरूपमें ही कुशोदक विन्दुओंसे 'आपो हि ष्ठा०' आदि वारुणमन्त्र एवं यथाविधान सावित्रीमन्त्रके द्वारा मार्जन करना विहित है। इसी क्रममें ॐ कार और 'भू: भुवः स्व:' इन व्याहतियोंसे युक्त वेदमाता गायत्रीका जप करके अनन्यभावसे भगवान्‌ सूर्यके प्रति जलाज्ञलि समर्पित करे (सूर्यार्घ्य प्रदान करे)।

इसी क्रममें पूर्वकी ओर अग्रभागवाले कुशोंके आसनपर समाहितचित्तसे बैठकर प्राणायाम करके संध्या-ध्यान करनेका श्रुतिमें विधान है। यह जो संध्या है, वही जगत्‌की सृष्टि करनेवाली है, मायासे परे है, निष्कला, ऐश्वरी, केवला शक्ति तथा तीन तत्त्वोंसे समुद्धत है। अत: अधिकारी व्यत्त (प्रातः:काल) रक्तवर्ण, (मध्याह्नकाल) शुक्लवर्ण एवं (सायंकाल) कृष्णवर्ण गायत्रीका ध्यान करके गायत्रीमन्त्रका जप करे।

द्विजको सदैव पूर्वाभिमुख होकर संध्योपासन करना चाहिये। संध्या-कृत्यसे रहित ब्राह्मण सदा अपवित्र रहता है, वह सभी कार्योके लिये अयोग्य होता है। वह जो भी अन्य कोई कार्य करता है, उसका कुछ भी फल उसे प्राप्त नहीं होता। अनन्यचित्त होकर वेदपारङ्गत ब्राह्मणोंने विधिवत्‌ संध्योपासन करके अपने पूर्वजोंके द्वारा प्राप्त उत्तम गतिको प्राप्त किया है।

संध्योपासनका त्यागकर जो द्विजोत्तम अन्य किसी धर्म-कार्यक लिये प्रयत्न करता है, उसे दस हजार वर्षोंतक नस्क भोग करना पड़ता है। अत: सभी प्रकारका प्रयत्न करके संध्योपासन अवश्य करना चाहिये।

(प्राड्मुख: सततं विप्र: संध्योपासनमाचरेत्‌।

संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्ह: सर्बकर्मसु॥

यदन्यत्कुरुते किञ्चिन्न तस्य फलभाग्भवेत्‌।

अनन्यचेतस: संतो ब्राह्मणा वेदपारगा:॥

उपास्य विधिवत्संध्यां प्राप्ताः पूर्वपरां गतिम्‌।

योऽन्यत्र कुरुते यत्नं धर्मकार्ये द्विजोत्तम:॥

विहाय संध्याप्रणतिं स याति नरकायुतम्‌।

तस्मात्‌ सर्वप्रयत्रेन संध्योपासनमाचरेत्‌॥

उपासितो भवेत्तेन देवों योगतनु: पर:।)

उस संध्योपासन कर्मसे योगमूर्ति परमात्मा भगवान्‌ नारायण पूजित हो जाते हैं। अत: अधिकारीको चाहिये कि वह पवित्र होकर पूर्वाभिमुख बैठ करके नित्य संयत - भावसे एक सहस्र या एक सौ अथवा दस बार गायत्रीका जप (अवश्य) करे।

गायत्रीका एक सहसर्त्र जप उत्तम, एक सौ जप मध्यम तथा दस बार किया गया जप कनिष्ठ जप कहलाता है।

एकाग्रचित्त होकर उदय होते हुए भगवान्‌ भास्करका उपस्थान करे। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें आये हुए विविध सौर मन्त्रोंसे देवाधिदेव महायोगेश्वर भगवान्‌ दिवाकरका उपस्थान करके पृथिवीपर मस्तक टेककर इस मन्त्रसे प्रणाम करे -

ॐ खखोल्काय शान्ताय कारणत्रयहेतवे॥

निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे।

त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोऽमृतम्‌॥

भूर्भुव: स्वस्त्वमोङ्कार: सर्वो रुद्र: सनातन:।

शान्तस्वरूप भगवान्‌ भास्कर आप सृष्टि, स्थिति और संहार - इन तीनों कारणोंके कारण हैं, आप ज्ञानस्वरूप हैं। मैं आपको आत्मनिवेदन करता हूँ, आप ही परब्रह्म हैं, आप ही ज्योति:स्वरूप, अपू - स्वरूप, स्सरूप तथा अमृत स्वरूप हैं। भू:, भुव:, स्व: - ये तीनों आप ही हैं और आप ही ॐ काररूप, सर्व स्वरूप रुद्र तथा अविनाशी हैं, आपको नमस्कार है।

इस उत्तम आदित्य हृदय - स्तोत्रका जप करके भगवान्‌ दिवाकरको प्रात: और मध्याह्न (तथा सायंकाल) - में नमस्कार करना चाहिये।

इसके पश्चात्‌ घर आ करके ब्राह्मण पुनः विधिवत्‌ आचमन करे।

तदनन्तर उसे अग्निको प्रज्वलित करके विधिवत्‌ भगवान्‌ अग्निदेवको आहुति प्रदान करनी चाहिये। मुख्य अधिकारीकी अशक्तावस्थामें उसकी आज्ञा प्राप्त करके ऋत्विक्‌ पुत्र अथवा पत्नी, शिष्य या सहोदर भ्राता भी हवन करे। मन्त्रविहीन एवं विधिकी उपेक्षा करके किया गया कोई भी कर्म इस लोक या परलोकमें फल देनेवाला नहीं होता।

तदनन्तर देवताओंको नमस्कार करके (अर्घ्य, पाद्य, चन्दन, सुगन्धित पदार्थका अनुलेपन, वस्त्र तथा नैवेद्यादि) पूजाके उपचारोंको निवेदनकर गुरुका पूजन करे और उनके हित - साधनमें लग जाय। तत्पश्चात्‌ प्रयत्नपूर्वक यथाशक्ति द्विजको वेदाभ्यास करना चाहिये और उसके बाद इष्ट मन्त्रोंका जप (वेदपारायण) करके शिष्योंके अध्यापन - कार्यमें प्रवृत्त होना चाहिये। वह शिष्योंको वेदार्थ धारण कराये और दत्तचित्त होकर वेदार्थका विचार करे। द्विजोत्तम धर्मशास्त्र आदि विविध शास्त्रोंका अवलोकन करे और वेदादि निगमशास्त्रों (उपनिषदों) तथा व्याकरणादि वेदाङ्गोंका अच्छी प्रकार अवलोकन करे। इसके बाद वह पुन: योग - क्षेमके लिये राजा या श्रीमानके पास जाय और अपने परिवारके लिये विविध प्रकारके अर्थोंका उपार्जन करे।

इसके पश्चात्‌ मध्याह्न कालके आनेपर स्नान करनेके लिये शुद्ध मिट्टी, पुष्प, अक्षत, तिल, कुश और गोमय (गायके गोबर) आदि पदार्थोंको एकत्र करना चाहिये। उसके बाद नदी, देव, पोखर, तडाग या सरोवरमें जाकर स्नान करे। प्रत्येक दिन तडाग, सरोवर या नदी आदिसे पाँच मृत्तिकापिण्ड बिना निकाले स्नान करना दोषयुक्त होता है। (अत: पाँच पिण्ड मिट्टी निकाल करके ही स्नान करना चाहिये।) स्नानके समय (स्नानके लिये लायी गयी) मिट्टीके एक भागसे सिर धोना चाहिये, दूसरे भागसे नाभिके ऊपरी भागको और तीसरे भागसे नाभिसे नीचेके भागका तथा मृत्तिकाके छठे भागसे पैरोंका प्रक्षालन करना चाहिये। इन मृत्तिकापिण्डोंको परिमाणमें पके हुए आँवलेके फलके समान होना चाहिये। मृत्तिकाके समान ही गोमय - स्नान भी होना चाहिये। तदनन्तर शरीरके अङ्गोंको विधिवत्‌ धोकर आचमन करके स्नान करना चाहिये।

जलाशयके तीरपर स्थित होकर ही मृत्तिका, गोमय आदिका अपने अङ्गोंमें लेपन करना चाहिये और इस लेपनके अङ्गभूत स्नानके अनन्तर पुनः वारुण (वरुणदेवताके) - मन्त्रोंस जलाशयके जलका अभिमन्त्रण करके पुन: जल - स्नान करना चाहिये; क्योंकि जल भगवान्‌ विष्णुका ही रूप है। यह स्नानकी प्रक्रिया प्रणवस्वरूप भगवान्‌ सूर्यका दर्शनकर जलाशयमें तीन बार निमज्जन (डुबकी लगाने) - से पूरी होती है। तदनन्तर स्नानाङ्ग आचमन करके नीचे लिखे मन्त्रसे आचमन करे -

अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुख:॥

त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्‌।

हे जलदेव! आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरण रूपी गुहामें विचरण करते हैं। आप सर्वत्र मुखवाले हैं। आप ही यज्ञ हैं। आप ही वषट्कार हैं। आप ही ज्योति: स्वरूप तेज और आप ही अमृतमय रसस्वरूप हैं।

'द्रुपदादिव०' इस मन्त्रका तीन बार उच्चारण अथवा प्रणव एवं व्याहृतियोंसहित सावित्री - मन्त्रका जप करना चाहिये। विद्वान्‌ अघमर्षण - मन्त्रका जप करे। तदनन्तर 'ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुव:', 'इदमापः प्रवहत' तथा व्याहृतियोंसे मार्जन करना चाहिये। अनन्तर 'आपो हि ष्ठा०' इत्यादि मन्त्रोंके द्वारा अभिमन्त्रित जलसे अघमर्षण - मन्त्रका तीन बार जप करते हुए अघमर्षण सम्पन्न करना चाहिये। अघमर्षणके अनन्तर 'द्रुपदादिव०' आदि मन्त्र अथवा गायत्री - मन्त्र या 'तदिूष्णो: परमं पदम्‌' आदि मन्त्र अथवा प्रणवकी आवृत्ति करनी चाहिये और देवाधिदेव श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये।

जिस जलको हाथमें लेकर अघमर्षण - क्रिया एवं मार्जन - क्रिया सम्पन्न की जाती है, उस जलको अपने सिरपर धारण करनेसे सभी प्रकारके पातकोंसे मुक्ति मिलती है। संध्योपासनके अनन्तर आचमन करके सदा परमेश्वरका स्मरण करना चाहिये। पुष्पसे युक्त अञ्जलिको शिरोभागसे लगाकर सूर्यका उपस्थान करना चाहिये और उपस्थानके बाद अपनी अञ्जलिके पुष्पोंको भगवान्‌ सूर्यके चरणोंमें अर्पित करना चाहिये। उदित होते हुए सूर्यको नहीं देखना चाहिये, अतः विशेष मुद्राद्वारा ही उनका दर्शन करना चाहिये। 'ॐ उतुत्यं०', 'चित्रं०', 'तच्चक्षु0 '-इन मन्त्रोंसे तथा 'ॐ ह ँ्सः शुचिषद्‌०' इस मन्त्रसे और सावित्रीके विशेष मन्त्रसे एवं अन्य सूर्यसे सम्बन्धित वैदिक मन्त्रोंसे सूर्यका उपस्थान करना चाहिये। तदनन्तर पूर्वाग्र कुशाओंके आसनपर बैठकर सूर्यका दर्शन करते हुए समाहितचित्तसे गायत्री - मन्त्र एवं अन्य विहित मन्त्रोंका जप करना चाहिये। मन्त्र - जपके लिये स्फटिक, रुद्राक्ष अथवा पुत्रजीव (जीवन्तिका) या अब्जाक्षसे निर्मित मालाका प्रयोग करना चाहिये।

यदि आर्द्र वस्त्रोंवाला हो तो जलके मध्य खड़े होकर जप करना चाहिये। अन्यथा (सूखे वस्त्रोंकी स्थितिमें) पवित्र भूमिमें कुशासनपर बैठकर एकाग्रचित्त होकर जप करना चाहिये। जपके पश्चात्‌ प्रदक्षिणाकर भूमिपर दण्डवत्‌ नमस्कार करना चाहिये। तदनन्तर आचमन करके यथाशक्ति अपनी शाखाके अनुसार स्वाध्याय करे। उसके बाद देवों, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। मन्त्रोंके प्रारम्भमें ॐ कारका और अन्‍तमें 'नमः' का प्रयोगकर प्रत्येक देव, ऋषि और पितृका तर्पण कर रहा हूँ - ऐसा कहकर तर्पण करे। देवताओं और मरीच्यादि ब्रह्मर्षियोंका तर्पण अक्षत और जलके साथ करना चाहिये। पितृगणों, देवों और मुनियोंके लिये अपने शाखासूत्रके विधानसे भक्तिपूर्वक तर्पण करे। तर्पण जलाञ्चलियोंके द्वारा करे। देवताओंका तर्पण यज्ञोपवीती अर्थात्‌ सव्य होकर देवतीर्थसे करे और निवीती होकर (कण्ठमें यज्ञोपवीत कर) ऋषियोंका ऋषितीर्थसे तथा प्राचीनावीती अर्थात्‌ अपसव्य होकर पितृतीर्थसे पितरोंका तर्पण करे।

तदनन्तर हे हर! स्नानमें प्रयुक्त वस्त्रको निचोड़कर मौन होकर आचमन करके मन्त्रोंसे पुष्प, पत्र तथा जलसे ब्रह्मा, शिव, सूर्य एवं मधुसूदन विष्णुदेवका पूजन करे। क्रोधरहित होकर भक्तिपूर्वक अन्य अभीष्ट देवोंकी भी पूजा करनी चाहिये। 'पुरुषसूक्त' के द्वारा पुष्पादि समर्पित करे। जल सर्वमय देव है अर्थात्‌ समस्त देवता जलमें व्याप्त रहते हैं। अत: उस जलमात्रसे भी वे सभी देवता पूजित होते हैं। इस पूजामें पूजकको समाहितचित्त होना चाहिये तथा प्रणवके साथ देवताका ध्यान करना चाहिये। उसके बाद प्रणाम करते हुए समस्त देवोंको पृथक्‌ - पृथक्‌ पुष्पाञ्जलि समर्पित करे।

देवताओंकी आराधनाके बिना कोई भी वैदिक कर्म पुण्यप्रद नहीं होता है। अतएव समस्त कार्योंके आदि, मध्य और अन्तमें हृदयसे भगवान्‌ हरिका ध्यान करना चाहिये। 'ॐ तद्विष्णोरिति०' मन्त्र तथा पुरुषसूक्तके मन्त्रोंका जप करते हुए उस निर्मल विष्णुके परमतेजके सामने आत्मनिवेदन करे अर्थात्‌ शरणागत हो जाय।

उसके बाद विष्णुमें अनुरक्तचित्त, शान्तस्वभाव वह भक्त 'तद्विष्णोः०' इस मन्त्रसे और 'अप्रेतेसशिरा:०' इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित पुष्पासनपर विराजमान हरिकी पुनः पूजा करके देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मानुषयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ नामक पञ्चयज्ञोंको करे। तर्पणसे पूर्व ब्रह्मयज्ञ कैसे हो सकता है? अतः मानुषयज्ञ करके स्वाध्याय (ब्रह्मयज्ञ) करना चाहिये।

वैश्वदेव ही देवयज्ञ है। काक आदि प्राणियोंके लिये जो बलि प्रदान की जाती है, वह भूतयज्ञ है। हे द्विजोत्तम! चाण्डाल एवं पतित आदिको घरके बाहर अन्न देना चाहिये और कुत्ता आदि पशुओं तथा पक्षियोंकों घरके बाहर भूमिपर अन्न देना चाहिये। पितरोंके उद्देश्यसे प्रतिदिन एक ब्राह्मणफो भोजन कराये। पितरोंके निमित्त जो नित्य श्राद्ध किया जाता है, उसीको पितृयज्ञ कहते हैं। यह उत्तम गति प्रदान करनेवाला है।

अथवा समाहितचित्त होकर यथाशक्ति कुछ कच्चा अन्न निकालकर वैदिक तत्त्ववेत्ता विद्वान्‌ ब्राह्मणको प्रदान करे। प्रतिदिन अतिथि - सत्कार करना चाहिये। घरपर आये हुए शान्तस्वभाव द्विज (ब्राह्मण) - को मन और वचनसे स्वागतपूर्वक नमस्कार करे तथा उनका अर्चन करे।

एक ग्रास परिमाणमात्र अन्नको 'भिक्षा' कहा गया है। उसका जो चार गुना अन्न है उसको 'पुष्कल' तथा उस पुष्कलके चार गुना अन्नको 'हन्तकार भिक्षा' कहते हैं।

गोदोहनमात्र कालतक अतिथिके आगमनकी प्रतीक्षा स्वयं करनी चाहिये। आये हुए अभ्यागत (अतिथि) - का सत्कार यथाशक्ति करना चाहिये।

ब्रह्मचारी भिक्षुकको विधिवत्‌ भिक्षा देनी चाहिये। लोभसे रहित होकर याचकोंको अन्न प्रदान करे। तत्पश्चात्‌ अपने बन्धुजनोंके साथ मौन होकर अन्नकी निन्‍दा न करते हुए भोजन करे।

हे द्विजश्रेष्ठ। जो देवयज्ञादि पञ्चयज्ञोंको बिना किये भोजन करते हैं, वे मूढात्मा तिर्यक्‌ - योनि (पक्षियोंकी योनि) - में जाते हैं। यथाशक्ति प्रतिदिन किये जानेवाले वेदाभ्यासके साथ पञ्चमहायज्ञ एवं देवतार्चन शीघ्र ही सभी पापोंको नष्ट कर देते हैं। जो मोहवश अथवा आलस्यके कारण बिना देवार्चन किये ही भोजन करता है, उसे नाना प्रकारके कष्टदायक नरकोंमें जाकर सूकरकी योनिमें जन्म ग्रहण करना पड़ता है।

अब मैं अशौचका सम्यक्‌ प्रकारसे वर्णन करता हूँ। जो अपवित्र है, वह सदा पातकी है। अपवित्र व्यक्तियोंके संसर्गसे अशौच होता है और उनके संसर्गका परित्याग कर देनेसे शरीर पवित्र हो जाता है। हे द्विजोत्तम! सभी विद्वान ब्राह्मण दस दिनोंका अशौच मानते हैं। यह अशौच मृत्यु अथवा जन्म दोनोंमें होता है। दाँत निकलनेके पूर्वतक बालककी मृत्यु होनेपर सद्य: स्नान करनेसे अशौचकी निवृत्ति हो जाती है। उसके बाद चूडा (मुण्डन) - संस्कारपर्यन्त बालककी मृत्यु होनेपर एक रात्रिका अशौच होता है।

उपनयन - संस्कारके पूर्वतक बालककी मृत्यु होनेपर तीन रात्रियोंका अशौच होता है। उपनयन - संस्कारके बाद किसीका मरण होनेपर यथाविधान दस रात्रिका अशौच ब्राह्मणोंको होता है।

क्षत्रिय बारह दिनोंमें, वैश्य पंद्रह दिनोंमें तथा शूद्र एक मासमें शुद्ध होता है। क्योंकि इनको यथाक्रम बारह दिनका, पंद्रह दिनका एवं एक मासका अशौच होता है। संन्यासियोंको अशौच नहीं लगता है। गर्भस्राव होनेपर गर्भमासके अनुसार जितने मासका गर्भ हो, उतनी रात्रिका अशौच होता है। (अर्थात्‌ एक मासका गर्भस्राव होनेपर एक रात्रि, दो मासका गर्भश्राव होनेपर दो रात्रिका अशौच होता है। इसी क्रममें अन्य मासोंकी गणना करके अशौचकी रात्रियोंका निश्चय करना चाहिये।)