गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
139 -140 - चन्द्रवंशवर्णन
श्रीहरिने कहा - हे रुद्र! सूर्यके वंशका वर्णन तो मैंने कर दिया। अब मुझसे चन्द्रशका वर्णन आप सुनें।
नारायण (विष्णु) - से ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। ब्रह्मासे अत्रिकी उत्पत्ति हुई। अत्रिसे सोम हुए। उनकी पत्नी तारा थी, जो पहले बृहस्पतिकी भी प्रियतमा थी। ताराने चन्द्र (सोम) - से बुधको उत्पन्न किया। उसी बुधका पुत्र पुरूरवा हुआ। बुधपुत्र पुरूरवासे उर्वशीके छ: पुत्र हुए, जिनके नाम श्रुतात्मक, विश्वावसु, शतायु, आयु, धीमान् और अमावसु थे।
अमावसुके भीम, भीमके काञ्चन, काञ्चनसे सुहोत्र और सुहोत्रके जह् हुए। जहुसे सुमन्तु, सुमन्तुसे उपजापक हुआ। उसका पुत्र बलाकाश्व था। बलाकाश्वसे कुश, कुशसे कुशाश्व, कुशनाभ, अमुर्त्तरय और वसु नामक चार पुत्र हुए। कुशाश्वसे गाधिका जन्म हुआ। विश्वामित्र उसीके पुत्र थे। गाधिकी सत्यवती नामकी एक कन्या थी। उसको उन्होंने ब्राह्मण ऋचीकको सौंप दिया। ऋचीकके जमदग्नि नामक पुत्र हुआ। जमदग्निके परशुराम हुए। विश्वामित्रसे देवरात तथा मधुच्छन्दा आदि अनेक पुत्रोंका जन्म हुआ।
बुधके पुत्र आयुसे नहुषकी उत्पत्ति हुई। नहुषके अनेना, राजि, रम्भक तथा क्षत्रवृद्ध नामक चार पुत्र हुए क्षत्रवृद्धका सुहोत्र नामक पुत्र राजा हुआ। सुहोत्रके काश्य, काश और गृत्समद नामक तीन पुत्र हुए। गृत्समदसे शौनक तथा काश्यसे दीर्घतमा हुआ। दीर्घतमासे वैद्य धन्वन्तरिका जन्म हुआ। केतुमान् उन्हींका पुत्र था। केतुमान् से भीमरथ,भीमरथसे दिवोदास, दिवोदाससे प्रतर्दन हुआ, जो शत्रुजित् नामसे विख्यात हुआ।
ऋतध्वज उसी शत्रुजित् का पुत्र था। ऋतध्वजसे अलर्क, अलर्कसे सन्नति, सन्नतिसे सुनीत, सुनीतसे सत्यकेतु, सत्यकेतुसे विभु नामक पुत्र हुआ। विभुसे सुविभु, सुविभुसे सुकुमार, सुकुमारसे धृष्टकेतुकी उत्पत्ति हुई। उस धृष्टकेतुका पुत्र वीतिहोत्र था। वीतिहोत्रके भर्ग और भर्गके भूमिक नामका पुत्र हुआ। ये सभी विष्णुधर्म परायण राजा थे।
नहुषपुत्र राजि या रजिके पाँच सौ पुत्र थे, जिनका संहार इन्द्रने किया था। नहुषके पुत्र क्षत्रवृद्धसे प्रतिक्षत्त्र हुए। उसका पुत्र संजय था। संजयके भी विजय हुआ। विजयका पुत्र कृत था। कृतके वृषधन, वृषधनसे सहदेव, सहदेवसे अदीन और अदीनके जयत्सेन हुआ। जयत्सेनसे संकृति और संकृतिसे क्षत्त्रधर्माकी उत्पत्ति हुई।
नहुषके क्रमश: यति, ययाति, संयाति, अयाति तथा विकृति नामक अन्य पाँच पुत्र थे। ययातिसे देवयानीने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया। राजा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने ययातिसे द्रुह्यू,अनु और पूरु नामक तीन पुत्रोंको उत्पन्न किया।
यदुके सहस्रजित्, क्रोष्टुमना और रघु नामक तीन पुत्र थे। सहस्रजित् से शतजित्, शतजित् से हय तथा हैहय नामक दो पुत्र हुए। हयसे अनरण्य तथा हैहयसे धर्म हुआ। धर्मका पुत्र धर्मनेत्र हुआ। उस धर्मनेत्रका पुत्र कुन्ति था। कुन्तिसे साहंजि हुआ। साहंजिसे महिष्मान्, महिष्मान् से भद्रश्रेण्य, भद्रश्रेण्यसे दुर्दमकी उत्पत्ति हुई। दुर्दमसे धनक, कृतवीर्य, जानकि, कृताग्नि, कृतवर्मा और कृतौजा नामक छ: बलवान् पुत्र हुए। कृतवीर्यसे अर्जुन तथा अर्जुनसे शूरसेन नामक पुत्र हुआ। उस पुत्रके अतिरिक्त कृतवीर्यके जयध्वज, मधु, शूर और वृषण नामक चार पुत्र हुए। शूरसेन सहित ये पाँचों पुत्र बड़े ही सुव्रती थे। जयध्वजसे तालजंघ, तालजंघसे भरत हुआ। कृतवीर्य वृषणका पुत्र मधु था। मधुसे वृष्णि हुआ, जिससे वृष्णिवंशियोंकी उत्पत्ति हुई।
क्रोष्टुके विजज्ञिवान् हुआ। उस विजज्ञिवान्का पुत्र आहि था। आहिसे उशंकु हुआ। उसका पुत्र चित्ररथ था। चित्ररथसे शशबिन्दु हुआ, जिसके एक लाख पत्नियाँ तथा पृथुकीर्ति, पृथुजय, पृथुदान, पृथुश्रवा आदि श्रेष्ठ दस लाख पुत्र थे। पृथुश्रवासे तम, तमसे उशना हुआ। उसका पुत्र शितगु था। तत्पश्चात् उसके श्रीरुक्मकवच हुआ। श्रीरुक्मकवचसे रुक्म, पृथुरुक्म, ज्यामघ, पालित और हरि - ये चार पुत्र हुए। ज्यामघसे विदर्भका जन्म हुआ।
विदर्भकी शैब्या नामकी एक पत्नी थी, उससे विदर्भने क्रथ, कौशिक तथा रोमपाद नामक तीन पुत्रोंको जन्म दिया। रोमपादसे बभ्रु और बभ्रुसे धृति हुआ।
कौशिकके ऋचि नामक पुत्र था। उसीसे चेदि नामका राजा हुआ। इसका पुत्र कुन्ति था। कुन्तिसे वृष्णि नामक पुत्र हुआ। वृष्णिसे निवृत्ति, निवृत्तिसे दशार्ह, दशार्हसे व्योम और व्योमसे जीमूत नामका पुत्र हुआ। जीमूतसे विकृतिका जन्म हुआ। उस विकृतिका पुत्र भीमरथ था। भीमरथसे मधुरथ और मधुरथसे शकुनि उत्पन्न हुआ। शकुनिका पुत्र करम्भि था। उस करम्भिका पुत्र देवमान् माना जाता है। देवमान् या देवनतसे देवक्षत्र तथा देवक्षत्रसे मधु नामक पुत्र हुआ। मधुसे कुरुवंश, कुरुवंशसे अनु, अनुसे पुरुहोत्र, पुरुहोत्रसे अंशु, अंशुसे सत्त्वश्रुत और उससे सात्त्वत नामका राजा हुआ।
सात्त्वतके भजिन, भजमान्, अन्धक, महाभोज, वृष्णि, दिव्यावन्य तथा देवावृध नामक सात पुत्र हुए। भजमान् से निमि, वृष्णि, अयुताजित्, शतजित्, सहस्राजित् , बभ्रु , देव और बृहस्पति नामके पुत्र हुए।
महाभोजसे भोज और उस वृष्णिसे सुमित्र नामक पुत्र हुआ। सुमित्रसे स्वधाजित्, अनमित्र तथा अशिनि हुए। अनमित्रका पुत्र निघ्न और निघ्नका पुत्र सत्राजित् हुआ। अनमित्रसे प्रसेन तथा शिबि नामक दो अन्य पुत्र भी हुए थे। शिबिसे सत्यक, सत्यकसे सात्यकि हुआ। सात्यकिके संजय और उस संजयके कुलि हुए। उस कुलिका पुत्र युगन्धर था। इन सभीको शिबिवंशी शैबेय कहा गया है।
अनमित्रके ही वंशमें वृष्णि, श्वफल्क तथा चित्रक नामक अन्य तीन पुत्र हुए थे। श्रवफल्कने गान्दिनीके गर्भसे अक्रूरको जन्म दिया, जो परम वैष्णव थे। अक्रूरसे उपमद्गु हुआ, जिसका पुत्र देवद्योत था। उपमद्गुके अतिरिक्त अक्रूरके देववान् और उपदेव नामक दो पुत्र माने गये हैं।
अनमित्र - पुत्र चित्रकके पृथु तथा विपृथु नामक दो पुत्र थे। सात्त्वतनन्दन अन्धकका पुत्र शुचि माना जाता है। भजमानके कुकुर और कम्बलबर्हिष दो पुत्र हुए। कुकुरसे धृष्टका जन्म हुआ। उसका पुत्र कापोतरोमक था। उस कापोतरोमकका विलोमा और विलोमासे तुम्बुरुका जन्म हुआ। तुम्बुरुसे दुन्दुभि तथा दुन्दुभिका पुनर्वसु माना जाता है। उस पुनर्वसुका पुत्र आहुक था। आहुकके एक पुत्री हुई, जिसका नाम आहुकी था। आहुकके दो पुत्र हुए जिनका नाम देवक और उग्रसेन था। देवकसे देवकीका जन्म हुआ। इसके अतिरिक्त देवकके वृकदेवा, उपदेवा, सहदेवा, सुरक्षिता, श्रीदेवी और शान्तिदेवी नामकी छ: कन्याएँ और भी थीं। इन सातों कन्याओंका विवाह वसुदेवके साथ हुआ था। सहदेवाके देववान् और उपदेव नामक दो पुत्र थे।
आहुकपुत्र उग्रसेनके कंस, सुनामा तथा वट आदि नामके अनेक पुत्र हुए। अन्धकपुत्र भजमान् से विदूरथ नामका पुत्र हुआ था। विदूरथसे शूर और शूरके शमी नामकाः पुत्र हुआ। शमीसे प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्रसे स्वयंभोज, स्वयंभोजसे हृदिक तथा हृदिकसे कृतवर्मा हुए। शूरसे ही देव, शतधनु और देवामीढुषका भी जन्म हुआ था। मारिषाके गर्भसे शूरके वसुदेव आदि अन्य दस पुत्र थे। शूरसे पृथा, श्रुतदेवी, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेव (राजाधिदेवी ) नामवाली पाँच पुत्रियाँ भी थीं। शूरने पुत्री पृथाको कुन्तिराजको दे दिया था। कुन्तिराजने शूरसे प्राप्त उस कन्याका विवाह पाण्डुसे कर दिया। पाण्डुकी उस पृथा नामकी पत्नीसे धर्म, वायु और इन्द्रादि देवोंके अंशसे युधिष्टिर, भीम, अर्जुन तथा पाण्डुकी पत्नी माद्रीमें अश्विनी कुमारके अंशसे नकुल तथा सहदेव नामक पुत्र हुए। विवाहके पूर्व ही पृथासे कर्णका जन्म हुआ था।
शूरकी पुत्री श्रुतदेवीके गर्भसे दन्तवक्त्र हुआ, जो अत्यन्त वीर योद्धा था। श्रुतकीर्ति कैकयराजको ब्याही गयी थी। कैकय राजसे उसके सन्तर्दन आदि पाँच पुत्र हुए। राजाधि देवीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिनका नाम विन्दु और अनुविन्दुथा। चेदिराज दमघोषको श्रुतश्रवा ब्याही थी। उससे शिशुपालका जन्म हुआ।
वसुदेवके पौरव, रोहिणी, मदिरा, देवकी, भद्रा आदि जो अन्य स्त्रियाँ हैं, उनमें रोहिणीके गर्भसे बलभद्र हुए। बलभद्रकी पत्नी रेवतीके गर्भसे सारण और शठ आदिका जन्म हुआ। देवकीके गर्भसे पहले छ: पुत्र उत्पन्न हुए। जिनके नाम कीर्तिमान, सुषेण, उदार्य, भद्रसेन, ऋजुदास और भद्रदेव हैं। कंसने इन सभी पुत्रोंको मार डाला था। देवकीके सातवें पुत्रके रूपमें बलराम और आठवें कृष्ण थे। कृष्णकी सोलह हजार रानियाँ थीं। रुक्मिणी, सत्यभामा, लक्ष्मणा, चारुहासिनी तथा जाम्बवती आदि आठ प्रधान पत्नियाँ थीं। इनसे उनके बहुत - से पुत्र हुए।
प्रद्युम्न, चारुदेष्ण तथा साम्ब कृष्णके प्रधान पुत्र हैं। प्रधयुम्नकी पत्नी ककुद्मिनीके गर्भसे महापराक्रमशाली अनिरुद्धका जन्म हुआ। अनिरुद्धके सुभद्रा नामक पत्नीके गर्भसे वज्र नामके राजा हुए। उनका पुत्र प्रतिबाहु था। प्रतिबाहुका पुत्र चारु हुआ।
ययाति - पुत्र तुर्वसुके वंशमें वह्नि नामक पुत्रका जन्म हुआ। वह्निसे भर्ग हुआ। भर्गसे भानु, भानुसे करन्धम तथा करन्धमसे मरुत् की उत्पत्ति हुई।
हे रुद्र! अब मुझसे द्रुह्युवंशका वर्णन सुनें - ययातिपुत्र द्रुह्युका पुत्र सेतु, सेतुका पुत्र आरद्ध था। आरद्धके गान्धार, गान्धारके धर्म, धर्मके घृत, घृतके दुर्गम, दुर्गमके प्रचेता हुए।
अब आप अनुवंशको सुनें - अनुका पुत्र सभानर हुआ। सभानरका कालञ्जय, कालञ्जयका सृञ्जय, सृञ्जयका पुरञ्जय, पुरञ्जयका जनमेजय, जनमेजयका पुत्र महाशाल था। इसी महात्मा महाशालका पुत्र उशीनर माना गया है। उशीनरसे राजा शिवि उत्पन्न हुए। शिविके पुत्र वृषदर्भ हुए। वृषदर्भसे महामनोज और महामनोजसे तितिक्षु और तितिक्षुसे रुषद्रथका जन्म हुआ। रुषद्रथसे हेम तथा हेमसे सुतप हुए। सुतपसे बलि और बलिसे अंग, बंग, कलिंग, आन्ध्र तथा पौण्ड्र नामके पुत्र हुए। अंगसे अनपान, अनपानसे दिविरथ, दिविरथसे धर्मरथ हुआ। धर्मरथसे रोमपाद तथा रोमपादसे चतुरंग, चतुरंगसे पृथुलाक्ष, पृथुलाक्षसे चम्प, चम्पसे हर्यङ्ग, हर्यङ्गसे भद्ररथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।
भद्ररथका पुत्र बृहत्कर्मा था। उसके बृहद्भानु नामक पुत्र हुआ। बृहद्भानुका पुत्र बृह्यगा और बृहद्मनाका पुत्र जयद्रथ था। जयद्रथसे विजय और विजयसे धृति हुआ। धृतिका पुत्र धृतव्रत था। धृतव्रतसे सत्यधर्मा हुआ। सत्यधर्माका पुत्र अधिरथ था। अधिरथके कर्ण और कर्णके वृषसेन नामक पुत्र हुआ।
हरिने पुनः कहा - हे रुद्र! इसके बाद आप पुरु वंशका वर्णन सुनें।
पुरुका पुत्र जनमेजय, जनमेजयका पुत्र नमस्यु था। नमस्युका अभय तथा अभयका सुद्यु हुआ। सुद्युके बहुगति नामक पुत्रका जन्म हुआ। उसका पुत्र संजाति था। संजातिके वत्सजाति और उसके रौद्राश्व हुआ। रौद्राश्वके ऋतेयु, स्थण्डिलेयु, कक्षेयु,
कृतेयु, जलेयु और सन्ततेयु नामक श्रेष्ठ पुत्र हुए।
ऋतेयुके रतिनार नामका पुत्र हुआ। उसका पुत्र प्रतिरथ था। प्रतिरथका मेधातिथि, मेधातिथिका ऐनिल नामक पुत्र माना जाता है। ऐनिलका पुत्र दुष्यन्त था। शकुन्तलाके गर्भसे दुष्यन्तके भरत नामक पुत्र हुआ। भरतसे वितथ, वितथसे मन्यु, मन्युसे नरका जन्म माना गया है। नरके संकृति और संकृतिके गर्ग हुआ। गर्गसे अमन्यु, अमन्युसे शिनि नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई।
मन्युपुत्र महावीरसे उरुक्षय, उरुक्षयसे त्रय्यारुणि, त्रय्यारुणिसे व्यूहक्षत्र, व्यूहक्षत्रसे सुहोत्र, सुहोत्रसे हस्ती, अजमीढ तथा द्विमीढ नामक तीन पुत्र हुए। हस्तीका पुत्र पुरमीढ और अजमीढका कण्व था। कण्वके मेधातिथि हुए। इन्हींसे काण्वायन नामक गोत्र ब्राह्मणोंके हुए और वे काण्वायन कहलाये।
अजमीढसे बृहदिषु नामक एक अन्य पुत्र भी हुआ था। उस पुत्रके बृहद्धनु हुआ। बृहद्धनुके बृहत्कर्मा तथा बृहत्कर्माके जयद्रथ नामका पुत्र था। जयद्रथसे विश्वजित् और विश्वजित् से सेनजित् ,सेनजित् से रुचिराश्व, रुचिराश्वसे पृथुसेन, पृथुसेनसे पार तथा पारसे द्वीप और नृप हुए। नृपका पुत्र सृमर हुआ। पृथुसेनका एक अन्य पुत्र था, जिसका नाम सुकृति कहा गया है। सुकृतिके विभ्राज और विभ्राजके अश्वह नामक पुत्र हुआ। कृतिके गर्भसे उत्पन्न उस अश्वहके ब्रह्मदत्त नामका पुत्र था। उस पुत्रसे विष्वक्सेनने जन्म लिया।
द्विमीढके यवीनर, यवीनरके धृतिमान्, धृतिमान्के सत्यधृति नामका पुत्र हुआ। उसका पुत्र दृढनेमि था। दृढनेमिसे सुपार्श्व और सुपार्श्वसे सन्नतिका जन्म हुआ। सन्नतिका पुत्र कृत कृतका पुत्र उग्रायुध था। उग्रायुधसे क्षेम्य नामक पुत्र हुआ। उसका पुत्र सुधीर था। सुधीरसे पुरञ्जय, पुरञ्जयसे विदूरथ नामके पुत्रने जन्म लिया। अजमीढकी नलिनी नामकी एक पत्नी थी। उसके गर्भसे राजा नीलकी उत्पत्ति हुई। नीलसे शान्ति नामका पुत्र हुआ। उसका पुत्र सुशान्ति था। सुशान्तिके पुरु हुआ। पुरुका पुत्र अर्क, अर्कका हर्यश्व, हर्यश्वका मुकुल और मुकुलके यवीर, बृहद्भानु, कम्पिल्ल, सृञ्जय एवं शरद्वान् नामक पाँच पुत्र हुए। इनमें शरद्वान् परम वैष्णव था। इस शरद्वान् के अहल्या नामकी पत्नीसे दिवोदास नामक पुत्र हुआ। उसके शतानन्द हुए शतानन्दके सत्यधृति हुआ। सत्यधृतिके उर्वशीसे कृप तथा कृपी नामक दो संतानें हुईं। कृपीका विवाह द्रोणाचार्यसे हुआ था। उसी कृपीसे द्रोणाचार्यके अश्वत्थामा नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए।
दिवोदासके मित्रयु और मित्रयुके च्यवन नामका पुत्र था। च्यवनसे सुदास, सुदाससे सौदास नामक पुत्र हुआ। उसका पुत्र सहदेव था। सहदेवसे सोमक, सोमकसे जन्तु (जह्नु) और पृषत नामक महान् पुत्र उत्पन्न हुआ। पृषतसे द्रुपद, द्रुपदसे धृष्टद्युम्नकी उत्पत्ति हुई। धृष्टद्युम्नसे धृष्टकेतु हुआ।
अजमीढके एक ऋक्ष नामका पुत्र था। उस ऋक्षसे संवरण, संवरणसे कुरुका जन्म हुआ। कुरुके सुधनु, परीक्षित् और जह्नु नामके तीन पुत्र थे। सुधनुसे सुहोत्र तथा सुहोत्रसे च्यवन, च्यवनसे कृतक तथा उपरिचर वसु हुए। वसुके बृहद्रथ, प्रत्यग्र और सत्य आदि अनेक पुत्र थे। बृहद्रथसे उस पुष्पवान् से सत्यहित नामका राजा हुआ। सत्यहितसे सुधन्वा, सुधन्वासे जह्लकी उत्पत्ति हुई।
बृहद्रथका एक अन्य पुत्र था, जिसका नाम जरासन्ध था। उस जरासन्धसे सहदेव, सहदेवसे सोमापि, सोमापिसे श्रुतवान्, भीमसेन, उग्रसेन, श्रुतसेन तथा जनमेजय हुए। जह्नुके सुरथ नामक पुत्र था। सुरथके विदूरथ, विदूरथके सार्वभौम, सार्वभौमके जयसेन तथा उस जयसेनसे अवधीत हुआ। उस अवधीतसे अयुतायु, अयुतायुसे अक्रोधन, अक्रोधनसे अतिथि, अतिथिसे ऋक्ष, ऋक्षसे भीमसेन, भीमसेनसे दिलीप, दिलीपसे प्रतीप, प्रतीपसे देवापि, शन्तनु और बाह्लीक नामके राजा तीन सहोदर भ्राता हुए।
बाह्लीकसे सोमदत्त हुआ। सोमदत्तसे भूरि और भूरिसे भूरिश्रवाकी उत्पत्ति हुई। इस भूरिश्रवाका पुत्र शल था। गङ्गाके गर्भसे शन्तनुके महाप्रतापी धर्मपरायण पुत्र भीष्म हुए। उस शन्तनुकी दूसरी पत्नी सत्यवतीसे चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य नामक अन्य दो पुत्रोंका जन्म हुआ। विचित्रवीर्यकी दो पत्नियाँ थीं, जिनका अम्बिका तथा अम्बालिका नाम था। व्यासजीने अम्बिकासे धृतराष्ट्रको, अम्बालिकासे पाण्डुको तथा उनकी दासीसे विदुरजीको पैदा किया।
धृतराष्ट्रने गान्धारीसे दुर्योधनादि सौ पुत्रोंको उत्पन्न किया। पाण्डुसे युधिष्ठिर आदि पाँच पुत्र हुए। द्रौपदीसे क्रमश: प्रतिविन्ध्य, श्रुतसोम, श्रुतकीर्ति, शतानीक और श्रुतकर्मा नामक पाँच पुत्रोंका जन्म हुआ। यौधेयी, हिडिम्बा, कौशी, सुभद्रिका (सुभद्रा), विजया तथा रेणुमती नामकी पत्नीयाँ भी थीं। इनके गर्भसे देवक, घटोत्कच, अभिमन्यु, सर्वग, सुहोत्र और निरमित्र नामक पुत्र हुए। अभिमन्युके परीक्षित् तथा परीक्षितके जनमेजय नामका पुत्र हुआ।