38 - 41 - देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वररीपूजन - विधि

श्रीहरिने कहा - हे रुद्र! नवमी आदि तिथियोंमें 'ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षिणि' - इस मन्त्रसे देवी दुर्गाका पूजन करना चाहिये। मार्गशीर्ष (अगहन) - मासकी तृतीया तिथिसे आरम्भ करके नामक्रमके अनुसार गौरी, काली, उमा, दुर्गा, भद्रा, कान्ति, सरस्वती,

मङ्गला, विजया, लक्ष्मी, शिवा और नारायणीरूपमें उन देवीका पूजन करनेवाले अधिकृत मनुष्यका इष्ट (प्रियजनों या प्रिय वस्तुओं )- से वियोग नहीं होता।

दुर्गदेवीके अट्ठारह हाथ हैं। उन हाथोंमें खेटक, ( खेटक-'खेटति भयमुत्पादयति अनेन इति खेटकः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भय उत्पन्न करनेवाली यष्टि (दण्ड विशेष) - को खेटक या खेट कहते हैं। यह देवीके हाथमें रहता है - यष्टिरूपेण खेट त्वमरिसंहारकारक:। देवीहस्तस्थितो नित्यं मम रक्षां कुरुष्व च॥ (शारदीय दुर्गापूजापद्धति, अस्त्र- पूजा - प्रकरण) घण्टा, दर्पण, तर्जनी - मुद्रा, धनुष, ध्वज, डमरू, परशु, पाश, शक्ति, मुद्रर , शूल, कपाल, शरक (बाण), अंकुश, वज्र, चक्र और शलाका - ये सभी सुशोभित रहते हैं। इनसे सुसज्जित उन अष्टादशभुजा देवीका स्मरण करना चाहिये।

अट्ठाईस भुजावाली या अट्ठारह भुजावाली अथवा बारह भुजावाली या आठ भुजा अथवा चार भुजावाली दुर्गादेवीका भी ध्यान करना चाहिये। महिषासुरका वध करनेवाली वे देवी सिंहपर विराजमान रहती हैं।

वासुदेवने कहा - हे रुद्र! सूर्यार्चनमें भगवान्‌ सूर्यका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये - वे भगवान्‌ सूर्य तेज:स्वरूप, रक्त वर्णवाले, श्वेत पद्मपर विराजमान, एक चक्रवाले रथपर समासीन, दो भुजाओंसे युक्त तथा कमल धारण करनेवाले हैं। इस रूपमें उनका सदैव ध्यान करना चाहिये।

श्रीहरिने पुन: कहा - हे वृषध्वज! [ अब] मैं माहेश्वरी - पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनो - पहले स्नान तथा आचमन कर ले। इसके बाद आसनपर बैठकर न्यास करके मण्डलमें महेश्वरकी पूजा करे। हे महेशान! हरकी पूजा परिवारके साथ करे। हे रुद्र! 'ॐ हां शिवासनदेवता आगच्छत' - इस मन्त्रसे आसनके देवताओंका आवाहन करे। मण्डलके मुख्य द्वारपर स्नान, गन्‍ध आदिद्वारा 'ॐ हां गणपतये नमः' मन्त्रसे गणपतिकी, 'ॐ हां सरस्वत्यै नम:' मन्त्रसे सरस्वतीकी, 'ॐ हां नन्दिने नमः' मन्त्रसे नन्दीकी, 'ॐ हां महाकालाय नमः' मन्त्रसे महाकालकी, 'ॐ हां गङ्गायै नमः' मन्त्रसे गङ्गाकी, 'ॐ हां लक्ष्म्यै नमः' मन्त्रसे लक्ष्मीकी, 'ॐ हां महाकलायै नमः' मन्त्रसे महाकलाकी तथा 'ॐ हां अस्त्राय नमः' मन्त्रसे अस्त्रकी पूजा करे।

इसी प्रकार 'ॐ हां ब्रह्मणे वास्त्वधिपतये नमः 'से वास्त्वधिपतिकी, 'ॐ हां गुरुभ्यो नमः' से गुरुकी, 'ॐ हां आधारशक्तयै नमः' से आधारशक्तिकी, 'ॐ हां अनन्ताय नमः' से अनन्तकी, 'ॐ हां धर्माय नमः से धर्मकी, 'ॐ हां ज्ञानाय नमः' से ज्ञानकी, 'ॐ हां वैराग्याय नम: 'से वैराग्यकी, 'ॐ हां ऐश्वर्याय नमः 'से ऐश्वर्यकी, 'ॐ हां अधर्माय नमः' से अधर्मकी, 'ॐ हां अज्ञानाय नमः' से अज्ञानकी, 'ॐ हां अवैराग्याय नमः' से अवैराग्यकी, 'ॐ हां अनैश्वर्याय नम:' से अनैश्वर्यकी, 'ॐ हां

ऊदर्ध्वच्छन्दाय नम:' से ऊद्रर्ध्वच्छन्दकी, ' ॐ हां अधशछन्दाय नमः' से अधश्छन्दकी, 'ॐ हां पद्माय नमः' से पद्मकी, 'ॐ हां कर्णिकायै नमः' से कर्णिकाकी, 'ॐ हां वामायै नमः' से वामाकी, 'ॐ हां ज्येष्ठाये नमः' से ज्येष्टाकी, 'ॐ हां रौद्रयै नमः' से रौद्रीकी, 'ॐ हां काल्यै नमः' से कालीकी, 'ॐ हां कलविकरण्यै नमः' से कलविकरणीकी, 'ॐ हां बलप्रमथिन्यै नमः' से बलप्रमधिनीकी, 'ॐ हां सर्वभूतदमन्यै नमः' से सर्वभूतदमनीकी, 'ॐ हां मनोन्मन्यै नमः' से मनोन्मनीकी, 'ॐ हां मण्डलत्रितयाय नमः 'से मण्डलत्रितयकी, 'ॐ हां हौं हं शिवमूर्तये नमः 'से शिवमूर्तिकी, 'ॐ हां विद्याधिपतये नमः' से विद्याधिपतिकी और 'ॐ हां हीं हौं शिवाय नम:' से शिवकी पूजा करे। अनन्तर 'ॐ हां हृदयाय नमः' से हृदयकी, 'ॐ हीं शिरसे नमः' से सिरकी, 'ॐ हूं शिखायै नमः' से शिखाकी, 'ॐ हैं कवचाय नमः' से कवचकी, 'ॐ हों नेत्रत्रयाय नमः' से नेत्रत्रयकी, 'ॐ हः अस्त्राय नमः' से अस्त्रकी और 'ॐ हां सद्योजाताय नमः' से सद्योजातकी पूजा करे।

सद्योजातकी आठ कलाएँ जाननी चाहिए, जो पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित हैं। उनकी पूजा [गन्ध आदिसे] इस प्रकार करनी चाहिये -'ॐ हां सिद्ध्यै नमः' से सिद्धिकी, 'ॐ हां ऋद्धयै नमः' से ऋद्धिकी, 'ॐ हां विद्युतायै नम:' से विद्युताकी, 'ॐ हां लक्ष्यै नमः' से लक्ष्मीकी, 'ॐ हां बोधायै नमः' से बोधाकी, 'ॐ हां काल्यै नम:' से कालीकी, 'ॐ हां स्वधायै नमः' से स्वधाकी और 'ॐ हां प्रभायै नमः' से प्रभाकी अर्चना करनी चाहिये।

हे वृषध्वज! वामदेवकी तेरह कलाएँ जाननी चाहिये, उनकी भी पूजा गन्ध - पुष्प आदिसे करनी चाहिये। उनकी पूजामें पहले 'ॐ हां वामदेवाय नमः' कहकर वामदेवकी पूजा करनेके बाद उनकी कलाओंका पूजन करना चाहिये। जैसे -'ॐ हां रजसे नमः' से रजस्की, 'ॐ हां रक्षायै नमः' से रक्षाकी, 'ॐ हां रत्यै नमः' से रतिकी, 'ॐ हां कन्यायै नमः' से कन्याकी, 'ॐ हां कामाये नमः' से कामाकी, 'ॐ हां जनन्यै नमः' से जननीकी, 'ॐ हां क्रियायै नमः' से क्रियाकी, 'ॐ हां वृद्धयै नमः' से वृद्धिकी, 'ॐ हां कार्यायै नम:' से कार्याकी, 'ॐ हां रा (धा) - त्र्यै नमः'से रा (धा) - त्रि (त्री) - की, 'ॐ हां भ्रामण्यै नमः'से भ्रामणीकी, 'ॐ हां मोहिन्यै नमः' से मोहिनीकी और 'ॐ हां क्ष (त्व)रायै नमः' से क्ष (त्व) - राकी अर्चना करनी चाहिये।

हे वृषध्वज! तत्पुरुषकी चार कलाएँ हैं। पहले 'ॐ हां तत्पुरुषाय नमः' इस मन्त्रद्वारा तत्पुरुषकी पूजा करे। तदनन्तर 'ॐ हां निवृत्यै नमः' से निवृत्तिकी, 'ॐ हां प्रतिष्ठायै नमः' से प्रतिष्ठाकी, 'ॐ हां विध्यायै नमः' से विध्याकी और 'ॐ हां शान्त्यै नमः' से शान्तिकी पूजा करनी चाहिये।

अघोरकी भैरव - सम्बन्धी छः कलाएँ जाननी चाहिये। इनकी पूजामें पहले 'ॐ हां अघोराय नमः' मन्त्रद्वारा अघोरकी पूजा करनेके पश्चात्‌ 'ॐ हां उमायै नम:' से उमाकी, 'ॐ हां क्षमायै नमः' से क्षमाकी, 'ॐ हां निद्रायै नमः' से निद्राकी, 'ॐ हां व्याध्यै नमः' से व्याधिकी, 'ॐ हां क्षुधाये नमः' से क्षुधाकी तथा 'ॐ हां तृष्णायै नमः'- से तृष्णाकी पूजा करनी चाहिये।

हे वृषभध्वज! ईशान देवकी पाँच कलाएँ हैं, इनकी पूजामें 'ॐ हां ईशानाय नमः' इस मन्त्रसे ईशानकी पूजा करनेके पश्चात्‌ 'ॐ हां समित्यै नमः' से समितिकी, 'ॐ हां अङ्गदायै नमः' से अङ्गदाकी, 'ॐ हां कृष्णायै नमः' से कृष्णाकी, 'ॐ हां मरीच्यै नम:' से मरीचिकी और 'ॐ हां ज्वालायै नम:' से ज्वालाकी पूजा करे।

तदनन्तर हे शङ्कर! 'ॐ हां शिवपरिवारेभ्यो नमः' से शिवपरिवारका, 'ॐ हां इन्द्राय सुराधिपतये नमः' से सुराधिपति इन्द्रका, 'ॐ हां अग्नये तेजोऽधिपतये नमः' से तेजोऽधिपति अग्निका, 'ॐ हां यमाय प्रेताधिपतये नम: ' से प्रेताधिपति यमका, 'ॐ हां निऋतये रक्षोऽधिपतये नम: 'से रक्षोऽधिपति निर्ऋतिका, 'ॐ हां वरुणाय जलाधिपतये नमः 'से जलाधिपति वरुणका, 'ॐ हां वायवे प्राणाधिपतये नमः' से प्राणाधिपति वायुका, 'ॐ हां सोमाय नेत्राधिपतये नमः' से नेत्राधिपति सोमका, 'ॐ हां ईशानाय सर्वविद्याधिपतये नम:' से सर्वविद्याधिपति ईशानका, 'ॐ हां अनन्ताय नागाधिपतये नमः' से नागाधिपति अनन्तका, 'ॐ हां ब्रह्मणे सर्वलोकाधिपतये नमः' से सर्वलोकाधिपति ब्रह्माका और 'ॐ हां धूलिचण्डेश्वराय नम:' से धूलिचण्डेश्वर का आवाहन, स्थापन, संनिधान, संनिरोध तथा सकलीकरण करना चाहिये।

तदनन्तर तत्त्व - न्यास करके मुद्रा दिखानी चाहिये तथा ध्यान करना चाहिये। इसके बाद पाद्य, आचमन, अर्घ्य, पुष्प, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन और स्नान तथा सुगन्धानुलेपन, वस्त्र, अलंकार, भोग, अङ्गन्यास, धूप, दीप, नैवेद्य-अर्पण, करोद्वर्तन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, गन्ध एवं ताम्बूल निवेदन करनेके बाद गीत, वाद्य, नृत्यसे महेश्वरको संतुष्टकर छत्र आदि समर्पित करना चाहिये। मुद्राका प्रदर्शन करके आवाहित देवके रूपका ध्यान, जप तथा तादात्म्यभावसे मूलमन्त्र द्वारा जप और पूजाको समर्पित करे।

इस प्रकार विविध कामनाओंकी सिद्धिके लिये विश्वावसु गन्धर्व तथा देवी कालरात्रि आदिकी उपासना करनी चाहिये।